भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्

पञ्चपादिकाकारादि के द्वारा बादरायण का नाम प्रस्तुत किया जाता है¹। खण्डनखण्डखाद्य- कार भी उसी का समर्थन करते हुए प्रतीत होते हैं²। श्री वाचस्पति मिश्रादि आचार्यगण वेदव्यास की चर्चा करते हैं³। इन विभिन्न वादों का सामञ्जस्य करनेवाले विद्वानों का कहना है कि दोनों नाम उन्हीं महर्षि कृष्णद्वैपायन के हैं, जिन्होंने महाभारत आदि इतिहासों और अष्टादश पुराणों की रचना की। इतना ही नहीं पातञ्जल योगसूत्रों के भाष्यकार भी वे ही हैं⁴। चिरजीवी महायोगियों का जीवन कई सहस्र वर्ष तक बना रहता है, समय-समय पर श्रद्धालु अधिकारियों को दर्शन देते रहते हैं। भगवान् आद्य शङ्कराचार्य को भी काशी में महर्षि वेदव्यास ने दर्शन देकर भाष्य-प्रणयन की प्रेरणा दी थी।

यहाँ यह विचारणीय है कि 'वेदव्यास' या 'व्यास' नाम का एक ही महापुरुष हुआ है ? अथवा अनेक ? यदि एक ही है, तब वह निश्चित कृष्णद्वैपायन व्यास है, बादरायण-व्यास कैसे ? यदि व्यास अनेक हैं, तब उनमें बादरायण व्यास का उल्लेख है ? या नहीं ? इस विषय की चर्चा करते हुए स्वयं महर्षि पराशर ने कहा है कि व्यास एक नहीं, अट्ठाईस हुए हैं—

वेदव्यासा व्यतीता ये ह्यष्टाविंशति सत्तम।
चतुर्धा यैः कृतो वेदो द्वापरेषु पुनः पुनः॥ (वि. पु. ३।३।१०)

अट्ठाईसों के क्रमशः नाम इस प्रकार हैं—

१. स्वयम्भू (ब्रह्मा)१५. त्रय्यारुण
२. प्रजापति१६. धनञ्जय
३. शुक्राचार्य१७. क्रतुञ्जय
४. बृहस्पति१८. जय
५. सविता१९. भरद्वाज
६. मृत्यु (यम)२०. गौतम
७. इन्द्र२१. हर्यात्मा
८. वसिष्ठ२२. वाजश्रवा मुनि
९. सारस्वत२३. तृणविन्दु
१०. त्रिधामा२४. ऋक्ष
११. त्रिशिख२५. शक्ति
१२. भरद्वाज२६. पराशर
१३. अन्तरिक्ष२७. जातुकर्ण
१४. वर्णी२८. कृष्णद्वैपायन

कथित अट्ठाईस व्यासों में जैसे कृष्णद्वैपायन का स्पष्ट उल्लेख है, वैसा बादरायण का नहीं,
अतः बादरायण को कृष्णद्वैपायन व्यास से भिन्न मानना अनिवार्य है।
"अपि च स्मर्यते" (ब्र. सू. २।३।४५) इस सूत्र में निर्दिष्ट स्मृति के रूप में भाष्यकार


१. पञ्चपादिका के मङ्गल-पद्यों में कहा है —

नमः श्रुतिशिरःपद्मषण्डमार्तण्डमूर्तये ।
बादरायणसंज्ञाय मुनये शमवेश्मने ॥

२. खण्डन. पृ. ८ पर कहा है—"भगवत्पादेन वा बादरायणीयेषु सूत्रेषु भाष्यं नाभाषि"।
३. भामती-मङ्गल-श्लोकों में कहा है—"वेदव्यासाय धीमते"।
४. द्र. सर्वशास्त्रनिष्णात स्वामी बालराम द्वारा व्याख्यात योग-भाष्य की भूमिका।