भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २५
केचित्—अन्यत्रान्यधर्माध्यास-इति वदन्ति । केचित्तु - यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रह-
भामती रजतस्य, ज्ञानाकारस्येति यावत्, अध्यासोऽन्यत्र बाह्ये । सौत्रान्तिकनये तावद् बाह्यमस्ति वस्तुसत्तन्न ज्ञानाकारस्यारोपः । विज्ञानवादिनामपि यद्यपि न बाह्यं वस्तुसत्तथाप्यनाद्यविद्यावासनाटोपितमलीकं बाह्यं, तत्र ज्ञानाकारस्यारोपः । उपपत्तिश्च यद्यादृशमनुभवसिद्धं रूपं तत्तादृशमेवाभ्युपेयमित्युत्सर्गोऽन्यथात्वं पुनरस्य बलवद्बाधकप्रत्ययवशान्नेदं रजतमिति च बाधस्येदन्तामात्रवाधेनोपपत्तौ न रजतगोचरतोचिता । रजतस्य धर्मिणो बाधे हि रजतं च तस्य च धर्मं इदन्ता बाधिते भवेताम्, तद्वरमिदन्तैवास्य धर्मो बाध्यतां न पुना रजतमपि धर्मि, तथा च रजतं बहिर्बाधितमर्यादान्तरे ज्ञाने व्यवतिष्ठत इति ज्ञानाकारस्य बहिरध्यासः सिध्यति ।
केचित्तु ज्ञानाकारख्यातावपरितुष्यन्तो वदन्ति ꣸ यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रहनिबन्धनो भ्रम इति ꣸ । अपरितोषकारणं चाहुः—विज्ञानाकारता रजतादेरनुभवाद्व्यवस्थाप्येतानुमानाद्वा ? तत्रानुमानमुपरिष्टान्निराकरिष्यते । अनुभवोऽपि रतजप्रत्ययो वा स्याद्, बाधकप्रत्ययो वा ? न तावद्रजतानुभवः । स हीदङ्कारास्पदं रजतमावेदयति न त्वान्तरम्, अह्मिति हि तदा स्यात् प्रतिपत्तुः प्रत्ययादव्यतिरेकात् ।
भामती-व्याख्या
( १ ) आत्मख्याति—बौद्धों का योगाचार निकाय अन्य पदार्थ ( ज्ञान ) के रजतादि धर्मों ( आकारों ) का आरोप अन्य पदार्थ ( बाह्य वस्तु ) में किया करता है । सौत्रान्तिक मत में बाह्य वस्तु अनुमित है, उसमें ज्ञान के आकार का समारोप हो सकता है । योगाचार के मत में यद्यपि बाह्य वस्तु सत् नहीं, तथापि अनादि अविद्या-वासना के द्वारा आरोपित अलीक बाह्य पदार्थ माना जाता है, उसी में ज्ञान के रजतादि आकारों का अध्यास हो जाता है । इस पक्ष में उपपत्ति का प्रदर्शन इस प्रकार किया जाता है कि जो वस्तु जैसी अनुभव में आती है, उसे वैसा ही स्वीकार करना चाहिए—ऐसा नैसर्गिक नियम है । उसका अन्यथाकरण तो किसी प्रबल बाधक प्रत्यय के बल पर ही सम्भव हो सकता है । ‘नेदं रजतम्’—इस बाध की चरितार्थता जब रजतगत केवल इदन्ता धर्म का बाध कर देने मात्र से हो जाती है, तब रजतरूप धर्मी का वह बाध नहीं कर सकता, क्योंकि रजतरूप धर्मी का भी बाध करने पर रजत और उसके धर्मभूत इदन्ता—इन दोनों का बाध करना होगा, उससे लाघव तो इसी में है कि रजत के केवल ‘इदन्ता’ धर्म का ही बाध किया जाय, रजतरूप धर्मी का नहीं । रजत बाहर बाधित होकर आन्तरिक ज्ञान में अवस्थित हो जाता है । इस प्रकार ज्ञान के आकार का बाहर आरोप उपपन्न हो जाता है ।
( २ ) अख्याति—कतिपय विद्वान् विज्ञानाकार ख्याति से सन्तुष्ट न होकर कहते हैं कि “यत्र यदध्यासस्तद्विवेकाग्रहनिबन्धनो भ्रमः” अर्थात् शुक्त्यादि में जो रजतादि का अध्यास कहा जाता है, वह वस्तुतः शुक्ति और रजत का भेद-ग्रह न रहने के कारण ‘इदं रजतम्’—ऐसे ज्ञान में भ्रमरूपता का व्यवहार होने लग जाता है । ये लोग आत्मख्याति में अपनी अरुचि का कारण यह बताते हैं कि बाह्य पदार्थ में रजताकारता का जो आरोप माना जाता है, वह अनुभव के आधार पर वैसा माना जाता है ? अथवा अनुमान के बल पर ? अनुमान का निराकरण आगे तर्कपाद में किया जायगा । अनुभव वहाँ दो होते हैं—(१) इदं रजतम् और (२) नेदं रजतम् । ‘इदं रजतम्’—यह अनुभव रजत की ज्ञानाकारता में प्रमाण नहीं हो सकता, क्योंकि वह रजत को इदन्त्वेन बाहर सिद्ध करता है आन्तरिक ज्ञानाकारता का व्यवस्थापक नहीं हो सकता । रजत को ज्ञान का आकार मानने पर ‘इदं रजतम्’— ऐसा अनुभव न होकर ‘अहं रजतम्’—ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, क्योंकि विज्ञानवाद में विज्ञान