भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ३
( बृह० २।४।१० ) इत्यादिश्रुतेः । तस्य महतो भूतस्य निरतिशयं सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तिमत्त्वं चेति । इति प्रथमवर्णकम् ॥
भामती
नुकरणम् । यथा हि यादृशं गात्रचलनादि नर्तकः करोति तादृशमेव शिक्ष्यमाणाऽनुकराति नर्तकी, न तु तदेव व्यनक्ति । एवं यादृशीमानुपूर्वी वैदिकानां वर्णपदादीनां करोत्यध्यापयिता तादृशीमेवानुकरोति माणवकः, न तु तामेवोच्चारयति । आचार्यव्यक्तिभ्यो माणवकव्यक्तीनामन्यत्वात् । तस्मान्नित्यानित्यवर्णवादिनां न लौकिकवैदिकपदवाक्यादिपौरुषेयत्वे विवादः, केवलं वेदवाक्येषु पुरुषस्वातन्त्र्यास्वातन्त्र्ये विप्रतिपत्तिः । यथाहूः—'यत्नतः प्रतिषेध्या नः पुरुषाणां स्वतन्त्रता' ।
तत्र सृष्टिप्रलयमनिच्छन्तो जैमिनीया वेदाध्ययनं प्रत्यस्माद्दशगुरुशिष्यपरम्परामविच्छिन्नामनादिमाचक्षते । वैयासिकं तु मतमनुवर्तमान्तानाः श्रुतिस्मृतीतिहासादिप्रसिद्धसृष्टिप्रलयानुसारेणानाद्यविद्योपधानलब्धसर्वशक्तिज्ञानस्यापि परमात्मनो नित्यस्य वेदानां योनेरपि न तेषु स्वातन्त्र्यं, पूर्वपूर्वसर्गानुसारेण तादृशतादृशानुपूर्वीविरचनात् । तथा हि यागादिब्रह्महत्यादयोऽर्थानर्थहेतवो ब्रह्मविवर्त्ता अपि स र्गान्तरे विपरीयन्ते, न हि जातु क्वचित् सर्गे ब्रह्महत्याऽर्थहेतुरनर्थहेतुश्चाश्वमेधो भवति, अग्निंर्वा क्लेदयति, आपो वा दहन्ति, तद्वत् । यथाऽत्र सर्गे नियतानुपूर्व्यं वेदाध्ययनमभ्युदयनिःश्रेयसहेतुरन्यथा तदेव वाग्वज्रतयाऽ-
भामती-व्याख्या
पदादि का अनुकरण भी भिन्न होता है, क्योंकि जैसा शरीर को नर्तक मटकाता है, वैसा ही सीखनेवाली नर्तकी भी मटकाती है, नर्तक के नृत्य की ही अभिव्यक्ति नर्तकी में नहीं मानी जाती । उसी प्रकार अध्यापक वैदिक वर्णों और पदों की जैसी आनुपूर्वी का उच्चारण करता है, वैसी ही आनुपूर्वी का अनुकरण माणवक करता है, अध्यापकोच्चारित आनुपूर्वी का ही उच्चारण नहीं करता, क्योंकि आचार्य की आनुपूर्वी व्यक्ति से मणिवक की आनुपूर्वी व्यक्ति भिन्न होती है। अतः नित्यवर्णवादी और अनित्यवर्णवादियों का वैदिक पदों और वाक्यों की पौरुषेयता में विवाद नहीं, केवल वैदिक वाक्यों में पुरुष के स्वातन्त्र्यास्वातन्त्र्य में वैमत्य है, जैसा कि श्री कुमारिलभट्ट कहते हैं—"यत्नतः प्रतिषेध्या नः पुरुषाणां स्वतन्त्रता" (श्लो. वा. पृ. ८०२)। [लौकिक पदों के उच्चारण में पुरुष स्वतन्त्र है, अतः पुरुष के दोष उसके शब्द में संक्रान्त हो जाते हैं, किन्तु वैदिक शब्दों में पुरुष का स्वातन्त्र्य न होने के कारण पुरुष के दोष उनमें संक्रान्त नहीं होते ]। महासृष्टि और महाप्रलय न माननेवाले जैमिनिमतावलम्बी आचार्यगण वेदाध्ययन की गुरु-शिष्य-परम्परा को अनन्त और अनादि मानते हैं, किन्तु व्यासमतावलम्बी वेदान्तिगणों के मत में श्रुति, स्मृति, इतिहासादि-प्रसिद्ध सृष्टि और प्रलय के अनुसार अनादि अविद्यारूप उपाधि के द्वारा सर्वज्ञत्व पाकर भी नित्य परमात्मा वेदों की रचना करके भी उसमें स्वतन्त्र नहीं माना जाता, क्योंकि पूर्व-पूर्व सृष्टि में प्रचलित आनुपूर्वी की ही वह रचना कर देता है, नूतन आनुपूर्वी का निर्माण नहीं करता । यह ध्रुव सत्य है कि इष्ट-साधनीभूत यागादि और अनिष्ट-साधनीभूत ब्रह्म-हत्यादि कर्म ब्रह्म के विवर्त्त होकर भी अन्य सृष्टि में विपरीत स्वभाव के नहीं होते, क्योंकि किसी भी सृष्टि में ब्रह्महत्या कर्म स्वर्गादिरूप इष्ट का और अश्वमेध नरकादिरूप अनिष्ट का, या अग्नि क्लेदन (आर्द्रीकरण) का अथवा जल दहन का करण नहीं होता । वैसे ही वेदों में पुरुष का स्वातन्त्र्य कभी नहीं रहता । जैसे इस समय आनुपूर्वी विशेष से युक्त वेदों का अध्ययन अभ्युदय और निःश्रेयस (मोक्ष) का साधन होता है, अन्यथा (स्वर और वर्णादि-क्रम का व्युत्क्रम हो जाने पर) वेद-मन्त्र वज्र बन कर यजमान का ही हिंसक हो जाता है, जैसा कि शिक्षाकार कहते हैं—
"मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥" (पाणि. शिक्षा)