भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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प्रस्तुत ग्रन्थ की अन्तःपरिधि का अध्ययन करने से पहले इसके बाह्य कलेवर की मीमांसा आवश्यक प्रतीत होती है, क्योंकि नाम और रूप का परिवेश ही अपने में अवगुण्ठित अस्ति-भाति-प्रियतत्त्व का उपलक्षक माना जाता है, परीक्षित लक्षण लक्ष्य का सटीक परिचायक होता है। फलतः ग्रन्थ का नाम तथा उसके रचयिता का कुछ परिचय कराया जाता है—
१. ग्रन्थ और ग्रन्थकार
१. ग्रन्थ का नाम—'ब्रह्मसूत्र' इस ग्रन्थ की प्रख्यात समाख्या है। सूत्र-ग्रन्थों का नामकरण दो प्रकार से होता आया है—(१) प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से, जैसे 'सांख्यसूत्र,' 'न्यायसूत्र' इत्यादि। (२) ग्रन्थकार के नाम पर भी ग्रन्थ का नाम रखा जाता है, जैसे 'पाणिनिसूत्र', 'कात्यायनसूत्र', 'जैमिनिसूत्र'। ब्रह्मविषयिणी मीमांसा को 'ब्रह्मसूत्र' कहना सर्वथा न्याय-संगत है।
आदरणीय वासुदेवशरण अग्रवाल ने कुछ पाश्चात्य विचारकों के साक्ष्य पर इस ग्रन्थ का नाम 'भिक्षुसूत्र' बताया है¹। दार्शनिक वाङ्मय के प्रमुख पारखी श्री गोपीनाथ कविराज ने अपनी प्रसिद्ध ब्रह्म-सूत्र-भूमिका (पृ० २) में लिखा है कि यदि यह कल्पना सत्य है, तब वह 'भिक्षुसूत्र' 'वेदान्तसूत्र' या 'ब्रह्मसूत्र' से भिन्न नहीं होगा"। कविराज जी की इस व्यवस्था से असहमति व्यक्त करते हुए उदयवीर शास्त्री कहते हैं² कि "पाणिनि ने पञ्चशिख की सांख्यविषयक रचना का 'भिक्षुसूत्र' पद से निर्देश किया है। फलतः पाणिनि के इस सूत्र के आधार पर कविराज डा० गोपीनाथ द्वारा की गई कल्पना पूर्णरूप से सन्दिग्ध है"।
गवेषकों का बहुमत इसी पक्ष में प्रतीत होता है कि पाणिनि-सूत्र में निर्दिष्ट 'भिक्षुसूत्र' यह 'ब्रह्मसूत्र' नहीं, क्योंकि यह यदि कृष्णद्वैपायन व्यास-द्वारा रचित मान भी लिया जाय, तब भी व्यास को पाराशर्य मुख्यतः नहीं कहा जा सकता, क्योंकि 'पराशर' शब्द से गोत्रार्थ में "गर्गादिभ्यो यञ्" (पा० सू० ४।१।१०५) इस सूत्र के द्वारा यञ् प्रत्यय करने पर पाराशर्य' शब्द सम्पन्न होता है। "अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्" (पा. सू. ४।१।१६२) इस सूत्र के द्वारा पौत्र-प्रपौत्रादि की ही गोत्र संज्ञा होती है, साक्षात् पुत्र की नहीं, व्यास तो पराशर के साक्षात् पुत्र थे, अतः व्यास को पाराशर्य कहना क्योंकर सम्भव होगा ? दूसरी बात यह भी है कि वहाँ कर्मन्द के द्वारा प्रणीत अन्य भी भिक्षुसूत्र निर्दिष्ट है, अतः भिक्षुसूत्र अनेक मानने ही पड़ते हैं तब इस बादरायण-सूत्र को उस झमेले में डालने की आवश्यकता नहीं। आगे चल कर यह कहा जायगा कि तर्कपाद में आलोचित विषय और उनकी सूत्र-निर्दिष्ट परिभाषाएँ बुद्ध-काल से बहुत परवर्ती बौद्धाचार्यों-द्वारा उद्भावित हैं, अतः बुद्धकालीन पाणिनि-सूत्रों में आबद्ध भिक्षुसूत्र कोई अन्य ही होगा, जो इस समय उपलब्ध नहीं। हाँ, नागार्जुन (ई. द्वितीय शताब्दी) के द्वारा प्रतिपादित शून्यवाद का निराकरण सूत्रों में न होने के कारण उससे पूर्व किसी समय की यह रचना मानी जाती है।
२. ग्रन्थकार—इस सूत्र-ग्रन्थ का रचयिता कौन है? इस प्रश्न के उत्तर में
¹ "पाणिनिकालीन भारत" के पृष्ठ ३२६ पर लिखा है—'वेबर का मत है कि पा. सू. ४।३।११०,१११ में पाणिनि बुद्धकालीन ब्राह्मण-भिक्षुओं का उल्लेख कर रहे हैं। पाराशर्य-कृत भिक्षुसूत्र वर्तमान वेदान्तसूत्र ज्ञात होते हैं।'
² 'वेदान्त दर्शन का इतिहास' पृ० ६० पर।