भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 39

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २१

भामती

मुखादर्शोदकदेशतामाभिमुख्यं च मुखस्यारोपयतीति प्रतिबिम्बविभ्रमोऽपि लक्षितो भवति । एतेन द्विचन्द्रदिङ्मोहालातचक्रगन्धर्वनगरवंशोरगादिविभ्रमेष्वपि यथासम्भवं लक्षणं योजनीयम् ।

एतदुक्तं भवति – न प्रकाशमानतामात्रं सत्त्वं येन देहेन्द्रियादेः प्रकाशमानतया सद्भावो भवेत् । नहि सर्पादिभावेन रज्ज्वादयो वा स्फटिकादयो वा रक्तादिगुणयोगिनो न प्रतिभासन्ते, प्रतिभासमाना वा भवन्ति तदात्मानस्तद्धर्माणो वा । तथा सति मरुषु मरीचयमुच्चावचमुच्चलत्तुङ्गतरङ्गभङ्गमालेयमभ्यर्णमवतीर्णा मन्दाकिनीत्यभिसन्धाय प्रवृत्तः तत् तोयमापीय पिपासामुपशमयेत् । तस्मादकामेनापि आरोपितस्य प्रकाशमानस्यापि न वस्तुसत्त्वमभ्युपगमनीयम् । न च मरीचिरूपेण सलिलमवस्तुसत् स्वरूपेण तु परमार्थसदेव देहेन्द्रियादयस्तु स्वरूपेणापि असन्त इत्यनुभावगोचरत्वात्कथमारोध्यन्त इति साम्प्रतम् , यतो यद्यसन्तो नानुभवगोचराः कथं तर्हि मरीच्यादीनामसतां तोयतयानुभवगोचरत्वम् ? न च स्वरूपसत्त्वेन तोयात्मनापि सन्तो भवन्ति । यद्युच्येत नाभावो नाम भावादन्यः कश्चिदस्ति अपि तु भाव एव भावान्तरात्मनाऽभावः स्वरूपेण तु भावः । यथाहूः—“भावान्तरमभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षयेति ।” ततश्च

भामती-व्याख्या

करती हैं । रश्मियों के मोड़-तोड़ दोष के कारण मुख की ग्रीवास्थता और अनभिमुखता का भान नहीं होता । फलतः द्रष्टा के द्वारा दर्पणादि में पूर्वदृष्ट दर्पणादि का देश और आभिमुख्य अपने मुख में आरोप करके व्यवहार किया जाता है—'अहं दर्पणे मुखं पश्यामि' । इसी प्रकार 'द्विचन्द्रभ्रम', 'दिग्भ्रम', 'अलातचक्र', 'गन्धर्वनगर', 'वंशोरग' ( बाँस के दण्ड में सर्प-भ्रम ) आदि भ्रमों में भी यथासम्भव यह लक्षण घटा लेना चाहिए ।

[ आक्षेपवादी ने जो कहा था कि चिदात्मा में जो प्रकाशमानता रूप सत्ता है, वही शरीरादि में भी विद्यमान है, अतः शरीरादि को असत् या अनृत नहीं कहा जा सकता, तब सत् और असत् का मिथुनीकरण कैसे होगा ? उस पर सिद्धान्ती कहता है कि ] प्रकाशमानत्वमात्र को सत्त्व नहीं कहा जाता कि शरीर और इन्द्रियादि भी प्रकाशमान होने के कारण सत् हो जाते । येन-केन रूपेण तो असत् पदार्थ भी प्रतीयमान हो जाते हैं, जैसे सर्पत्वरूप से रज्जु, आरुण्यादि के योग से स्फटिकादि प्रतीयमान होते हैं । जो जिस रूप में प्रतीयमान होता है, वैसा सत् नहीं हो जाता, अन्यथा रज्जु भी सर्प और स्फटिकादि भी अरुण हो जायेंगे और ग्रीष्म काल में तपते मरुस्थल पर ऊपर-नीचे लहराती सघन सूर्य-रश्मियाँ ही उन्नतावनत तरङ्गावलिसंकुल जाह्नवी के रूप में मूर्तिमान हो जाएँगी और प्यास से व्याकुल मृगों के यूथ उसी गंगा का जल पीकर अपनी चिरतृषा दूर कर लेंगे । इसलिए आरोपित पदार्थों की प्रकाशमानता को वस्तुसत्ता नहीं मानना चाहिए । यदि कहा जाय कि मरु-जल तो किरणों के रूप में असत् होने पर भी स्वरूपेण सत् ही होता है किन्तु देह, इन्द्रियादि तो स्वरूप से भी सत् नहीं, अतः अनुभव के अविषय होने के कारण क्योंकर आरोपित होंगे ? तो वैसा कहना उचित नहीं, क्योंकि यदि असत् पदार्थ अनुभव के विषय नहीं होते, तब जल के रूप में मरु-मरीचियाँ क्यों प्रतीयमान होती हैं ? मरीचियाँ स्वरूपतः सत् हैं, तो जलरूप में सत् हो जाएँगी—ऐसा कभी नहीं हो सकता ।

शङ्का—यदि कहा जाय कि भाव से भिन्न अभाव नाम की कोई वस्तु ही नहीं होती, अपितु एक ही भाव अन्य भाव के रूप में अभाव हो जाता है, किन्तु वह स्वरूपतः भाव ही रहता है, जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—“भावान्तरमभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया” ( श्लो. वा. पृ. ५६६ ) । अर्थात् एक भाव अन्य भाव की अपेक्षा अभाव होता है, जैसे घट स्वरूपेण भावरूप होने पर भी पटादि के रूप में अभाव ही होता है । अतः भावरूप

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 39, कुल 639 में से · BharatKosha