भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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वेदकर्तृत्वविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १११

भवति, यथा व्याकरणानि पाणिन्यादेर्ज्ञेयैकदेशार्थमपि, स ततोऽप्यधिकतरविज्ञान इति प्रसिद्धं लोके। किमु वक्तव्यमनेकशाखाभेदभिन्नस्य देवतिर्यङ्मनुष्यवर्णाश्रमादिप्रविभागहेतोर्ऋग्वेदाद्याख्यस्य सर्वज्ञानाकरस्याप्रयत्नेनैव लीलान्यायेन पुरुषनिःश्वासवद्यस्मान्महतो भूताद्योनेः संभवः, 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदः'

भामती विस्तरग्रहणम्। सोपनयं निगमनमाह ॐ किमु वक्तव्यम् इति ॐ। वेदस्य यस्मात् महतो भूताद् योनेः सम्भवः तस्य महतो भूतस्य ब्रह्मणो निरतिशयं सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तित्वं च किमु वक्तव्यमिति योजना ॐ अनेकशाखा इति ॐ। अत्र चानेकशाखाभेदभिन्नस्येत्यादिः सम्भव इत्यन्त उपनयः। तस्येत्यादि सर्वशक्तिमत्त्वं चेत्यन्तं निगमनम्। ॐ अप्रयत्नेनैव इति ॐ ईषत्प्रयत्नेन, यथाऽलवणा यवागूरिति। देवर्षयो हि महापरिश्रमेणापि यत्राशक्तास्तदयमीषत्प्रयत्नेन लीलयैव करोतीति निरतिशयमसय सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तिमत्त्वं चोक्तं भवति। अप्रयत्नेनास्य वेदकर्तृत्वे श्रुतिरुक्ता 'अस्य महतो भूतस्य' इति।

येऽपि तावद् वर्णानां नित्यत्वमास्थिषत तैरपि पदवाक्यादीनामनित्यत्वमभ्युपेयम्। आनुपूर्वीभेदवन्तो हि वर्णा पदम्। पदानि चानुपूर्वीभेदवन्ति वाक्यम्। व्यक्तिधर्मश्चानुपूर्वी न वर्णधर्मः। वर्णानां नित्यानां विभूनां च कालतो देशतो वा पौर्वापर्यायोगात्। व्यक्तिश्चानित्येति कथं तदुपगृहीतानां वर्णानां नित्यानामपि पदता नित्या। पदानित्यतया च वाक्यादीनामप्यनित्यता व्याख्याता। तस्मान्नृत्यानुकरणवत् पदाद्य-

भामती-व्याख्या माधुर्य का जो अन्तर अनुभूत होता है, वह सरस्वती के द्वारा भी नहीं कहा जा सकता। शास्त्र कितना भी विस्तरार्थक हो वक्तृज्ञान की बराबरी नहीं कर सकता-इस तथ्य की अभिव्यक्ति के लिए 'विस्तर' पद का ग्रहण किया गया है। न्याय-प्रयोग का उपनय-सहित निगमन किया जाता है—"किमु वक्तव्यमित्यादि"। ऐसे वेद का जिस महान् कारण से सम्भव (उत्पाद) होता है, उसकी सर्वज्ञता के विषय में कहना ही क्या है? [ भाष्य-प्रदर्शित अनुमान का पूरा आकार कल्पतरूकार ने दिखाया है—'ब्रह्म वेदविषयादधिकविषयकज्ञानवत् तत्कर्तृत्वाद्, यो यद्वाक्यप्रणयनकर्त्ता, स तद्विषयादधिकविषयज्ञः, यथा पाणिनीयव्याकरणात् पाणिनिः। भाष्य-प्रयुक्त अवयवों में "अनेकशाखाभेदभिन्नस्य"-यहाँ से लेकर "सम्भवः"-यहाँ तक उपनय और "तस्य"-यहाँ से लेकर "सर्वशक्तिमत्त्वं च"-यहाँ तक निगमन वाक्य प्रदर्शित किया गया है। "अप्रयत्नेनैव" का अर्थ है—"ईषत्प्रयत्नेन'। जैसे 'अलवणा यवागू' का 'ईषल्लवणा' अर्थ होता है। अर्थात् देव और ऋषिगण अपने महान् श्रम के द्वारा भी जिस कार्य का सम्पादन नहीं कर सकते, उस कार्य को परमात्मा अपने थोड़े प्रयत्न के द्वारा लीलामात्र से ही सम्पन्न कर देता है, इससे ही परमेश्वर में निरतिशय सर्वज्ञत्व और सर्वशक्तिमत्त्व पर्यवसित हो जाता है। वह (ईश्वर) अपने स्वल्प प्रयत्न से ही वेदों की रचना कर डालता है—यह श्रुति ही कहती है—"अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यदृग्वेदः" (बृह. उ. २।४।१०)। जो (मीमांसकगण) वर्णों को नित्य मानते हैं, उन्हें भी 'पद' और 'वाक्यादि' को अनित्य ही मानना पड़ेगा, क्योंकि क्रम विशेष से युक्त वर्ण पद और आनुपूर्वी विशेष से युक्त पद ही वाक्य कहे जाते हैं। आनुपूर्वी (क्रम विशेष) वर्णों की अभिव्यक्ति का धर्म है, वर्णों का नहीं, क्योंकि वर्ण नित्य हैं, अतः कालिक पौर्वापर्यभाव जैसे उनमें सम्भव नहीं, वैसे ही वर्ण विभु हैं, अतः दैशिक पूर्वोत्तरभाव उनमें नहीं बन सकता। वर्णों की अभिव्यक्ति अनित्य होती है, अतः आनुपूर्वी विशेष से युक्त वर्णगत पदत्व नित्य क्योंकर होगा? विवश होकर ऐसे पदों को अनित्य ही मानना होगा, पदों के अनित्य होने से वाक्यों को अनित्य मानना अनिवार्य है। अतः नृत्य का अनुकरण जैसे भिन्न होता है, वैसे ही गुरु-द्वारा उच्चरित