भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
समाधाता लोकसिद्धमध्यासलक्षणमाचक्षाण एवाक्षेपं प्रतिक्षिपति ॐ उच्यते—स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः ॐ । अवसन्नोऽवमतो वा भासोऽवभासः । प्रत्ययान्तरबाधश्रास्यावसादोऽवमानो वा ।
भामती-व्याख्या
(अध्यास) नहीं होता, अतः अध्यास में आरोप्यमान (अध्यस्यमान) रजतादि पदार्थों की प्रतीति का उपयोग होता है, उनकी पारमार्थिक सत्ता अपेक्षित नहीं होती ।
यहाँ जो यह शङ्का होती है कि अध्यस्यमान पदार्थ की प्रतीति हो जानेपर वह पूर्व-दृष्ट कहलाता है और पूर्व-दृष्ट पदार्थ का अन्यत्र अध्यास होता है । किन्तु अध्यास हो जाने के पश्चात् ही रजतादि की प्रतीति होती है—इस प्रकार अध्यास और प्रतीति का अन्योऽन्याश्रय प्रसक्त क्यों न होगा ? इस शङ्का का परिहार करने के लिए कहा गया है—"नैसर्गिकः" । उक्त व्यवहार स्वाभाविक (अनादि) है । प्रतीत्यादिरूप व्यवहार अनादि है, अतः उसके कारणीभूत अध्यास में भी अनादिता ध्वनित हो जाती है, फलतः पूर्व-पूर्व मिथ्याज्ञानोपदर्शित पदार्थ का उत्तरोत्तर अध्यास में उपयोग होता जाता है । बीज-वृक्ष प्रवाह के समान अनादि पदार्थों में अन्योऽन्याश्रयता नहीं मानी जाती [जिस बीज व्यक्ति से जो वृक्ष उत्पन्न होता है, यदि उसी वृक्ष व्यक्ति से उसके जनकीभूत बीज की उत्पत्ति मानी जाती है, तब अवश्य अन्योऽन्याश्रयता होगी, किन्तु अन्य बीज से अन्य वृक्ष की उत्पत्ति मानने में परस्पराश्रयता नहीं होती । इसी प्रकार प्रकृत में प्रतीति और अध्यास का अनादि प्रवाह माना जा सकता है] ।
यह बात ठीक है कि अध्यास में अध्यस्यमान की केवल पूर्व प्रतीति उपयोगी है, परमार्थ सत्ता नहीं, किन्तु गगन-कुसुम के समान अत्यन्त असत् देह, इन्द्रियादि की प्रतीति ही सम्भव नहीं, क्योंकि असत्ता का अर्थ अप्रतीयमानता और सत्ता का अर्थ प्रतीयमानता ही किया जाता है । चिदात्मा में प्रतीयमानत्वरूप ही सत्त्व माना जाता है, उससे भिन्न वैशेषिक-सम्मत सत्ता जाति का समवाय वा बौद्ध-स्वीकृत अर्थक्रियाकारित्व को यहाँ सत्त्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि वैसा मानने पर 'सत्ता' जाति में सत्ता और 'अर्थक्रियाकारित्व' धर्म में अर्थक्रियाकारिता न होने के कारण सत्तादि प्रपञ्च को असत् मानना होगा । सत्तादि में भी दूसरी सत्तादि की कल्पना करने पर अनवस्था हो जाती है । फलतः प्रकाशमानता को ही सत्ता मानना आवश्यक है । तब तो देहादि को भी सत् ही मानना होगा, असत् नहीं—'देहादयः नासन्तः, प्रतीयमानत्वात्, चिदात्मवत्' । देहादि को यदि असत् माना जाता है, तब वे प्रतीयमान न हो सकेंगे, अतः सत् और असत् का मिथुनीभाव क्योंकर होगा ? मिथुनीभाव के बिना किसका किससे भेदाग्रह होगा ? एवं भेदाग्रह सम्भव न होने पर अध्यास कैसे होगा ? इस शङ्का को हृदय में रखकर आक्षेपवादी प्रश्न करता है—"कोऽयमध्यासो नाम ?" यहाँ 'किम्' शब्द आक्षेपार्थक है अर्थात् अध्यास उपपन्न नहीं हो सकता ।
इस आक्षेप के समाधान में समाधान करनेवाला अध्यास का लोक-प्रसिद्ध लक्षण प्रस्तुत करता है—"उच्यते स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः" । 'षदॢ विशरणगत्यवसादने' इस धातु से निष्पन्न अवसाद या अवमत का अर्थ ही 'अव' उपसर्ग से अवद्योतित है, अतः अवसन्न (अवसाद-युक्त) या अवमत (तिरस्कृत) अवभास ही अध्यास का शब्दार्थ सिद्ध होता है । यहाँ अधिष्ठान-ज्ञान के द्वारा उसका बाध होना ही अवसाद या अवमान है । इस प्रकार अवभास के द्वारा मिथ्या ज्ञान विवक्षित होने पर अध्यास का संक्षिप्त लक्षण 'मिथ्याज्ञान-मध्यासः'—ऐसा पर्यवसित होता है ।