भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ११६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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वेदान्तानामानर्थक्यम्; अक्रियार्थत्वात्। कर्तृदेवतादिप्रकाशनार्थत्वेन वा क्रियाविधि- शेषत्वम्; उपासनादिक्रियान्तरविधानार्थत्वं वा। न हि परिनिष्ठितवस्तुप्रतिपादनं संभवति; प्रत्यक्षादिविषयत्वात्परिनिष्ठितवस्तुनः; तत्प्रतिपादने च हेयोपादेयरहिते पुरुषार्थाभावात्। अत एव 'सोऽरोदीद्' इत्येवमादीनामानर्थक्यं मा भूदिति 'विधिना त्वेकवाक्यत्वात्स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः' (जै० सू० १।२।७) इति स्तावकत्वेनार्थव-
भामती
विहितकर्मापेक्षितकर्तृदेवतादिप्रतिपादनपरत्वेनैव क्रियार्थत्वम्। यदि त्वसन्निधानात्तत्परत्वं न रोचयन्ते, ततः सन्निहितोपासनादिक्रियापरत्वं वेदान्तानाम्। एवं हि प्रत्यक्षाद्यनधिगतगोचरत्वेनानपेक्षतया प्रामाण्यं च प्रयोजनवत्त्वं च सिध्यतीति तात्पर्यार्थः। पारमर्षसूत्रोपन्यासस्तु पूर्वपक्षदाढर्याय। आनर्थक्यं चाप्रयो- जनत्वम्, सापेक्षतया प्रमानुत्पादकत्वं चानुवादकत्वादिति। ॐ अतः ॐ इत्यादि ॐ वा ॐ इत्यन्तं ग्रहणक-
भामती-व्याख्या
विहित कर्मों में अपेक्षित कर्त्ता और देवतादि का प्रतिपादन कर वेदान्त-वाक्य कर्म (धर्म) के अङ्ग हो सकते हैं। यदि कर्म-काण्ड से दूर पठित होने के कारण वेदान्त कर्मार्थक नहीं हो सकते, तब उपनिषत्काण्ड में प्रतिपादित प्राणादि की उपासना में वेदान्त-वाक्यों का उपयोग माना जा सकता है। इस प्रकार प्रत्यक्षादि प्रमाणों से अनधिगत पदार्थों के प्रतिपादक वेदान्त- वाक्यों में अनपेक्षत्व, प्रामाण्य और प्रयोजनवत्त्व सिद्ध हो जाता है।
भाष्यकार ने महर्षि जैमिनि के सूत्र का उपन्यास पूर्व पक्ष को दृढ़ बनाने के लिए किया है [ आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानार्थक्यमतदर्थानां तस्मादनित्यमुच्यते'' (जै. सू. १।२।१) यह सूत्र यद्यपि अर्थवादाधिकरण का पूर्वपक्ष-सूत्र है, सिद्धान्त-सूत्र नहीं, तथापि यहाँ भी पूर्वपक्ष की दृढ़ता के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। उसका अर्थ यह है कि आम्नाय (समस्त वेद) क्रिया (अग्निहोत्रादि कर्मों) के विधान में ही पर्यवसित होता है। वेदान्त-वाक्यों के समान जो वाक्य क्रियापरक नहीं, वे अनर्थक हैं, अतः अनित्य (अप्रमाण) माने जाते हैं]। वेदान्त- वाक्यों में जो आनर्थक्य कहा गया है, उसका अर्थ अप्रयोजनवत्त्व अथवा प्रत्यक्षादि-सापेक्ष एवं अनुवादकमात्र होने के कारण प्रमानुत्पादकत्व ही आनर्थक्य कहा गया है—'अतः' से लेकर 'वा' तक ["अतो वेदान्तानामानर्थक्यमक्रियार्थत्वात्, कर्तृदेवतादिप्रकाशनार्थत्वेन वा क्रियाविधिशेषत्वम्, उपासनादिक्रियान्तरविधानार्थत्वं वा"-यह] वाक्य ग्रहणक वाक्य (संग्रह, संक्षिप्त या व्याख्येय भाष्य) है और उसका व्याख्यान भाष्य है—"'न हि" से लेकर "उपपन्नो वा" यहाँ तक। [उसका तात्पर्य यह कहा जा चुका है कि परिनिष्ठित (सिद्ध) पदार्थ का प्रतिपादन सम्भव नहीं, क्योंकि सिद्ध पदार्थ प्रत्यक्ष प्रमाण का विषय होता है, सिद्ध पदार्थ न तो हेय होता है और न उपादेय, अतः उसके प्रतिपादन से कोई भी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता, अत एव वेद में परिगृहीत सिद्धार्थक आख्यानों का कर्म की स्तुति या निन्दा में तात्पर्य मान कर विधि वाक्यों से एक-वाक्यता स्थापित किया जाता है, जैसे-सोऽरोदीद् यदरौदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्" (तै. सं. १।५।१)। अर्थात् 'देवता और असुर परस्पर युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हैं, देवतागण अपना चाँदी-सोना अग्निदेव के पास धरोहर रख देते हैं। युद्ध जीत कर आते हैं, अपनी धरोहर अग्निदेव से माँगते हैं, वह धन लेकर भागता है, पीछा करनेवाले देवगण उसे मारने लगते हैं। अग्नि एक स्थान पर बैठ कर रोने लगता है। उसके नेत्रों से जो आँसू निकलते हैं, वे पृथिवी पर पड़ते ही रजत बन जाते हैं, रजत ने अग्निदेव से रुदन कराया, अतः उसका नाम 'रुद्र' है, यज्ञ में रजत की दक्षिणा नहीं दी जाती।' इस आख्यायिका की "बर्हिषि रजतं न देयम्"-इस निषेध वाक्य के साथ एकवाक्यता की जाती