भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२४शारीरकशङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

नापि सदसद्, परस्परविरोधादिति अनिर्वाच्यमेवारोपणीयं मरीचिषु तोयमास्थेयं तदनेन क्रमेणाध्यस्तं तोयं परमार्थतोयमिव । अत एव पूर्वदृष्टमिव । तत्त्वतस्तु न तोयं न च पूर्वदृष्टं किं त्वनृतमनिर्वाच्यम् । एवं च देहेन्द्रियादिप्रपञ्चोऽप्यनिर्वाच्योऽपूर्वोऽपि पूर्वमिथ्याप्रत्ययोपदर्शित इव परत्र चिदात्मन्यध्यस्यत इति उपपन्नमध्यासलक्षणयोगाद् देहेन्द्रियादिप्रपञ्चबाधनं चोपपादयिष्यते । चिदात्मा तु श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणगोचरस्तन्मूलतदविरुद्धन्यायनिर्णीतशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः सत्त्वेनैव निर्वाच्यः । अबाधिता स्वयम्प्रकाशतैवास्य सत्ता सा च स्वरूपमेव चिदात्मनो न तु तदतिरिक्तं सत्तासामान्यसमवायोऽर्थक्रियाकारिता वा इति सर्वमवदातम् ।

स चायमेवंलक्षणकोऽध्यासोऽनिर्वचनीयः सर्वेषामेव सम्मतः परीक्षकाणां तद्भेदे परं विप्रतिपत्तिरित्त्यनिर्वचनीयतां द्रढयितुमाह ॐ तं केचिदन्यत्रान्यधर्माध्यास इति वदन्ति ॐ । अन्यधर्मस्य, ज्ञानधर्मस्य

भामती-व्याख्या

खपुष्प के समान अत्यन्त अलीक कहना युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि अत्यन्त अलीक पदार्थ कभी अनुभव का विषय नहीं हो सकता । परिशेषतः अध्यस्यमान जलादि पदार्थों को सत्, असत् और सदसदुभयरूप न मानकर अनिर्वाच्य ही मानना होगा, अतः अध्यस्त जल व्यावहारिक जल के समान अत एव पूर्व-दृष्ट जैसा है । वस्तुतः न तो वह जल है और न पूर्वदृष्ट किन्तु अनृत और अनिर्वाच्यमात्र है । इस प्रकार देह इन्द्रियादि प्रपञ्च भी अनिर्वाच्य है, अपूर्व ( पूर्व सत् न ) होने पर भी मिथ्या ज्ञान के द्वारा पूर्व उपदर्शित एवं चिदात्मरूप अधिष्ठान में अध्यस्त है—यह उपपन्न हो गया, क्योंकि अध्यास का लक्षण उनमें घट जाता है ।

देह और इन्द्रियादि प्रपञ्च बाधित होने के कारण अनृत या मिथ्या है, इसके बाध का उपपादन आगे किया जायगा किन्तु चिदात्मा श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणादि में परमार्थ वस्तुत्वेन निर्णीत एवं श्रुतिमूलक उपक्रमादि न्यायों से अवधारित है, अतः शुद्ध, बुद्ध मुक्त स्वभाव के आत्मा का सत्त्वेन निर्वचन करना होगा । चिदात्मा की जो अबाधित स्वयं प्रकाशता है, वही उसका सत्त्व है, उससे अतिरिक्त सत्तारूप महासामान्य ( जाति ) का समवाय या अर्थक्रियाकारित्व को सत्त्व नहीं माना जाता [ सत् पदार्थों की सत्ता का निर्वचन दार्शनिकों ने विभिन्न प्रकार से किया है—वैशेषिकाचार्यों ने सत्ता नाम की एक जाति मानी है, जो द्रव्य, गुण और कर्म—इन पदार्थों में रहती है—"सामान्यं द्विविधम् परमपरं चानुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । तत्र परं सत्ता महाविषयत्वात्" ( प्र. भा. पृ. २६ ) । इसी के आधार पर सत्ता-समवायवान् पदार्थ को सत् और 'सत्तासमवाय' ( व्योम. पृ. १२६ ) को सत्त्व कहा गया है । बौद्धों ने सत्ता का लक्षण किया है—"सत्ता अर्थक्रियास्थितिः" ( प्र. वा. १११ ) किन्तु वेदान्त में 'सतो भावः सत्ता'—ऐसा भावार्थक 'तल्' प्रत्यय न कर 'देवता' शब्द के समान स्वार्थ में 'तल्' प्रत्यय मानकर सद्रूप ही सत्ता मानी है । वार्तिककार कहते हैं—

प्रकृत्यर्थातिरेकेण प्रत्ययार्थो न विद्यते ।
सत्तैत्यत्र ततः स्वार्थस्तद्धितोऽत्र भवन् भवेत् ॥ ( बृह. वा. पृ. १६७८ )

वैशेषिक-सम्मत सत्ता का निरास बौद्धों ने भी किया है—सच्छब्दनिमित्तं हि सतो भावः सत्ता, द्रव्यं प्रकृत्यर्थः, द्रव्यात्मसंग्रहः प्रत्ययार्थः । सक्रिया वोपचारसत्तारूपा । वैशेषिकसत्ता नोभयम्, अर्थान्तरत्वात्" ( अभिधर्मप्र. पृ. ६ ) ] ।

उक्त अनिर्वचनीय अध्यास प्रायः सभी दार्शनिकों को सम्मत है, केवल उसके स्वरूप विशेष में विप्रतिपत्ति ( मतभेद ) है, उसे दिखाने के लिए कहा गया है—"तं केचिदन्यत्रान्यधर्माध्यास इति वदन्ति" ।