भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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हिन्दीसहितभामतीसंचलितम्

ने "ममैवांशो जीवलोके" (गी. १५।७) इस गीता-पद्य को प्रस्तुत किया है। यदि गीताशास्त्र के प्रणेता भगवान् व्यास ही ब्रह्मसूत्रकार हैं, तब वे अपनी ही कृति को स्मृति के रूप में उल्लिखित करते हैं—यह समुचित प्रतीत नहीं होता, अत एव भगवद्गीता १ में जो 'ब्रह्मसूत्र' पद आया है, उसका अर्थ आचार्य शङ्कर ने किया है—"ब्रह्मणः सूचकानि वाक्यानि ब्रह्म-सूत्राणि। आत्मेत्येवोपासीत (बृह. उ. १।४।७) इत्यादिभिर्हि ब्रह्मसूत्रपदैः आत्मा ज्ञायते" (गी. १३।४)। इससे यह नितान्त स्पष्ट हो जाता है कि गीता में निर्दिष्ट 'ब्रह्मसूत्र' पद से बादरायणीय सूत्रों का ग्रहण सम्भव नहीं, क्योंकि उनकी रचना गीता के बहुत पश्चात् की गई है। स्वयं भगवान् शङ्कराचार्य "अनावृत्तिः शब्दात्" (ब्र. सू. ४।४।२२) इस सूत्र की पातनिका में कहते हैं—"भगवान् बादरायणः आचार्यः पठति"।

श्री बालगङ्गाधर तिलक ने जो अपने 'गीता-रहस्य' में व्यवस्था दी है कि 'पहले कोई विस्तृत गीता बनी, उसके अनन्तर ब्रह्मसूत्र और उसके पश्चात् संक्षिप्त गीता की रचना की गई, अत एव ब्रह्मसूत्र में गीता और गीता में ब्रह्मसूत्र का उल्लेख संगत है'। तिलक जी का वह बौद्धिक व्यायाम ऋषियों की असीम शक्ति को सीमित कर देता है। जैसे हमलोग कुछ लिख कर उसे काटते-कूटते और बढ़ाते-घटाते हैं, वैसे ऋषिगण नहीं किया करते। उनकी सधी लेखनी से जो लकीर बन गई, वह पत्थर की लकीर हो जाती थी।

बादरायण-सूत्रों में जो सांख्य, योग और पाञ्चरात्र आदि के मतवाद आलोचित हैं, उनका मूलरूप महाभारत २ में पाया जाता है, अतः महाभारत-काल के पश्चात् ही इनकी रचना सिद्ध होती है।

३. आचार्य बादरायण का समय

ऊपर के विवेचनों से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि बौद्धों की महायानिक धारा का उद्गम हो जाने के अनन्तर ही आचार्य बादरायण के अद्वयवाद का समुदय होता है—जैमिनि और बादरायण का एक-दूसरे के सूत्रों में परस्पर उल्लेख होने के कारण दोनों समसामयिक हैं। जैमिनि का समय ई. पूर्व द्वितीय शताब्दी माना जाता है, अतः ३श्रीदास गुप्ता के अनुसार ईसा-पूर्व द्वितीय शताब्दी ही बादरायण का समय मानना उचित प्रतीत होता है। श्री उदयवीर शास्त्री का जो महान् प्रयत्न समूचे हिमालय पर्वत को पीछे ढकेलने में हो रहा है, वह तभी सफल हो सकता है, जब कि महाभारत-काल को स्थिर और ध्रुव माना जा सके, किन्तु यह एक टेढी खीर है। आचार्य बादरायण चाहे पुरातन हों या नूतन, उनका व्यक्तित्व सदैव श्रद्धास्पद और सराहनीय ही रहेगा।

जैमिनि-सूत्रों में केवल बादरायण का ही उल्लेख नहीं, अपितु बादरायण-सूत्र चर्चित आचार्यों का बहुत साम्य है, अतः दोनों के सूत्रों में निर्दिष्ट व्यक्तियों की नामावलि प्रस्तुत की जाती है—

४. जैमिनि सूत्र-निर्दिष्ट आचार्य—बादरायण (१।१।५), बादरि (३।१।३, ६।१।२७, ८।३।६, ९।२।२०), आश्मरथ्य (६।५।१६, १६।२।१), आत्रेय (४।३।१८, ५।२।१८, ६।१।२६),


१. "ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः" (गी० १३।४)
२. सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा।
ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै॥ (म. भा. शान्ति ३४९।६४)
३. इण्डियन फिलासफी का हिन्दी रूपान्तर भाग १ पृ. ४२६
४. शाण्डिल्य सूत्रों में बादरायण के लिए कहा है—
"आत्मैकपरां बादरायणः" (शां. सू. ३०)