भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशास्त्रकर्तृत्वविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११३
भामती नर्थहेतुः, एवं सर्गान्तरेष्वपीति, तदनुरोधात् सर्वज्ञोऽपि सर्वशक्तिरपि पूर्वपूर्वसर्गानुसारेण वेदान् विरचयन्न स्वतन्त्रः । पुरुषस्वातन्त्र्यमात्रं चापौरुषेयत्वं रोचयन्ते जैमिनीया अपि, तच्चास्माकमपि समानमन्यत्राभिनिवेशात् । न चैकस्य प्रतिभानेऽनाश्वास इति युक्तम्, न हि बहूनामप्यज्ञानां विज्ञानां वाऽऽशयदोषवतां प्रतिभाने युक्त आश्वासः । तत्त्वज्ञानवतश्चापास्तसमस्तदोषस्यैकस्यापि प्रतिभाने युक्त एवाश्वासः । सर्गादिभुवां प्रजापतिदेवर्षीणां धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यसम्पन्नानामुपपद्यते तत् स्वरूपावधारणं, तत्प्रत्ययेन चार्वाचीनानामपि तत्र सम्प्रत्यय इत्युपपन्नं ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वं शास्त्रस्य चापौरुषेयत्वं प्रामाण्यं चेति ।
भामती-व्याख्या [ तैत्तिरीयसंहिता (२।५) में आख्यायिका आती है कि त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप की इन्द्र ने हत्या कर दी । त्वष्टा ने इन्द्र को मार डालनेवाले पुत्र की लिप्सा से सोमयाग का अनुष्ठान किया । उसमें इन्द्र का भाग नहीं रखा । इन्द्र ने स्वयं यज्ञ में आ कर बलपूर्वक सोमरस का पान किया । त्वष्टा ने सोमपात्र में बचे सोम-रस की आहुति डालते हुए मन्त्र पढ़ा— “स्वाहेन्द्रशत्रुर्वर्धस्व” । वहाँ 'इन्द्रस्य शत्रुः'—ऐसे षष्ठी तत्पुरुष का स्वर न बोल कर 'इन्द्रः शत्रुर्यस्य'—इस प्रकार बहुव्रीहि समास के स्वर का प्रयोग कर डाला । उसका फल यह हुआ कि उस याग से उत्पन्न वृत्रासुर नाम के पुत्र का हन्ता इन्द्र ही हो गया ] । अतः अन्य सृष्टि के आरम्भ में सर्वज्ञ परमेश्वर भी पूर्व-प्रचलित आनुपूर्वी के अनुसार ही वेदों का प्रचार कर देता है, उनकी नूतन रचना न करने के कारण परमात्मा को स्वतन्त्र नहीं माना जाता । वेदों में पुरुष की स्वतन्त्रता का न होना ही वेदों की अपौरुषेयता है—ऐसा जैमिनीय मत के आचार्य भी मानते हैं। वैसा ही हमारे वेदान्त में भी समानरूप से माना जाता है, किसी प्रकार के आग्रह की बात और है ।
शङ्का—एक ईश्वर ही यदि वेद-प्रवर्तक माना जाता है, तब यह भी सन्देह हो सकता हैं कि वह पूर्वप्रचलित वेदों का उपदेश करता है ? अथवा अपने नूतन रचित वेदों का प्रचार करता है ? अतः एक ईश्वर पर निर्भर न रह कर बहुत पुरुषों पर ही अध्ययनाध्यापन की परम्परा निर्भर रखनी चाहिए [ जैसा कि वार्तिककार कहते हैं—
अन्यथाकरणे चास्य बहुभ्यः स्यान्निवारणम् ।
एकस्य प्रतिभातं तु कृतकान्न विशिष्यते ॥
अतश्च सम्प्रदाये च नैकः पुरुष इष्यते ।
बहवः परतन्त्राः स्युः सर्वे ह्यद्यतवन्नराः ॥ ( श्लो. वा. पृ. ९०-९१ )
अर्थात् पूर्व-काल में जैसे वेदों का कोई एक पुरुष कर्त्ता नहीं रहा, वैसे ही सम्प्रदाय-प्रवर्तक भी कोई एक ईश्वर नहीं रहा, किन्तु आज-कल के समान ही अनेक परतन्त्र व्यक्तियों की परम्परा में वेद की अध्ययन-धारा प्रवाहित होती आ रही है ] ।
समाधान—यदि एक पुरुष पर विश्वास नहीं किया जा सकता, तब अनेक पुरुषों पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि अज्ञानी पुरुषों की एक लम्बी परम्परा अथवा अनेक ज्ञानवान् किन्तु वञ्चक पुरुषों की परम्परा में जो बात आ रही है, वह कभी भी विश्वसनीय नहीं होती । यदि एक व्यक्ति भी तत्त्वज्ञ, विवेकी और आप्त पुरुष है, तब उसके प्रतिभान पर विश्वास किया जा सकता है। यदि हम लोग ईश्वर के स्वरूप का अवधारण नहीं कर सकते, तब भी सृष्टि के आरम्भ में होनेवाले प्रजापति, देव और ऋषिगण धर्म, ज्ञान, वैराग्य और पूर्ण ऐश्वर्य से सम्पन्न होते हैं, वे उस (ईश्वर) के स्वरूप का अवधारण भली प्रकार कर सकते हैं । उन पर पूर्ण विश्वास रखनेवाले अर्वाचीन व्यक्तियों को भी ईश्वर का स्वरूपावधारण सुलभ हो जाता है । फलतः वेदरूप शास्त्रों की कारणता ब्रह्म में, शास्त्रों
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