भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१२०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

ब्रह्मस्वरूपविषये निश्चिते समन्वयेऽवगम्यमानेऽर्थान्तरकल्पना युक्ता; श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गात् । न च तेषां कर्तृस्वरूपप्रतिपादनपरतावसीयते, ‘तत्केन कं पश्येत्’ ( बृह० २।४।१३ ) इत्यादिक्रियाकारकफलनिराकरणश्रुतेः । न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि प्रत्यक्षादिविषयत्वं ब्रह्मणः; ‘तत्त्वमसि’ ( छान्दो० ६।८।७ ) इति ब्रह्मात्म-


भामती

कर्तृपरता तेषामदृष्टाऽनुपपन्ना चेत्याह ॐ न च तेषाम् इति ॐ । सापेक्षत्वेनाप्रामाण्यं पूर्वपक्षबीजं दूषयति ॐ न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि इति ।

अयमाभिसन्धिः—पुंवाक्यनिदर्शनेन हि भूतार्थतया वेदान्तानां सापेक्षत्वमाशङ्क्यते, तत्रेवं भवान् पृष्टो व्याचष्टाम्, किं पुंवाक्यानां सापेक्षता भूतार्थत्वेनाहो पौरुषेयत्वेन ? यदि भूतार्थत्वेन ततः प्रत्यक्षादीनामपि परम्परापेक्षत्वेनाप्रामाण्यप्रसङ्गः, तान्यपि हि भूतार्थान्येव । अथ पुरुषबुद्धिप्रभवतया पुंवाक्यं सापेक्षम्, एवं तर्हि तदपूर्वकाणां वेदान्तानां भूतार्थानामपि नाप्रामाण्यं प्रत्यक्षादीनामिव नियतेन्द्रियलिङ्गादिजन्मनाम् । यद्युच्येत सिद्धे किलापौरुषेयत्वे वेदान्तानामनपेक्षतया प्रामाण्यं सिद्ध्येत्, तदेव तु भूतार्थत्वेन न सिद्धयति, भूतार्थस्य शब्दानपेक्षेण पुरुषेण मानान्तरतः शक्यज्ञानत्वाद् बुद्धिपूर्वविरचनोपपत्तेः, वाक्यत्वादिलिङ्गकस्य वेदपौरुषेयत्वानुमानस्याप्रत्यूहमुत्पत्तेः । तस्मात् पौरुषेयत्वेन सापेक्षत्वं दुर्वारं, त तु भूतार्थत्वेन । कार्यार्थत्वे तु कार्यस्यापूर्वस्य मानान्तरागोचरतयाऽत्यन्ताननुभूतपूर्वस्य तत्त्वेन समारोपेण वा पुरुषबुद्धावनारोहात् तदर्थानां वेदान्तानामशक्यरचनतया पौरुषेयत्वाभावादनपेक्षं


भामती-व्याख्या

लेना चाहिए । वेदान्त-वाक्यों में जब ब्रह्मपरता दृष्ट और सम्भव है, तब अदृष्ट क्रियापरत्वादि की कल्पना युक्त नहीं, अन्यथा कर्मपरक वाक्यों को ब्रह्मपरक मानने का अतिप्रसङ्ग भी उपस्थित हो जायगा । वेदान्त-वाक्यों में कर्तृभोक्तृ-प्रतिपादकता केवल अदृष्ट ही नहीं, अनुपपन्न भी है—‘न च तेषां कर्तृस्वरूपप्रतिपादनपरताऽवसीयते ।

पूर्वपक्षी ने वेदान्त-वाक्यों में जो प्रत्यक्षादि-सापेक्षत्वेन अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य का अभाव प्रसक्त किया था, उसकी निवृत्ति की जा रही है—‘न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि’ । आशय यह है कि पूर्वपक्षी ने सिद्धार्थ-प्रतिपादक पौरुषेय वाक्यों का उदाहरण देकर वेदान्त-वाक्यों में सापेक्षत्व की आशङ्का की थी, वहाँ यह प्रश्न उठता है कि पुरुष के वाक्यों में सापेक्षता भूतार्थत्वेन प्रसक्त की जाती है ? अथवा पुरुष-कृतत्वेन ? यदि सिद्धार्थविषयकत्वेन सापेक्षत्व और अप्रामाण्य माना जाता है, तब प्रत्यक्षादि प्रमाणों में भी परस्पर-सापेक्षता होने के कारण अप्रामाण्य होना चाहिए, क्योंकि वे भी सिद्धार्थविषयक होते हैं । यदि पौरुषेय वाक्य पुरुष-कृत होने के कारण पौरुषेय वाक्य सापेक्ष माने जाते हैं, तब वेदान्त-वाक्यों में पुरुष-कृतत्व न होने के कारण सिद्धार्थकत्व मानने पर भी वैसे ही अप्रामाण्य प्रसक्त नहीं होता, जैसे कि नियत इन्द्रिय और लिङ्गादि से जनित प्रत्यक्षादि प्रमाणों में ।

**शङ्का—**यदि कहा जाय कि वेदान्त-वाक्यों में अपौरुषेयत्व सिद्ध हो जाने पर ही अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य सिद्ध होगा, वह अपौरुषेयत्व ही सिद्धार्थविषयकत्वेन सिद्ध नहीं होता, क्योंकि सिद्ध वस्तु का ज्ञान शब्द के बिना ही प्रत्यक्षादि प्रमाणों के द्वारा सम्पादित करके पुरुष तद्बोधक वाक्य की रचना स्वयं कर सकता है, वेद में भी वाक्यत्वरूप लिङ्ग के द्वारा पौरुषेयत्व का अनुमान हो जाता है—‘वेदाः पौरुषेयाः वाक्यत्वाद् भारतादिवाक्यवत्’ । अतः वेदान्त-वाक्यों में पौरुषेयत्वेन सापेक्षत्व प्रसक्त होता है, भूतार्थत्वेन नहीं । जब वेदान्त-वाक्यों को कार्यपरक माना जाता है, तब कार्यरूप पदार्थ अपूर्व होने के कारण प्रमाणान्तर का विषय नहीं होता, अत्यन्त अननुभूत वस्तु का बुद्धि में न तो तत्त्वेन आरोहण