भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 35

अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १७


आह—कोऽयमध्यासो नामेति ? उच्यते—स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः । तं

भामती

योगादारोप्यस्य प्रतीतिरुपयुज्यते न वस्तुसत्तेति । स्यादेतत् — आरोप्यस्य प्रतीतौ सत्यां पूर्वदृष्टस्य समारोपः, समारोपनिबन्धना च प्रतीतिरिति दुर्वारं परस्पराश्रयत्वमित्यत आह— ꕤ नैसर्गिक इति ꕤ । स्वाभाविकोऽनादिरयं व्यवहारः । व्यवहारानादितया तत्कारणस्याध्यासस्यानादितोक्ता । ततश्च पूर्वपूर्वंमिथ्याज्ञानोपदर्शितस्य बुद्धीन्द्रियशरीरादेरुत्तरोत्तराध्यासोपयोग इत्यनादित्वाद्बीजाङ्कुरवन्न परस्पराश्रयत्वमित्यर्थः ।

स्यादेतद्—अद्धा पूर्वप्रतीतिमात्रमुपयुज्यत आरोप्ये, न तु प्रतीयमानस्य परमार्थसत्ता । प्रतीतिरेव त्वत्यन्तासतो गगनकमलिनीकल्पस्य देहेन्द्रियादेर्नोपपद्यते । प्रकाशमानत्वमेव हि चिदात्मनोऽपि सत्त्वं न तु तदतिरिक्तं सत्तासामान्यसमवायोऽर्थक्रियाकारिता वा, द्वैतापत्तेः । सत्तायाश्चार्थक्रियाकारितायाश्च सत्तान्तरार्थक्रियाकारितान्तरकल्पनेऽनवस्थापातात् प्रकाशमानतैव सत्ताऽभ्युपेतव्या । तथा च देहादयः प्रकाशमानत्वाद्भासन्तश्चिदात्मवद्, असत्त्वे वा न प्रकाशमानास्तत् कथं सन्तस्तयोर्मिथुनीभावस्तदभावे वा कस्य कुतो भेदाग्रहस्तदसम्भवे कुतोऽध्यास इत्याशयावानाह ꕤ आह आक्षेप्ता कोऽयमध्यासो नाम ?क इत्याक्षेपे ।


भामती-व्याख्या

परमार्थसत् आत्मा से अत्यन्त भिन्न शरीरादि कुछ भी वस्तुसत् नहीं, तब चिदात्मा का किसके साथ भेदाग्रह और तादात्म्य-विभ्रम होगा ? इस शङ्का का समाधान करते हुए कहा गया है—“सत्यानृते मिथुनीकृत्य” । इसका अन्वय है— “विवेकाग्रहादध्यासः” इसके साथ । यहाँ सत्य पदार्थ है—चिदात्मा और असत्य है—बुद्धि, इन्द्रिय और देहादि । इन दोनों धर्मियों को एक युगल के रूप में बुद्धिस्थ करना ही मिथुनीकरण है, क्योंकि संवृतिसत् ( संवृतिसंज्ञक अविद्या का कार्य ) और परमार्थसत् ( ब्रह्म ) का वास्तविक युगलीकरण सम्भव नहीं, परिशेषतः अभूत पदार्थ को आरोप-प्रणाली के द्वारा ही भूत वस्तु बनाकर परमार्थ तत्त्व के साथ मिथुनीकरण करना होगा—इस प्रक्रिया की सूचना देने के लिए ‘मिथुनीकृत्य’ पद में ‘च्चि’ प्रत्यय का प्रयोग किया गया है [ “कृभ्वस्तियोगे सम्पद्यकर्त्तरि च्विः” ( पा. सू. ५।४।५० ) इस सूत्र के द्वारा स्वार्थ में ‘च्चि’ प्रत्यय का जो वैकल्पिक विधान किया गया है, उसके लिए वार्त्तिककार ने कहा है—“च्चिविधावभूततद्भावग्रहणम्” । फलतः जो वस्तु जैसी नहीं है, उसका वैसा बन जाना च्वि प्रत्यय से ध्वनित होता है । प्रकृत में पारमार्थिक युगलभाव सम्भव नहीं, अतः एक पदार्थ का अध्यास करके उसका दूसरे सत्य पदार्थ के साथ युगलभाव सम्पादित किया गया है—इस तथ्य को अभिसूचित करने के लिए ‘च्चि’ प्रत्यय का यहाँ प्रयोग किया गया है । ‘संवृति’ शब्द का प्रयोग नागार्जुन ने अविद्या या अध्यास के अर्थ में किया है—

द्वे सत्ये समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना ।
लोकसंवृतिसत्यं सत्यं च परमार्थतः ॥ ( आगम. २४।८ )

चन्द्रकीर्ति ने इसकी वृत्ति में “समन्ताद्वरणं संवृत्तिरज्ञानम्” कहा है । प्रज्ञाकर गुप्त संवृति का अर्थ करते हैं—“संवृतिर्नाम विकल्पविज्ञानम्, अनादिवासनाबलायातः प्रतिभासः” ( प्र. वा. पृ. १८५ ) । श्री शान्तिदेव के बोधिचर्यावतार में श्री प्रज्ञाकरमति कहते हैं—“संव्रियते आव्रियते यथाभूतपरिज्ञानं स्वभावावरणादावृतप्रकाशनाच्च अनयेति संवृतिः, अविद्या, मोहो, विपर्यासः इति पर्यायः” ( बो. च. पं. पृ. १७० ) । फलतः संवृतिसत् का अर्थ है—आविद्यक या व्यावहारिक सत् ] । आशय यह है कि अप्रतीयमान पदार्थ का कभी आरोप