भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128
११०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ३

सर्वज्ञकल्पस्य योनिः कारणं ब्रह्म। न हीदृशस्य शास्त्रस्यर्ग्वेदादिलक्षणस्य सर्वज्ञगुणान्वितस्य सर्वज्ञादन्यतः संभवोऽस्ति। यद्यद्विस्तरार्थं शास्त्रं यस्मात्पुरुषविशेषात्सं-

भामती

न्यायमीमांसादयो दश विद्यास्थानानि तैस्तया तया द्वारोपकृतस्य। तदनेन समस्तशिष्टजनपरिग्रहेणा- प्रामाण्यशङ्काऽप्यपाकृता। पुराणादिप्रणेतारो हि महर्षयः शिष्टास्तैस्तया तया द्वारा वेदान् व्याचक्षाणै- स्तदर्थं चादरेणानुतिष्ठद्भिः परिगृहीतो वेद इति। न चायमनवबोधको नाप्यस्पष्टबोधको येनाप्रमाणं स्यादित्याह ❀ प्रदीपवत् सर्वार्थद्योतिनः ❀। सर्वमर्थजातं सर्वथाऽवबोधयन् नानवबोधको नाप्यस्पष्ट- बोधक इत्यर्थः। अत एव ❀ सर्वज्ञकल्पस्य ❀ सर्वज्ञसदृशस्य। सर्वज्ञस्य हि ज्ञानं सर्वविषयं शास्त्रस्या- प्यभिधानं सर्वविषयमिति सादृश्यम्। तदेवमन्वयमुक्त्वा व्यतिरेकमाह ❀ न हीदृशस्य इति ❀। सर्वज्ञस्य गुणः सर्वविषयता तदन्वितं शास्त्रम्। अस्यापि सर्वविषयत्वात्। उक्तमर्थं प्रमाणयति ❀ यद्यद्विस्तरार्थं शास्त्रं यस्मात् पुरुषविशेषात् सम्भवति स पुरुषविशेषस्ततोऽपि शास्त्रादधिकतरविज्ञानः ❀ इति योजना। अद्यात्वेऽप्यस्मदादिभिर्यत्समीचीनार्थविषयं शास्त्रं विरच्यते तत्रास्माकं वक्तॄणां वाक्याज्ज्ञानमधि- कविषयम्। न हि ते तेऽसाधारणधर्मा अनुभूयमाना अपि शक्या वक्तुम्। न खल्विक्षुक्षीरगुडादीनां मधुर- रसभेदाः शक्याः सरस्वत्याप्याख्यातुम्। विस्तरार्थमपि वाक्यं न वक्तृज्ञानेन तुल्यविषयमिति कथयितुं


भामती-व्याख्या

उन्हें महान् नहीं कहा जाता, अपितु सभी अङ्गों और उपाङ्गों को मिला देने से उनका कलेवर भी महान् (विपुल) हो जाता है—"अनेकविद्यास्थानोपबृंहितस्य"। वेदों के छः अङ्ग होते हैं—"शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषम्" (मुं. उ. १।१।५), इनमें पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र—इन चारों को मिला देने से सब दस विद्यास्थान कहे जाते हैं।

पुराणकारादि शिष्ट पुरुषों के द्वारा वेद परिगृहीत है, अतः इसमें अप्रामाण्य की आशङ्का नहीं कर सकते, क्योंकि पुराणादि ग्रन्थों के प्रणेता ऋषिगण शिष्ट कहे जाते हैं ["के शास्त्रस्थाः ? शिष्टाः, तेषामविच्छिन्ना स्मृतिः शब्देषु वेदेषु च" (शाबर. १।३।९)]। उनके द्वारा वेदों का समुचित व्याख्यान और वैदिक कर्मों का श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान यह सिद्ध करता है कि वेदों के उपदेशों को महर्षियों ने अपने आचरणों में पूर्णतया उतारा था, वेदों का प्रामाण्य उन्हें सर्वथा अभ्युपगत था। वेद न तो अबोधक हैं और न संशयादि के उत्पादक, अतः उनमें मिथ्यात्व, अज्ञान और संशय नाम का त्रिविध अप्रामाण्य सम्भव नहीं—"प्रदीपवत् सर्वार्थद्योतिनः।" समस्त अर्थों का जो विस्पष्ट अवबोधक होता है, उसे न तो अबोधक कह सकते हैं और न अस्पष्ट बोधक। अत एव वेदों को "सर्वज्ञकल्प" कहा जाता है। सर्वज्ञकल्प का यहाँ अर्थ सर्वज्ञ-सदृश है। सर्वज्ञ पुरुष का ज्ञान जैसे सर्वविषयक होता है, वैसे शास्त्रों का अभिधान भी सर्वविषयक है—यही दोनों में सादृश्य है। अन्वयमुखेन प्रतिपादित विषय का व्यतिरेकतः प्रतिपादन किया जाता है—"न हीदृशस्य शास्त्रस्य ऋग्वेदादिलक्षणस्य सर्वज्ञगुणान्वितस्य सर्वज्ञादन्यतः सम्भवोऽस्ति"। सर्वज्ञ का गुण है—सर्वविषयत्व, उससे युक्त होने के कारण शास्त्र भी सर्वविषयक होता है। उक्त अर्थ का सर्वज्ञता में पर्यवसान किया जाता है—"यद् यद्विस्तरार्थं शास्त्रं यस्मात् पुरुषविशेषात् सम्भवति, स ततोऽप्यधिकतरविज्ञानः"। लोक में यह प्रसिद्ध व्याप्ति है कि शास्त्र की अपेक्षा शास्त्रप्रणेता पुरुष अधिक विषय का ज्ञान रखता है। आज-कल भी हम लोगों के द्वारा जो शास्त्र रचा जाता है, उसकी अपेक्षा शास्त्रकार में अधिक विषय का ज्ञान होता है, क्योंकि पुरुष के द्वारा वस्तु के जिन असाधारण धर्मों का अनुभव किया जाता है, उन सभी का शब्दों के द्वारा कथन करना सम्भव नहीं होता, जैसे इक्षु (ईख या गन्ना) दूध और गुडादि के