भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
| ३२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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निबन्धनो भ्रम इति । अन्ये तु-यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मत्वकल्पनामाचक्षते इति । सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभिचरति । तथा च लोकेऽ-
भामती
माभासो हुतवहानुष्णत्वानुमानवत् । यच्चोक्तं मिथ्याप्रत्ययस्य व्यभिचारे सर्वप्रमाणेष्वनाश्वास इति । तद्बोधकत्वेन स्वतः प्रामाण्यं नाव्यभिचारेणेति व्युत्पाद्योद्दूरमस्माभिः परिहृतं न्यायकणिकायामिति नेह प्रतन्यते । दिङ्मात्रं चास्य स्मृतिप्रमोषभङ्गस्योक्तम् । विस्तरस्तु ब्रह्मतत्त्वसमीक्षायामवगन्तव्य इति तदिदमुक्तम् ॐ अन्ये तु यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मकल्पनामाचक्षते इति ॐ । यत्र शुक्तिकादौ यस्य रजतादेरध्यासस्तस्यैव शुक्तिकादेर्विपरीतधर्मकल्पनं रजतत्वधर्मकल्पनमिति योजना । ननु सन्तु नाम परीक्षकाणां विप्रतिपत्तयः प्रकृते तु किमायातमित्यत आह ॐ सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभि-
भामती-व्याख्या
सभी भ्रम ज्ञानों में जो यथार्थत्व का अनुमान किया जाता है—'विभ्रमप्रत्यया यथार्थाः, प्रत्ययत्वात्' । वह अनुमान अग्नि में अनुष्णत्व-साधक अनुमान के समान ही प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित है, क्योंकि इदं रजतमित्यादि ज्ञानों में तदभाववति तत्प्रकारकत्वरूप अयथार्थत्व प्रत्यक्षतः सिद्ध है । यह जो कहा गया कि यदि किसी ज्ञान को विषय-व्यभिचारी माना गया तो सभी ज्ञानों पर से विश्वास उठ जायगा । वह संगत नहीं, क्योंकि ज्ञानगत प्रामाण्य स्वतः होता है, अव्यभिचार-प्रयुक्त नहीं । जब कि ज्ञान स्वभावतः विषय-प्रकाशक है, तब अबोधकत्व-रूप अप्रामाण्य उसमें रह ही कैसे सकता है—यह सब कुछ न्यायकणिका में कहा गया है । यहाँ तो उसका दिग्दर्शनमात्र कराया गया है, विस्तार ब्रह्मसिद्धि की व्याख्या तत्त्वसमीक्षा में किया गया है । [न्यायकणिका में अनाश्वासापत्ति का प्रतीकार करते हुए कहा गया है— "यत्तूक्तमनाश्वासादिति तदन्यत्र ( ब्र. सि. पृ. १४४ ) आचार्येण—
बोधादेव प्रमाणत्वमिति मीमांसकस्थितिम् ।
विदन्नव्यभिचारेण तां व्युदस्यत्यपण्डितः ॥
इत्यादिना प्रबन्धेन दूषितमिति नेह दूषितम् । तथापि दूषणकणिकेह सूच्यते—किमव्यभिचारित्वैव प्रामाण्यम् ? अथ तत्कारणम् ? तद्व्यापिका वा ? येन क्वचिद् व्यभिचारदर्शनात् तदभावे सति ज्ञानमात्रेऽनाश्वासः स्यात् । न तावदव्यभिचारितैव प्रामाण्यम्, अव्यभिचारिणामपि वह्न्यादौ धूमादीनां कुतश्चिन्निमित्तादनुपजनितकृशानुप्रत्ययानामप्रामाण्यं स्यात् । व्यभिचारिणामपि चक्षुरादीनां नीलादिभेदे तद्विषयज्ञानहेतूनां प्रामाण्यमिति साम्प्रतम्, प्रमितिक्रिया प्रति साधकतमत्वाभावसम्भवात्, अन्यथा काष्ठादीनामपि पाकादावपि असाधनत्वप्रसङ्गात्" ( न्या. क. पृ. १६२ ) इसी प्रकार अन्य पक्षों का भी खण्डन किया गया है । ब्रह्मसिद्धि में मण्डन मिश्र ने इस वाद का विस्तारपूर्वक निरास किया है, अतः उसकी व्याख्या तत्त्वसमीक्षा में अवश्य पूर्ण विस्तार किया गया होगा, किन्तु इस समय तक वह कहीं उपलब्ध नहीं हुई है ] ।
भाष्यकार ने अन्यथाख्याति का स्वरूप बताया है—"अन्ये तु यत्र यदध्यासस्तस्यैव विपरीतधर्मकल्पनामाचक्षते" । जिस (शुक्त्यादि) में जिस (रजतादि) का अध्यास लोक-प्रसिद्ध है, वह शुक्त्यादि में विपरीत (स्वावृत्ति) रजतत्व धर्म की कल्पना है [न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका में श्री वाचस्पति मिश्र ने कहा है—"कस्मात् पुनरयं शुक्तौ रजतार्थी प्रवर्तते न पुनः रजताभावे ? कस्माच्चेदं पुरोवर्तिद्रव्यमङ्गुल्या निर्दिश्य रजतत्वं निषेधति—नेदं रजतमिति, यदि तत्र न प्रसञ्जितं रजतत्वं पूर्वविज्ञानेन" (ता. टी. १।२।१) ]
परीक्षक विद्वानों के विवाद का पर्यवसित अर्थ बताते हुए भाष्यकार कहते हैं—
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३३
नुभवः–शुक्तिका हि रजतवदवभासते, एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति । कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ? सर्वो हि पुरोऽवस्थिते
भामती
चरति ॐ । अन्यस्यान्यधर्मकल्पनानृतता, सा चानिर्वचनीयतेत्यधस्तादुपपादितम् । तेन सर्वेषामेव परीक्षकाणां मतेऽन्यस्यान्यधर्मकल्पनानिर्वचनीयताऽवश्यम्भाविनीत्यनिर्वचनीयता सर्वतन्त्राविरुद्धोऽर्थ इत्यर्थः । अख्यातिवादिभिरकामैरपि सामानाधिकरण्यव्यपदेशप्रवृत्तिनियमस्नेहादिदमभ्युपेयमिति भावः । न केवलमियमनृतता परीक्षकाणां सिद्धाऽपितु लौकिकानामपीत्याह । ॐ तथा च लोकेऽनुभवः । शुक्तिका हि रजतवदवभासत इति ॐ । न पुना रजतमिदमिति शेषः । स्यादेतत्–अन्यस्यान्यात्मताविभ्रमो लोकसिद्धः, एकस्य त्वभिन्नस्य भेदभ्रमो न दृष्ट इति कुतश्चिदात्मनोऽभिन्नानां जीवानां भेदविभ्रम इत्यत आह ॐ एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति ॐ ।
पुनरपि चिदात्मन्यध्यासमाक्षिपति ॐ कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ॐ । अयमर्थः–चिदात्मा प्रकाशते न वा ? न चेत् प्रकाशते, कथमस्मिन्नध्यासो विषयतद्धर्माणाम् । न खल्वप्रतिभासमाने पुरोवर्त्तिनि द्रव्ये रजतस्य वा तद्धर्माणां वा समारोपः सम्भवतीति । प्रतिभासे वा न तावदयमात्माऽजड़ो घटादिवत् पराधीनप्रकाश इति युक्तम् । न खलु स एव कर्ता च कर्म च भवति, विरोधात्, परसमवेतक्रियाफलशालि हि कर्म, न च ज्ञानक्रिया परसमवायिनीति कथमस्यां कर्म ? न च तदेव
भामती–व्याख्या
“सर्वथापि त्वन्यस्यान्यधर्मावभासतां न व्यभिचरति”। अन्य वस्तु में अन्यरूपता की कल्पना ही अनृतता है, अनृतता का अर्थ अनिर्वचनीयता है—यह पहले कहा जा चुका है। सभी दार्शनिकों के मत में अन्यत्रान्यधर्मकल्पना या अनिर्वचनीयता अवश्यंभाविनी है, अतः अनिर्वचनीयता एक सर्वतन्त्र-सिद्धान्त है [ जिसका लक्षण करते हुए न्यायसूत्रकार कहते हैं—“सर्वतन्त्राविरुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः” (न्या. सू. १।१।२८) सभी दर्शनों से अविरुद्ध सिद्धान्त सर्वतन्त्रसिद्धान्त कहा जाती है ]। अख्यातिवादी प्राभाकरगणों को विवश होकर पुरोवर्ती द्रव्य में प्रवृत्ति और सामानाधिकरण्य-व्यपदेश के आधार पर यह भ्रमरूपता माननी होगी । पूर्व-निरूपित अनृतता केवल परीक्षक विद्वानों तक ही सीमित नहीं, अपितु लोक-प्रसिद्ध भी है—“तथा च लोकेऽनुभवः 'शुक्तिका हि रजतवदवभासते इति”। 'रजतमिदम्'—ऐसा लोक में अनुभव नहीं होता, अपितु 'शुक्तिका रजतवदवभासते'—ऐसा ही अनुभव होता है ।
यह जो शङ्का होती है कि लोक में अन्य वस्तु में अन्यरूपतात्मक विभ्रम तो प्रसिद्ध है, किन्तु एक अभिन्न तत्त्व में भेद-भ्रम नहीं देखा जाता, अतः एक चित्तत्त्व में अभिन्न जीवों का भेद-भ्रम क्योंकर होगा ? उस शङ्का को दूर करने के लिए कहा गया है—“एकश्चन्द्रः सद्वितीयवदिति”। जैसे एक चन्द्र में द्वित्वादि का भ्रम हो जाता है, वैसे ही एक ब्रह्म में अनेक जीवरूपता का भ्रम हो जाता है ।
अध्यास पर पुनः आक्षेप—चिदात्मा के अध्यास पर पुनः आक्षेप किया जाता है— “कथं पुनः प्रत्यगात्मन्यविषयेऽध्यासो विषयतद्धर्माणाम् ?” आक्षेपवादी का अभिप्राय यह है कि चिदात्मा प्रकाशित होता है ? या नहीं ? यदि वह प्रकाशित नहीं होता, तब उसमें विषय और उसके धर्मों का अध्यास कैसे होगा ? क्योंकि जो शुक्ति प्रतीयमान नहीं, उसमें कभी भी रजत और उसके धर्मों का आरोप नहीं होता । यदि आत्मा प्रकाशित होता है, तब जिज्ञासा होती है कि उसका प्रकाशक कौन ? यदि कहा जाय कि आत्मा अजड़ चैतन्यरूप है, अतः घटादि के समान उसका प्रकाश अन्य किसी के द्वारा सम्भव नहीं, अतः आत्मा स्वयं अपना प्रकाशक है । तब वही प्रकाशक ( प्रकाश का कर्त्ता ) और वही प्रकाश्य ( प्रकाश का
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३४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ]
भामती
स्वं च परं च, विरोधात् । आत्मान्तरसमवायाभ्युपगमे तु ज्ञेयस्यात्मनोऽनात्मत्वप्रसङ्गः । एवं तस्य तस्ये- त्यनवस्थाप्रसङ्गः ।
स्यादेतत् । आत्मा जडोऽपि सर्वार्थज्ञानेषु भासमानोऽपि कतैव न कर्म, परसमवेतक्रियाफल- शालित्वाभावात्, चैत्रवत् । यथा हि चैत्रसमवेतक्रियया चैत्रनगरप्राप्तावुभयसमवेतायामपि क्रियमाणायां नगरस्यैव कर्मता परसमवेतक्रियाफलशालित्वात् । न तु चैत्रस्य क्रियाफलशालिनोऽपि, चैत्रसमवायाद्ग- मनक्रियाया इति । तन्न, श्रुतिविरोधात् । श्रूयते हि “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इति । उपपद्यते च । तथाहि—योऽयमर्थप्रकाशः फलं यस्मिन्नर्थश्च आत्मा च प्रथेते स किं जडः, स्वयम्प्रकाशो वा ? जडश्चे- द्विषयात्मानावपि जडाविति कस्मिन् किं प्रकाशेताविशेषात्, इति प्राप्तमान्ध्यमशेषस्य जगतः । तथा चाभाणकः—'अन्धस्यैवान्धलग्नस्य विनिपातः पदे पदे' । न च निलीनमेव विज्ञानमर्थात्मानौ ज्ञापयति
भामती-व्याख्या
कर्म ) हो—ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि कर्मकारक सदैव कर्त्ता से भिन्न होता है, 'देवदत्तः ग्रामं गच्छति'—यहाँ पर ग्रामरूप कर्मकारक से भिन्न देवदत्त की गमन क्रिया से जो देवदत्त और ग्राम का संयोगरूप फल होता है, उस संयोग का आश्रय होने के कारण ग्राम को कर्म कहा जाता है, किन्तु 'आत्मा आत्मानं प्रकाशयति'—यहाँ पर प्रकाश क्रिया कर्मरूप आत्मा से भिन्न पदार्थ में नहीं रहती, फलतः कर्तृत्व और कर्मत्व का एक आधार में रहना सर्वथा विरुद्ध है, वही आत्मा स्व भी हो और पर भी—यह क्योंकर सम्भव होगा ? यदि आत्मा का प्रकाश अन्य किसी आत्मा से माना जाता है, तब प्रकाश्य भूत ( ज्ञेय या वेद्य ) आत्मा जड़ और अनात्मरूप हो जायगा एवं अन्यान्य प्रकाशक-परम्परा की कल्पना में अनवस्था भी होती है ।
यह जो कहा जाता है कि यद्यपि आत्मा अजड़ और सभी पदार्थों के ज्ञानों में भासमान है, तथापि वह कर्त्ता ही माना जाता है, कर्म नहीं, क्योंकि वह पर-समवेत क्रिया से जनित फल का आश्रय नहीं, जैसे—चैत्र । 'चैत्रो नगरं गच्छति'—यहाँ चैत्र-समवेत गमनरूप क्रिया से जनित जो फल है—चैत्र और नगर का संयोग, उस संयोग के यद्यपि चैत्र और नगर— दोनों आश्रय हैं, तथापि कर्मता नगर में ही घटती है, चैत्र में नहीं, क्योंकि वह गमन क्रिया जिस चैत्र में समवेत ( समवायसम्बन्धेन वृत्ति ) है, वह नगर से भिन्न है, अपने से नहीं, अतः पर-समवेत क्रिया-जन्य फल का आश्रय होने से नगर ही कर्म बनता है, चैत्र नहीं, क्योंकि वह स्वसमवेत क्रिया-जन्य फल का ही आश्रय है, पर-समवेत क्रिया-जन्य फल का आश्रय नहीं । इसी प्रकार आत्मा भी स्वसमवेत क्रिया-जन्य फल का ही आश्रय है, अतः वह चैत्र के समान कर्त्ता ही होता है, कर्म नहीं ।
वह कहना उचित नहीं, क्योंकि श्रुति कहती है कि वह किसी भी प्रकाश से प्रकाशित [ प्रकाश क्रिया-जन्य फल का आश्रय ] नहीं—'अगृह्यो न हि गृह्यते' ( बृ. उ. ३।६।२६ ), “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” ( तै. उ. २।१।१ ) । युक्ति-युक्त भी यही है, क्योंकि जो यह अर्थ- प्रकाशरूप फल है, जिसके होने पर अर्थ ( विषय ) और आत्मा—दोनों भासित होते हैं, वह क्या जड़ है ? अथवा स्वयंप्रकाश ? यदि जड़ है, तब विषय और आत्मा तो पहले ही जड़ हैं, फिर किससे कौन प्रकाशित होगा ? विषय भी अन्य प्रकाश से प्रकाशनीय होने के कारण जड़ और आत्मा भी वैसा ही, दोनों में कोई विशेषता नहीं कि एक से दूसरे का प्रकाश हो जाता । परिशेषतः जगत् सर्वथा प्रकाश-शून्य अन्धकारमय बन कर रह जायगा, जैसी कि कहावत प्रसिद्ध है—“अन्धस्यैवान्धलग्नस्य विनिपातः पदे पदे ।” अन्धे बैल की पूँछ पकड़ कर अन्धे व्यक्ति चल पड़े, स्थान-स्थान पर गर्त-पात होना ही था । अर्थ और आत्मा का
अध्यासविचारः ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ३५
भामती
चक्षुरादिवदिति वाच्यम्, ज्ञापनं हि ज्ञानजननं, जनितं च ज्ञानं जडं सन्नोक्तदूषणमतिवर्त्ततेति। एवमुत्तरोत्तराण्यपि ज्ञानानि जडानीत्यनवस्था। तस्मादपराधीनप्रकाशा संविदुपेत्तव्या। तथापि किमायातं विषयात्मनोः स्वभावजडयोः ? एतदायातं यत्तयोः संविज्जड़ेति। तत्किं पुत्रः पण्डित इति पितापि पण्डितोऽस्तु ? स्वभाव एष संविदः स्वयम्प्रकाशाया यदर्थात्मसम्बन्धितेति चेत्, हन्त पुत्रस्यापि पण्डितस्य स्वभाव एष यत् पितृसम्बन्धितेति समानम्। सहार्थात्मप्रकाशेन संवित्प्रकाशो न स्वार्थात्मप्रकाशं विनेति तस्याः स्वभाव इति चेत्, तत्किं संविदो भिन्नौ संविदर्थात्मप्रकाशौ। तथा च न स्वयम्प्रकाशा संविन्न च संविदर्थात्मप्रकाश इति। अथ संविदर्थात्मप्रकाशौ न संविदो भिद्येते, संविदेव तौ। एवं चेत्, यावदुक्तं भवति संविदात्माथौ सहेति तावदुक्तं भवति संविदर्थात्मप्रकाशौ सहेति, तथा च न विवक्षितार्थसिद्धिः। न चातीतानागतार्थगोचरायाः संविदोऽर्थसहभावोऽपि। तद्विषयहानोपादानोपेक्षाबुद्धि-
भामती-व्याख्या
प्रकाश स्वयं अप्रकाशित रह कर ही चक्षुरादि के समान यदि अर्थ और आत्मा का प्रकाशक माना जाता है, तब भो कथित जगदान्ध्यरूप दोष से पीछा नहीं छूटता, क्योंकि विषय के प्रकाशक या ज्ञापन का अर्थ होता है—विषय के ज्ञान को जन्म देना, उक्त प्रकाश से जनित ज्ञान भी जड़ ही है, अतः वह भी स्वयं दूसरे का प्रकाश क्योंकर कर सकेगा ? इसी प्रकार कल्प्यमान उत्तरोत्तर ज्ञान व्यक्तियाँ भी जड़ ही मानी जाएँगी, इस प्रकार परप्रकाशवाद में अनवस्था दोष प्रसक्त होता है, अतः स्वयंप्रकाश ज्ञान तत्त्व को ही मानना चाहिए।
विषय और आत्मा के ज्ञान को स्वयंप्रकाश मान लेने से स्वभावतः जड़भूत विषय और आत्मा पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। इस प्रश्न का उत्तर यह है कि स्वयंप्रकाश ज्ञान में प्रकाशमानता स्वतः सिद्ध है, ज्ञानगत प्रकाशमानता के बल पर ज्ञान के विषयीभूत विषय और आत्मा में भी प्रकाशमानता सिद्ध हो जाती है। यदि कहा जाय कि ज्ञान की प्रकाशमानता से ज्ञान के जनकीभूत विषय और आत्मा में प्रकाशमानता तभी सिद्ध हो सकती है, जबकि पुत्रगत पाण्डित्य के द्वारा उसके जनकीभूत माता-पिता में पाडित्य सिद्ध होता हो, किन्तु ऐसा नियम नहीं, क्योंकि पुत्र में पाण्डित्य होने पर भी उसके माता-पिता में पांडित्य की अवश्यंभाविता नहीं देखी जाती। यदि कहा जाय कि ज्ञान विषय और आत्मा का नियत सम्बन्धी है, अतः ज्ञान की प्रकाशमानता से विषय और आत्मा में प्रकाशमानता आ जाती है। तब भी वह आपत्ति बनीं ही रहती है, क्योंकि पुत्र भी माता-पिता का नियत सम्बन्धी है, अतः पुत्र के पण्डित होने पर माता-पिता को भी अवश्य पण्डित होना चाहिए।
यदि पुत्र की अपेक्षा ज्ञान का एक यह वैशिष्ट्य माना जाता है कि विषय और आत्मा की प्रकाशमानता के बिना ज्ञान में प्रकाशमानता नहीं होती, अपितु अर्थात्म-प्रकाश के साथ ही ज्ञान का प्रकाश होता है। तब जिज्ञासा होती है कि ज्ञान से [ ज्ञान का प्रकाश और अर्थात्मा का प्रकाश—ये ] दोनों प्रकाश क्या भिन्न हैं ? अथवा अभिन्न ? यदि ज्ञान से ज्ञान का प्रकाश भिन्न है, तब ज्ञान को स्वयंप्रकाश नहीं कहा जा सकता, किन्तु घटादि के समान भिन्न प्रकाश से प्रकाशित होने के कारण ज्ञान को जड़ ही मानना होगा। अर्थ और आत्मा के प्रकाश को ज्ञान से भिन्न मानने पर विषय और आत्मा में ज्ञान की विषयता सिद्ध न होकर ज्ञान-जन्य प्रकाश की विषयता ( ज्ञान-ज्ञाप्यता ) माननी होगी, जिसमें अनवस्था दोष दिखाया जा चुका है। यदि 'ज्ञान का प्रकाश और अर्थात्मा का प्रकाश'—ये दोनों प्रकाश ज्ञान से भिन्न नहीं, ज्ञानरूप ही हैं, तब जो कहा गया कि 'संविदर्थात्मप्रकाशौ सह' उसका अर्थ होता है—'संविदात्मार्थौ सह'। तब आत्मगत ज्ञानाश्रयत्वरूप विवक्षित अर्थ की सिद्धि
३६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १
भामती जननादर्थसहभाव इति चेन्न, अर्थसंविद इव हानादिबुद्धीनामपि तद्विषयत्वानुपपत्तेः। हानादिजननाद्धानादिबुद्धीनामर्थविषयत्वम्, अर्थविषयहानादिबुद्धिजननच्चार्थसंविदस्तद्विषयत्वमिति चेत्, तत् किं देहस्य प्रयत्नवदात्मसंयोगो देहप्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुरर्थे इत्यर्थप्रकाशोऽस्तु ? जाड्याद्वेहात्मसंयोगो नार्थप्रकाश इति चेत्, नन्वयं स्वयंप्रकाशोऽपि स्वात्मन्येव खद्योतवत्प्रकाशः, अर्थे तु जड इत्युपपादितम्। न च प्रकाशस्यात्मानो विषयाः। ते हि विच्छिन्नदीर्घस्थूलतयाऽनुभूयन्ते। प्रकाशश्चायमान्तरोऽस्थूलोऽणुरह्रस्वोऽदीर्घश्चेति प्रकाशते। तस्माच्चन्द्रेऽनुभूयमान इव द्वितीयश्चन्द्रमाः स्वप्रकाशादन्योऽर्थोऽनिर्वचनीय एवेति युक्तमुत्पश्यामः। न चास्य प्रकाशस्यान्तः स्वलक्षणभेदोऽनुभूयते। न चानिर्वाच्यार्थभेदः प्रकाशं निर्वाच्यं भेत्तुमर्हति, अतिप्रसङ्गात्। न चार्थनामपि परस्परं भेदः समीचीनज्ञानपद्धतिमध्यास्ते इत्युपरिष्टादुपपादयिष्यते। तदयं प्रकाश एव स्वयम्प्रकाश एकः कूटस्थो नित्यो निरंशः प्रत्यगात्मा अशक्यनिर्वचनीयेभ्यो देहेन्द्रियादिभ्य आत्मानं प्रतीपं निर्वचनीयमञ्चति जानातीति प्रत्यङ् स चात्मेति
भामती-व्याख्या नहीं होती। अतीत और अनागत घटादि रूप अर्थ के वर्तमानकालीन ज्ञान का अर्थ-सहभाव सम्भव भी नहीं। यदि कहा जाय कि जो ज्ञान जिस विषय की हान-बुद्धि, उपादान-बुद्धि या उपेक्षा-बुद्धि को जन्म देता है, उस ज्ञान में उस विषय का सहभाव माना जाता है। वर्तमान ज्ञान अतीतघटादिविषयक हानादि-बुद्धि का जनक होता है, यही उस ज्ञान में अर्थ-सहभाव अनुमित हो जाता है—'अतीतघटविषयकं ज्ञानम्, अतीतघटसहभूतम्, अतीतघटविषयकहानादि-बुद्धिजनकत्वात्। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि अतीतघटादि के ज्ञान में जैसे अतीतघटविषयकत्व सिद्ध है, वैसा हानादि-बुद्धि में अतीतघटविषयकत्व सिद्ध नहीं, अतः अतीतघटविषयक-हानादिबुद्धिजनकत्वरूप हेतु स्वरूपासिद्धिदोष से युक्त है, उसके द्वारा अर्थ सहभाव का ज्ञान में अनुमान नहीं किया जा सकत। 'घटादिविषयक हानादिरूप प्रवृत्ति की जनक होने के कारण हानादि-बुद्धि में घटविषयकत्व और घटादिविषयक हानादि-बुद्धि की जनकता होने के कारण घटादि के ज्ञान में घटादिविषयकत्व सिद्ध होता है'—ऐसा कहने पर देहगत प्रयत्नवदात्मा के संयोग में अर्थ-प्रकाशत्वापत्ति होती है, क्योंकि वह संयोग भी देहरूप अर्थ में प्रवृत्त्यादि का जनक होता है। यदि कहा जाय कि जड़ होने के कारण देहात्म-संयोग को अर्थविषयक प्रकाश नहीं कह सकते। तब स्वयंप्रकाaction/ज्ञान में भी अर्थप्रकाशता न बनेगी, क्योंकि उसकी प्रकाश्य कोटि में स्वयं ज्ञान ही आता है, विषय नहीं, अतः वह खद्योत (जुगनू) के समान केवल अपने अंश में प्रकाशरूप होने पर भी विषयांश में जड़ ही है—ऐसा पहले कहा जा चुका है। घटादि विषय ज्ञान के आत्मा (स्वरूप) ही है—ऐसा कहना अत्यन्त अनुचित है, क्योंकि घटादि विषय विच्छिन्न (शरीर के बाहर), दीर्घ, स्थूल, अणु और ह्रस्व के रूप में देखे जाते हैं और उनका ज्ञान शरीर के अन्दर अदीर्घ, अस्थूल, अनणु और अह्रस्व के रूप में अवभासित होता है। फलतः एक चन्द्र में प्रतीयमान द्वितीय चन्द्रमा के समान स्वयंप्रकाश चित्त्तत्त्व से भिन्न घटादि प्रपञ्च को अनिर्वचनीय मानना ही उचित है।
इस स्वयंप्रकाश चित्त्तत्त्व का स्वाभाविक स्वलक्षण (अवान्तरव्यक्ति-भेद) अनुभूत नहीं होता और घटादि अनिर्वचनीय प्रपञ्च आत्मा के वास्तविक भेद का जनक नहीं हो सकता, अन्यथा घटादि उपाधियों के द्वारा गगन का भी वास्तविक भेद हो जायगा। घटादि पदार्थों का परस्पर भेद भी समीचीन ज्ञान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता—यह आगे चल कर कहा जायगा। परिशेषतः यह घटादि का प्रकाश ही स्वयंप्रकाश, एक कूटस्थ, नित्य और निरंश प्रत्यगात्मा है। उसे प्रत्यगात्मा इस लिए कहा जाता है कि वह देह, इन्द्रियादि
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३७
विषये विषयान्तरमध्यस्यति, युष्मत्प्रत्ययापेतस्य च प्रत्यगात्मनोऽविषयत्वं ब्रवीषि ?
भामती
प्रत्यगात्मा, स चापराधीनप्रकाशत्पादनंशत्वाच्चाविषयस्तस्मिन्नध्यासो विषयधर्माणां, देहेन्द्रियादिधर्माणाम् । कथं, किमाक्षेपे । अयुक्तोऽयमध्यास इत्याक्षेपः । कस्मादयमयुक्त इत्यत आह ॐ सर्वो हि पुरोऽवस्थिते विषये विषयान्तरमध्यस्यति ॐ । एतदुक्तं भवति -- यत्पराधीनप्रकाशमंशवच्च तत्सामान्यांशग्रहे कारणदोषवशाच्च विशेषाग्रहेऽन्यथा प्रकाशते । प्रत्यगात्मा त्वपराधीनप्रकाशतया न स्वज्ञाने कारणान्यपेक्षते । येन तदाश्रयैर्दोषैर्दूष्येत । न चांशवान्, येन कश्चिदस्यांशो गृह्येत कश्चिन्न गृह्येत, नहि तदेव तदानीमेव तेनैव गृहीतमगृहीतं च सम्भवतीति न स्वयम्प्रकाशपक्षेऽध्यासः । सदात्मनेऽप्यप्रकाशे पुरोऽवस्थितत्वस्यांपरोक्षत्वस्याभावान्नाध्यासः । नहि शुक्तावपुरःस्थितायां रजतमध्यस्यतीदं रजतमिति । तस्मादत्यन्तग्रहेऽत्यन्ताग्रहे च नाध्यास इति सिद्धम् । स्यादेतत् — अविषयत्वे हि चिदात्मनो नाध्यासो, विषय एव तु चिदात्मा अस्मत्प्रत्ययस्य, तत्कथं नाध्यास इत्यत आह ॐ युष्मत्प्रत्ययापेतस्य च प्रत्यगात्मनोऽविषयत्वं ब्रवीषि ॐ । विषयत्वे हि चिदात्मनोऽन्यो विषयी भवेत् । तथा च यो विषयी स एव चिदात्मा,
भामती-व्याख्या
अनिर्वचनीय प्रपञ्च से प्रतीप ( विपरीत ) अपने को निर्वचनीय जानता है [ 'प्रत्यगात्मा' इस शब्द के 'प्रत्यग्' और 'आत्मा' दो भाग हैं । उनमें 'प्रत्यग्' प्रतिपूर्वक 'अञ्चु गतिपूजनयोः' धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ होता है—प्रतीपम् ( विपरीतम् ) आत्मानमञ्चति जानाति । अर्थात् जो अनात्म प्रपञ्च से अपने को विपरीत अनुभव करता है। वही आत्मतत्त्व है, अतः चित्तत्त्व प्रत्यगात्मा कहलाता है ]। वह आत्मा पर-प्रकाश ( अन्य प्रकाश से प्रकाशित होनेवाला ) नहीं एवं निरंश है, अतः किसी अन्य ज्ञान का विषय नहीं। उस आत्मा में शरीरादि विषय और उनके कर्तृत्वादि धर्मों का अध्यास क्योंकर होगा ? भाष्य में प्रयुक्त 'कथम्' शब्द का घटकीभूत 'किम्' पद आक्षेपार्थक है, अतः 'कथमध्यासः' —इस वाक्य का अर्थ है— 'अयुक्तोऽयमध्यासः' । अध्यास अयुक्त क्यों है ? इस प्रश्न का उत्तर है— "सर्वो हि पुरोऽवस्थिते विषये विषयान्तरमध्यस्यति ।" आशय यह है कि जो शुक्त्यादि पदार्थ परप्रकाश और सांश होता है, उसके चमकीले अंश ( अवयव ) का ग्रहण एवं नीलपृष्ठादि भाग का अभान होने के कारण वह शुक्त्यादि द्रव्य अन्यथा ( रजतरूपेण ) प्रतीत होता है, किन्तु प्रत्यगात्मा स्वयंप्रकाश है, अपने ज्ञान में कारण-कलाप की अपेक्षा ही नहीं करता कि उन कारणों के दोषों से दूषित हो जाता । सावयव भी नहीं कि सामान्य अवयवों का ग्रहण और विशेष अवयवों का अग्रहण हो जाता । एक अखण्ड वस्तु एक ही समय एक ही पुरुष के द्वारा गृहीत भी हो और अगृहीत भी—ऐसा सम्भव नहीं हो सकता । फलतः स्वयंप्रकाशत्व पक्ष में अध्यास उपपन्न नहीं होता । यदि आत्मा का कभी भी प्रकाश नहीं माना जाता, तब भी पुरोऽवस्थितत्व और अपरोक्षत्व का अभाव होने के कारण अध्यास नहीं बनता, क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो शुक्ति पुरःस्थित नहीं, उसमें 'इदं रजतम्' —इस प्रकार रजत का अध्यास नहीं कर सकता । फलतः अत्यन्त गृहीत या अत्यन्त अगृहीत पदार्थ में कभी अध्यास नहीं होता—यह सिद्ध हो जाता है ।
यह सत्य है कि यदि चिदात्मा किसी ज्ञान का विषय न होता, तब उसमें किसी पदार्थ का अध्यास नहीं हो सकता था, किन्तु जब चिदात्मा 'अहम्' —इस प्रतीति का विषय हो जाता है, तब उसमें अध्यास क्यों नहीं होगा ? भाष्यकार कहते हैं— "युष्मत्प्रत्ययापेतस्य च प्रत्यगात्मनोऽविषयत्वं ब्रवीषि" । चिदात्मा यदि किसी ज्ञान का विषय है, तब वह ज्ञानरूप विषयी चिदात्मा से भिन्न ही होगा, अतः वहाँ जो विषयी है, वही चिदात्मा माना जायगा
| ३८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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उच्यते—न तावदयमेकान्तेनाविषयः, अस्मत्प्रत्ययविषयत्वात्, अपरोक्षत्वाच्च प्रत्य-
भामती
विषयस्तु ततोऽन्यो युष्मत्प्रत्ययगोचरोऽभ्युपेयः । तस्मादनात्मत्वप्रसङ्गादनवस्थापरिहाराय युष्मत्प्रत्यया- पेतत्वम्, अत एवाविषयत्वमात्मनो वक्तव्यं। तथा च नाध्यास इत्यर्थः ।
परिहरति ॐ उच्यते—न तावदयमेकान्तेनाविषयः ॐ । कुतः ? । ॐ अस्मत्प्रत्ययविषयत्वात् ॐ । अयमर्थः । सत्यं प्रत्यगात्मा स्वयम्प्रकाशत्वादविषयोऽनंशश्च, तथाप्यनिर्वचनीयानाद्यविद्यापरिकल्पितबुद्धि- मनः सूक्ष्मस्थूलशरीरेन्द्रियावच्छेदेनानवच्छिन्नोऽपि वस्तुतोऽवच्छिन्न इवाभिन्नोऽपि भिन्न इवाकर्त्तापि कर्त्तेवाभोक्तापि भोक्तेवाविषयोऽप्यस्मत्प्रत्ययविषय इव जीवभावमापन्नोऽवभासते । नभ इव घटमणि- कमल्लिकाद्यवच्छेदभेदेन भिन्नमिवानेकविधधर्मकमिवेति । नहि चिदेकरसस्यात्मनश्चिदंशे गृहीतेऽगृहीतं कि- ञ्चिदस्ति । खल्वानन्द नित्यत्वविभुत्वादयोऽस्य चिद्रूपादवस्तुतो भिद्यन्ते, येन तद्ग्रहे न। गृह्येरन् । गृहीता एव तु कल्पितेन भेदेन न विवेचिता इत्यगृहीता इवाभान्ति । न चात्मनो बुद्ध्यादिभ्यो भेदस्तात्त्विकः, येन चिदात्मनि गृह्यमाणे सोऽपि गृहीतो भवेत् । बुद्ध्यादीनामनिर्वाच्यत्वेन तद्भेदस्याप्यनिर्वचनीय- त्वात् । तस्माच्चिदात्मनः स्वयंप्रकाशस्यैवानवच्छिन्नस्यावच्छिन्नेभ्यो बुद्ध्यादिभ्यो भेदाग्रहात् तदध्यासेन जीवभाव इति । तस्य चानिदमिदमात्मनोऽस्मत्प्रत्ययविषयत्वमुपपद्यते । तथाहि— कर्त्ता भोक्ता चिदात्माऽ-
भामती-व्याख्या
और विषय को उससे भिन्न 'त्वम्' या 'इदम्'—इस प्रतीति का विषय कहना होगा, तब आत्मा में अनात्मत्व प्रसक्त होगा, अतः ग्राहक-परम्परा की अनवस्था का भी परिहार करने के लिए आत्मा को 'त्वम्'—इस प्रतीति का अविषय मानना आवश्यक है, फलतः आत्मा में अविषयता कहनी होगी, अविषयीभूत पदार्थ में अध्यास नहीं हो सकता—यहाँ तक आक्षेपवादी ने कहा ।
समाधान—उक्त आक्षेप का परिहार करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"उच्यते, न तावदयमेकान्तेनाविषयः", नियमतः आत्मा अविषय नहीं, क्योंकि वह अस्मत्प्रत्यय ('अहम्'—इस प्रतीति) का विषय हो जाता है। आशय यह है कि यद्यपि प्रत्यगात्मा स्वयं प्रकाश होने के कारण अविषय और निरवयव है, तथापि अनिर्वचनीय और अनादि अविद्या के द्वारा परिकल्पित बुद्धि और मन आदि से घटित सूक्ष्म शरीर एवं स्थूल शरीररूप उपाधियों के द्वारा अवच्छिन्न होकर वस्तुतः अपरिच्छिन्न, अकर्ता, अभोक्ता और अविषयीभूत आत्मा परिच्छिन्न, कर्त्ता, भोक्ता और अस्मत्प्रत्यय ('अहम्'—इस प्रतीति) का विषय मान लिया जाता है। ऐसा चिदात्मा जीवभाव को प्राप्त होकर विभिन्न रूपों में वैसे ही अवभासित होता है, जैसे घट, मणिक (मटका) और मल्लिकादि (हाँडी आदि रूप) उपाधियों से अवच्छिन्न होकर एक ही आकाश विभिन्न रूप और धर्मवाला प्रतीत होता है। यद्यपि चिदेकरस आत्मा का चिदंश गृहीत होने पर कुछ अगृहीत नहीं रहता। आनन्दत्व, नित्यत्व, विभुत्वादि धर्म भी चिद्रूप आत्मा से वस्तुतः भिन्न नहीं होते कि चिदात्मा का ग्रहण होने पर भी वे अगृहीत रह जाते। बुद्ध्यादि उपाधियों से आत्मा का तात्त्विक भेद नहीं कि चिदात्मा का ग्रहण हो जाने पर वह भेद भी गृहीत हो जाता। बुद्ध्यादिरूप अनिर्वचनीय प्रतियोगियों से निरूपित होने के कारण वह आत्मगत भेद भी अनिर्वचनीय ही है, तात्त्विक नहीं हो सकता। यद्यपि आत्मा अपरिच्छिन्न और स्वयंप्रकाश है, तथापि बुद्ध्यादि परिच्छिन्न पदार्थों से भेदाग्रह होने के कारण बुद्ध्यादि का तादात्म्याध्यास हो जाता है, बुद्ध्यादि से तादात्म्यापन्न आत्मा जीवरूप होकर 'अहम्'—इस प्रतीति का विषय बन जाता है, क्योंकि 'अहं कर्त्ता', 'अहं भोक्ता'—इस प्रकार कर्त्ता-भोक्ता के रूप में आत्मा अहंकाराकार प्रतीति का विषय होता है। आत्मा वस्तुतः
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ३९
भामती
हम्प्रत्यये प्रत्यवभासते। न चोदासीनस्य तस्य क्रियाशक्तिर्भोगशक्तिर्वा सम्भवति। यस्य च बुद्ध्यादेः कार्य्यकरणसङ्घातस्य क्रियाभोगशक्ती न तस्य चैतन्यम्। तस्माच्चिदात्मैव कार्य्यकरणसङ्घातेन ग्रथितो लब्धक्रियाभोगशक्तिः स्वयम्प्रकाशोऽपि बुद्ध्यादिविषयविच्छुरणात् कथञ्चिदस्मत्प्रत्ययविषयोऽहङ्कारास्पदं जीव इति च जन्तुरिति च क्षेत्रज्ञ इति चाख्यायते। न खलु जीवश्चिदात्मनो भिद्यते। तथा च श्रुतिः “अनेन जीवेनात्मना” इति। तस्माच्चिदात्मनोऽव्यतिरेकाज्जीवः स्वयम्प्रकाशोऽप्यहम्प्रत्ययेन कर्तृभोक्तृतया व्यवहारयोग्यः क्रियत इत्यहम्प्रत्ययालम्बनमुच्यते। न चाध्यासे सति विषयत्वं विषयत्वे चाध्यास इत्यन्योन्याश्रयत्वमिति साम्प्रतम्। बीजाङ्कुरवदनादित्वात् पूर्व्वपूर्व्वाध्यासतद्वासनाविषयीकृतस्योत्तरोत्तराध्यासविषयत्वाविरोधादित्युकं ॐ नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः ॐ इति भाष्यग्रन्थेन। तस्मात् सुष्ठूक्तं ‘न तावदयमेकान्तेनाविषयः’ इति। जीवो हि चिदात्मतया स्वयम्प्रकाशतयाऽविषयोऽप्यौपाधिकेन रूपेण विषय इति भावः। स्यादेतत् – न वयमपराधीनप्रकाशतयाऽविषयत्वेनाध्यासमपाकुर्मः, किन्तु प्रत्यगात्मा न स्वतो नापि परतः प्रथत इत्यविषय इति ब्रूमः। तथा च सर्व्वथाऽप्रथमाने प्रत्यगात्मनि कुतोऽध्यास इत्यत आह ॐ अपरोक्षत्वाच्च प्रत्यगात्मप्रसिद्धेः ॐ । प्रतीच आत्मनः प्रसिद्धिः
भामती-व्याख्या
अकर्त्ता-अभोक्ता, असङ्ग और उदासीन है, उसमें वास्तविक क्रिया शक्ति और भोग शक्ति सम्भव नहीं। जिस बुद्ध्यादिरूप सूक्ष्मशरीर और कार्य-कारण-संघातात्मक स्थूल शरीर में क्रिया शक्ति और भोगशक्ति वस्तुतः होती है, उसमें चैतन्य नहीं होता, अतः कार्य-कारण-संघातरूप शरीर से तादात्म्यापन्न आत्मा में ही क्रिया और भोग शक्ति मानी जाती है। यद्यपि आत्मा स्वभावतः स्वयंप्रकाश (अन्य ज्ञान का अविषय) है, तथापि विषयीभूत बुद्ध्यादि से तादात्म्यापन्न होकर कथंचित् ‘अहम्’—इस प्रतीति का विषय होकर अहङ्कारास्पद जीव, जन्तु, क्षेत्रज्ञ—इत्यादि नामों से प्रख्यात होता है। जीव चिदात्मा से वस्तुतः भिन्न नहीं होता, जैसा कि श्रुति कहती है— “अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि” (छां० ६।३।२) [चिदात्मा ने संकल्प किया कि मैं जीव बन कर इस मानव शरीर में प्रविष्ट होकर नाम और रूप की अभिव्यक्ति करूँ, अतः जीव चिदात्मरूप ही है]। चिदात्मा से अभिन्न होने के कारण जीव स्वयंप्रकाश होने पर भी अहमाकार प्रतीति के द्वारा कर्त्ता-भोक्ता के रूप में व्यवहार-योग्य बना दिया जाता है, अतः वह अहङ्काराकार प्रतीति का आलम्बन माना जाता है। ‘अध्यास होने पर विषयत्व और विषयत्व होने पर अध्यास होगा—इस प्रकार अन्योऽन्याश्रयता है’—ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि बीज और अंकुर के समान दोनों अनादि हैं, पूर्व-पूर्व अध्यास के द्वारा विषयीकृत आत्मा का उत्तरोत्तर अध्यास होता जाता है—इस भाव को प्रकट करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—‘‘नैसर्गिकोऽयं लोकव्यवहारः’’। इस लिए भाष्यकार ने बहुत ठीक कहा है कि “न तावदयमेकान्तेनाविषयः”। अर्थात् जीव के दो रूप परिलक्षित होते हैं—(१) स्वाभाविक और (२) औपाधिक। स्वाभाविक स्वयंप्रकाश या अविषय होने पर भी औपाधिक रूप से विषय हो जाता है [आत्मा अविषय ही है या विषय ही है—ऐसा एकान्तिकरूप से नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह विषय भी है और अविषय भी, स्वाभाविकरूपेण अविषय और आध्यासिकरूपेण विषय होता है]।
यहाँ आक्षेपवादी कहता है कि आत्मा स्वयंप्रकाश होने से अविषय है, अतः उसमें अध्यास नहीं हो सकता—ऐसा हम नहीं कहते, अपितु हमारी शङ्का यह है कि आत्मा न तो स्वतः और न परतः प्रकाशित होता है, अतः सर्वथा अप्रसिद्ध और अप्रथमान आत्मा में अध्यास क्योंकर होगा ? इस आक्षेप के समाधान में भाष्यकार ने कहा है—‘‘अपरोक्षत्वाच्च
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गात्मप्रसिद्धेः। न चायमस्ति नियमः—पुरोऽवस्थित एव विषये विषयान्तरमध्य- सितव्यमिति; अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालास्तलमलिनताद्यध्यस्यन्ति । एवमविरुद्धः
भामती
प्रथा तस्य। अपरोक्षत्वात् । यद्यपि प्रत्यगात्मनि नान्या प्रथास्ति, तथापि भेदोपचारः, यथा पुरुषस्य चैतन्यमिति । एतदुक्तं भवति — अवश्यं चिदात्माऽपरोक्षोऽभ्युपेयस्त्वदप्रथायां सर्वस्याप्रथनेन जगदान्ध्यप्रसङ्गादित्युक्तं, श्रुतिश्चात्र भवति 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति"इति । तदेवं परमार्थपरिहारमुक्त्वाऽभ्युपेत्यापि चिदात्मनः परोक्षतां प्रौढवादितया परिहारान्तरमाह । ॐ न चायमस्ति नियमः पुरोऽवस्थित एव ॐ अपरोक्ष एव ॐ । विषये विषयान्तरमध्यसितव्यम ॐ । कस्मादयं न नियम इत्यत आह ॐ अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालास्तलमलिनताद्यध्यस्यन्ति ॐ । हियंस्मादर्थे । नभो हि द्रव्यं सद् रूपस्पर्शविरहान्न बाह्येन्द्रियप्रत्यक्षम् । नापि मानसं, मनसोऽसहायस्य बाह्येऽप्रवृत्तेः । तस्मादप्रत्यक्षम् । अथ च तत्र बाला अविवेकिनः परदर्शितदर्शनाः कदाचित्पार्थिवच्छायां श्यामतामारोप्य, कदाचित्तेजसं शुक्लत्वमारोप्य नीलोत्पलपलाशश्याममिति वा राजहंसमालावधवलमिति वा निर्वर्णयन्ति तत्रापि पूर्वदृष्टस्य तैजसस्य वा तामसस्य वा रूपस्य परत्र नभसि स्मृतिरूपोऽवभास इति । एवं तदेव तलमध्यस्यन्ति अवाङ्मुखीभूतमहेन्द्रनीलमणिमयमहाकटाहकल्पमित्यर्थः । उपसंहरति ॐ एवम् ॐ । उक्तेन प्रकारेण सर्वक्षेपपरिहारात् ॐ अविरुद्धः प्रत्यगात्मन्यप्यनात्मनां ॐ । बुद्ध्यादीनाम् ॐ अध्यासः ॐ ।
भामती-व्याख्या
प्रत्यगात्मप्रसिद्धेः" । प्रत्यगात्मा की प्रथा या प्रसिद्धि अवश्य माननी होगी, क्योंकि वह अपरोक्ष है। यद्यपि प्रत्यगात्मा की प्रथा प्रत्यगात्मा से भिन्न नहीं, अतः 'प्रत्यगात्मनः प्रथा' — ऐसा व्यवहार सम्भव नहीं। तथापि उसी प्रकार यहाँ भेद का उपचार हो जाता है, जैसे 'आत्मनः चैतन्यम्' — इत्यादि व्यवहारों में होता है। आशय यह है कि आत्मा को अवश्य ही अपरोक्षरूप मानना होगा, क्योंकि उसका प्रकाश न होने पर जगदान्ध्य-प्रसङ्ग पहले दिखाया जा चुका है। उसके प्रकाश से ही विश्व प्रकाशित है, श्रुति स्पष्ट उद्घोष कर रही है कि "तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" ( कौ. २।५।१५ ) । इस प्रकार पारमार्थिक दृष्टि से आक्षेप का परिहार करके चिदात्मा की परोक्षता को स्वीकार करते हुए भी प्रौढीवाद का सहारा लेकर उक्त आक्षेप का समाधान किया जाता है — "न चायमस्ति नियमः पुरोऽवस्थिते एव विषये विषयान्तरमध्यसितव्यम्" । अर्थात् ऐसा कोई नियम नहीं कि अपरोक्ष विषय में ही अध्यास होता हो, क्योंकि "अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालाः तलमलिनतादि अध्यस्यन्ति" । अर्थात् यद्यपि आकाश द्रव्य रूप और स्पर्श गुण से रहित होने के कारण, चक्षु और त्वग्रूप बाह्य इन्द्रिय के द्वारा प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता । मानस प्रत्यक्ष का भी वह विषय नहीं, क्योंकि बाह्य विषय के ग्रहण में मन स्वतन्त्र नहीं, अपितु बाह्य इन्द्रिय की सहायता से ही प्रवृत्त होता है, जैसा कि कहा गया है — परतन्त्रं बहिर्मनः' ( विधिवि. पृ. ११४ ) । अतः आकाश प्रत्यक्ष नहीं, फिर भी बालक ( अल्पज्ञ मनुष्य ) आकाश में कदाचित् पार्थिव छायारूप श्यामता का आरोप करके कहते हैं — यह आकाश नीलोत्पल के पत्तों जैसा श्यामल है। एवं कदाचित् तैजस शुक्ल रूप का अध्यास करके व्यवहार करते हैं — यह आकाश राजहंसों के समूह के समान धवल ( श्वेत ) है। वहाँ भी पूर्वदृष्ट तामस श्याम और तैजस शुक्ल रूप का आकाशरूप पर द्रव्य में स्मृतिरूप अवभास बन जाता है। इसी प्रकार सुदूर ऊपर गगन में तल का आरोप करके लोग कहा करते हैं कि यह गगन नीलमणि से निर्मित औंधा कड़ाह है। अध्यास-लक्षण का उपसंहार करते हुए कहा है — “एवमविरुद्धः प्रत्यगात्मन्यपि अनात्माध्यासः"। 'एवम्' का अर्थ है—
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ४१
प्रत्यगात्मन्यप्यनात्माध्यासः ।
तमेतमेवंलक्षणमध्यासं पण्डिता अविद्येति मन्यन्ते; तद्विवेकेन च वस्तुस्वरूपा-
भामती
ननु सन्ति च सहस्रमध्यासास्तत्किमर्थमयमेवाध्यास आक्षेपसमाधानाभ्यां व्युत्पादितः, नाध्यासमात्रमित्यत आह ॐ तमेतमेवंलक्षणमध्यासं पण्डिता अविद्येति मन्यन्ते ॐ । अविद्या हि सर्वानर्थबीजमिति श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणादिषु प्रसिद्धम् , तदुच्छेदाय वेदान्ताः प्रवृत्ता इति वक्ष्यति । प्रत्यगात्मन्यनात्माध्यास एव सर्वानर्थहेतुर्न पुन रजतादिविभ्रमा इति स एवाविद्या, तत्स्वरूपं चाविज्ञातं न शक्यमुच्छेत्तुमिति तदेव व्युत्पाद्यं नाध्यासमात्रम् । अत्र च एवंलक्षणमित्येवंरूपतयाऽनर्थहेतुतोक्ता । यस्मात्प्रत्यगात्मन्यशनायादिरहितेऽशनायाद्युपेतान्तःकरणाद्यहितारोपेण प्रत्यगात्मानमदुःखं दुःखाकरोति, तस्मादनर्थहेतुः । न चैवं पृथग्जना अपि मन्यन्तेऽध्यासं, येन न व्युत्पाद्येतेत्यत उक्तं ॐ पण्डिता मन्यन्ते ॐ ।
नन्वियमनादिरतिनिरूढनिबिडवासनानुविद्धाऽविद्या न शक्या निरोद्धुम्, उपायाभावादिति यो मन्यते तं प्रति तन्निरोधोपायमाह ॐ तद्विवेकेन च वस्तुस्वरूपावधारणं ॐ । निर्विचिकित्सं ज्ञानं ॐ विद्यामाहुः ॐ । पण्डिताः प्रत्यगात्मनि खल्वत्यन्तविविक्ते बुद्ध्यादिभ्यो बुद्ध्यादिभेदाग्रहणनिमित्तो बुद्ध्याद्यात्मत्वतद्धर्माध्यासः । तत्र श्रवणमननादिभिर्यद्विवेकविज्ञानं तेन विवेकाग्रहे निवर्त्तितेऽध्यासापबाधात्मकं वस्तुस्वरूपावधारणं विद्या चिदात्मरूपं स्वरूपे व्यवतिष्ठत इत्यर्थः ।
भामती-व्याख्या
सभी आक्षेपों का परिहार हो जाने पर प्रत्यगात्मा में बुद्ध्यादि का अध्यास बन जाता है ।
शङ्का होती है कि सहस्रों अध्यास-प्रकार दिखाए जा सकते थे, तब यह आत्मानात्माध्यास का ही निरूपण क्यों किया ? इस शङ्का को दूर करने के लिए कहा जाता है—"तमेतमेवंलक्षणकमध्यासं पण्डिता अविद्येति मन्यन्ते" । अविद्या सभी अनर्थों का मूल कारण हैं—ऐसा श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणादि में प्रसिद्ध है । उस अविद्या का उच्छेद करने के लिए ही वेदान्त ग्रन्थ प्रवृत्त हुए हैं—ऐसा कहा जायगा । प्रत्यगात्मा में अनात्माध्यास ही सर्वानर्थ का हेतु है, शुक्ति-रजतादि-भ्रम नहीं, अतः आत्मानात्माध्यास ही मुख्य अविद्या है । उसके स्वरूप का जब तक ज्ञान न हो, तब तक उसका उच्छेद नहीं किया जा सकता, अतः वही विशेषतः व्युत्पादनीय है, सभी अध्यास नहीं । भाष्यकार ने 'एवंलक्षणम्'— ऐसा कहकर उसकी अनर्थ-हेतुता प्रकट की है । क्षुधा-पिपासादि से रहित आत्मा में क्षुधा-पिपासादि से युक्त अन्तःकरणादि अहितकर पदार्थों का अध्यास वस्तुतः दुःख-रहित आत्मा को भी दुःखी बना देता है, अतः वह अनर्थ का हेतु है । ऐसे अध्यास का ज्ञान सर्वजन-साधारण नहीं कि उसका निरूपण अनावश्यक हो जाता—यह दिखाने के लिए कहा गया है—"पण्डिता मन्यन्ते" ।
'यह अविद्या अनादि, अतिनिरूढ़ ( सुदृढ ), निविड़ ( घनीभूत ) वासनाओं से युक्त होने के कारण कभी समुच्छेदनीय ही नहीं, क्योंकि उसके उच्छेद का कोई उपाय ही दिखाई नहीं देता'—ऐसी धारणावाले व्यक्तियों के लिए अविद्या के निरोध का उपाय दिखाते हैं—"तद्विवेकेन च वस्तुस्वरूपावधारणं विद्यामाहुः" । पण्डितगण असन्दिग्ध ज्ञान को विद्या कहा करते हैं । प्रत्यगात्मा बुद्ध्यादि से वस्तुतः अत्यन्त विविक्त ( निर्लिप्त ) है किन्तु बुद्ध्यादि का विवेक-ग्रह ( भेद-ज्ञान ) न होने के कारण बुद्ध्यादि के तादात्म्य एवं धर्मों का अध्यास आत्मा में हो जाता है । वेदान्त-वेद्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वरूप आत्मा के श्रवण, मनन और निदिध्यासनादि के द्वारा जो विवेक-विज्ञान उत्पन्न होता है, उसके द्वारा विवेकाग्रह की निवृत्ति हो जाने पर अध्यास का बाधरूप वस्तु-स्वरूपात्मक अवधारण प्रकट होता है, वही विद्या है, वह चिदात्मस्वरूप होकर आत्मस्वरूप में व्यवस्थित होती है ।
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| ४२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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वधारणं विद्यामाहुः। तत्रैवं सति यत्र यदध्यासः, तत्कृतेन दोषेण गुणेन वाऽणुमात्रेणापि स न संबध्यते, तमेतमविद्याख्यमात्मानात्मनोरितरेतराध्यासं पुरस्कृत्य सर्वे
भामती
स्यादेतद् – अतिनिरूढनिबिडवासनानुविद्धाऽविद्या विद्ययाऽपबाधिताऽपि स्ववासनावशात्पुनरुद्भविष्यति, प्रवर्त्तयिष्यति च वासनादिकार्यं स्वोचितमित्यत आह ॐ तत्रैवं सति ॐ एवम्भूतवस्तुतत्त्वावधारणे सति । ॐ यत्र यदध्यासस्तत्कृतेन दोषेण गुणेन वाऽणुमात्रेणापि स न सम्बध्यते ॐ । अन्तःकरणादिदोषेणाशनायादिना चिदात्मा चिदात्मनो गुणेन चैतन्यान्दादिनाऽन्तःकरणादि न सम्बध्यते । एतदुक्तं भवति—तत्त्वावधारणाभ्यासस्य हि स्वभाव एव स तादृशो यदनादिमपि निरूढनिबिडवासनमपि मिथ्याप्रत्ययमपनयति । तत्त्वपक्षपातो हि स्वभावो धियाम् । यथाऽऽहुर्बाह्या अपि—
निरुपद्रवभूतार्थस्वभावस्य विपर्ययैः ।
न बाधोऽयत्नवत्त्वेऽपि बुद्धेस्तत्पक्षपातः ॥ इति ।
विशेषतस्तु चिदात्मस्वभावस्य तत्त्वज्ञानस्यात्यन्तान्तरङ्गस्य कुतोऽनिर्वच्ययाऽविद्यया बाध इति । यदुक्तम्—'सत्यानृते मिथुनीकृत्य विवेकाग्रहादध्यस्याहमिदं ममेदमिति लोकव्यवहारः' इति, तत्र व्यपदेश-
भामती-व्याख्या
यह जो भय होता है कि अविद्या ऐसी निरूढ और निबिड़ वासनाओं से युक्त है कि एक बार विद्या के द्वारा अपबाधित होकर भी अपनी सुदृढ़ वासनाओं के बल पर पुनः प्रकट होकर अपने संस्कारों को अपने अनुरूप मूर्तरूप दे डालेगी । उस भय को दूर करने के लिए कहा है–"तत्रैवं सति" । 'एवं' शब्द का अर्थ है—पूर्वोक्त रीति से वस्तु-तत्त्व का अवधारण (निश्चय) कर लेने पर । "यत्र यदध्यासस्तत्कृतेन दोषेण गुणेन वा अणुमात्रेणापि स न सम्बध्यते" । आत्मा में तादात्म्येन अध्यस्त अन्तःकरण के क्षुधा-पिपासादि दोषों से चिदात्मा और चिदात्मा के चैतन्य, आनन्दादि गुणों से अन्तःकरण का अणुमात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता । आशय यह है कि कथित तत्त्वावधारण का स्वभाव ही ऐसा है कि वह अनादि, निरूढ और सघन वासना से युक्त मिथ्या ज्ञान को नष्ट कर देता है, जैसा कि वेद-बाह्य बौद्ध विद्वान् धर्मकीर्ति ने भी कहा है—
निरुपद्रवभूतार्थस्वभावस्य विपर्ययैः ।
न बाधोऽयत्नवत्त्वेऽपि बुद्धेस्तत्पक्षपातः ॥ (प्र. वा. पृ. १४४)
[वस्तु-स्वभाव की रक्षा के लिए कुछ भी यत्न न करने पर भी विपर्ययों (मिथ्या ज्ञानों) के द्वारा तत्त्व ज्ञान का बाध कभी नहीं होता, क्योंकि भूतार्थ-स्वभाव (वस्तुतत्त्व का स्वभाव) सदैव उपद्रवों (सभी प्रकार की बाधाओं) से रहित होता है । प्राणियों की बुद्धि सदैव तत्त्व-पक्षपातिनी होती है । उक्त वार्तिक की व्याख्या में भाष्यकार कहते हैं—
ततः स्वभावो भूतात्मा निरुपद्रव एव च ।
कथमस्य परित्यागः कर्तुं शक्यः सचेतसा ॥
पक्षपातश्च चित्तस्य न दोषेषु प्रवर्त्तते ।
ततः तस्य न दोषाय यत्नः कश्चित्प्रवर्त्तते ॥ (प्रज्ञाकर, पृ. १४४)] ।
उसमें भी विशेषता यह है कि हमारा तत्त्वज्ञान चिदात्मस्वरूप होने से अत्यन्त अन्तरङ्ग है, उसका अनिर्वचनीय एवं निस्तत्त्वभूत अविद्या के द्वारा बाध हो भी कैसे सकता है ?
भाष्यकार ने कहा है—"सत्यानृते मिथुनीकृत्य विवेकाग्रहादध्यस्य 'अहमिदम्', 'ममेदम्'–इति लोकव्यवहारः"। वहाँ व्यवहार चार प्रकार का कहा गया है—"अभिज्ञाभिवदनमुपादानमर्थक्रिया इति चतुर्विधः" (पं. वि. पृ. ६२) । उसमें शब्दात्मक व्यवहार तो
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३
प्रमाणप्रमेयव्यवहारा लौकिका वैदिकाश्च प्रवृत्ताः, सर्वाणि च शास्त्राणि विधिप्रतिषेधमोक्षपराणि।
कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि शास्त्राणि चेति ? उच्यते—देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमानरहितस्य प्रमातृत्वानुपपत्तौ प्रमाणप्रवृत्त्यनु-
भामती
लक्षणो व्यवहारः कण्ठोक्तः, इतिशब्दसूचितं लोकव्यवहारमादर्शयति ॐ तमेतमविद्याख्यं ॐ इति । निगदव्याख्यातम् ।
आक्षिपति – ॐ कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि ॐ । तत्त्वपरिच्छेदो हि प्रमा विद्या, तत्साधनानि प्रमाणानि कथमविद्यावद्विषयाणि ? नाविद्यावन्तं प्रमाणान्याश्रयन्ति, तत्कार्यस्य विद्याया अविद्याविरोधित्वादिति भावः । सन्तु वा प्रत्यक्षादीनि संवृत्यापि यथा तथा, शास्त्राणि तु पुरुषहितानुशासनपराण्यविद्याप्रतिपक्षतया नाविद्यावद्विषयाणि भवितुमर्हन्तीत्याह ॐ शास्त्राणि चेति ॐ ।
समाधत्ते ॐ उच्यते—देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमानहीनस्य ॐ । तादात्म्यतद्धर्माध्यासहीनस्य । ॐ प्रमातृत्वानुपपत्तौ सत्यां प्रमाणप्रवृत्त्यनुपपत्तेः ॐ । अयमर्थः—प्रमातृत्वं हि प्रमां प्रति कर्तृत्वं तच्च स्वातन्त्र्यं, स्वातन्त्र्यं च प्रमातुरितरकारकाप्रयोज्यस्य समस्तकारकप्रयोक्तृत्वम् । तदनेन प्रमाकरणं
भामती-व्याख्या
भाष्यकार ने 'अहमिदं ममेदम्'—इस वाक्य से ही प्रदर्शित कर दिया है, शेष व्यवहारों की सूचना के लिए कहा है—‘‘इति लोकव्यवहाराः’ अर्थात् 'इत्येवंविधा व्यवहाराः' । वहाँ 'इति' पद के द्वारा अभिसूचित लोकव्यवहारों का स्पष्टीकरण करने के लिए भाष्यकार ने कहा है—"तमेतमविद्याख्यम्"—यहाँ से लेकर "सर्वाणि शास्त्राणि विधिप्रतिषेधमोक्षपराणि"—यहाँ तक। भाष्य की पदावली अत्यन्त सरल और स्पष्टार्थक है।
उक्त स्थापना पर आक्षेप किया गया—‘‘कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि’’। उसका भाव यह है कि तत्त्व-परिच्छेदरूप प्रमा विद्यारूप है, उस प्रमा के साधनीभूत प्रत्यक्षादि प्रमाणों में अविद्यावद्विषयकत्व सम्भव नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाण अविद्यावान् (अज्ञानी) पुरुष की अधिकार-कक्षा में नहीं आते, क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाणों का कार्य जो प्रमा या विद्या है, वह अविद्या की विरोधिनी होती है। प्रत्यक्षादि प्रमाणों को यदि किसी प्रकार सांवृतिक (आविद्यक) व्यवहार का साधन मान भी लिया जाय, तब भी शास्त्रीय व्यवहार में कभी भी आविद्यकत्व की सम्भावना नहीं कर सकते, क्योंकि शास्त्र सदैव पुरुष को उसके हित की ही शिक्षा देते हैं, वे अविद्या के सर्वथा प्रबल प्रतिपक्षी होते हैं, अविद्यावान् पुरुष उनका अधिकारी क्योंकर होगा ? ऐसी आशङ्का की गई है—‘‘शास्त्राणि च’’। उक्त आशङ्का का परिहार किया जाता है—‘‘उच्यते’’। ‘‘देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमानहीनस्य’’—इस वाक्य का अर्थ है—तादात्म्यतद्धर्माध्यासहीनस्य। प्रमातृत्वानुपपत्तौ सत्यां प्रमाणप्रवृत्त्यनुपपत्तेः'—ऐसा अन्वय कर लेना चाहिए। आशय यह है कि प्रमातृत्व का अर्थ है—प्रमा का कर्तृत्व, कर्तृत्व का अर्थ है—स्वातन्त्र्य । प्रमाता में जो इतर (कर्मादि) कारकों से अप्रयोज्यत्व और कर्मादि समस्त कारकों का प्रयोक्तृत्व है, वही प्रमाता पुरुष में स्वातन्त्र्य है [ ‘‘स्वतन्त्रः कर्त्ता’’ (पा. सू. १।४।५४) में भाष्यकार ने 'तन्त्र' शब्द प्रधानार्थक मान कर कहा है—‘‘अस्ति प्राधान्ये वर्तते । तद्यथा स्वतन्त्रोऽयं ब्राह्मण इत्युच्यमाने स्वप्रधान इति गम्यते । तद्यः प्राधान्ये वर्तते तन्त्रशब्दः तस्येदं ग्रहणम्’’। कारक सूत्र में भी कहा है—‘‘किं पुनः प्रधानम् ? कर्त्ता । कथं पुनर्ज्ञायते कर्त्ता प्रधानमिति ? यत्सर्वेषु साधनेषु सन्निहितेषु कर्त्ता
| ४४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ] |
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पपत्तेः । न हीन्द्रियाण्यनुपादाय प्रत्यक्षादिव्यवहारः संभवति । न चाधिष्ठानमन्तरेणे-
न्द्रियाणां व्यवहारः संभवति । न चानध्यस्तात्मभावेन देहेन कश्चिद्व्याप्रियते । न
भामती
प्रमाणं प्रयोजनीयम् । न च स्वव्यापारमन्तरेण करणं प्रयोक्तुमर्हति । न च कूटस्थनित्यश्चिदात्माऽपरिणामी
स्वतो व्यापारवान् । तस्माद् व्यापारवद्बुद्ध्यादितादात्म्याध्यासाद् व्यापारवत्तया प्रमाणमधिष्ठातुमर्हतीति
भवत्यविद्यावत्पुरुषविषयत्वमविद्यावत्पुरुषाध्यस्त्वं प्रमाणानामिति । अथ मा प्रवर्त्तिषत प्रमाणानि किं
नश्छिन्नमित्यत आह ॐ नहीन्द्रियाण्यनुपादाय प्रत्यक्षादिव्यवहारः सम्भवति ॐ । व्यवह्रियतेऽनेनेति
व्यवहारः फलं, प्रत्यक्षादीनां प्रमाणानां फलमित्यर्थः । इन्द्रियाणीति, इन्द्रियलिङ्गादीनीति द्रष्टव्यं, दण्डिनो
गच्छन्तीतिवत् । एवं हि प्रत्यक्षादीत्युपपद्यते । व्यवहारक्रियया च व्यवहार्याक्षेपात्समानकर्तृकता ।
अनुपादाय यो व्यवहार इति योजना । किमिवि पुनः प्रमातोपादत्ते प्रमाणानि ? अथ स्वयमेव कस्मान्न
प्रवर्त्तन्ते प्रमाणानि इत्यत आह । ॐ न चाधिष्ठानमन्तरेणेन्द्रियाणां व्यापारः ॐ । प्रमाणानां व्यापारः
ॐ सम्भवति ॐ न जातु करणान्यनधिष्ठितानि कर्त्रा स्वकार्ये व्याप्रीयन्ते । मा भूत् कुविन्दरहितेभ्यो
भामती-व्याख्या
प्रवर्त्तयिता भवति”। उद्योतकार ने कहा है— “अनेन कारकप्रयोक्तृत्वं कर्तुः स्वातन्त्र्य-
मित्युक्तम्”]। फलतः प्रमा के कर्त्ता को भी प्रमा के करण का प्रयोजक या प्रवर्त्तयिता होना
चाहिए। कर्त्ता पुरुष में जब तक अपना व्यापार (क्रिया) नहीं होता, तब तक वह करण
का प्रवर्त्तक नहीं हो सकता। कूटस्थ नित्य चिदात्मा अपरिणामी और अमूर्त द्रव्य है, उसमें
स्वतः क्रिया नहीं हो सकती, परिशेषतः व्यापार-युक्त सूक्ष्म और स्थूल शरीर रूप उपाधियों
के तादात्म्याध्यास से चिदात्मा स्वयं व्यापारवान् होकर प्रमा के करणीभूत इन्द्रियादि का
अधिष्ठाता (प्रवर्त्तक) हो सकता है। यही प्रमाणों (प्रमा के करणों) की अविद्यावत्पुरुषों
में विषयता (आश्रयता या प्रेर्यता) है। प्रमा के करणीभूत इन्द्रियादि पदार्थों में यदि कोई
व्यापार या क्रिया नहीं होती, तब क्या क्षति ? इस प्रश्न का उत्तर है— 'नहीन्द्रियाण्यनु-
पादाय प्रत्यक्षादिव्यवहारः सम्भवति।' यहाँ 'व्यवह्रियतेऽनेन'—इस व्युत्पत्ति के आधार पर
'व्यवहार' शब्द प्रमाणजनित ज्ञानरूप फल का उपस्थापक है। 'इन्द्रिय' पद अजहत्स्वार्थ
लक्षणा के द्वारा इन्द्रिय और लिङ्गादि करणों का वैसे ही बोधक है, जैसे कि 'दण्डिनो
गच्छन्ति'—यहाँ पर दण्डी पद दण्डी और अदण्डी के समुदाय का गमक होता है। 'इन्द्रिय'
पद की इन्द्रियादि में लक्षणा करने पर ही 'प्रत्यक्षादि'—ऐसे प्रयोग का औचित्य स्थिर
होता है। भाष्य में जो कहा गया है— 'इन्द्रियाण्यनुपादाय व्यवहारः।' वहाँ पर व्यवहाररूप
क्रिया के द्वारा व्यवहार क्रिया के कर्त्ता (व्यवहारी पुरुष) का आक्षेप करके 'अनुपादाय
व्यवहरति'—ऐसे प्रयोग का लाभ किया जाता है। इस प्रकार अनुपादान और व्यवहार—इन
दो क्रियाओं में समानकर्तृत्व का भान हो जाता है, जिसकी चर्चा विगत पृ० १५ पर की
जा चुकी है। 'अनुपादाय व्यवहारो न सम्भवति'—यहाँ प्रतीयमान 'अनुपादान' और
'सम्भव'—इन दो क्रियाओं का कर्त्ता एक नहीं, क्योंकि 'अनुपादान' क्रिया का कर्त्ता प्रमाता
और सम्भव क्रिया का कर्त्ता व्यवहार है, तब 'अनुपादाय'—इस पद में 'क्त्वा' प्रत्यय और
उसको 'ल्यप्' का आदेश नहीं हो सकता, अतः वहाँ 'अनुपादाय यो व्यवहारः, स न
सम्भवति'—ऐसी योजना कर लेनी चाहिए। प्रमाता प्रमाणों को प्रवृत्त क्यों करता है?
प्रमाण स्वयं ज्ञानोत्पादनार्थ क्यों प्रवृत्त नहीं हो जाते? इस प्रश्न का उत्तर है— “न चाधिष्ठान-
मन्तरेण इन्द्रियाणां व्यापारः”। किसी चेतन अधिष्ठाता की प्रेरणा के बिना इन्द्रिय स्वयं
प्रवृत्त नहीं हो सकते, क्योंकि कुविन्द (तन्तुवाय या जुलाहा) की प्रेरणा के बिना केवल तुरी
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४५
चैतस्मिन्सर्वस्मिन्नसति असङ्गस्यात्मनः प्रमातृत्वमुपपद्यते । न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिरस्ति । तस्मादविद्यावद्विषयाण्येव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि शास्त्राणि च ।
भामती
वेमादिभ्यः पटोत्पत्तिरिति । अथ देह एवाधिष्ठाता कस्मान्न भवति, कृतमत्रात्माध्यासेनेत्यत आह ॐ न चानध्यस्तात्मभावेन देहेन कश्चिद्व्याप्रियते ॐ । सुषुप्तेऽपि व्यापारप्रसङ्गादिति भावः । स्यादेतत्--यथाऽनध्यस्तात्मभावं वेमादिकं कुविन्दो व्यापारयन् पटस्य कर्त्ता, एवमनध्यस्तात्मभावं देहेन्द्रियादि व्यापारयन् भविष्यति तदभिज्ञः प्रमातेत्यत आह ॐ न चैतस्मिन् सर्वस्मिन् ॐ । इतरेतराध्यासे इतरेतरधर्माध्यासे चासति आत्मनोऽसङ्गस्य सर्वथा सर्वदा सर्वधर्मधर्मिवियुक्तस्य प्रमातृत्वमुपपद्यते । व्यापारवन्तो हि कुविन्दादयो वेमादीनधिष्ठाय व्यापारयन्ति । अनध्यस्तात्मभावस्य तु देहादिष्वात्मनो न व्यापारयोगोऽसङ्गत्वादित्यर्थः । अतश्चाध्यासाश्रयाणि प्रमाणानीत्याह ॐ न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिरस्ति ॐ । प्रमायां खलु फले स्वतन्त्रः प्रमाता भवति । अन्तःकरणपरिणामभेदश्च प्रमेयप्रवणः कर्तृस्थश्चित्स्वभावः प्रमा कथं च जडस्यान्तःकरणस्य परिणामश्चिद्रूपो भवेत् । यदि चिदात्मा तत्र नाध्यस्येत ? कथं चिदात्मकत्तृको भवेत् । यद्यन्तःकरणं व्यापारवच्चिदात्मनि नाध्यस्येत् ? तस्मादितरेतराध्यासाच्चिदात्मकत्तृस्थं प्रमाफलं सिध्यति । तत्सिद्धौ च प्रमातृत्वं, तामेव च प्रमामुररीकृत्य प्रमाणस्य प्रवृत्तिः । प्रमातृत्वेन च प्रमोपलक्ष्यते । प्रमायाः फलस्याभावे प्रमाणं न प्रवर्त्तेत । तथा च प्रमाणमप्रमाणं
भामती-व्याख्या
और वेमादि साधनों से पट की उत्पत्ति कहीं भी नहीं देखी जाती। तुरी-वेमादि कारण-कलाप का अधिष्ठाता केवल शरीर क्यों नहीं हो जाता, इसमें आत्मा के तादात्म्याध्यास की क्या आवश्यकता ? इस शङ्का का समाधान है—"न चानध्यस्तात्मभावेन देहेन कश्चिद् व्याप्रीयते।" जिस देह में आत्मा का अध्यास न हो, उस देह के द्वारा कुछ भी संचालित नहीं होता, अन्यथा सुषुप्ति अवस्था में भी शरीर के द्वारा करण-ग्राम का सञ्चालन होना चाहिए। 'जिन तुरी-वेमादि साधनों में आत्मा का तादात्म्याध्यास नहीं होता, उन साधनों को भी कुविन्द सञ्चालित कर पटादि कार्यों का जैसे कर्त्ता बन जाता है, वैसे ही जिन देहादि पदार्थों में आत्माध्यास नहीं होता, उनको सञ्चालित करके उनका अभिज्ञ व्यक्ति प्रमाता क्यों नहीं बन जाता ?' इस शङ्का का समाधान है—"न चैतस्मिन् सर्वस्मिन् असति"। अर्थात् इस आत्मा के तादात्म्याध्यास के बिना सर्वथा असङ्ग एवं समस्त धर्मधर्मिभाव से रहित आत्मा में प्रमातृत्व नहीं बन सकता, क्योंकि कुविन्दादि स्वयं सक्रिय होकर ही तुरी वेमादि का सञ्चालन कर सकते हैं। जिस आत्मा में देहादि का तादात्म्याध्यास नहीं, उसमें किसी प्रकार की भी क्रिया सम्भव नहीं, क्योंकि आत्मा असङ्ग है। प्रमाणों के अध्यासापेक्षी होने में यह भी एक कारण है कि "न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिरस्ति।" आशय है कि प्रमारूप फल के उत्पादन में स्वतन्त्र कर्त्ता को प्रमाता कहा गया है। अन्तःकरण के उस परिणाम-विशेष को प्रमा कहा जाता है, जो प्रमेय-विषयक और कर्त्ता में रहनेवाला चित्स्वभाव है। जड़ाभूत अन्तःकरण का चित्स्वरूप परिणाम तभी सम्भव होगा, जब कि अन्तःकरण में चिदात्मा का तादात्म्याध्यास होगा। उक्त प्रमा का कर्त्ता आत्मा तभी होगा, जबकि कर्तृत्ववादि धर्म-युक्त अन्तःकरण का आत्मा में तादात्म्याध्यास होगा, फलतः आत्मा और अन्तःकरणादि का अन्योऽन्याध्यास होने पर ही प्रमारूपफल चिदात्मरूप कर्त्ता के आश्रित सिद्ध हो सकेगा, उसकी सिद्धि हो जाने पर कर्त्ता में प्रमातृत्व बन सकेगा और उसी प्रमा को उद्देश्य करके प्रमाणों की प्रवृत्ति होती है। भाष्यकार ने जो कहा है—"न च प्रमातृत्वमन्तरेण प्रमाणप्रवृत्तिः"। वहाँ पर 'प्रमातृत्व' पद की लक्षणा 'प्रमा' में की जाती है, क्योंकि प्रमारूप फल के न होने पर प्रमाण
| ४६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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पश्वादिभिश्चाविशेषात् । यथा हि पश्वादयः शब्दादिभिः श्रोत्रादीनां संबन्धे सति शब्दादिविज्ञाने प्रतिकूले जाते ततो निवर्तन्ते, अनुकूले च प्रवर्तन्ते; यथा दण्डोद्यतकरं पुरुषमभिमुखमुपलभ्य मां हन्तुमयमिच्छतीति पलायितुमारभन्ते, हरिततृणपूर्णपाणि-
भामती
स्यादित्यर्थः । उपसंहरति— ॐ तस्मादविद्यावद्विषयाण्येव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि ॐ ।
स्यादेतत् — भवतु पृथग्जनानामेवम् , आगमोपपत्तिप्रतिपन्नप्रत्यगात्मतत्त्वानां व्युत्पन्नानामपि पुंसां प्रमाणप्रमेयव्यवहारा दृश्यन्त इति कथमविद्यावद्विषयाण्येव प्रमाणानीत्यत आह । ॐ पश्वादिभिश्चाविशेषादिति ॐ । विदन्तु नामागमोपपत्तिभ्यां देहेन्द्रियादिभ्यो भिन्नं प्रत्यगात्मानं, प्रमाणप्रमेयव्यवहारे तु प्राणभृन्मात्रधर्मान्नातिवर्तन्ते । यादृशो हि पशुशकुन्तादीनामविप्रतिपन्नमुग्धभावानां व्यवहारस्तादृशो व्युत्पन्नानामपि पुंसां दृश्यते । तेन तत्सामान्यात्तेषामपि व्यवहारसमयेऽविद्यावत्त्वमनुमेयम् । चशब्दः समुच्चये, उक्तशङ्कानिवर्तनसहितपूर्वोक्तोपपत्तिरविद्यावत्पुरुषविषयत्वं प्रमाणानां साधयतीत्यर्थः । एतदेव विभजते ॐ यथा हि पश्वादयः इति ॐ । अत्र च ॐ शब्दादिभिः श्रोत्रादीनां सम्बन्धे सति ॐ इति प्रत्यक्षं प्रमाणं दर्शितम् । ॐ शब्दादिविज्ञाने ॐ इति तत्फलमुक्तम् । ॐ प्रतिकूले ॐ इति चानुमानफलम् । तथाहि — शब्दादिस्वरूपमुपलभ्य तज्जातीयस्य प्रतिकूलतामनुस्मृत्य तज्जातीयतयोपलभ्यमानस्य प्रतिकूलतामनुमिमीत इति । उदाहरति— ॐ यथा दण्डेति ॐ । शेषमतिरोहितार्थम् । स्यादेतत् — भवन्तु
भामती-व्याख्या
की प्रवृत्ति क्योंकर होगी ? तब प्रमाण अप्रमाण होकर रह जायगा । अविद्यावद्विषयकत्व का उपसंहार किया जाता है— "तस्मादविद्यावद्विषयाण्येव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि ।"
साधारण पठित या अपठित व्यक्तियों के प्रत्यक्षादि प्रमाण तो अवश्य ही अविद्यावान् पुरुषों में सीमित माने जा सकते हैं, किन्तु जिन मनीषियों ने आगम प्रमाण और आगमानुकूल युक्तियों के बल पर आत्मतत्त्व का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर लिया है, ऐसे व्युत्पन्न विद्वानों के प्रमाण-प्रमेयादि व्यवहारों में अविद्यावद्विषयकत्व क्योंकर सम्भव होगा ? इस शङ्का का अपनयन करते हुए भाष्यकार कहते हैं—'पश्वादिभिश्चाविशेषात्' । भले ही तत्त्ववेत्ता पुरुष उपनिषदादि प्रमाणों और उनकी अनुगुण उपपत्तियों की सहायता से देहेन्द्रियादि-भिन्न प्रत्यगात्मा का ज्ञान प्राप्त कर लें, किन्तु प्रमाण-प्रमेयादि व्यवहारों में साधारण प्राणियों की मर्यादा का उल्लङ्घन नहीं किया करते, क्योंकि पशु-पक्षी आदि अव्युत्पन्न प्राणियों के व्यवहार जैसे देखे जाते हैं, वैसे ही व्युत्पन्न विद्वानों के भी व्यवहार देखे जाते हैं । इस प्रकार व्यवहारों की समानता के द्वारा व्युत्पन्न विद्वानों के प्रत्यक्षादि प्रमाणों में भी अविद्यावत्पुरुषविषयकत्व का अनुमान किया जा सकता है—'विदुषामपि प्रत्यक्षादिव्यवहारः, अध्यासनिबन्धनः, व्यवहारत्वात्, पश्वादिव्यवहारवत्' । भाष्य में प्रयुक्त 'च' शब्द समुच्चयार्थक है, उसके प्रयोग से अध्यासनिबन्धनत्व की सिद्धि में उक्त आशङ्का की निवृत्ति और कथित युक्तियों का समुच्चय किया जाता है । भाष्यकार अपने दृष्टान्त का स्पष्टीकरण स्वयं कर रहे हैं—"यथा पश्वादयः" इत्यादि । 'शब्दादिभिः श्रोत्रादीनां सम्बन्धे सति'—इस वाक्य के द्वारा प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाया है । 'शब्दादि विज्ञाने'—इस वाक्य से प्रत्यक्ष का फल सूचित किया है । 'प्रतिकूले'—ऐसा कह कर अनुमान का फल प्रदर्शित किया गया है, क्योंकि शब्दादि को श्रोत्र से सुन एवं उसी प्रकार के शब्द की प्रतिकूलता का स्मरण कर 'तज्जातीयत्व' हेतु के द्वारा उपलभ्यमान शब्द में प्रतिकूलता ( अनिष्ट-साधनता ) का अनुमान किया जाता है—'अयं शब्दः, मदनिष्ट-साधनम्, शब्दविशेषत्वात्, पूर्वोपलब्धशब्दवत्' । उदाहरण दिया गया—"यथा दण्ड"—इत्यादि से ।
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४७
मुपलभ्य तं प्रत्यभिमुखीभवन्ति; एवं पुरुषा अपि व्युत्पन्नचित्ताः क्रूरदृष्टीनाक्रोशतः खड्गोद्यतकरांर्बलवत उपलभ्य ततो निवर्तन्ते, तद्विपरीतान्प्रति प्रवर्तन्ते, अतः समानः पश्वादिभिः पुरुषाणां प्रमाणप्रमेयव्यवहारः। पश्वादीनां च प्रसिद्धोऽविवेकपुरःसरः प्रत्यक्षादिव्यवहारः। तत्सामान्यदर्शनाद् व्युत्पत्तिमत्तामपि पुरुषाणां प्रत्यक्षादिव्यवहारस्तत्कालः समान इति निश्चीयते।
शास्त्रीये तु व्यवहारे यद्यपि बुद्धिपूर्वकारी नाविदित्वात्मनः परलोकसंबं-
भामती
प्रत्यक्षादीन्यविद्यावद्विषयाणि। शास्त्रं तु ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेतेत्यादि न देहात्माध्यासेन प्रवर्तितुमर्हति। अत्र खल्वामुष्मिकफलोपभोगयोग्योऽधिकारी प्रतीयते। तथा च पारमर्षं सूत्रम् - “शास्त्रफलं प्रयोक्तरि तल्लक्षणत्वात्स्वयं प्रयोगे स्यादिति”। न च देहादि भस्मीभूतं पारलौकिकाय फलाय कल्पत इति देहाद्यतिरिक्तं कञ्चिदधिकारिणमाक्षिपति शास्त्रं, तदवगमश्च विद्येति कथमविद्यावद्विषयं शास्त्रमित्याशङ्कयाह ॐ शास्त्रीये तु इति ॐ। तुशब्दः प्रत्यक्षादिव्यवहाराद्विनक्ति शास्त्रीयम्। अधिकारशास्त्रं हि स्वर्गकामस्य पुंसः परलोकसम्बन्धं विना न निर्वहतीति तावन्मात्रमाक्षिपेत्, न स्वस्यासंसारित्वमपि तस्याधिकारेऽनुपयोगात्। प्रत्युतोपनिषदस्य पुरुषस्याकर्तुरभोक्तुरधिकारविरोधात्। प्रयोक्ता हि कर्मणः कर्मजनितफलभोगभागी कर्मण्यधिकारी स्वामी भवति। तत्र कथमकर्ता प्रयोक्ता कथं वाऽभोक्ता कर्मजनितफलभोगभागी? तस्मादनाद्यविद्यालब्धकर्तृत्वभोक्तृत्वब्राह्मणत्वाद्यभिमानिनं नरमधिकृत्य विधि-निषेधशास्त्रं प्रवर्तते। एवं वेदान्ता अप्यविद्यावत्पुरुषविषया एव, नहि प्रमात्रादिविभागादृते तदर्थाधि-
भामती-व्याख्या
उसकी ओर दौड़ता आ रहा है, तब वह वहाँ से भाग खड़ी होती है और जब अपने मालिक को हरा-हरा घास लिये अपनी ओर पुचकार करते आता देखती है, तब गौ अपने मालिक के पास आ जाती है। इसी प्रकार हिताहित की बात सोच-समझ कर प्राणिमात्र का व्यवहार प्रवृत्त होता है]।
यहाँ यह शङ्का अवश्य उठ जाती है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों की प्रवृत्ति अध्यासमूलक मानी जा सकती है, किन्तु “ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत”—इत्यादि शास्त्र देहात्माध्यासमूलक नहीं हो सकते, क्योंकि ज्योतिष्टोमादि कर्मों का अधिकारी वही हो सकता है, जो पारलौकिक स्वर्गादि फलों का उपभोग करने योग्य हो, जैसे कि महर्षि जैमिनि कहते हैं— “शास्त्रफलं प्रयोक्तरि तल्लक्षणत्वात् स्वयं प्रयोगे स्यात्” (जै. सू. ३।७।१८) अर्थात् वेद-प्रतिपादित स्वर्गादिरूप फल कर्म के प्रयोक्ता (अनुष्ठान करनेवाले कर्त्ता) को ही प्राप्त होता हैं, क्योंकि विधिवाक्य-घटक ‘स्वर्गकाम,’ इत्यादि शब्द उसी कर्त्ता का फलभोक्तृत्वरूप लक्षण प्रस्तुत करते हैं। यजमान को अपने स्वयं किए हुए कर्मों का ही फल मिलता है। जन्मान्तर में प्राप्त होनेवाले स्वर्गादि फलों का भोग यजमान का यह शरीर नहीं कर सकता, क्योंकि प्राण निकल जाने पर इस शरीर को यहाँ ही भस्म कर दिया जाता है, अतः उक्त शास्त्र देहादि से भिन्न किसी अधिकारी का आक्षेप करता है, देहादि से अतिरिक्त आत्मरूप अधिकारी का ज्ञान ही विद्या कहलाता है, अतः शास्त्र को अविद्यावत्पुरुषविषयक क्योंकर कहा जा सकेगा? इस आशङ्का का उचित समाधान करते हुए भाष्यकार ने कहा है—“शास्त्रीये तु व्यवहारे यद्यपि बुद्धिपूर्वकारी नाविदित्वा परलोकसम्बन्धमधिक्रियते।” ‘तु’ पद के द्वारा शास्त्रीय व्यवहार में प्रत्यक्षादि-व्यवहारों से विशेषता ध्वनित की है। अधिकार (फल-भोक्तृत्व-प्रतिपादक) शास्त्र का निर्वाह तब तक नहीं होता, जब तक स्वर्गकामनावान् पुरुष का परलोक के साथ सम्बन्ध उपपन्न नहीं हो जाता, अतः अधिकार-शास्त्र केवल इतना
| ४८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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न्धमधिक्रियते, तथापि न वेदान्तवेद्यम्, अशनायाद्यतीतम्, अपेतब्रह्मक्षत्रादिभेदम्, असंसार्यात्मतत्त्वमधिकारेऽपेक्ष्यते, अनुपयोगादधिकारविरोधाच्च । प्राक् च तथाभूतात्मविज्ञानात्प्रवर्तमानं शास्त्रमविद्यावद्विषयत्वं नातिवर्तते । तथा
भामती
गमः । ते त्वविद्यावन्तमनुशासन्तो निर्मृष्टनिखिलाविद्यमनुशिष्टं स्वरूपे व्यवस्थापयन्तीत्येतावानेषां विशेषः । तस्मादविद्यावत्पुरुषविषयाण्येव शास्त्राणीति सिद्धम् ॥
स्यादेतद् — यद्यपि विरोधानुपयोगाभ्यामौपनिषदः पुरुषोऽधिकारे नापेक्ष्यते, तथाप्युपनिषद्गूढोऽवगम्यमानः शक्नोत्यधिकारं निरोद्धुम् । तथा च परस्परापहतार्थत्वेन कृत्स्न एव वेदः प्रामाण्यमपजह्यादित्यत आह ॐ प्राक् च तथाभूतात्म इति ॐ । सत्यमौपनिषदपुरुषाधिगमोऽधिकारविरोधी, तस्मात्तु पुरस्तात् कर्मविधयः स्वोचितं व्यवहारं निर्वर्त्तयन्तो नानुपजातेन ब्रह्मज्ञानेन शक्या निरोद्धुम् । न च परस्परापह्नतिः, विद्याविद्यावत्पुरुषभेदेन व्यवस्थोपपत्तेः । यथा “न हिंस्यात् सर्वा भूतानीति” साध्यांश-निषेधेऽपि “श्येनेनाभिचरन् यजेतेति” शास्त्रं प्रवर्त्तमानं न हिंस्यादित्यनेन न विरुध्यते, तत् कस्य हेतोः ?
भामती-व्याख्या
ही आक्षेप कर सकता है कि हमारे फल का भोक्ता परलोकसम्बन्ध के योग्य है । उससे अधिक भोक्ता में असंसारित्वादि का आक्षेप नहीं कर सकता, क्योंकि असंसारित्वादि का प्रतिपादन अधिकार में उपयोगी नहीं, प्रत्युत उपनिषद्-गम्य असंसारित्व ( अकर्तृत्व-अभोक्तृत्व ) फल-भोक्तृत्वरूप अधिकार के विरुद्ध है, क्योंकि प्रयोक्ता ( कर्म का प्रयोग करनेवाला कर्त्ता ) ही कर्म-जनित फल का भोक्ता बन कर कर्म का अधिकारी ( स्वामी ) माना जाता है । वहाँ अकर्त्ता पुरुष कर्म का अनुष्ठाता एवं अभोक्ता पुरुष कर्म-जनित फल के भोग का भागी कैसे बनेगा ? फलतः अनादि अविद्या से प्रयुक्त कर्तृत्व-भोक्तृत्व के अधिकारी पुरुष को उद्देश्य करके ही विधि-निषेध शास्त्र प्रवृत्त होते हैं। इसी प्रकार वेदान्त शास्त्र भी अविद्यावत्पुरुष को ही विषय करके प्रवृत्त होता है, क्योंकि प्रमाता, प्रमाण, प्रमेयादि-विभाग के बिना वेदान्त शास्त्र के अर्थ का ज्ञान ही नहीं हो सकता । वेदान्त वाक्य तो अविद्यावान् पुरुष को अपने पावन उपदेशों के द्वारा सकल आध्यासिक परिच्छेदों से निकाल कर अपने शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप में व्यवस्थापित कर देते हैं— इतना वेदान्त-शास्त्र का विधि-निषेधात्मक धर्म-शास्त्र से अन्तर अवश्य है । इस प्रकार यह एकान्ततः सिद्ध हो जाता है कि सभी शास्त्र अविद्यावान् पुरुष को विषय करते हैं ।
यद्यपि कथित अनुपयोग और विरोध होने के कारण औपनिषद ( अकर्त्ता-अभोक्ता ) पुरुष कर्माधिकार में अपेक्षित नहीं, तथापि उपनिषत् प्रमाण से अवगम्यमान पुरुष कर्माधिकार का निरोध या बाध तो कर सकता है । इस प्रकार परस्पर-बाधित अर्थ का प्रतिपादक वेद अपनी प्रमाणता खो बैठेगा । इस आक्षेप का परिहार किया गया—"प्राक् तथाभूतात्म-विज्ञानात् प्रवर्तमानं शास्त्रमविद्यावद्विषयत्वं नातिवर्तते” । यह सत्य है कि औपनिषद पुरुष का ज्ञान कर्माधिकार का विरोधी है, किन्तु उस ज्ञान की प्राप्ति से पूर्व कर्म-विधायक वाक्य अपने अनुकूल व्यवहार का सम्पादन करते हुए अनुत्पन्न ब्रह्म-ज्ञान के द्वारा बाधितार्थक नहीं हो सकते ? कर्म-काण्ड और ज्ञान-काण्ड का परस्पर कोई विरोध भी नहीं, क्योंकि कर्म-काण्ड का अधिकारी अज्ञानवान् और ज्ञान-काण्ड का अधिकारी ज्ञानवान् पुरुष होता है—इस प्रकार अधिकारी के भेद से उक्त काण्डों की व्यवस्था हो जाती है। जैसे कि “न हिंस्यात् सर्वाभूतानि” ( कूर्मपु० अ. १६ ) । यह शास्त्र साध्यरूप हिंसा का निषेध करता है और "श्येनेनाभिचरन् यजेत” ( षड्विं. ब्रा. १।८ ) यह शास्त्र हिंसा ( शत्रु-वध ) का विधान करता है,
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४९
हि—'ब्राह्मणो यजेत' इत्यादीनि शास्त्राण्यात्मनि वर्णाश्रमवयोऽवस्थादिविशेषाध्यास-
भामती
पुरुषभेदादिति । अवजितक्रोधारातयः पुरुषा निषेधेऽधिक्रियन्ते, क्रोधारातिवशीकृतास्तु श्येनादिशास्त्र इति । अविद्यावत्पुरुषविषयत्वं नातिवर्त्तत इति यदुक्तं तदेव स्फोरयति ॐ तथाहि इति ॐ । वर्णाध्यासः—"राजा राजसूयेन यजेतेत्यादिः” । आश्रमाध्यासः—"गृहस्थः सदृशीं भार्यां विन्देदित्यादिः” । वयोऽध्यासः—"कृष्णकेशोऽग्नीनादधीतेत्यादिः” । अवस्थाध्यासः—अप्रतिसमाधेयव्याधीनां जलादिप्रवेशेन प्राणत्याग इति । आदिग्रहणं महापातकोपपातकसङ्करीकरणापात्रीकरणमलिनीकरणाद्यध्यासोपसंग्र-
भामती-व्याख्या
फिर भी इन दोनों शास्त्रों का कोई विरोध नहीं, क्योंकि अधिकारी पुरुष के भेद से उनकी व्यवस्था बन जाती है। अर्थात् क्रोधरूप शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेनेवाले पुरुष "न हिंस्यात्”—इस निषेध शास्त्र के अधिकारी एवं क्रोधरूप शत्रु के वशवर्ती पुरुष 'श्येनेनाभिचरन्’—इत्यादि विधि शास्त्रों के अधिकारी माने जाते हैं। यह जो कहा गया कि "शास्त्रमविद्यावत्पुरुषविषयत्वं नातिवर्तते”। उसी का विशदीकरण किया जाता है—"तथा हि” इत्यादि से। वर्णाध्यास का उदाहरण है—"राजा राजसूयेन स्वाराज्यकामो यजेत” (आप. श्रौ. सू. १८।८।१४) । यहाँ राजा का अर्थ क्षत्रिय है, अतः क्षत्रिय वर्ण का अभिमानी पुरुष राजसूय कर्म का अधिकारी है। आश्रमाध्यास भी कहीं अपेक्षित है, जैसे—"गृहस्थः सदृशीं भार्या विन्देत्” (गौतम स्मृ. ४) । यहाँ गृहस्थ आश्रम का अध्यास होना चाहिए। "जातपुत्रः कृष्णकेशोऽग्नीनादधीत”—इत्यादि शास्त्रों के द्वारा विहित अग्न्याधान कर्म में लगभग तीस वर्ष की अवस्था का अभिमान अनिवार्य है। "अप्रतिसमाधेयव्याधीनां जलादिप्रवेशेन प्राणत्यागः”—इत्यादि वाक्यों में असाध्य रोग से पीड़ित अवस्था की अपेक्षा है। आदि पद के द्वारा (१) महापातक, (२) उपपातक, (३) संकरीकरण, (४) अपात्रीकरण, (५) मलिनीकरणादि का अध्यास गृहीत होता है [ (१) ब्रह्महत्यादि को महापातक कहा गया है—
"ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः।
महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ॥” (मनु. ११।४)
उपपातक इस प्रकार गिनाए गए हैं—
गोवधोऽयाज्यसंयाज्यपारदार्यात्मविक्रयाः ।
गुरुमातृपितृत्यागः स्वाध्यायाग्न्योः सुतस्य च ॥
परिवित्तिताऽनुजेऽनूढे परिवेदनमेव च ।
तयोर्दानं च कन्यायास्तयोरेव च याजनम् ॥
कन्याया दूषणं चैव वार्धुष्यं व्रतलोपनम् ।
तडागारामदाराणामपत्यस्य च विक्रयः ॥
व्रात्यता बान्धवत्यागो भृत्याध्यापनमेव च ।
भृत्या चाध्ययनादानमपण्यानां च विक्रयः ॥
सर्वाकरेष्वधीकारो महायन्त्रप्रवर्तनम् ।
हिंसौषधीनां स्त्र्याजीवोऽभिचारो मूलकर्म च ॥
बन्धनार्थमशुष्काणां द्रुमाणामवपातनम् ।
आत्मार्थे च क्रियारम्भो निन्दितान्नादनं तथा ॥
अनाहिताग्निता स्तेयमृणानामपक्रिया ।
असच्छास्त्राधिगमनं कौशीलव्यस्य च क्रिया ॥
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| ५० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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माश्रित्य प्रवर्तन्ते । अध्यास्रो नाम अतस्मिंस्तद्बुद्धिरित्यवोचाम । तद्यथा-पुत्रभार्या-दिषु विकलेषु सकलेषु वा अहमेव विकलः सकलो वेति बाह्यधर्मानात्मन्यध्यस्यति;
भामती
हार्यम् ।
तदेवमात्मानात्मनोः परस्पराध्यासमाक्षेपसमाधानाभ्यामुपपाद्य प्रमाणप्रमेयव्यवहारप्रवर्त्तनेन च दृढीकृत्य तस्यानर्थहेतुतामुदाहरणप्रपञ्चेन प्रतिपादयितुं तत्स्वरूपमुक्तं स्मारयति ॐ अध्यास्रो नामातस्मिं-स्तद्बुद्धिरित्यवोचाम ॐ । 'स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः' इत्यस्य संक्षेपाभिधानमेतत् । तत्राहमिति धर्मितादात्म्याध्यासमात्रं ममेत्यनुत्पादितधर्माध्यासं नानर्थहेतुरिति धर्माध्यासमेव ममकारं साक्षादशेषा-नर्थसंसारकारणमुदाहरणप्रपञ्चेनाह ॐ तद्यथा, पुत्रभार्यादिषु इति ॐ । देहतादात्म्यमात्मन्यध्यस्य देहधर्मं पुत्रकलत्रादिस्वाम्यं च कृशत्वादिवदारोप्याहाहमेव विकलः सकल इति । स्वस्य खलु साकल्येन स्वाम्य-साकल्यात् स्वामीश्वरः सकलः सम्पूर्णो भवति । तथा स्वस्य वैकल्येन स्वाम्यवैकल्यात् स्वामीश्वरो विकलोऽसम्पूर्णो भवतीति । बाह्यधर्मा ये वैकल्यादयः स्वाम्यप्रणालिकया सञ्चारिताः शरीरे तानात्मन्यध्य-
भामती-व्याख्या
धान्यकुप्यपशुस्तेयं मद्यपस्त्रीनिषेवणम् ।
स्त्रीशूद्रविट्क्षत्रवधो नास्तिक्यं चोपपातकम् ॥ ( मनु. ११।५९-६६ )
गर्दभ-वधादि को सङ्कलीकरण कहा गया है—
खराश्वोष्ट्रमृगेभानामजाविकवधस्तथा ।
संकीरीकरणं ज्ञेयं मीनाहिमहिषस्य च ॥ ( मनु. ११।६८ )
अपात्र से दानादि-ग्रहण अपात्रीकरण कहा गया है—
निन्दितेभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम् ।
अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम् ॥ ( मनु० ११।६९ )
मनुस्मृति में मलिनीकरण पातक भी गिनाए हैं—
कृमिकीटवयोहत्या मद्यानुगतभोजनम् ।
फलैधःकुसुमस्तेयमधैर्यं च मलावहम् ॥ ( मनु० ११।७० ) ] ।
इस प्रकार आत्मानात्मपदार्थों के अन्योऽन्याध्यास का आक्षेपसमाधानपूर्वक उपपादन किया गया, प्रमाण-प्रमेय-व्यवहार की उसमें प्रवर्तकता दिखाकर अध्यास का दृढीकरण दिखाया गया, अब विविध उदाहरणों के माध्यम से अध्यास की कथित अनर्थ-हेतुता का चित्रण करने के लिए अध्यास के पूर्वोक्त स्वरूप का स्मरण दिलाया जाता है—“अध्यासो नाम अतस्मिंस्तद्बुद्धिरित्यवोचाम”। यह “स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः”—इस विशद लक्षण का संक्षिप्ताभिधान मात्र है। अध्यास के दो अंश दिखाए गए—( १ ) अहङ्काराध्यास और ( २ ) ममकाराध्यास। इन्हीं को क्रमशः धर्म्यध्यास और धर्माध्यास भी कहा जाता है। इनमें धर्माध्यास साक्षात् अनर्थ का हेतु है—यह अनेक उदाहरणों के द्वारा सिद्ध किया जाता है—“पुत्रभार्यादिषु”। आत्मा में देह का तादात्म्याध्यास करके देह के धर्मभूत पुत्रभार्यादि के स्वामित्व एवं कृशत्वादि का आरोप करके मनुष्य कहता है—“अहमेव विकलः सकलः”—इत्यादि। अर्थात् पुत्रादिरूप स्वकीय जनों की सकलता ( सम्पन्नता ) से उसका स्वामित्व सकल हो जाने के कारण स्वामी अपने को सकल ( सम्पन्न ) मानता है। उसी प्रकार पुत्रादि स्वकीय परिजनों की विकलता ( विपन्नता ) से अपने को विकल मानता है—इस प्रकार पुत्रादि बाह्य पदार्थों के धर्म स्वामित्व-परम्परा से आत्मा में सञ्चारित और अध्यस्त होते दिखाए गए। ये वैकल्य और साकल्यादि धर्म देह के अपने नहीं, अपितु पुत्रादि उपाधियों के
अध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५१
तथा देहधर्मान्-स्थूलोऽहं, कृशोऽहं, गौरोऽहं तिष्ठामि, गच्छामि, लङ्घयामि चेति। तथेन्द्रियधर्मान्-मूकः, काणः, क्लीबः, बधिरः, अन्धोऽहमिति। तथाऽन्तःकरणधर्मान्-कामसंकल्पविचिकित्साध्यवसायादीन् । एवमहंप्रत्ययिनमशेषस्वप्रचारसाक्षिणि प्रत्यगात्मन्यध्यस्य, तं च प्रत्यगात्मानं सर्वसाक्षिणं तद्विपर्ययेणान्तःकरणादि-
भामती
स्यतीत्यर्थः। यदा च परोपाध्यपेक्षे देहधर्मे स्वाम्ये इयं गतिस्तदा कैव कथाऽनौपाधिकेषु देहधर्मेषु कृशत्वादिवित्यभिप्रायवानाह ꣤ तथा देहधर्मान् इति ꣥। देहादप्यन्तरङ्गाणामिन्द्रियाणामध्यस्तात्मभावानां धर्मान्मूकत्वादींस्ततोऽप्यन्तरङ्गस्यान्तःकरणस्याध्यस्तात्मभावस्य धर्मान् कामसङ्कल्पादीन् आत्मन्यध्यस्यतीति योजना।
तदनेन प्रपञ्चेन धर्माध्यासमुक्त्वा तस्य मूलं धर्म्यध्यासमाह ꣤ एवमहम्प्रत्ययिनम् ꣥। अहम्प्रत्ययो वृत्तिर्यस्मिन्नन्तःकरणादौ सोऽयमहम्प्रत्ययी तं ꣤ स्वप्रचारसाक्षिणि ꣥ अन्तःकरणप्रचारसाक्षिणि, चैतन्योदासीनताभ्यां, ꣤ प्रत्यगात्मन्यध्यस्य ꣥ तदनेन कर्तृत्वभोक्तृत्वे उपपादिते। चैतन्यमुपपादयति ꣤ तं च प्रत्यगात्मानं सर्वसाक्षिणं तद्विपर्ययेण ꣥ अन्तःकरणादिविपर्ययेण, अन्तःकरणाद्यचेतनं तस्य विपर्ययः चैतन्यं तेन, इत्थंभूतलक्षणे तृतीया। ꣤ अन्तःकरणादिष्वध्यस्यति ꣥। तदनेनान्तःकरणाद्यवच्छिन्नः प्रत्यगात्मा इदमनिदंरूपश्चेतनः कर्त्ता भोक्ता कार्य्यकारणाविद्याद्वयाधारोऽहङ्कारास्पदं
भामती-व्याख्या
द्वारा सञ्चारित औपाधिक धर्म हैं, उनकी जब ऐसी गति है, तब देहगत अनौपाधिक कृशत्वादि का आरोप आत्मा में क्यों न होगा? इसी भाव की अभिव्यक्ति करने के लिए कहा है— "तथा देहधर्मान्"। देह की अपेक्षा इन्द्रियाँ अन्तरङ्ग हैं, जिन वागादि इन्द्रियों में आत्मरूपता अध्यस्त है, उनके मूकत्वादि धर्मों एवं उनसे भी अन्तरङ्ग अन्तःकरण के सङ्कल्पादि धर्मों का आत्मा में अध्यास हो जाता है—इस प्रकार भाष्यार्थ की योजना कर लेनी चाहिए।
विस्तारपूर्वक धर्माध्यास की चर्चा करने के पश्चात् धर्माध्यास के मूल कारण धर्म्यध्यास का भाष्यकार वर्णन कर रहे हैं— "एवमहंप्रत्ययिनमशेषस्वप्रचारसाक्षिणि प्रत्यगात्मानमध्यस्य"। 'अहम्', 'अहम्'--इस प्रकार का प्रत्यय (वृत्ति) जिसमें होता है, उस अन्तःकरण को 'अहंप्रत्ययी' कहते हैं। उस (अन्तःकरण) का तादात्म्याध्यास उस प्रत्यगात्मा में किया जाता है, जो अन्तःकरण की वृत्तियों का स्वगत चैतन्य (ज्ञान) और तटस्थता के कारण साक्षी है [लोक में भी साक्षी वही पुरुष कहा जाता है, जो किसी वाद का ज्ञान तो रखता है, किन्तु उस वाद में सक्रिय भाग नहीं लेता, तटस्थ रहता है]। इस प्रकार 'अन्तःकरण से तादात्म्यापन्न होकर प्रत्यगात्मा अपने को कर्त्ता-भोक्ता मानने लगता है'--यह दिखाया गया। अन्तःकरण में चैतन्यारोप दिखाया जाता है— "तं च प्रत्यगात्मानं सर्वसाक्षिणम्"। "तद्विपर्ययेण" का अर्थ है—अन्तःकरणगत अचैतन्य (जाड्य) के विपरीत जो चैतन्य है, उस चैतन्य से उपलक्षित आत्मा का अन्तःकरण में अध्यास होता है। 'तद्विपर्ययेण'—यहाँ तृतीया विभक्ति "इत्थंभूतलक्षणे" (पा. सू. २।३।२१) इस सूत्र के द्वारा विहित हुई है [जो कि ज्ञापकार्थक होती है, जैसे किसी व्यक्ति के शिर पर जटाएँ देख कर समझ लिया जाता है कि यह तपस्वी है। वहाँ 'जटाभिः तापसः' ऐसा प्रयोग होता है, वैसे ही 'तद्विपर्ययेण प्रत्यगात्मा अध्यस्तो भवति'-यहाँ पर 'जाड्यविपरीतेन चैतन्यरूपेण'-ऐसा अर्थ फलित होता है]। "अन्तःकरणादिषु अध्यस्यति" ऐसा कह कर भाष्यकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अन्तःकरणादि से अवच्छिन्न प्रत्यगात्मा 'इदम्' और 'अनिदम्'-इस प्रकार विरुद्धरूपापन्न (चिदचिद्रूप) होकर चेतन, कर्त्ता-भोक्ता, 'कार्याविद्या और कारणाविद्या'--इन दो प्रकार की 'अविद्याओं का आधारभूत,