भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

इति ॐ । स्मृते रूपमिव रूपमस्येति स्मृतिरूपः । असन्निहितविषयत्वं च स्मृतिरूपत्वं सन्निहितविषयं च प्रत्यभिज्ञानं समीचीनमिति नातिव्याप्तिः । नाप्यव्याप्तिः स्वप्नज्ञानस्यापि स्मृतिविभ्रमरूपस्यैवंरूपत्वात्तत्रापि हि स्मर्यमाणे पित्रादौ निद्रोपप्लववशादसन्निधानापरामर्शे तत्र तत्र पूर्वदृष्टस्यैव सन्निहितदेशकालत्वस्य समारोपः ।

एवं पीतः शङ्खस्तिक्तो गुड इत्यत्राप्येतल्लक्षणं योजनीयम् । तथाहि—बहिर्वनिर्गच्छत्यच्छनयनरश्मिसंपृक्तपित्तद्रव्यवत्तिनीं पीततां पित्तद्रव्यरहितामनुभवन् शङ्खं च दोषाच्छादितशुक्लिमानं द्रव्यमात्रमनुभवन् पीततायाश्च शङ्खासम्बन्धमननुभवन्नसम्बन्धाग्रहणसारूप्येण पीतं तपनीयपिण्डं पीतं बिल्वफलमित्यादौ पूर्वदृष्टं सामानाधिकरण्यं पीतत्वशङ्खत्वयोरारोप्याह पीतः शङ्ख इति । एतेन तिक्तो गुड इति प्रत्ययो व्याख्यातः ।

एवं विज्ञातृपुरुषाभिमुख्येष्वादर्शादिकेषु स्वच्छेषु चाक्षुषं तेजो लग्नपि बलीयसा सौरेण तेजसा प्रतिस्रोतः प्रवर्तितं मुखसंयुक्तं मुखं ग्राहयद् दोषवशात्तद्देशतामनभिमुखतां च मुखस्याग्राहयत् पूर्वदृष्टाभि-


भामती-व्याख्या

शङ्का को दूर करने के लिए कहा गया है—"स्मृतिरूपः" । [ "प्रशंसायां रूपप्" (पा. सू. ५।२।६६) इस सूत्र के द्वारा 'रूपप्' प्रत्यय करके जो 'स्मृतिरूप' पद निष्पन्न होता है, वह यहाँ अनुपयुक्त है, क्योंकि उससे स्मृति का प्रशस्तता या परिपूर्णता प्रतीत होती है, किन्तु यहाँ स्मृतिविषय का एक अंशमात्र विवक्षित है, अतः बहुव्रीहि समास के द्वारा 'स्मृतिरूपः' शब्द श्री मिश्र जी निष्पन्न कर रहे हैं ] 'स्मृते रूपमिव रूपमस्य'—इस प्रकार सम्पन्न 'स्मृतिरूप' पद के द्वारा असन्निकृष्टार्थविषयकत्व मात्र की उपस्थिति कराई जाती है, जिससे 'तदेवान्न गोत्वम्', 'स एवायं देवदत्तः'—इत्यादि प्रत्यभिज्ञात्मक प्रमा ज्ञान में इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि प्रत्यभिज्ञा ज्ञान सन्निहितविषयक होता है। इस लक्षण की कहीं अव्याप्ति भी नहीं, क्योंकि सभी भ्रमप्रकारों में इस लक्षण का सम्यक् समन्वय हो जाता है, जैसे कि—

( १ ) स्वाप्न ज्ञान—स्वप्न देखते समय स्मर्यमाण माता-पिता आदि पदार्थों में 'निद्रा' दोष के कारण उनकी असन्निधानता का भान नहीं हो पाता और पूर्व जाग्रत अवस्था में दृष्ट सन्निहित देश-कालवृत्तित्व का समारोप होकर 'इयं मे माता', 'अयं मे पिता' ऐसी प्रतीति हो जाती है।

( २ ) पीतः शङ्खः—ऐसा भ्रम पीलिया रोगवाले व्यक्ति को प्रायः होता है। उसके नेत्रों से निकली शुभ्र रश्मियों के साथ पीलिया का कारणीभूत कुपित पित्त द्रव्य वैसे ही चिपक जाता है, जैसे चाँदी के तारों पर सोने का रंग चढ़ा हो। उस पित्त द्रव्य को साथ चिपकाए नेत्र-रश्मियाँ बाहर निकल कर श्वेत शङ्ख पर फैल जाती है। 'अतिसामीप्य' दोष के कारण पित्त द्रव्य का ग्रहण नहीं हो पाता और पीलिया रोग के कारण शङ्खगत शुक्ल वर्ण का भान नहीं होता, पित्तगत पीत वर्ण और शङ्ख के वास्तविक असम्बन्ध का ग्रहण भी नहीं होता। जैसे 'पीतं स्वर्णपिण्डम्', 'पीतं बिल्वफलम्'—इत्यादि सत्य स्थल पर गुण और गुणी द्रव्य का असम्बन्धाग्रह होता है, वैसे ही 'पीतः शङ्खः'—इत्यादि भ्रम-स्थल पर पूर्वदृष्ट पीतत्व और तपनीयपिण्डत्वादि के सामानाधिकरण्य का पीतत्व और शङ्खत्व में आरोप करके पीलियावाला व्यक्ति व्यवहार करने लग जाता है—'पीतः शङ्खः' । इसी प्रकार 'तिक्तो गुडः' आदि भ्रमों की प्रक्रिया होती है।

( ३ ) प्रतिबिम्ब विभ्रम-स्थलों में द्रष्टा पुरुष के सम्मुखस्थ दर्पण या जलादि स्वच्छ पदार्थों पर उसकी नेत्र-रश्मियाँ जाती हैं और दर्पण-तल पर प्रसृत सूर्य के प्रखर प्रकाश से टकराकर द्रष्टा के मुख की ओर ही मुड़ जाती और मुख का ही पूर्णतया ग्रहण