भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ११४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ३ |
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अथवा,—यथोक्तमृग्वेदादि शास्त्रं योनिः कारणं प्रमाणमस्य ब्रह्मणो यथावत्स्वरूपाधिगमे। शास्त्रादेव प्रमाणाज्जगतो जन्मादिकारणं ब्रह्माधिगम्यत इत्यभिप्रायः। शास्त्रमुदाहृतं पूर्वसूत्रे—‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते’ इत्यादि। किमर्थं तर्हीदं सूत्रं ? यावता पूर्वसूत्र एवैवंजातीयकं शास्त्रमुदाहरता शास्त्रयोनित्वं ब्रह्मणो दर्शितम्। उच्यते,—तत्र पूर्वसूत्राक्षरेण स्पष्टं शास्त्रस्यानुपादानाज्जन्मादि केवलमनुमानमुपन्यस्तमित्याशङ्क्येत, तमाशङ्कां निवर्तयितुमिदं सूत्रं प्रववृते—शास्त्रयोनित्वादिति ॥ ३ ॥
भामती
वर्णकान्तरमारभते ॐ अथवा इति ॐ। पूर्वेणाधिकरणेन ब्रह्मस्वरूपलक्षणासम्भवशङ्कां व्युदस्य लक्षणसम्भव उक्तः, तस्यैव तु लक्षणस्यानेनानुमानत्वशङ्कामपाकृत्यागमोपदर्शनेन ब्रह्मणि शास्त्रं प्रमाणमुक्तम्। अक्षराथंस्वतिरोहितः ॥ ३ ॥
भामती-व्याख्या
में अपौरुषेयत्व और प्रामाण्य उपपन्न हो जाता है। इस सूत्र में 'शास्त्रस्य योनिः' और 'शास्त्रं योनिरस्य'—इस प्रकार द्विविध समास का अवलम्बन कर इस एक ही अधिकरण के दो वर्णक (अधिकरण-प्रकार भेद) हो जाते हैं, उनमें यहाँ तक प्रथम वर्णक समाप्त हो जाता है। [इस वर्णक का विषय वाक्य होता है—तस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यदृग्वेदः' (बृह. उ. २।४।१०)। यहाँ संशय होता है कि यह वाक्य ब्रह्म में शास्त्रप्रणेतृत्व का प्रतिपादक नहीं है ? अथवा है ? पूर्व पक्ष इस प्रकार किया गया कि वेद अपौरुषेय है, अतः वेदकर्तृत्व ब्रह्म में सम्भव नहीं और सिद्धान्त हो जाता है—"शास्त्रयोनित्वात्" । पुरुष-स्वातन्त्र्याभावरूप अपौरुषेयता का निर्वाह इस प्रकार भी हो जाता है कि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर विगत सृष्टि में प्रचलित वेद का ही उपदेश करता है, नूतन रचना नहीं करता। अतः ब्रह्म में वेदकर्तृत्वरूप शास्त्रयोनित्व सम्भव हो जाता है, यह सब कुछ ब्रह्म में सर्वज्ञत्व के बिना समझस नहीं होता, अतः ब्रह्म में सर्वज्ञत्व पर्यवसित हो जाता है]।
द्वितीय वर्णक का आरम्भ किया जाता है—"अथवा"। पूर्व ('जन्माद्यस्य यतः'—इस) अधिकरण के द्वारा 'ब्रह्मणः स्वरूपलक्षणासम्भव'—इस प्रकार की शङ्का का निराकरण करके स्वरूपलक्षण को सम्भावित किया, 'जगज्जन्मादिकर्तृत्वरूप लक्षण' में अनुमानत्व की आशङ्का को इस अधिकरण के प्रथम वर्णक से निरस्त किया गया। इस अधिकरण के द्वितीय वर्णक के द्वारा ब्रह्म में शास्त्रप्रमाणकत्व प्रतिपादित किया गया, इससे ब्रह्म में अनुमान प्रमाण का निरास करके शास्त्र प्रमाण प्रदर्शित हो जाता है। इस वर्णक में सूत्र और भाष्य नितान्त सुस्पष्ट और सुगम है। [जैसे धर्म के लक्षण और प्रमाण की जिज्ञासा "चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मे" (जै. सू. १।१।२) इस एक ही सूत्र के द्वारा शान्त की गई है, वार्तिककार कहते हैं—
द्वयमेकेन सूत्रेण श्रुत्यर्थाभ्यां निरूप्यते ।
स्वरूपेऽपि हि तस्योक्तं प्रमाणं कथ्यतेऽर्थतः ॥ (श्लो. वा. पृ. ४५)
वैसे ही ब्रह्मणः किं स्वरूपम् ? इस प्रश्न का उत्तर "जन्माद्यस्य यतः" और ब्रह्मणि किं प्रमाणम् ? इसका उत्तर है—यह द्वितीय वर्णक 'शास्त्रयोनि' या 'शास्त्रलक्षणं ब्रह्म'। जगज्जन्मादिकारणत्व का अर्थ श्री सुरेश्वराचार्य ने जगदुपादानाश्रयत्व किया है—
अस्य द्वैतेन्द्रजालस्य यदुपादानकारणम् ।
अज्ञानं तदुपाश्रित्य ब्रह्म कारणमुच्यते ॥ (बृह. वा. पृ. ५०५)