भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवेदान्तसमन्वयविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११९
वाक्यानि तात्पर्येणैतस्यार्थस्य प्रतिपादकत्वेन समनुगतानि । 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' । एकमेवाद्वितीयम् (छान्दो० ६।२।१) 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्' (ऐत० १।१।१।१ ) 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्' । 'अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः' ( बृह० २।५।१९) 'ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात्' (मुण्ड० २।२।११) इत्यादीनि । न च तद्गतानां पदानां
भामती
इति ॐ : वेदान्तानामाभ्यासिकीं ब्रह्मपरतामाचिख्यासुर्बहूनि वाक्यान्युदाहरति ॐ सदेव इति ॐ । यतो वा इमानि भूतानीति तु वाक्यं पूर्वमुपाहृतं जगदुत्पत्तिस्थितिनाशाकारणमिति चेह स्मारितमिति न पठितम् । येन हि वाक्यमुपक्रम्यते येन चोपसंह्रियते, तदेव वाक्यार्थ इति शाब्दाः । यथोपांशुयाजवाक्येऽनूचोः पुरोडाशयोर्जा मितादोषसङ्कीर्त्तनपूर्वकमुपांशुयाजविधाने तत्प्रतिसमाधानोपसंहारे चापूर्वोपांशुयाजकर्मविधिपरतयैकवाक्यताबलादाधिता, एवमत्रापि सदेव सोम्येदमिति ब्रह्मोपक्रमात् तत्त्वमसीति च जीवस्य ब्रह्मात्मतोपसंहारात् तत्परतैव वाक्यस्य । एवं वाक्यान्तराणामपि पौर्वापर्य्यालोचनया ब्रह्मपरत्वमवगन्तव्यम् । न च तत्परत्वस्य दृष्टस्य सति सम्भवेऽन्यपरताऽदृष्टा युक्ता कल्पयितुम्, अतिप्रसङ्गात् । न केवलं
भामती-व्याख्या
प्रकार बता रहा है—"समन्वयात्" । 'शास्त्रं ब्रह्मणि प्रमाणम्, तात्पर्यतः ब्रह्मणि समनुगतत्वात्'—इस प्रकार के अनुमान में हेतुगत पक्षधर्मता का प्रतिपादन 'समन्वय' पद के द्वारा किया गया है, अतः 'सम्यग् अन्वयः, समन्वयः'—यहाँ सम्यक् शब्द का अर्थ होता है—तात्पर्यतः । वेदान्त-वाक्यों की नियमतः ब्रह्मपरता दिखाने के लिए वैसे बहुत-से वाक्यों का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है—“सदेव सौम्य ! इदमग्र आसीत्” (छां. ६।२।१) । सूत्रकार ने 'तत्' पद के द्वारा द्वितीय सूत्रोपात्त जगज्जन्मादिकारणीभूतब्रह्म-बोधक वाक्य का स्मरण दिला दिया, अतः सूत्र में उस वाक्य के रखने की आवश्यकता नहीं। भाष्योदाहृत वेदान्तवाक्य में ब्रह्मपरकत्व का प्रकार यह है कि जिस पदार्थ का उपक्रम कर जिस अर्थ में प्रकरण का उपसंहार किया जाता है, वही पदार्थ उस प्रकरण का मुख्य अर्थ माना जाता है, जैसे [ 'जामि वा एतद् यज्ञस्य क्रियते यदन्वञ्चौ पुरोडाशौ, उपांशुयाजमन्तरा यजति, विष्णुरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वायाग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय” ( तै. सं. २।६।६ ) । इस वाक्य को लेकर मीमांसा दर्शन ( २।१।४ ) में संशय किया गया है कि “उपांशुयाजमन्तरा यजति”—इस वाक्य के द्वारा विष्ण्वादिवाक्यों में विहित तीनों यागों का अनुवाद किया गया है? या उपांशुयाजसंज्ञक नूतन कर्म का विधान किया गया है? अनुवादकत्व का पूर्व पक्ष करने के अनन्तर सिद्धांत किया गया है कि ] उपांशुयाज के विधायक उक्त वाक्य में कहा गया है कि पौर्णमाससंज्ञक 'आग्नेय', 'अग्नीषोमीय' और 'उपांशु'—इन तीनों यागों में प्रथम दो याग पुरोडाश द्रव्य और उपांशुयाज घृत से किया जाता है । पुरोडाशद्रव्यक दोनों भागों को निरन्तर ( अव्यवहित ) करने पर एक ही द्रव्य को लेकर जामित्व ( आलस्य ) आ जाता है, अतः उस दोष से बचने के लिए उन दोनों भागों के मध्य में घृतद्रव्यवाला उपांशुयाज करना चाहिए । अतः उपक्रम में जामित्व दोष दिखाकर मध्य में उपांशु याज के विधान से उक्त दोष का समाधान ( निस्तार ) दिखाया गया, अतः उक्त वाक्य पूरा एक है और उसका तात्पर्य उपांशुयाज के विधान में माना जाता है । वैसे ही प्रकृत में भी ब्रह्म का उपक्रम कर 'तत्त्वमसि' पद के द्वारा जीव से ब्रह्म का अभेद प्रदर्शित कर ब्रह्म में ही उपसंहार किया गया, अतः छान्दोग्योपनिषत् के इस प्रकरण का तात्पर्य ब्रह्म में निश्चित होता है । इसी प्रकार भाष्योदाहृत अन्य वाक्यों के पौर्वापर्य का पर्यालोचन वाक्यों में ब्रह्मपरता का निश्चय कर