भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४
न च परिनिष्ठिते वस्तुस्वरूपे विधिः संभवति, क्रियाविषयत्वाद्धि विधेः। तस्मात्कर्मापे- क्षितकर्तृस्वरूपदेवतादिप्रकाशनेन क्रियाविधिशेषत्वं वेदान्तानाम्। अथ प्रकरणान्तर- भयान्नैतदभ्युपगम्यते, तथापि स्ववाक्यगतोपासनादिकर्मपरत्वम्। तस्मान्न ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वमिति प्राप्ते उच्यते,—
तत्तु समन्वयात् ॥ ४ ॥
तुशब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः। तद् ब्रह्म सर्वज्ञं सर्वशक्ति जगदुत्पत्तिस्थितिलय- कारणं वेदान्तशास्त्रादेवावगम्यते। कथम्? समन्वयात्। सर्वेषु हि वेदान्तेषु
भामती
वस्तुनि भवितुमर्हतीति। उपसंहरति ॐ तस्माद् इति ॐ। अत्रारुचिकारणमुक्त्वा पक्षान्तरमुपसंक्रामति। ॐ अथ इति ॐ। एवं च सत्युपक्रमे भङ्गेण शब्दस्यातात्पर्यात् प्रमाणान्तरेण यादृशमस्य रूपं व्यव- स्थाप्यते न तच्छब्देन विरुध्यते, तस्योपासनापरत्वात्, समारोपेण चोपासनाया उपपत्तेरिति। प्रकृतमुप- संहरति ॐ तस्मान्न ॐ इति। सूत्रेण सिद्धान्तयति ॐ एवं प्राप्त उच्यते ॐ तत्तु समन्वयात्।
तदेतद् व्याचष्टे ॐ तुशब्दः इति ॐ। तदित्युत्तरपक्षप्रतिज्ञां विभजते ॐ तद् ब्रह्म इति ॐ। पूर्वपक्षवादी कर्कशाशयः पृच्छति ॐ कथम् ॐ। कुतः प्रकारादित्यर्थः। सिद्धान्ती स्वपक्षे हेतुं प्रकार- मेवमाह ॐ समन्वयात् ॐ। सम्यगन्वयः समन्वयस्तस्मात्। एतदेव विभजते ॐ सर्वेषु हि वेदान्तेषु
भामती-व्याख्या
"दध्ना जुहोति" इत्यादि। कर्म का उसके फल विशेष के साथ सम्बन्ध-बोधक वाक्य अधिकार विधि है, जैसे—"अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः"। इन सभी वाक्यों की एकवाक्यता करके जो महावाक्य सम्पन्न होता है, उसे प्रयोग विधि कहते हैं। विनियोग वाक्य के (१) श्रुति, (२) लिङ्ग, (३) वाक्य, (४) प्रकरण, (५) स्थान और (६) समाख्या— ये छः प्रमाण सहायक होते हैं और प्रयोग विधि के सहायक प्रमाण होते हैं—(१) श्रुति, (२) अर्थ, (३) पाठ, (४) स्थान, (३) मुख्य और (६) प्रवृत्ति। इनकी चर्चा आती ही रहती है]। फलतः विधि सदैव साध्यरूप भावनाविषयक होती है, ब्रह्मादिरूप सिद्ध पदार्थों की विधि नहीं हो सकती विधि वाक्यों की क्रियापरता का उपसंहार किया जाता है—"तस्मात् कर्मापेक्षितकर्तृस्वरूपदेवतादिप्रकाशनेन क्रियाविधिशेषत्वं वेदान्तानाम्"।
वेदान्त-वाक्यों की कर्मपरता में अरुचि के कारण उपासनापरत्वरूप पक्षान्तर का उपन्यास किया जाता है—"अथ प्रकरणान्तरभयान्नैतदभ्युपगम्यते, तथापि स्ववाक्यगतो- पासनादिकर्मपरत्वम्"। इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि कथित (शुद्ध, बुद्ध, सिद्ध- स्वभावक ब्रह्म में वेदान्त-वाक्यों का तात्पर्य नहीं और उपक्रमादि प्रमाणों के आधार पर जो जीव-ब्रह्माभेदरूप अर्थ व्यवस्थापित होता है, वह वेदान्त-वाक्यों के उपासना परकत्व-पक्ष में विरुद्ध नहीं पड़ता, क्योंकि उपासना तो आरोप के द्वारा भी हो सकती है, जीव में ब्रह्मरूपता का आरोप कर "तत्त्वमसि" आदि महावाक्यों का सामञ्जस्य स्थापित किया जा सकता है। अतः सिद्ध ब्रह्म में शास्त्रप्रमाणकत्व सम्भव नहीं।
उक्त आक्षेप का निराकरण करने के लिए इस सूत्र को सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत किया जाता है—"एवं प्राप्ते उच्यते तत्तु समन्वयात्"। इसकी व्याख्या की जाती है—"तु शब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः"। उत्तर सूत्र में 'तत्' पद से जो प्रतिज्ञा की गई, उसका स्पष्टी- करण किया जाता है—"तद् ब्रह्म"। अर्थात् ब्रह्म शास्त्रप्रमाणक है। पूर्व पक्षी कर्कश आशय से पूछता है—"कथम् ?" अर्थात् "केन प्रकारेण ब्रह्म शास्त्रप्रमाणकमुच्यते?" सिद्धान्ती अपनी प्रतिज्ञा के उचित हेतु का प्रदर्शन करता है ब्रह्म में शास्त्रप्रमाणकत्व की सिद्धि का