भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवेदकर्तृत्वविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १०९
( ३—शास्त्रयोनित्वाधिकरणम् । सू० ३ )
जगत्कारणत्वप्रदर्शनेन सर्वज्ञं ब्रह्मेत्युपक्षिप्तं, तदेव द्रढयन्नाह—
शास्त्रयोनित्वात् ॥ ३ ॥
महत् ऋग्वेदादेः शास्त्रस्यानेकविद्यास्थानोपबृंहितस्य प्रदीपवत्सर्वार्थावद्योतिनः
भामती
सूत्रान्तरमवतारयितुं पूर्वसूत्रसङ्गतिमाह ❀ जगत्कारणत्वप्रदर्शनेन इति ❀ । न केवलं जगद्योनित्वादस्य भगवतः सर्वज्ञता, शास्त्रयोनित्वादपि बोद्धव्या। शास्त्रयोनित्वस्य सर्वज्ञतासाधनत्वं समर्थयते। ❀ महत् ऋग्वेदादेः शास्त्रस्य इति ❀ । चातुर्वर्ण्यस्य चातुराश्रम्यस्य च यथायथं निषेकादिश्मशानान्तासु ब्राह्ममुहूर्तोपक्रमप्रबोधपरिसमापनीयासु नित्यनैमित्तिककाम्यकर्मपद्धतिषु च ब्रह्मतत्त्वे च शिष्याणां शासनात् शास्त्रमृग्वेदादि, अत एव महाविषयत्वात् महत्। न केवलं महाविषयत्वेनास्य महत्त्वम्, अपि त्वनेकाङ्गोपाङ्गोपकरणतयापीत्याह ❀ अनेकविद्यास्थानोपबृंहितस्य ❀ । पुराण-
भामती-व्याख्या
है, वैसे ही अविद्या-विशिष्ट ब्रह्म से उत्पन्न जगद्रूप कार्य उसी ब्रह्म में स्थित और उसी में विलीन हो जाता है। जगज्जन्मादिकारणत्व विशिष्ट ब्रह्म का स्वरूप और शुद्ध ब्रह्म का तटस्थ लक्षण है, क्योंकि जो लक्षण लक्ष्य से तटस्थ (लक्ष्यावृत्ति) होकर लक्ष्य का उपलक्षक होता है, उसे तटस्थ लक्षण कहते हैं, तटस्थ लक्षण के द्वारा भी लक्षण का प्रयोजन सिद्ध होता है। न्यायभाष्यकार ने लक्षण का प्रयोजन बताया है—"उद्दिष्टस्यातत्त्व-व्यवच्छेदको धर्मो लक्षणम्" (न्या. सू. १।१।२)। इसकी व्याख्या करते हुए वार्तिककार ने कहा है—"लक्षणं खलु लक्ष्यं पदार्थं समानासमानजातीयेभ्यो व्यवच्छिनत्ति"। 'काकवद् गृहं देवदत्तस्य'—इत्यादि व्यवहारों में काकादि उपलक्षक पदार्थों को भी देवदत्त के गृह का व्यावर्तक माना जाता है। श्री कुमारिल भट्ट भी यही कहते हैं—"सर्वथा लक्षणं नाम यद् व्यवच्छेदकारणम्" (तं. वा. पृ. ७४६)। श्री शबरस्वामी भी कहते हैं—"न शक्यं पृष्ठाकोटेन तत्र तत्रोपदेष्टुमिति लक्षणमुक्तम्।
ऋषयोऽपि पदार्थानां नान्तं यान्ति पृथक्त्वशः।
लक्षणेन तु सिद्धानामन्तं यान्ति विपश्चितः॥"
अर्थात् धरातल पर बिखरे हुए अनन्त अलक्ष्यों की व्यावृत्ति और लक्ष्यों का सञ्चयन लक्षण के माध्यम से ही हो सकता है, प्रत्येक व्यक्ति को झुक-झुक कर देखना और पहचानना सम्भव नहीं]॥ २॥
तृतीय सूत्र की अवतरणिका के रूप में पूर्व (द्वितीय) सूत्र से इसकी संगति भाष्यकार बताते हैं—"जगत्कारणत्वप्रदर्शनेन सर्वज्ञं ब्रह्मेत्युपक्षिप्तम्, तदेव द्रढयति"।
विशाल विश्व की कारणता होने मात्र से भगवान् में सर्वज्ञता नहीं, अपितु ऋग्वेदादि महान् शास्त्रों का प्रणेतृत्व भी भगवान् में सर्वज्ञता का प्रयोजक है। शास्त्रप्रणेतृत्व में सर्वज्ञत्व की साधनता का समर्थन किया जाता है—'महतः ऋग्वेदादि शास्त्रस्य। ब्राह्मणादि चारों वर्णों एवं ब्रह्मचर्यादि चारों आश्रमों के लिए समस्त संस्कारों [निषेक (गर्भाधान) आदि अन्त्येष्टि-पर्यन्त संस्कार द्विजत्व का सम्पादन करते हैं—वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्म-नाम। कार्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च॥ (मनु० २।२६)]। प्रातः काल से लेकर सायं तक सम्पादनीय नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्मों तथा ब्रह्मतत्त्व का शासन (विधान) करने के कारण ऋग्वेदादि को शास्त्र कहा जाता है। केवल प्रतिपाद्य विषय की दृष्टि से ही