भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 133

वेदान्तसमन्वयविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११५

( ४—समन्वयाधिकरणम् । सू० ४ )

कथं पुनर्ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वमुच्यते, यावता 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्' ( जै० सू० १।२।१ ) इति क्रियापरत्वं शास्त्रस्य प्रदर्शितम् । अतो

भामती

शास्त्रप्रमाणकत्वमुक्तं ब्रह्मणः प्रतिज्ञामात्रेण, तदनेन सूत्रेण प्रतिपादनीयमित्युत्सूत्रं पूर्वपक्षमारभयति भाष्यकारः ॐ कथं पुनः इति ॐ । किमाक्षेपे । शुद्धबुद्धोदासीनस्वभावतयोपेक्षणीयं ब्रह्म भूतमभिदधतां वेदान्तानामपुरुषार्थोपदेशिनामप्रयोजनत्वापत्तेः, भूतार्थत्वेन च प्रत्यक्षादिभिः समानविषयतया लौकिकवाक्यवत् तदर्थानुवादकत्वेनाप्रामाण्यप्रसङ्गात् । न खलु लौकिकानि वाक्यानि प्रमाणान्तरविषयमर्थमवबोधयन्ति स्वतः प्रमाणम्, एवं वेदान्ता अपीत्यनपेक्षत्वलक्षणं प्रामाण्यमेषां व्याहन्येत । न च तैरप्रमाणैर्भवितुं युक्तम् । न चाप्रयोजनैः, स्वाध्यायाध्ययनविध्यापादितप्रयोजनवत्वनियमात् । तस्मात्तत्-

भामती-व्याख्या

इसी प्रकार अज्ञातज्ञापकत्वरूप प्रामाण्य शास्त्रों में ही माना गया है—

प्रमाणानि च शास्त्राणि तत्प्रामाण्यं न चान्यतः ।
अज्ञातात्मावबोधित्वात् तथा पूर्वमवादिषम् ॥ ( बृह. वा. पृ. ५१५ )

फलतः ब्रह्मणि प्रमाणं नास्ति ? अस्ति वा ? इस सन्देह का निराकरण इस द्वितीय वर्णक में किया गया है ] ।


पूर्व अधिकरण के द्वितीय वर्णक में जो कहा गया कि ब्रह्म में शास्त्र ( वेद ) प्रमाण है, वह केवल एक प्रतिज्ञामात्र है, उसका उपपादन इस समन्वयाधिकरण में करना है । उपपादन का अर्थ होता है—आक्षेपपूर्वक समाधान । इस सूत्र में केवल समाधान है, आक्षेप नहीं, अतः भाष्यकार सूत्र की परिधि से बाहर रह कर आक्षेप या पूर्व पक्ष की रचना कर रहे हैं—“कथं पुनः” । यहाँ जिस 'किम्' पद से 'थमु' प्रत्यय करके 'कथम्' शब्द बनाया गया है, वह 'किम्' पद आक्षेपार्थक है, प्रश्नादि का वाचक नहीं। इस प्रकार 'कथं पुनः ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वमुच्यत ?' इस वाक्य का अर्थ होता है—“यदुक्तं शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्मेति, तन्न”। अतः पूर्व अधिकरण से इस अधिकरण की आक्षेपिकी संगति फलित होती है। आक्षेपवादी प्रमेय ( ब्रह्म ) और प्रमाण ( वेदान्त ) दोनों में अनौचित्य का प्रदर्शन करता है—ब्रह्म शुद्ध, बुद्ध और उदासीनस्वभाव का होने से न हेय और न उपादेय, किन्तु उपेक्षणीयमात्र है। इस प्रकार के निष्प्रयोजन और सिद्ध ब्रह्म के उपदेशक वेदान्त-वाक्य भी निरर्थक हैं। केवल निरर्थक ही नहीं, अपितु प्रत्यक्षादि प्रमाणों के विषयीभूत सिद्ध ब्रह्म का बोधन करना अनुवाद मात्र है, अनुवादक वाक्य गृहीतग्राही होने के कारण प्रमाण भी नहीं माने जाते । जो कहा जाता है कि वेद स्वतःप्रमाण है, वह भी संगत नहीं क्योंकि जैसे प्रमाणान्तरविषय-विषयक लौकिक वाक्य स्वतः प्रमाण नहीं माने जाते, वैसे ही उसी प्रकार के वैदिक वाक्य भी स्वतःप्रमाण क्योंकर होंगे ? महर्षि जैमिनि ने शब्द में प्रमाणता के लिए इतरप्रमाणानपेक्षत्व आवश्यक माना है—“औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः, तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात्” ( जै. सू. १।१।५ ) । वेदान्त-वाक्यों को जब अपने अर्थ के बोधन में प्रत्यक्षादि की अपेक्षा हो जाती है, तब उनमें अनपेक्षत्व नहीं रहता । वेदान्त-वाक्यों को अप्रमाण या निष्प्रयोजन भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः” ( शत. ब्रा. ११।५।६ ) इस विधि वाक्य के द्वारा वेदों में प्रयोजनवत्ता का आपादन किया जाता है, क्योंकि निष्प्रयोजनभूत वाक्यों के अध्ययन का विधान सम्भव नहीं । फलतः