भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १९
भामती
एतावता मिथ्याज्ञानमित्युक्तं भवति—तस्येदमुपख्यानं ॐ पूर्वदृष्टेत्यादि ॐ । पूर्वदृष्टस्यावभासः पूर्वदृष्टावभासः । मिथ्याप्रत्ययश्चारोपविषयारोपणीयस्य मिथुनमन्तरेण न भवतीति पूर्वदृष्टग्रहणेनानृतमारोपणीयमुपस्थापयति, तस्य च दृष्टत्वमात्रमुपयुज्यते न वस्तुसत्तेति दृष्टग्रहणम्, तथापि वर्त्तमानं दृष्टं दर्शनं नारोपोपयोगीति पूर्वेत्युक्तं, तत्र पूर्वदृष्टं स्वरूपेण सदप्यारोपणीयतयाऽनिर्व्वाच्यमित्यनृतम् । आरोपविषयं सत्यमाह ॐ परत्रेति ॐ । परत्र शुक्तिकादौ परमार्थसति, तदनेन सत्यानृतमिथुनमुक्तम् । स्यादेतत्—परत्र पूर्वदृष्टावभास इत्यलक्षणमतिव्यापकत्वात् । अस्ति हि स्वस्तिमत्यां गवि पूर्वदृष्टस्य गोत्वस्य परत्र कालाक्ष्यामवभासः । अस्ति च पाटलिपुत्रे पूर्वदृष्टस्य देवदत्तस्य परत्र माहिष्मत्यामवभासः समीचीनः । अवभासपदं च समीचीनेऽपि प्रत्यये प्रसिद्धं यथा नीलस्यावभासः पीतस्यावभास इत्यत आह ॐ स्मृतिरूप
भामती-व्याख्या
कहते हैं—"सामान्यविशेषधर्मपरिज्ञाने सति तद्विपरीतधर्माध्यारोपेण विपर्ययः सर्वत्र भवतीति । कः पुनरयं विपर्ययः ? अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययः" (न्या. सू. १।१।२) । श्री कुमारिल भट्ट ने भी मिथ्याज्ञान विपर्यय को ही माना है, जैसा कि श्लो. वा. पृ. ६१-६२ में प्रयुक्त "मिथ्यात्वाज्ञानसंशयैः" और "साक्षाद् विपर्ययज्ञानाद् लब्ध्येव त्वप्रमाणता"—इत्यादि वाक्यों से स्पष्ट है। श्री ज्ञानश्री ने भी आरोप के अर्थ में ही 'अध्यास' शब्द का प्रयोग किया—"अर्थश्चेत्कोऽध्यासतो भासतेऽन्यः स्थाप्यो वाच्यस्तत्त्वतो नैव कश्चित्" (ज्ञानश्री. पृ. २०३) । किन्तु प्राचीन आचार्य वसुबन्धु ने अध्यास के लिए उपचार शब्द का प्रयोग उचित समझा है—"आत्मधर्मोपचारो हि विविधो यः प्रवर्तते" (विज्ञप्ति. पृ. ९६) । इसकी व्याख्या में कहा गया है—"यच्च यत्र नास्ति, तत् तत्रोपचर्यते।" जपाकुसुमादि के समीपवर्ती स्फटिकादि में जपाकुसुम की अरुणिमा का उपचार (उपसंक्रमण) प्रसिद्ध ही है]।
मिथ्याज्ञान का विस्तृत लक्षण किया गया है—"परत्र पूर्वदृष्टावभासः"। 'पूर्वदृष्टस्य अवभासः पूर्वदृष्टावभासः'—इस प्रकार यहाँ षष्ठी समास है। मिथ्या ज्ञान तब तक नहीं हो सकता, जब तक आरोप के विषय (अधिष्ठान) और आरोपणीय रजतादि पदार्थों के मिथुन (युगल) की उपस्थिति न हो, अतः यहाँ 'पूर्वदृष्ट' पद के द्वारा अनृत (असत्य) आरोपणीय की उपस्थिति कराई गई है। उस (आरोपणीय पदार्थ) की केवल दृष्टता (प्रतीति) अपेक्षित है, परमार्थ सत्ता नहीं—इस तथ्य का आविष्कार 'दृष्ट' पद के द्वारा किया गया है। उसमें भी वर्तमानकालीन दर्शन उपयोगी नहीं—यह दिखाने के लिए 'पूर्व' पद का ग्रहण किया गया है। यद्यपि पूर्वदृष्ट रजतादि पदार्थ स्वरूपतः सत् (व्यावहारिक) है, प्रातिभासिक नहीं, तथापि आरोपणीयत्व (ब्रह्मज्ञानेतरज्ञानबाध्यत्व) रूप से असत् होने के कारण अनृत कहा जाता है। अध्यास के विषय (अधिष्ठान) की अनृत-विरुद्ध सत्यता प्रकट करने के लिए 'परत्र' का प्रयोग किया गया है। शुक्त्यादि पर पदार्थ रजतादि की अपेक्षा सत्य (अधिकसत्ताक) होते हैं। इस प्रकार अनृत और ऋत (सत्य) का मिथुन (जोड़ा) प्रस्तुत किया गया है।
यहाँ शङ्का होती है कि 'परत्र पूर्वदृष्टावभासः'—यह अध्यास का लक्षण निर्दुष्ट नहीं, क्योंकि स्वस्तिमती नाम की गो व्यक्ति में पूर्व दृष्ट 'गोत्व' जाति का परत्र (कालाक्षी नाम की गो व्यक्ति में) अवभास (सत्य ज्ञान) होता है। इसी प्रकार पाटलिपुत्र (पटना नगर) में पूर्व दृष्ट देवदत्त का परत्र (माहिष्मति नाम के नगर में) अवभास होता है। 'अवभास' पद सत्य ज्ञान में भी प्रयुक्त होता है, जैसे—'नीलस्यावभासः', 'पीतस्यावभासः'। इस प्रकार गोत्वादि जाति एवं देवदत्तादि व्यक्तियों की सत्य अनुभूति में प्रसक्त अतिव्याप्ति की इस