भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३


भामती

चराः स्युः, न सतस्त्वास्तदात्मना मरीचीनामसत्त्वात् । द्विविधं च वस्तूनां तत्त्वं सत्त्वमसत्त्वं च, तत्र पूर्वं स्वतः परं तु परतः । यथाहु—

"स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मके ।
वस्तुनि ज्ञायते किञ्चिद्रूपं कैश्चित्कदाचन ॥” इति ।

तत् किं मरीचिषु तोयनिर्भासप्रत्ययस्तत्त्वगोचरः ? तथा च समीचीन इति न भ्रान्तो नापि बाध्येत । अद्धा न बाध्येत, यदि मरीचीनतोयात्मत्सत्त्वान् अतोग्दात्मना गृह्णीयात् । तोयात्मना तु गृह्णन् कथमभ्रान्तः कथं वाऽबाध्यः ? हन्त तोयाभावात्मनां मरीचीनां तोयभावात्मत्वं तावन्न सत्, तेषां तोया-भावादभेदेन तोयभावात्मतानुपपत्तेः । नाप्यसत्, वस्त्वन्तरमेव हि वस्त्वन्तरस्यासत्त्वमास्थीयते भावा-न्तरमभावोऽन्यो न कश्चिदनिरूपणादिति वदद्भिः । न चारोपितं रूपं वस्त्वन्तरं तद्धि मरीचयो वा भवेद्, गङ्गादिगतं तोयं वा ? पूर्वस्मिन् कल्पे मरीचय इति प्रत्ययः स्यात् न तोयमिति । उत्तरस्मिंस्तु गङ्गायां तोयमिति स्यान्न पुनरिहेति । देशभेदास्मरणे तोयमिति स्यान्न पुनरिहेति । न चेदमत्यन्तमसन्निभ्रस्तसमस्त-स्वरूपमलीकमेवास्त्विति साम्प्रतम् , नाप्यसत्, तस्यानुभवगोचरत्वानुपपत्तेरित्युक्तमधस्तात् । तस्मान्न सत्


भामती-व्याख्या

समाधान— असत् ( निस्तत्त्व ) भी अनुभव का विषय होता है । यदि वह अनुभव का विषय नहीं होता, तो क्या मरु-मरीचियाँ भी जलरूप में सतत्त्व ( सत् ) है कि अनुभव का विषय हो जाती हैं ? यदि कहा जाय कि 'जलरूप में मरीचियाँ असत् हैं । वस्तुओं का तत्त्व दो प्रकार का होता है—( १ ) सत्त्व और ( २ ) असत्त्व, जैसा कि न्यायभाष्यकार ने कहा है—"सतः सद्भावः, असतश्चासद्भावस्तत्त्वम्” ( न्या. सू. १।१।१ ) । इनमें प्रथम ( सत्त्व ) स्वतः ( पर-निरपेक्ष ) और द्वितीय ( असत्त्व ) परतः ( पर-सापेक्ष या प्रतियोगिनिरूपित ) होता है, जैसा कि श्री कुमारिलभट्ट ने कहा है—

स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मके ।
वस्तुनि ज्ञायते किञ्चिद्रूपं कैश्चित्कदाचन ॥” ( श्लो. वा. पृ. ४७६ )

[ अर्थात् सभी पदार्थ स्वरूपतः सत् और पर-रूप से असत् होते हैं, जैसे घट घटत्वेन सत् और पटत्वेन असत् होता है । उन रूपों में किसी को कभी एक रूप और कभी अन्य रूप प्रतीत होता है ] ।' तो वैसा कहना समुचित नहीं, क्योंकि तब तो मरु-मरीचियों में जलज्ञान क्या तत्त्वगोचर है? यदि ऐसा है, तब वह समीचीन ज्ञान है, भ्रम नहीं, अतः उसका बाध नहीं होना चाहिए । यदि कहें कि वह तब बाधित न होता, जब कि अजलरूप से मरीचियों को वह ग्रहण करता, किन्तु जलरूपेण मरीचियों का ग्रहण करता है, अतः वह समीचीन ( अभ्रमरूप ) क्यों होगा और अबाध्य क्योंकर होगा ? तो वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि जल से भिन्न मरीचियों में जलरूपता सत् नहीं, अन्यथा जलाभाव और जलभाव का अभेद प्रसक्त होगा । मरीचियों में जलरूपता को असत् भी नहीं कह सकते, क्योंकि यह कहा जा चुका है कि अन्य वस्तु की अन्यरूपता ही असत्त्व है—"भावान्तरमभावोऽन्यो न कश्चिदनिरूपणात्” ( श्लो. वा. पृ. ५६६ ) । आरोपित जलादि पदार्थ तृतीय वस्तु नहीं हो सकता । आरोपित जल या तो मरीचिरूप होगा या गङ्गादिगत जल । मरीचिरूप मानने पर 'मरीचयः'—ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, 'जलम्'—ऐसी नहीं । गङ्गादिगत जलरूप मानने पर 'गङ्गायां जलम्'—ऐसी प्रतीति होगी, 'इह जलम्'—ऐसी प्रतीति नहीं । यदि गङ्गारूप देश का विस्मरण मान लिया जाय, तब भी 'जलम्'—ऐसी प्रतीति होगी, 'इह जलम्'—ऐसी नहीं । मरुमरीचि-जल को

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