भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवेदान्तसमन्वयविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११७
त्त्वमुक्तम्। मन्त्राणां च 'इषे त्वा' इत्यादीनां क्रियातत्साधनाभिधायित्वेन कर्मसमवायि- त्त्वमुक्तम्। न क्वचिदपि वेदवाक्यानां विधिसंस्पर्शमन्तरेणार्थवत्ता दृष्टोपपन्ना वा।
भामती
वाक्यम्। अस्य विभागभाष्यं ॐ न हि ॐ इत्यादि ॐ उपपन्ना वा ॐ इत्यन्तम्।
स्यादेतत् — अक्रियार्थत्वेऽपि ब्रह्मस्वरूपविधिपरा वेदान्ता भविष्यन्ति, तथा च विधिना त्वेक- वाक्यत्वादिति सिद्धान्तसूत्रमनुग्रहीष्यते। न खल्वप्रवृत्तप्रवर्त्तनमेव विधिः। उत्पत्तिविधेरज्ञातज्ञापनाथं- त्वात्। वेदान्तानां चाज्ञातं ब्रह्म ज्ञापयतां तथाभावदित्यत आह ॐ न च परिनिष्ठित इति ॐ। अना- गतोत्पाद्यभावविषय एव हि सर्वो विधिरूपेयोऽधिकारविनियोगप्रयोगोत्पत्तिरूपाणां परस्पराविनाभावात्, सिद्धे च तेषामसम्भवात्। तद्वाक्यानां त्वैदमर्थ्यं भिद्यते। यथाऽग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकाम इत्यादि- भ्योऽधिकारविनियोगप्रयोगाणां प्रतिलम्भादग्निहोत्रं जुहोतीत्युत्पत्तिमात्रपरं वाक्यम्। न त्वत्र विनि- योगादयो न सन्ति, सन्तोऽप्यन्यतो लब्धत्वात् केवलमविवक्षिताः। तस्माद् भावनाविषयो विधानं सिद्धे
भामती-व्याख्या
है—'यस्माद्रजतं रोदितवान्, तस्माद् यागे दक्षिणारूपेण न देयम्।'
इसी प्रकार "इषे त्वा उर्जे त्वा" (माध्यन्दिन. १।१) इत्यादि मन्त्रों का 'इषे त्वेति छिनत्ति"—इत्यादि पलाश-शाखा-छेदनादि कर्मों में उपयोग करने के लिए सभी अर्थवाद- वाक्यों की विधि वाक्यों से एकवाक्यता की जाती है—"विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः" (जै. सू. १.२।७) अर्थात् अर्थवाद वाक्य विधि वाक्यों के साथ एकवाक्यतापन्न होकर विधेय पदार्थ की स्तुति और निषेध्य पदार्थ की निन्दा में उपयोगी होते हैं]।
शङ्का—यद्यपि वेदान्त-वाक्य किसी क्रिया (कर्म) का प्रतिपादन नहीं करते, तथापि ब्रह्मस्वरूप के विधायक हो सकेंगे, ऐसा मानने पर "विधिना त्वेकवाक्यत्वात्" (जै. सू. १।२।७) यह सिद्धान्त सूत्र भी अनुपालित हो जाता है। अप्रवृत्त पुरुष के प्रवर्तक वाक्य को ही विधि वाक्य नहीं कहते, क्योंकि 'यदाग्नेयोऽष्टाकपालः (तै. सं. २।६।३।३) इत्यादि उत्पत्ति विधि (कर्म के स्वरूपभूत द्रव्य और देवता के प्रकाशक) वाक्य किसी के प्रवर्तक न होकर केवल अज्ञात अर्थ के प्रकाशकमात्र होते हैं। वेदान्त-वाक्य भी अज्ञात ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं, अतः ब्रह्म-स्वरूप के विधायक हो सकते हैं।
समाधान—उक्त शङ्का का निरास करने के लिए भाष्यकार कहते हैं—"न च परिनिष्ठिते वस्तुस्वरूपे विधिः सम्भवति"। सभी विधि वाक्यों का भविष्य में उत्पन्न होनेवाला भावनारूप कार्य ही विषय होता है, क्योंकि अधिकार, विनियोग, प्रयोग और उत्पत्ति विधियों का परस्पर अविनाभाव होता है, सिद्ध वस्तु में अधिकारादि (अप्रवृत्त-प्रवर्त्तनादि) सम्भावित नहीं। कर्मों के प्रकरण में प्रायः सभी वाक्य होते हैं, जहाँ सब नहीं होते, कोई एक ही वाक्य होता है, वहाँ भी सभी वाक्यों की कल्पना कर ली जाती है, क्योंकि सबका प्रयोजन भिन्न- भिन्न होता है। जैसे "अग्निहोत्रं जुहोति"—इत्यादि वाक्यों से अधिकार, विनियोग और प्रयोग विधियों का लाभ हो जाता है। "अग्निहोत्रं जुहोति"—यह वाक्य कर्म की उत्पत्ति- मात्र का प्रतिपादक है, किन्तु यहाँ विनियोगादि नहीं हैं अथवा अन्यतः प्राप्त हो जाने से अविवक्षितार्थक हैं—यह बात नहीं। [सभी चार प्रकार के विधि वाक्य होते हैं—(१) उत्पत्ति विधि, (२) विनियोग विधि, (३) अधिकार विधि और (४) प्रयोग विधि। कर्म के दो रूप होते हैं—द्रव्य और देवता, क्योंकि किसी देवता के उद्देश्य से किसी द्रव्य का त्याग ही यागादि कर्म कहलाता है। कर्म के रूपों का बोधक वाक्य उत्पत्ति विधि है, जैसे—'अग्निहोत्रं जुहोति" (तै. सं. १।५।९।१)। कर्म के अङ्गों का विधायक वाक्य विनियोग विधि है, जैसे—