भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
वानुविधानाद्व्यवहारभावाभावयोरित्यर्थः । तदेवमध्यासस्वरूपं फलं च व्यवहारमुक्त्वा तस्य निमित्तमाह ॐ इतरेतराविवेकेन ॐ । विवेकाग्रहणेनेत्यर्थः । अथाविवेक एव कस्मान्न भवति, तथा च नाध्यास इत्यत आह ॐअत्यन्तविविक्तयोर्धर्मधर्मिणोःॐ । परमार्थतो धर्मिणोरतादात्म्यं विवेको धर्माणां चासङ्कीर्णता विवेकः ।
स्यादेतत् —विविक्तयोर्वस्तुसतोर्भदाग्रहनिबन्धनस्तादात्म्यविभ्रमो युज्यते शुक्तेरिव रजताद्भेदाग्रहे रजततादात्म्यविभ्रमः । इह तु परमार्थसतश्चिदात्मनो न भिन्नं देहाद्यस्ति वस्तुसत्तत् कुतश्चिदात्मनो भेदाग्रहः कुतश्च तादात्म्यविभ्रम इत्यत आह ॐ सत्यानृते मिथुनीकृत्य ॐ । विवेकाग्रहादध्यस्येति योजना । सत्यं चिदात्मा, अनृतं बुद्धीन्द्रियदेहादि, ते द्वे धर्मिणी मिथुनीकृत्य, युगलीकृत्येत्यर्थः । न च संवृतिपरमार्थसतोः पारमार्थिकं मिथुनमस्तीत्यभूतातद्भावात्थस्य च्वेः प्रयोगः । एतदुक्तं भवति — अप्रतीतस्यारापा-
भामती-व्याख्या
है, अपने आश्रयीभूत कर्त्ता के विना भावना उपपन्न नहीं हो सकती, अतः भावना के द्वारा कर्त्ता का आक्षेप या उन्नयन किया जाता है ]। यहाँ भी अध्यसन ओर व्यवहरण—इन दो क्रियाओं के द्वारा जो कर्त्ता उन्नीत होता है, वह एक ही है, अतः एक ही कर्त्ता की अध्यसन और व्यवहरण—इन दो क्रियाओं में अध्यसन क्रिया पूर्वकालीन है, अतः उसकी वाचकीभूत अधिपूर्वक अस् धातु के उत्तर क्त्वा प्रत्यय निष्पन्न हो जाता है । 'अधि' अव्यय पूर्व में होने के कारण “समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्” ( पा० सू० ७।१।३७ ) इस सूत्र के द्वारा क्त्वा को 'ल्यप्' का आदेश होकर 'अध्यस्य' पद सम्पन्न हो जाता है, उक्त प्रयोग का तात्पर्य 'अध्यस्य व्यवहरति लोकः'—इस प्रयोग में है ।
'अध्यस्य' पद में प्रयुक्त 'क्त्वा' प्रत्यय के द्वारा अध्यास में पूर्वकालभावित्व सूचित किया गया, अतः पूर्वकालभावी अध्यास में उत्तरभावी व्यवहार क्रिया की कारणता का स्पष्टीकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—“मिथ्याज्ञाननिमित्तो व्यवहारः”। 'मिथ्या ज्ञान' शब्द का अर्थ है—अध्यास, यही अध्यास उक्त व्यवहार का निमित्त है, अतः व्यवहार को अध्यास निमित्तक कहा गया है, क्योंकि 'अध्याससत्त्वे व्यवहारसत्त्वम्, अध्यासाभावे व्यवहाराभावः'—इस प्रकार अध्यास के भावाभाव का अनुविधान व्यवहार का भावाभाव करता है । इस प्रकार अध्यास के स्वरूप एवं उसके फलभूत व्यवहार का कथन करके उसका निमित्त कहते हैं—“इतरेतराविवेकेन”। यहाँ 'विवेक' पद से विवेक ( भेद ) का अग्रह विवक्षित है । 'विवेकाग्रह को अध्यास का निमित्त न मान कर अविवेक ( भेदाभाव ) को ही अध्यास का निमित्त क्यों नहीं माना जाता ?' इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जहाँ अविवेक या भेदाभाव है, वहाँ अध्यास हो ही नहीं सकता—यह दिखाने के लिए कहा गया है—अत्यन्त-विविक्तयोः धर्मिणोः ।” आशय यह है कि अभिन्न पदार्थ में कभी अध्यास नहीं होता, शुक्ति और रजत के समान दो नितान्त विविक्त ( भिन्न ) धर्मियों में ही अध्यास होता है, हाँ उनमें विवेक ( भेद ) का भान नहीं होना चाहिए । विवेक दो प्रकार का होता है—( १ ) दो धर्मियों का आतादात्म्य धर्मिविवेक कहलाता है और ( २ ) आरुण्यादि धर्मों का असंकीर्णत्व ( स्फटिकाद्यवृत्तित्व ) धर्मविवेक है ।
यहाँ यह शङ्का होती है कि जो दो धर्मी वस्तुतः विविक्त हों किन्तु उनके विवेक ( भेद ) का ग्रह ( भान ) न हो रहा हो, तब उनमें तादात्म्य-विभ्रम ( शुक्ति में रजतरूपतादि का भ्रम ) घटित हो जाता है, जैसे कि शुक्ति और रजत—दो वस्तुतः भिन्न पदार्थ हैं, उनका भेद-ग्रह न होने के कारण उनका 'इदं रजतम्'—इस प्रकार तादात्म्य-भ्रम हो जाता है, किन्तु