भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

भावात्मनोपाख्येयतयास्य युज्येतानुभवगोचरता, प्रपञ्चस्य पुनरत्यन्तासतो निरस्तसमस्तसामर्थ्यस्य निस्तत्त्वस्य कुतोऽनुभवविषयभावः ? कुतो वा चिदात्मन्यारोपः ?

न च विषयस्य समस्तसामर्थ्यस्य विरहेऽपि ज्ञानमेव तत्तादृशं स्वप्रत्ययसामर्थ्यासादितादृष्टान्तसिद्धस्वभावभेदमुपजातमसतः प्रकाशनं तस्मादसत्प्रकाशनशक्तिरेवाविद्येति साम्प्रतम् , यतो येयमसत्प्रकाशनशक्तिर्विज्ञानस्य किं पुनरस्याः शक्यम् ? असदिति चेत्, किमेतत्कार्यमाहोस्विदस्या ज्ञाप्यम् ? न तावत्कार्यमसत्तस्तस्यानुपपत्तेः । नापि ज्ञाप्यं, ज्ञानान्तरानुपलब्धेः । अनवस्थापाताच्च । विज्ञानस्वरूपमेवासतः प्रकाश इति चेत्, कः पुनरेष सदसतोः सम्बन्धः ? असदधीननिरूपणत्वं सतो ज्ञानस्यासता सम्बन्ध इति चेत्, अहो बतायमतिनिर्वृत्तः प्रत्ययतपस्वी यस्यासत्यपि निरूपणमायतते, न च प्रत्ययस्तल्लाभते किञ्चित् । असत आधारत्वायोगात् । असदन्तरेण प्रत्ययो न प्रथते इति प्रत्ययस्यैवैष स्वभावो न त्वसदधीनमस्य किञ्चिदिति चेत्, अहो बतास्यासत्पक्षपातो यदयमतदुत्पत्तिरतदात्मा च तदविनाभावनियतः प्रत्यय इति । तस्मादत्यन्तासन्तः शरीरेन्द्रियादयो निस्तत्त्वा नानुभवविषया भवितुमर्हन्तीति ।

अत्र ब्रूमः— निस्तत्त्वं चेन्नानुभवगोचरस्तत्किमिदानीं मरीचयोऽपि तोयात्मना सतत्त्वा यदनुभवगो-


भामती-व्याख्या

में प्रतीयमान होने के कारण मरीच्यादि में अनुभव-विषयता बन जाती है किन्तु कर्तृत्वादि प्रपञ्च तो अत्यन्त असत् और समस्तसामर्थ्य-रहित निस्तत्त्वमात्र है, इसमें अनुभवविषयता क्योंकर होगी और इसका आत्मा में आरोप कैसे होगा ? यदि कहा जाय कि यद्यपि विषय-प्रपञ्च अत्यन्त सामर्थ्य-शून्य है, तथापि उसका ज्ञान ही ऐसा है कि वह अपने समनन्तर प्रत्यय ( स्वसजातीय और अव्यवहित पूर्व ज्ञानरूप कारण ) से ऐसा लोकोत्तर सामर्थ्य प्राप्त करता है, जो किसी बाह्य दृष्टान्त में अनुभूत नहीं, उसी सामर्थ्य के बल पर असत् पदार्थों का प्रकाश कर देता है उसकी असत्प्रकाशनशक्ति का ही नाम अविद्या कहा जाता है। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि यह जो विज्ञान की असत्प्रकाशन शक्ति है, उसका शक्य क्या है ? यदि असत् को शक्य माना जाता है, तब वह ( असत् पदार्थ ) इस शक्ति का कार्य ? अथवा उसका ज्ञाप्य है ? असत् पदार्थ को शक्ति का कार्य नहीं कह सकते, क्योंकि असत् पदार्थ में उत्पद्यमानत्वरूप कार्यत्व सम्भव नहीं। असत् को उस शक्ति का ज्ञाप्य भी नहीं कह सकते, क्योंकि ज्ञान-ज्ञाप्यता का अर्थ है—ज्ञानजन्य ज्ञान की विषयता। प्रकृत में दो ज्ञान पदार्थों का भान नहीं होता, केवल असत् का एक ही ज्ञान प्रतीत होता है। उसका भी ज्ञान मानने पर अनवस्था हो जायगी। असत् का प्रकाश उसके ज्ञान से भिन्न नहीं, अतः अनवस्था नहीं होती—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि सत् ज्ञान का असत् विषय के साथ क्या सम्बन्ध ? यदि कहा जाय कि ज्ञान अपने असद्भूत विषय के द्वारा निरूपित होता है—यही सत् और असत् का सम्बन्ध है। तो यह नहीं कह सकते, क्योंकि जिस ज्ञान का जीवन असत् पर निर्भर है, वह ज्ञान ही क्या होगा ? ज्ञान अपने ऐसे विषय पर कोई अतिशय का भी आधान नहीं कर सकता, क्योंकि असत् पदार्थ किसी भी धर्म का आश्रय नहीं बन सकता। 'ज्ञान अपने विषय पर कोई अतिशय उत्पन्न नहीं करता, अपितु असत् के बिना उसका भान नहीं हो सकता—यह ज्ञान का स्वभाव है'—ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि यह सम्भव नहीं कि जब ज्ञान न तो उस असत् से उत्पन्न है और असद्रूप है, तब असत् का अविनाभाव ( असत् के बिना न रह सकना ) ज्ञान में क्योंकर बनेगा ? फलतः देह, इन्द्रियादि अत्यन्त असत् और निस्तत्त्व हैं, उनमें अनुभव-विषयता कभी नहीं बन सकती और उसके बिना उनका आत्मा में अध्यास नहीं हो सकता।

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