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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

वेदान्तसमन्वयविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ११९

वाक्यानि तात्पर्येणैतस्यार्थस्य प्रतिपादकत्वेन समनुगतानि । 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' । एकमेवाद्वितीयम् (छान्दो० ६।२।१) 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्' (ऐत० १।१।१।१ ) 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्' । 'अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः' ( बृह० २।५।१९) 'ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात्' (मुण्ड० २।२।११) इत्यादीनि । न च तद्गतानां पदानां


भामती

इति ॐ : वेदान्तानामाभ्यासिकीं ब्रह्मपरतामाचिख्यासुर्बहूनि वाक्यान्युदाहरति ॐ सदेव इति ॐ । यतो वा इमानि भूतानीति तु वाक्यं पूर्वमुपाहृतं जगदुत्पत्तिस्थितिनाशाकारणमिति चेह स्मारितमिति न पठितम् । येन हि वाक्यमुपक्रम्यते येन चोपसंह्रियते, तदेव वाक्यार्थ इति शाब्दाः । यथोपांशुयाजवाक्येऽनूचोः पुरोडाशयोर्जा मितादोषसङ्कीर्त्तनपूर्वकमुपांशुयाजविधाने तत्प्रतिसमाधानोपसंहारे चापूर्वोपांशुयाजकर्मविधिपरतयैकवाक्यताबलादाधिता, एवमत्रापि सदेव सोम्येदमिति ब्रह्मोपक्रमात् तत्त्वमसीति च जीवस्य ब्रह्मात्मतोपसंहारात् तत्परतैव वाक्यस्य । एवं वाक्यान्तराणामपि पौर्वापर्य्यालोचनया ब्रह्मपरत्वमवगन्तव्यम् । न च तत्परत्वस्य दृष्टस्य सति सम्भवेऽन्यपरताऽदृष्टा युक्ता कल्पयितुम्, अतिप्रसङ्गात् । न केवलं


भामती-व्याख्या

प्रकार बता रहा है—"समन्वयात्"'शास्त्रं ब्रह्मणि प्रमाणम्, तात्पर्यतः ब्रह्मणि समनुगतत्वात्'—इस प्रकार के अनुमान में हेतुगत पक्षधर्मता का प्रतिपादन 'समन्वय' पद के द्वारा किया गया है, अतः 'सम्यग् अन्वयः, समन्वयः'—यहाँ सम्यक् शब्द का अर्थ होता है—तात्पर्यतः । वेदान्त-वाक्यों की नियमतः ब्रह्मपरता दिखाने के लिए वैसे बहुत-से वाक्यों का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है—“सदेव सौम्य ! इदमग्र आसीत्” (छां. ६।२।१) । सूत्रकार ने 'तत्' पद के द्वारा द्वितीय सूत्रोपात्त जगज्जन्मादिकारणीभूतब्रह्म-बोधक वाक्य का स्मरण दिला दिया, अतः सूत्र में उस वाक्य के रखने की आवश्यकता नहीं। भाष्योदाहृत वेदान्तवाक्य में ब्रह्मपरकत्व का प्रकार यह है कि जिस पदार्थ का उपक्रम कर जिस अर्थ में प्रकरण का उपसंहार किया जाता है, वही पदार्थ उस प्रकरण का मुख्य अर्थ माना जाता है, जैसे [ 'जामि वा एतद् यज्ञस्य क्रियते यदन्वञ्चौ पुरोडाशौ, उपांशुयाजमन्तरा यजति, विष्णुरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वायाग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय” ( तै. सं. २।६।६ ) । इस वाक्य को लेकर मीमांसा दर्शन ( २।१।४ ) में संशय किया गया है कि “उपांशुयाजमन्तरा यजति”—इस वाक्य के द्वारा विष्ण्वादिवाक्यों में विहित तीनों यागों का अनुवाद किया गया है? या उपांशुयाजसंज्ञक नूतन कर्म का विधान किया गया है? अनुवादकत्व का पूर्व पक्ष करने के अनन्तर सिद्धांत किया गया है कि ] उपांशुयाज के विधायक उक्त वाक्य में कहा गया है कि पौर्णमाससंज्ञक 'आग्नेय', 'अग्नीषोमीय' और 'उपांशु'—इन तीनों यागों में प्रथम दो याग पुरोडाश द्रव्य और उपांशुयाज घृत से किया जाता है । पुरोडाशद्रव्यक दोनों भागों को निरन्तर ( अव्यवहित ) करने पर एक ही द्रव्य को लेकर जामित्व ( आलस्य ) आ जाता है, अतः उस दोष से बचने के लिए उन दोनों भागों के मध्य में घृतद्रव्यवाला उपांशुयाज करना चाहिए । अतः उपक्रम में जामित्व दोष दिखाकर मध्य में उपांशु याज के विधान से उक्त दोष का समाधान ( निस्तार ) दिखाया गया, अतः उक्त वाक्य पूरा एक है और उसका तात्पर्य उपांशुयाज के विधान में माना जाता है । वैसे ही प्रकृत में भी ब्रह्म का उपक्रम कर 'तत्त्वमसि' पद के द्वारा जीव से ब्रह्म का अभेद प्रदर्शित कर ब्रह्म में ही उपसंहार किया गया, अतः छान्दोग्योपनिषत् के इस प्रकरण का तात्पर्य ब्रह्म में निश्चित होता है । इसी प्रकार भाष्योदाहृत अन्य वाक्यों के पौर्वापर्य का पर्यालोचन वाक्यों में ब्रह्मपरता का निश्चय कर

१२०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

ब्रह्मस्वरूपविषये निश्चिते समन्वयेऽवगम्यमानेऽर्थान्तरकल्पना युक्ता; श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गात् । न च तेषां कर्तृस्वरूपप्रतिपादनपरतावसीयते, ‘तत्केन कं पश्येत्’ ( बृह० २।४।१३ ) इत्यादिक्रियाकारकफलनिराकरणश्रुतेः । न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि प्रत्यक्षादिविषयत्वं ब्रह्मणः; ‘तत्त्वमसि’ ( छान्दो० ६।८।७ ) इति ब्रह्मात्म-


भामती

कर्तृपरता तेषामदृष्टाऽनुपपन्ना चेत्याह ॐ न च तेषाम् इति ॐ । सापेक्षत्वेनाप्रामाण्यं पूर्वपक्षबीजं दूषयति ॐ न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि इति ।

अयमाभिसन्धिः—पुंवाक्यनिदर्शनेन हि भूतार्थतया वेदान्तानां सापेक्षत्वमाशङ्क्यते, तत्रेवं भवान् पृष्टो व्याचष्टाम्, किं पुंवाक्यानां सापेक्षता भूतार्थत्वेनाहो पौरुषेयत्वेन ? यदि भूतार्थत्वेन ततः प्रत्यक्षादीनामपि परम्परापेक्षत्वेनाप्रामाण्यप्रसङ्गः, तान्यपि हि भूतार्थान्येव । अथ पुरुषबुद्धिप्रभवतया पुंवाक्यं सापेक्षम्, एवं तर्हि तदपूर्वकाणां वेदान्तानां भूतार्थानामपि नाप्रामाण्यं प्रत्यक्षादीनामिव नियतेन्द्रियलिङ्गादिजन्मनाम् । यद्युच्येत सिद्धे किलापौरुषेयत्वे वेदान्तानामनपेक्षतया प्रामाण्यं सिद्ध्येत्, तदेव तु भूतार्थत्वेन न सिद्धयति, भूतार्थस्य शब्दानपेक्षेण पुरुषेण मानान्तरतः शक्यज्ञानत्वाद् बुद्धिपूर्वविरचनोपपत्तेः, वाक्यत्वादिलिङ्गकस्य वेदपौरुषेयत्वानुमानस्याप्रत्यूहमुत्पत्तेः । तस्मात् पौरुषेयत्वेन सापेक्षत्वं दुर्वारं, त तु भूतार्थत्वेन । कार्यार्थत्वे तु कार्यस्यापूर्वस्य मानान्तरागोचरतयाऽत्यन्ताननुभूतपूर्वस्य तत्त्वेन समारोपेण वा पुरुषबुद्धावनारोहात् तदर्थानां वेदान्तानामशक्यरचनतया पौरुषेयत्वाभावादनपेक्षं


भामती-व्याख्या

लेना चाहिए । वेदान्त-वाक्यों में जब ब्रह्मपरता दृष्ट और सम्भव है, तब अदृष्ट क्रियापरत्वादि की कल्पना युक्त नहीं, अन्यथा कर्मपरक वाक्यों को ब्रह्मपरक मानने का अतिप्रसङ्ग भी उपस्थित हो जायगा । वेदान्त-वाक्यों में कर्तृभोक्तृ-प्रतिपादकता केवल अदृष्ट ही नहीं, अनुपपन्न भी है—‘न च तेषां कर्तृस्वरूपप्रतिपादनपरताऽवसीयते ।

पूर्वपक्षी ने वेदान्त-वाक्यों में जो प्रत्यक्षादि-सापेक्षत्वेन अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य का अभाव प्रसक्त किया था, उसकी निवृत्ति की जा रही है—‘न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि’ । आशय यह है कि पूर्वपक्षी ने सिद्धार्थ-प्रतिपादक पौरुषेय वाक्यों का उदाहरण देकर वेदान्त-वाक्यों में सापेक्षत्व की आशङ्का की थी, वहाँ यह प्रश्न उठता है कि पुरुष के वाक्यों में सापेक्षता भूतार्थत्वेन प्रसक्त की जाती है ? अथवा पुरुष-कृतत्वेन ? यदि सिद्धार्थविषयकत्वेन सापेक्षत्व और अप्रामाण्य माना जाता है, तब प्रत्यक्षादि प्रमाणों में भी परस्पर-सापेक्षता होने के कारण अप्रामाण्य होना चाहिए, क्योंकि वे भी सिद्धार्थविषयक होते हैं । यदि पौरुषेय वाक्य पुरुष-कृत होने के कारण पौरुषेय वाक्य सापेक्ष माने जाते हैं, तब वेदान्त-वाक्यों में पुरुष-कृतत्व न होने के कारण सिद्धार्थकत्व मानने पर भी वैसे ही अप्रामाण्य प्रसक्त नहीं होता, जैसे कि नियत इन्द्रिय और लिङ्गादि से जनित प्रत्यक्षादि प्रमाणों में ।

**शङ्का—**यदि कहा जाय कि वेदान्त-वाक्यों में अपौरुषेयत्व सिद्ध हो जाने पर ही अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य सिद्ध होगा, वह अपौरुषेयत्व ही सिद्धार्थविषयकत्वेन सिद्ध नहीं होता, क्योंकि सिद्ध वस्तु का ज्ञान शब्द के बिना ही प्रत्यक्षादि प्रमाणों के द्वारा सम्पादित करके पुरुष तद्बोधक वाक्य की रचना स्वयं कर सकता है, वेद में भी वाक्यत्वरूप लिङ्ग के द्वारा पौरुषेयत्व का अनुमान हो जाता है—‘वेदाः पौरुषेयाः वाक्यत्वाद् भारतादिवाक्यवत्’ । अतः वेदान्त-वाक्यों में पौरुषेयत्वेन सापेक्षत्व प्रसक्त होता है, भूतार्थत्वेन नहीं । जब वेदान्त-वाक्यों को कार्यपरक माना जाता है, तब कार्यरूप पदार्थ अपूर्व होने के कारण प्रमाणान्तर का विषय नहीं होता, अत्यन्त अननुभूत वस्तु का बुद्धि में न तो तत्त्वेन आरोहण

सिद्धार्थंत्वविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२१

भामती

प्रमाणत्वं सिध्यतीति प्रामाण्याय वेदान्तानां कार्यपरत्वमातिष्ठामहे ।

अत्र ब्रूमः—किं पुनरिदं कार्यमभिमतमायुष्मतः यदशक्यं पुरुषेण ज्ञातुम् ? अपूर्वमिति चेत् , हन्त कुतस्त्यमस्य लिङाद्यर्थत्वं, तेनालौकिकेन सङ्गतिसंवेदनविरहात् ? लोकानुसारतः क्रियाया एव लौकिक्याः कार्याया लिङादेरवगमात् । स्वर्गकामो यजेतेति साध्यस्वर्गविशिष्टो नियोज्योऽवगम्यते, स च तदेव कार्यमवगच्छति यत् स्वर्गानुकूलं, न च क्रिया क्षणभङ्गुराऽऽमुष्मिकाय स्वर्गाय कल्पत इति परिशेषाद्भवत एवापूर्वं कार्ये लिङादीनां सम्बन्धग्रह इति चेत् , हन्त चैत्यवन्दनादिवाक्येष्वपि स्वर्गकामादिवदसम्बन्धादपूर्वकार्यत्वप्रसङ्गस्तथा च तेषामप्यशक्यरचनत्वेनापौरुषेयत्वापातः। स्वप्नदृष्टेन पौरुषेयत्वेन वा तेषामपूर्वार्थत्वप्रतिषेधे वाक्यत्वादिनो लिङ्गेन वेदानामपि पौरुषेयत्वमनुमितमित्यपूर्वार्थता न स्यात् । अन्यतस्तु वाक्यत्वादिनानुमानाभासत्वोपपादने कृतमपूर्वार्थत्वेनात्र तदुपपादनेन ? उपपादितं चापौरुषेयत्वमस्माभिर्न्यायकणिकायाम् , इह तु विस्तरभयान्नोक्तम् । तेनापौरुषेयत्वेऽसिद्धे भूतार्थानामपि

भामती-व्याख्या

होता है और न अतत्त्वेन ( अन्यरूपारोपेण ) । कार्यार्थक वेदान्त-वाक्यों की रचना पुरुष के द्वारा नहीं हो सकती, अपौरुषेयत्व होने के कारण अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य सिद्ध हो जाता है, अतः एव वेदान्त-वाक्यों को हम कार्यपरक मानते हैं ।

समाधान—वह कार्य पदार्थ क्या है, जिसे पुरुष जान नहीं सकता ? यदि प्रभाकर-सम्मत अपूर्व ( अदृष्ट ) को कार्य कहा जाता है, तब वह लिङादि विधि प्रत्ययों का वाच्य नहीं हो सकता, क्योंकि लोक में अप्रसिद्ध अर्थ के साथ किसी भी शब्द का शक्ति-ग्रह नहीं होता । लोक में तो लिङादि शब्दों के द्वारा लौकिक क्रिया का ही अभिधान होता है ।

शङ्का—"स्वर्गकामो यजेत" इस वाक्य से स्वर्गादिरूप साध्य की कामना से विशिष्ट नियोज्य ( अधिकारी ) प्रतीत होता है, वह उसी पदार्थ को अपना कार्य ( कृति-साध्य ) समझता है, जो स्वर्ग का उत्पादन कर सके । यागादि क्रिया तो क्षण-भङ्गुर है, जन्मान्तर में होनेवाले स्वर्गादि फलों का उत्पादन नहीं कर सकती, परिशेषतः स्वर्गकामपद-समभिव्याहार-संज्ञक तर्क से सहकृत वैदिक वाक्यों के द्वारा ही अलौकिक कार्य के साथ लिङादि का संगति-ग्रह हो जाता है, जैसा कि शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—

तस्मान्नियोज्यसम्बन्धसमर्थं विधिवाचिभिः ।
कार्यं कालान्तरास्थायि क्रियातो भिन्नमुच्यते ॥
तस्माल्लोकानुसारेण व्युत्पत्तिः कार्यमात्रके ।
तस्य त्वपूर्वरूपत्वं वेदवाक्यानुसारतः ॥ ( प्र. पं. पृ. ४२६,४८ )

समाधान—यदि 'स्वर्गकाम' पद से समभिव्याहृत लिङादि अपूर्व कार्य का बोध करा देते हैं, तब "चैत्यमभिवन्देत स्वर्गकामः"—इत्यादि वाक्यों में भी स्वर्गकाम पद-समभिव्याहृत लिङादि से अपूर्व कार्य का बोध होना चाहिए । यदि वैसा वहाँ भी मान लिया जाता है, तब ऐसे बौद्ध वाक्यों की भी रचना किसी पुरुष के द्वारा सम्भव नहीं, अतः इन वाक्यों को भी वेदों के समान ही अपौरुषेय मानना होगा । यदि स्वप्नादि में अपूर्वार्थक वाक्यों की पौरुषेयता देखकर बौद्ध वाक्यों में पौरुषेयत्व सिद्ध किया जाता है, तब वैदिक वाक्यों में भी वाक्यत्वादि लिङ्गों के द्वारा पौरुषेयत्व का अनुमान हो जाने पर उनकी भी अपूर्वार्थकता समाप्त हो जाती है । यदि 'वेदः पौरुषेयः, वाक्यत्वात्, कालिदासादिवाक्यवत्'—इस अनुमान में स्मर्यमाणकर्तृकत्वरूप उपाधि का उद्भावन कर अनुमानाभासता सिद्ध की जाती है, तब वेदान्त-वाक्यों में अस्मर्यमाणकर्तृकत्व होने के कारण ही अनपेक्षत्व और प्रामाण्य सिद्ध हो जाता है, अतः


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१२२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

भावस्य शास्त्रमन्तरेणानवगम्यमानत्वात् । यत्तु—हेयोपादेयरहितत्वादुपदेशानर्थक्यमिति, नैष दोषः; हेयोपादेयशून्यब्रह्मात्मतावगमादेव सर्वक्लेशप्रहाणात्पुरुषार्थ-

भामती

वेदान्तानां न सापेक्षतया प्रामाण्यविघातः, न चानधिगतगन्तृता नास्ति येन प्रामाण्यं न स्याज्जीवस्य ब्रह्मताया अन्यतोऽनधिगमात्, तदिदमुक्तं, ॐ न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपीति ॐ । द्वितीयं पूर्वपक्षबीजं स्मारयित्वा दूषयति ॐ "यत्तु हेयोपादेयरहितत्वाद् इति ॐ । विध्यर्थावगमात् खलु पारम्पर्येण पुरुषार्थप्रतिलम्भः, इह तु तत्त्वमसीत्यवगतिपर्यन्तवाक्यार्थज्ञानाद् बाह्यानुष्ठानानपेक्षात्साक्षादेव पुरुषार्थप्रतिलम्भो नायं सर्पो रज्जुरियमिति ज्ञानादिवेति । सोऽयमस्य विध्यर्थज्ञानात् प्रकर्षः ।

एतदुक्तं भवति—द्विविधं हीप्सितं पुरुषस्य किञ्चिदप्राप्तं ग्रामादि, किञ्चित् पुनः प्राप्तमपि भ्रमवशादप्राप्तमित्यवगतं, यथा स्वग्रीवावनद्धं ग्रैवेयकम् । एवं जिहासितमपि द्विविधं, किञ्चिदहीनं जिहासति, यथा वलयितचरणं फणिनं, किञ्चित् पुनर्हानमेव जिहासति, यथा चरणाभरणे नूपुरे फणिनमारोपितम् ।

भामती-व्याख्या

वेदान्त-वाक्यों में अनपेक्षत्व सिद्ध करने के लिए कार्यार्थकत्व मानने की क्या आवश्यकता ? वेदों में अपौरुषेयत्व का विस्तारपूर्वक उपपादन न्यायकलिका में किया गया है, अतः यहाँ अनावश्यक विस्तार के भय से उसका विशेषतः उपपादन नहीं किया जाता। वेदों में पौरुषेयत्व सिद्ध न होने के कारण सिद्धार्थक वेदान्त-वाक्यों में भी न प्रत्यक्षादि-सापेक्षत्व प्रसक्त होता है और अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य का विघात होता है, क्योंकि अज्ञातार्थज्ञापकत्व ही प्रामाण्य का प्रयोजक है, वह तो वेदान्त-वाक्यों में विद्यमान ही है, अतः प्रामाण्य क्यों न होगा ? वेदान्त को छोड़ कर अन्य कोई ऐसा प्रमाण नहीं, जिसके द्वारा जीव में ब्रह्मरूपता का ज्ञान प्रथमतः उत्पन्न किया जा सके, अतः प्रमाणान्तर से अनधिगत जीव और ब्रह्म के अभेद का बोध कराने के कारण "तत्त्वमसि" आदि वेदान्त-वाक्य परमार्थतः प्रमाणभूत हैं। यही तथ्य भाष्यकार के शब्दों में व्यक्त किया गया है—"न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि प्रत्यक्षादिविषयत्वं ब्रह्मणः, "तत्त्वमसि" (छां. ६।८।७) इति ब्रह्मात्मभावस्य शास्त्रमन्तरेणानवगम्यमानत्वात् ।"

पूर्वपक्ष के द्वितीय तर्क का स्मरण दिला कर निराकरण किया जाता है—"यत्तु हेयोपादेयरहितत्वात्तदुपदेशानर्थक्यमिति, नैष दोषः, हेयोपादेयशून्यब्रह्मात्मतावगमादेव सर्वक्लेशप्रहाणात्पुरुषार्थसिद्धेः" । अर्थात् कर्मरूप साध्यार्थ के विधि वाक्य से कर्म का ज्ञान और उस ज्ञान के पश्चात् कर्मानुष्ठान होता है, तब कहीं उससे स्वर्गादि के साधनीभूत अदृष्टरूप पुरुषार्थ की सिद्धि होती है, किन्तु प्रकृत में "तत्त्वमसि"—इस वेदान्त-वाक्य के द्वारा जीव में ब्रह्मरूपता के साक्षात्कार मात्र से वैसे ही परम पुरुषार्थ की सिद्धि हो जाती है, जैसे "नायं सर्पः, रज्जुरियम्"—इस प्रकार के ज्ञान से सर्प-भ्रम सदैव के लिए दूर हो जाता है। जीव में ब्रह्मरूपता अथवा रज्जु में रज्जुरूपता का ज्ञान हो जाने के पश्चात् किसी प्रकार के अनुष्ठान की अपेक्षा नहीं रहती। साध्यार्थ-ज्ञान की अपेक्षा सिद्धार्थ-ज्ञान का यह महान् प्रकर्ष (वैशिष्ट्य) है, जिसको भाष्यकार ने 'प्रहाण' पद में 'प्र' के प्रयोग से ध्वनित किया है।

कहने का अभिप्राय यह है कि जैसे पुरुष (के ईप्सित उपादेय) पदार्थों में दो प्रकार के पदार्थ आते हैं—(१) अप्राप्त पदार्थ, जैसे ग्रामादि और (२) प्राप्त पदार्थ, जैसे गले में पहना हुआ हार, जो कि किसी भ्रम के कारण खोया हुआ समझ लिया गया था। वैसे ही जिहासित (त्याज्य या हेय) पदार्थ भी द्विविध ही होते हैं—(१) अहीन (अत्यक्त या प्राप्त) पदार्थ, जैसे पैर में लिपटा हुआ सर्प और (२) हीन (अप्राप्त) पदार्थ, जैसे पायजेब में

सिद्धार्थत्वविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२३

सिद्धेः । देवतादिप्रतिपादनस्य तु स्ववाक्यगतोपासनाद्यर्थत्वेऽपि न कश्चिद्विरोधः । न तु तथा ब्रह्मण उपासनाविधिशेषत्वं संभवति; एकत्वे हेयोपादेयशून्यतया क्रियाकार-

भामती

तत्राप्राप्तप्राप्तौ चात्यक्तत्यागे च बाह्योपायानुष्ठानसाध्यत्वात् तदुपायतत्त्वज्ञानादस्ति पराचीनानुष्ठानापेक्षा । न जातु ज्ञानमात्रं वस्त्वपनयति । न हि सहस्रमपि रज्जुप्रत्यया वस्तुसन्तं फणिनमपनयितुमीशते । समारोपिते तु प्रेप्सितजिहासिते तत्त्वसाक्षात्कारमात्रेण बाह्यानुष्ठानानपेक्षेण शक्येते प्राप्तुमिव हातुमिव । समारोपमात्रजीविते हि ते, समारोपितं च तत्त्वसाक्षात्कारः समूलघातमुपहन्तीति । तथेहाप्यविद्यासमारोपितजीवभावे ब्रह्मण्यानन्दे वस्तुतः शोकदुःखादिरहिते समारोपितनिवन्धनस्तद्भावस्तत्त्वमसीतिवाक्या-त्थंतत्त्वज्ञानावगतिपर्यन्तान्निवर्त्तते । तन्निवृत्तौ प्राप्तमप्यानन्दरूपमप्राप्तमिव प्राप्तं भवति, त्यक्तमपि शोकदुःखाद्यत्यक्तमिव त्यक्तं भवति, तदिदमुक्तं ❀ ब्रह्मात्मावगमादेव ❀ । जीवस्य सर्वक्लेशस्य सवासनस्य विपर्य्यासस्य, स हि क्लिश्नाति जन्तूनतः क्लेशः, तस्य प्रकर्षेण हानात् पुरुषार्थस्य दुःखनिवृत्तिसुखाति-लक्षणस्य सिद्धेरिति । यत्त्वात्मेत्येवोपासीतात्मानमेव लोकमुपासीतेत्युपासनावाक्यगतदेवतादिप्रतिपादनेनो-पासनापरत्वं वेदान्तानामुक्तं, तद् दूषयति ❀ देवतादिप्रतिपादनस्य तु ❀ आत्मेत्येतावन्मात्रस्य । ❀ स्ववा-क्यगतोपासनाथंत्त्वेऽपि न कश्चिद्विरोधः ❀ । यदि न विरोधः, सन्तु तर्हि वेदान्ता देवताप्रतिपादनद्वारेणो-पासनाविधिपरा एवेत्यत आह ❀ न तु तथा ब्रह्मणः इति ❀ । उपास्योपासकोपासनादिभेदप्रसिद्धयधीनो-

भामती-व्याख्या

आरोपित सर्प। इनमें अप्राप्त पदार्थ की प्राप्ति और अत्यक्त का त्याग बाह्य अनुष्ठान (व्यापार) की अपेक्षा करता है, केवल साधन तत्त्व के ज्ञान से साध्य नहीं होता, अपितु उपायभूत वस्तु का ज्ञान हो जाने के पश्चात् अनुष्ठान (क्रिया या व्यापार) की अपेक्षा होती है, क्योंकि प्राप्त अत्यक्त पदार्थ का ज्ञानमात्र से परिहाण लोक में नहीं देखा जाता, जैसे कि रज्जु तत्त्व के हजारों ज्ञानों के द्वारा भी पैर में लिपटे वास्तविक (अनारोपित) सर्प की निवृत्ति नहीं कर सकते, हाँ, जीव में नित्य प्राप्त किन्तु विस्मृत ब्रह्मरूपता की प्राप्ति और पायजेब में आरोपित सर्प की निवृत्ति वस्तु तत्त्व के साक्षात्कार मात्र से हो जाती है, उसके लिए किसी प्रकार के बाह्य व्यापार की अपेक्षा नहीं होतो, क्योंकि जो पदार्थ केवल भ्रमतः आरोपित मात्र होते हैं, उनका तत्त्व-साक्षात्कार से समूल नाश हो जाता है। प्रकृत में वैसा ही है कि आनन्द ब्रह्म में अविद्या के द्वारा आरोपित जीवभाव एवं जन्म-मरणादि अनन्त दुःख केवल 'तत्त्वमसि'-इत्यादि वेदान्त-वाक्यों से जनित तत्त्व-साक्षात्कार से निवृत्त हो जाता है। उसकी निवृत्ति हो जाने पर प्राप्त आनन्दरूपता भी प्राप्त-जैसी और त्यक्त दुःख-राशि त्यक्त-जैसी हो जाती है, भाष्यकार यही कह रहे हैं- “ब्रह्मात्मावगमादेव”। जीव के वासना-सहित विपर्यय रूप क्लेश की निवृत्ति हो जाती है। वह विपर्यय (मिथ्या ज्ञान) ही क्लेश है, जो कि जीवों को क्लेशित (दुःखी) करता है। उस क्लेश की निवृत्ति से दुःख-निवृत्ति और परमा-नन्द-प्राप्तिरूप पुरुषार्थ की सिद्धि हो जाती है।

यह जो पूर्वपक्षी ने कहा था कि "आत्मेत्येवोपासीत" (बृह० उ० १।४।७), आत्मान-मेव लोकमुपासीत' (बृह० उ० १।४।१५) इत्यादि उपासना-वाक्यगत देवतादि चेतन पदार्थों के प्रतिपादन में वेदान्त-वाक्यों का उपयोग है। उस पक्ष को दूषित किया जाता है- "देवतादि प्रतिपादनस्य तु न कश्चिद् विरोधः"। यदि किसी प्रकार का विरोध नहीं, तब वेदान्त-वाक्यों में देवतादि-प्रतिपादन के द्वारा उपासना-विधि-परत्व मान लेना चाहिए इस शङ्का का निराकरण किया गया है-"न तु तथा उपासनाविधिशेषत्वम्"। (फिर भी ब्रह्म उपासना-विधि का अङ्ग क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि उपाश्य, उपासक

१२४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

काद्वैतविज्ञानापमर्दोपपत्तेः । न ह्येकत्वविज्ञानेनोन्मथितस्य द्वैतविज्ञानस्य पुनः संभवो- ऽस्ति, येनोपासनाविधिशेषत्वं ब्रह्मणः प्रतिपद्येत । यद्यप्यन्यत्र वेदवाक्यानां न विधि- संस्पर्शमन्तरेण प्रमाणत्वं दृष्टम् ; तथाप्यात्मविज्ञानस्य फलपर्यन्तत्वान्न तद्विषयस्य

भामती

पासना न निरस्तसमस्तभेदप्रपञ्चे वेदान्तवेद्ये ब्रह्मणि सम्भवतीति नोपासनाविधिशेषत्वम्, वेदान्तानां तद्वि- रोधित्वादित्यर्थः ।

स्यादेतत्—यदि विधिविरहेऽपि वेदान्तानां प्रामाण्यं, हन्त तर्हि सोऽरोदीदित्यादीनामप्यस्तु स्वतन्त्राणामेवोपेक्षणीयार्थानां प्रामाण्यम् , न हि हानोपादानबुद्धी एव प्रमाणस्य फले, उपेक्षाबुद्धेरपि तत्फलत्वेन प्रामाणिकैरभ्युपेतत्वादिति कृतं बर्हिषि रजतं न देयमित्यादिनिषेधविधिपरत्वेनैतेषामित्यत आह ॐ यद्यपि इति ॐ । स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणतया हि सर्वो वेदराशिः पुरुषार्थतन्त्र इत्यवगतं, तत्रैकेनापि वर्णेन नापुरुषार्थेन भवितुं युक्तं, किं पुनरियता सोऽरोदीत्यादिना पदप्रबन्धेन । न च वेदान्तेभ्य इव तदर्थावगममात्रादेव कश्चित् पुरुषार्थं उपलभ्यते, तेनैष पदसन्दर्भः साकाङ्क्ष एवास्ते पुरुषार्थमुदीक्ष- माणः । बर्हिषि रजतं न देयमित्ययमपि निषेधविधिः स्वनिषेध्यस्य निन्दामपेक्षते, न ह्यन्यथा ततश्चेतनः शक्यो निवर्तयितुम् । तद्यदि दूरतोऽपि न निन्दामवाप्स्यत्ततो निषेधविधिरेव रजतनिषेधे च निन्दायां च बर्विहोमवत् सामर्थ्यद्वयमकल्पयिष्यत् । तदेवमुक्तसयोः सोऽरोदीदिति च बर्हिषि रजतं न देयमिति च पदसन्दर्भयोर्लक्ष्यमाणनिन्दाद्वारेण नष्टाश्वदग्धरथवत् परस्परं समन्वयः । न त्वेवं वेदान्तेषु पुरुषार्थापेक्षा,

भामती-व्याख्या

और उपासना का भेद सिद्ध हो जाने पर ही उपासना सम्भव हो सकती है, किन्तु समस्त भेद-प्रपञ्च का निरास जिस अद्वैत ब्रह्म तत्त्व में किया जाता है, उसमें उपासना-विधि की शेषता ( अङ्गता ) सम्भावित नहीं, क्योंकि वेदान्त-वाक्य भेद के सर्वथा विरोधी हैं।

शङ्का—विधि-सम्पर्क के बिना यदि वेदान्त-वाक्यों को प्रमाण माना जाता है, तब तो 'सोऽरोदीत्'—इत्यादि उपेक्षणीयार्थक अर्थवाद वाक्यों में भी विधि वाक्य से एकवाक्यता के बिना स्वातन्त्र्येण प्रामाण्य मानना चाहिए, क्योंकि केवल हान और उपादान का ज्ञान ही प्रमाण का फल नहीं माना जाता, किन्तु उपेक्षा-ज्ञान को भी वेदान्तियों ने प्रमाण-फल के रूप में स्वीकार कर लिया है, अतः “बर्हिषि रजतं न देयम्'—इत्यादि निषेध-विधि की शेषता ( अङ्गता ) उक्त अर्थवाद वाक्यों में माननी व्यर्थ है।

समाधान—भाष्यकार कहते हैं कि "यद्यपि अन्यत्र वेदवाक्यानां न विधिसंस्पर्शमन्तरेण प्रमाणत्वं दृष्टम्” । आशय यह है कि “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः”—इस स्वाध्याय विधि के द्वारा गृहीत होने के कारण समस्त वेद-राशि पुरुषार्थ की साधन है—यह भली प्रकार अवगत हो चुका है, अतः वेद का एक वर्ण भी अपुरुषार्थ नहीं हो सकता, तब भला "सोऽरोदीद् यदरोदीत् तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्”—इतना बड़ा पद-सन्दर्भ निरर्थक और अप्रमाण क्योंकर होगा ? वेदान्त वाक्यों के समान अर्थवाद वाक्यों के द्वारा किसी पदार्थ के ज्ञानमात्र से किसी पुरुषार्थ की सिद्धि भी नहीं होती, अतः 'किमर्थोऽयं पदसन्दर्भः ?' इस प्रकार की आकांक्षा एवं “बर्हिषि रजतं न देयम्—इस विधि की 'कस्मात्'—इस प्रकार की आकांक्षा है, नष्टाश्वदग्धरथ-न्याय का सहारा लेकर उक्त अर्थवाद वाक्य का रजत की निन्दा में तात्पर्य मानकर अर्थवाद और विधि—दोनों की एकवाक्यता पर्यवसित होती है। विधि वाक्य को अपने विधेय की प्रशंसा और निषेध वाक्य को अपने निषेध्य की निन्दा निसर्गतः अपेक्षित होती है। विधि वाक्यों को जहाँ समीप या दूर के किसी अर्थवाद की सहायता नहीं मिलती, वहाँ अगत्या विधि वाक्य से ही प्रशंसा और निन्दा की कल्पना वैसे ही हो जाती है, जैसे “दविहोमं कुर्यात्” (जै० सू० ८।४।१९) से ।

उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२५

शास्त्रस्य प्रामाण्यं शक्यं प्रत्याख्यातुम्। न चानुमानगम्यं शास्त्रप्रामाण्यं, येनान्यत्र- दृष्टं निदर्शनमपेक्षेत। तस्मात्सिद्धं ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वम्। अत्रापरे प्रत्यवतिष्ठन्ते—यद्यपि शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्म, तथापि प्रतिपत्तिविधि-


भामती

तदर्थावगमादेवानपेक्षात् परमपुरुषार्थलाभादित्यर्थम्।

ननु विध्यसंस्पर्शिनो वेदस्यान्त्यस्य न प्रामाण्यं दृष्टमिति कथं वेदान्तानां तदस्पृशां तद्भविष्यतीत्यत आह ॐ न चानुमानगम्यम् इति ॐ। अबाधितानधिगतासन्दिग्धबोधजनकत्वं हि प्रमाणत्वं प्रमाणानां, तच्च स्वत इत्युपपादितम्। यद्यपि चैषामोद्बुद्धबोधजनकत्वं कार्यार्थापत्तिसमधिगम्यं तथापि तद्बोधोपजनने मानान्तरं नापेक्षन्ते, नापीमामेवार्थार्पत्तिं, परस्पराश्रयप्रसङ्गादिति स्वत इत्युक्तम्। ईदृग्बोधजनकत्वं च कार्य इव विधीनां वेदान्तानां ब्रह्मण्यस्तीति दृष्टान्तानपेक्षं तेषां ब्रह्मणि प्रामाण्यं सिद्धं भवति। अन्यथा नेन्द्रियान्तराणां रूपप्रकाशनं दृष्टमिति चक्षुरपि न रूपं प्रकाशयेदिति। प्रकृतमुपसंहरति ॐ तस्माद् इति ॐ।

आचार्यदेशीयानां मतमुत्थापयति — ॐ अत्रापरे प्रत्यवतिष्ठन्ते इति ॐ। तथाहि—अज्ञातसङ्गति-


भामती-व्याख्या

वेदान्त-वाक्यों में यह बात नहीं कि किसी विधि के साथ समन्वय की आवश्यकता हो, वे तो स्वयं अन्य प्रमाणों से निरपेक्ष होकर परम पुरुषार्थ के साधन होते हैं।

यदि कहा जाय कि वेदान्त से भिन्न अन्य किसी वैदिक वाक्य में विधि-सम्पर्क के विना प्रामाण्य नहीं देखा जाता, अतः किस उदाहरण के द्वारा वेदान्त-वाक्यों में प्रामाण्य का अनुमान किया जायगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"न चानुमानगम्यं शास्त्रप्रामाण्यं येनान्यत्र दृष्टं निदर्शनमपेक्षेत"। ज्ञानगत अबाधित, अनधिगत और असन्दिग्ध अर्थ की बोधकता ही प्रामाण्य पदार्थ है, जो कि वैदिक वाक्य-जनित ज्ञानों में स्वतः सिद्ध होता है—यह कहा जा चुका है, अतः किसी अनुमानादि प्रमाण के द्वारा प्रामाण्य की सिद्धि अपेक्षित ही नहीं, जिसके लिए किसी उदाहरण-घटित अनुमान की आवश्यकता हो। यद्यपि ज्ञान की अबाधितार्थकता रूप प्रमाणता सफलप्रवृत्तिरूप कार्य के द्वारा अवगत होती है, अतः वेदान्त-वाक्यों में सफल प्रवृत्ति-जनक बोध की जनकता कार्यलिङ्गक अनुमान के द्वारा ही सिद्ध होती है, अतः वेदान्त-वाक्यों को भी अनुमान की अपेक्षा अनिवार्य है—'वेदान्त-वाक्यं प्रमाज्ञानजनकम्, सफलप्रवृत्तिहेतुभूतज्ञानजनकत्वात्, सम्प्रतिपन्नवत्'। तथापि प्रमात्मक बोध की उत्पत्ति में वेदान्त-वाक्य इतर प्रमाण की अपेक्षा नहीं करते। कार्यलिङ्गक अनुमानरूप अर्थापत्ति की भी अपेक्षा नहीं, क्योंकि वह तो प्रमारूप कार्य हो जाने के पश्चात् प्रवृत्त होगा, पहले उसकी सत्ता ही सम्भव नहीं कि वेदान्त-वाक्य बोध की उत्पत्ति में उसकी अपेक्षा करते, अन्यथा अन्योऽन्याश्रयता प्रसक्त होती है। फलतः वेदान्त-वाक्यों में बोधजनकत्व इतर प्रमाण-निरपेक्ष स्वतः ही होता है। जैसे विधि वाक्य कार्यरूप अर्थ का ज्ञान दृष्टान्त-निरपेक्ष स्वतः ही उत्पन्न करते हैं, वैसे ही वेदान्त-वाक्य भी ब्रह्म का ज्ञान किसी दृष्टान्त की अपेक्षा के विना ही उत्पन्न करते हैं, अतः ब्रह्म में वेदान्त-वाक्यों को प्रमाण माना जाता है। यदि इसमें भी दृष्टान्त की अपेक्षा आवश्यक है, तब चक्षुरादि में भी रूपादि-ज्ञान की जनकता सिद्ध न होगी, क्योंकि अन्य इन्द्रियों में वह नहीं देखी जाती कि जिसे दृष्टान्त बनाकर चक्षुरादि में रूपादि-ज्ञान की जनकता सिद्ध करते। प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—"तस्मात् सिद्धं ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वम्"।

एकदेशिमत—वेदान्त के ही कतिपय माननीय आचार्यों का कहना है कि—

१२६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

भामती स्वेन शास्त्रत्वेनार्थवत्तया। मननाविप्रतीत्या च कार्यार्थाद् ब्रह्मनिश्चयः॥ न खलु वेदान्ताः सिद्धब्रह्मरूपपरा भवितुमर्हन्ति, तत्राविवित्सितसङ्गतित्वाद्, यत्र हि शब्दा लोकेन प्रयुज्यन्ते तत्र तेषां सङ्गतिग्रहः। न चाहेय-मनुपादेयं रूपमात्रं कश्चिद्विवक्षति प्रेक्षावान्, तस्यानुभुत्सितत्वात्। अनुभुत्सितावबोधने च प्रेक्षावत्ता-विधातात्। तस्मात् प्रतिपित्सितं प्रतिपिपादयिषन्नयं लोकः प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतमेवार्थं प्रतिपादयेत्, कार्यं चावगतं तद्धेतुरिति तदेव बोधयेत्। एवं च वृद्धव्यवहारप्रयोगात् पदानां कार्यपरत्वमवगच्छति। तत्र किञ्चित्साक्षात्कार्याभिधायकं, किञ्चित्कार्यार्थस्वार्थाभिधायकं, न तु भूतार्थपरता पदानाम्। अपि च नरान्तरस्य व्युत्पन्नस्यार्थप्रत्ययमनुमाय तस्य च शब्दभावाभावानुविधानमवगम्य शब्दस्य तद्विषयबोधकत्वं निश्चेतव्यं, न च भूतार्थरूपमात्रप्रत्यये परनरवर्त्तिनि किञ्चिल्लिङ्गमस्ति। कार्यप्रत्यये तु नरान्तरवर्त्तिनि प्रवृत्तिनिवृत्ती [स्तो हेतु इत्यज्ञातसङ्गतित्वान्न ब्रह्मरूपपरा वेदान्ताः। अपि च वेदान्तानां वेदत्वात् शास्त्रत्वप्रसिद्धिरस्ति, प्रवृत्तिनिवृत्तिपराणां च सन्दर्भाणां शास्त्रत्वम्। यथाहूः—

प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा।
पुंसां येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते ॥ इति।

भामती-व्याख्या

अज्ञातसंगतित्वेन शास्त्रत्वेनार्थवत्तया।
मननादिप्रतीत्या च कार्यार्थाद् ब्रह्मनिश्चयः॥

(१) अज्ञातसंगतित्व, (२) शास्त्रत्व, (३) अर्थवत्त्व और (४) मननादि-विधान—इन चार हेतुओं के द्वारा ब्रह्म में उपासना-विधि-शेषत्व निश्चित होता है—

(१) वेदान्त-वाक्यों का सिद्ध ब्रह्म में संगति-ग्रह (शक्ति-ज्ञान) सम्भव नहीं, क्योंकि जिस अर्थ में लोग शब्दों का प्रयोग नहीं करते, उस अर्थ में शब्दों का संगति-ग्रह नहीं हो सकता, लोकतः संगति-ग्रह के आधार पर ही वैदिक शब्दों से अर्थ-बोध होता है, जैसा कि मण्डन मिश्र कहते हैं—"लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः" (ब्र. सि. पृ. ८२)। लोक में कोई भी प्रेक्षावान् व्यक्ति हेय और उपादेय से रहित वस्तुमात्र की विवक्षा नहीं करता, क्योंकि ऐसी वस्तु बुभुत्सित (जिज्ञासित) ही नहीं होती। यदि अजिज्ञासित पदार्थ का कोई प्रतिपादन करता है, तब उसे प्रेक्षावान् (बुद्धिपूर्वककारी) नहीं कहा जायगा, अतः बुद्धिमान् मनुष्य प्रतिपित्सित (बुभुत्सित या जिज्ञासित) अर्थ की विवक्षा से प्रवृत्ति और निवृत्ति के हेतुभूत अर्थ का ही प्रतिपादन किया करता है। कार्य वस्तु ही वह पदार्थ है, जो अवगत होकर प्रवृत्ति का हेतु होता है, अतः कार्यरूप अर्थ का ही प्रतिपादन करना चाहिए। वृद्ध पुरुषों के व्यवहार की सहायता से पदों की शक्ति कार्यरूप अर्थ में ही निश्चित होती है। उनमें कुछ पद साक्षात् कार्य के अभिधायक होते हैं और कुछ पद कार्यार्थक स्वार्थ के अभिधायक होते हैं, सिद्धार्थपरता पदों में अवगत ही नहीं होती। दूसरी बात यह है कि मध्यम (प्रवृत्त होने वाले) वृद्ध के अन्दर अवस्थित प्रवर्तक ज्ञान का अनुमान करके शब्द विशेष के होने पर ही वह ज्ञान उत्पन्न होता है, अन्यथा नहीं—इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा शब्द में उस बोध की जनकता निश्चित की जाती है, किन्तु जिस ज्ञान से कोई प्रवृत्ति या निवृत्ति नहीं होती, ऐसे अन्यपुरुषगत सिद्धार्थविषयक ज्ञान का अनुमान नहीं हो सकता। कार्यविषयक ज्ञान के अनुमापक तो प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप लिङ्ग सुलभ हो जाते हैं। अतः वेदान्त शब्दों का ब्रह्म में संगति-ग्रह न हो सकने के कारण उनमें ब्रह्मपरता सम्भव नहीं।

(२) वेदान्त-वाक्य वेद होने के कारण शास्त्र कहे जाते हैं और प्रवृत्ति निवृत्तिपरक पद-संदर्भ ही शास्त्र की परिभाषा में आता है, जैसा कि श्रीकुमारिल भट्ट ने कहा है—

उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२७


भामती

तस्माच्छास्त्रत्वप्रसिद्ध्या व्याहतमेषां स्वरूपपरत्वम्। अपि च न ब्रह्मरूपप्रतिपादनपराणामेषामर्थवत्त्वं पश्यामः। न च रज्जुरियं न भुजङ्ग इति यथाकथञ्चिल्लक्षणया वाक्यार्थतत्त्वनिश्चये यथा भयकम्पादिनिवृत्तिः, एवं तत्त्वमसीतिवाक्यार्थावगमान्निवृत्तिर्भवति सांसारिकाणां धर्मांणाम्; श्रुतवाक्यार्थस्यापि पुंसस्तेषां तादवस्थ्यात्। अपि च यदि श्रुतब्रह्मणो भवति सांसारिकधर्मनिवृत्तिः कस्मात् पुनः श्रवणस्योपरि मननादयः श्रूयन्ते? तस्मात्तेषां वैयर्थ्यप्रसङ्गादपि न ब्रह्मस्वरूपपरा वेदान्ताः, किन्त्वात्मप्रतिपत्तिविषयकार्यपराः। तच्च कार्यं स्वात्मनि नियोज्यं नियुञ्जानं नियोग इति च मानान्तरापूर्वत्वाऽपूर्वमिति चाख्यायते। न च विषयानुष्ठानं विना तत्सिद्धिरिति स्वसिद्धयर्थं तदेव कार्यं स्वविषयस्य करणस्यात्मज्ञानस्यानुष्ठानमाक्षिपति। यथा च कार्यं स्वविषयाधीननिरूपणमिति ज्ञानेन विषयेण निरूप्यते, एवं


भामती-व्याख्या

प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा।
पुंसां येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते॥ (श्लो. वा. पृ० ४०६)

[जिस नित्य (अपौरुषेय) अथवा कृतक (पौरुषेय) पद-सन्दर्भ के द्वारा पुरुषों की किसी विषय में प्रवृत्ति या किसी विषय से निवृत्ति होती है, उस पद-सन्दर्भ को शास्त्र कहा जाता है, इसकी चर्चा पहले आ चुकी है]। अतः वेदान्त-वाक्यों में शास्त्रत्व की प्रसिद्धि होने के कारण सिद्धार्थपरता सम्भव नहीं।

(३) वेदान्त-वाक्य यदि ब्रह्मस्वरूप के ही प्रतिपादक माने जाते हैं, तब इनमें अर्थवत्ता (प्रयोजनवत्ता) नहीं रहती। यह जो कहा जाता है कि 'रज्जुरियं न सर्पः'—इत्यादि सिद्धार्थक शब्दों से यथाकथञ्चित् वाक्यार्थ का निश्चय हो जाने पर जैसे भय और कम्पादि की निवृत्ति देखी जाती है, वैसे ही "तत्त्वमसि"—इत्यादि शब्दों से वाक्यार्थ का निश्चय हो जाने पर कर्तृत्ववादि सांसारिक धर्मों की निवृत्ति हो जाती है। वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि जिन वेदान्तियों ने "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों से वाक्यार्थ का बोध प्राप्त कर लिया है, वे भी अपने को पहले की भांति ही कर्त्ता-भोक्ता मानते हैं, अतः उक्त वाक्यार्थ बोध से कर्तृत्ववादि सांसारिक धर्मों की निवृत्ति नहीं होती।

(४) यदि वेदान्त-वाक्यों के श्रवणमात्र से पुरुषार्थ की सिद्धि हो जाती है, तब “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह. उ. २।४।५) इत्यादि श्रुति वाक्यों में श्रवण के पश्चात् मननादि का विधान किस प्रयोजन के लिए किया गया? अतः श्रवणादि की व्यर्थतापत्ति का परिहार करने के लिए भी मानना पड़ता है कि वेदान्त-वाक्य ब्रह्म-स्वरूपमात्र के के बोधक नहीं माने जा सकते, अपितु आत्मा की प्रतिपत्ति (ज्ञान) को विषय करनेवाले कार्य पदार्थ के बोधन में ही वेदान्त-वाक्यों का तात्पर्य स्थिर होता है। वह कार्य पदार्थ अपनी उत्पत्ति में नियोज्य (अधिकारी) पुरुष का नियोजक होने के कारण नियोग एवं प्रमाणान्तर से अनधिगत होने के कारण अपूर्व भी कहलाता है, जैसा कि श्री शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—

क्रियादिभिन्नं यत्कार्यं वेद्यं मानान्तरैर्न तत्।
अतो मानान्तरापूर्वमपूर्वमिति गीयते॥
कार्यत्वेन वियोज्यं च स्वात्मनि प्रेरयन्नसौ।
नियोग इति मीमांसानिष्णा तैरभिधीयते॥ (प्र. पं. पृ. ४४१)

उस नियोगरूप कार्य की सिद्धि उसकी विषयीभूत आत्मप्रतिपत्ति के अनुष्ठान से विना सम्भव नहीं, अतः वह कार्य अपनी सिद्धि के लिए अपनी विषयीभूत आत्मप्रतिपत्ति

१२८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४

विषयतयैव शास्त्रेण ब्रह्म समर्प्यते । यथा-यूपादहवनीयादीन्यलौकिकान्यपि विधिशेषतया शास्त्रेण समर्प्यन्ते, तद्वत् । कुत एतत् ? प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजनत्वा-


भामती

ज्ञानमपि स्वविषयमात्मानमन्तरेणाशक्यनिरूपणमिति तन्निरूपणाय तादृशमात्मानमाक्षिपति तदेव कार्यम् । यथाहुः—'यत्तु तत्सिद्धयर्थमुपादीयते आक्षिप्यते तदपि विधेयमिति तन्त्रे व्यवहारः' इति । विधेयता च नियोगविषयस्य ज्ञानस्य भावार्थतयाऽनुष्ठेयता, तद्विषयस्य स्वात्मनः स्वरूपसत्ताविनिश्चितिः । आरोपिततद्भावस्य त्वन्यस्य निरूपकत्वे तेन तन्निरूपितं न स्यात् । तस्मात्तादृगात्मप्रतिपत्तिविधिपरेभ्यो वेदान्तेभ्यस्तादृगात्मविनिश्चयः । तदेतस्सर्वमाह ॐ यद्यपि इति ॐ । विधिपरेभ्योऽपि वस्तुतत्त्वविनिश्चय इत्यत्र निदर्शनमुक्तं ॐ यथा यूप इति ॐ । यूपे पशुं बध्नातीति बन्धनाय विनियुक्ते यूपे तस्यालौकिकत्वात् कोऽसौ यूप इत्यपेक्षिते खादिरो यूपो भवति, यूपं तक्षति, यूपमष्टाश्रीकरोतीत्यादिभिर्वार्क्षस्तक्षणादिविधिपरैरपि संस्काराविष्टं विशिष्टसंस्थानं दारु यूप इति गम्यते । एवमाहवनीयादयोऽप्यवगन्तव्याः । प्रवृत्तिनिवृत्तिपरस्य शास्त्रत्वं न स्वरूपपरस्य, कार्य एव सम्बन्धो न स्वरूपे, इति हेतुद्वयं भाष्यवाक्येनोपपादितं


भामती-व्याख्या

(आत्मज्ञान) के अनुष्ठान का आक्षेपक (कल्पक) होता है। जैसे कार्य (नियोग) अपने विषयीभूत आत्मज्ञान के द्वारा निरूपित होता है—'आत्मज्ञानविषयो नियोगः'। वैसे ही ज्ञान भी अपने विषयीभूत आत्मा के विना निरूपित नहीं हो सकता, अतः ज्ञान का निरूपण करने के लिए वैसे ही आत्मा का आक्षेप वही कार्य (नियोग) करता है, जैसा कि श्री प्रभाकर मिश्र कहते हैं—"यस्मिन्नयं पुरुषो नियुज्यते, स तद्विषयः। तस्मान्नैव विधिः कर्त्तव्यतामाह, विषयतया त्पादत्ते। तस्माद् यद्यदुपदीयते तत्तद्विधेयमिति तन्त्रे व्यवहारः" (बृहती. पृ. ३९)। यहाँ 'उपादीयते' का अर्थ 'आक्षिप्यते' है। यद्यपि नियोग का विषयीभूत ज्ञान सिद्ध पदार्थ होने से विधेय नहीं, तथापि धात्वर्थत्वेन विधेयत्व बन जाता है अर्थात् यहाँ ज्ञान का अर्थ उपासना है, जो कि स्वरूपत अनुष्ठेय पदार्थ है। उस ज्ञान के विषयीभूत आत्मा की विधेयता है—आत्मस्वरूप की सत्ता का विनिश्चय, क्योंकि यहाँ विधेयता अज्ञातज्ञप्तिरूप मानी गई है, आत्मस्वरूप-सत्ता का निश्चय अज्ञातार्थ-ज्ञापक होता है। यहाँ अनात्मपदार्थों में आरोपित आत्मा ज्ञान का विषय नहीं, अतः आत्म-प्रतिपत्ति की विधि के बोधक वेदान्त-वाक्यों से वैसे (अनारोपित) आत्मा का निश्चय होता है। भाष्यकार इसी भाव की अभिव्यक्ति कर रहे हैं—"यद्यपि शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्म"। विधिपरक वाक्यों से भी वस्तुतत्त्व का निश्चय होता है—इसमें दृष्टान्त देते हैं—"यथा यूपादहवनीयादीन्यलौकिकान्यपि विधिशेषतया शास्त्रेण समर्प्यन्ते, तद्वत्"। "यूपे पशुं बध्नाति"—इस प्रकार विहित बन्धन को सम्पन्न करने के लिए विनियुक्त यूप एक अलौकिक पदार्थ माना जाता है, क्योंकि तक्षणादि दृष्ट और प्रोक्षणादि अदृष्ट संस्कारों से युक्त यूप पदार्थ केवल लौकिक नहीं माना जा सकता, किन्तु लोक में अप्रसिद्ध होने के कारण अलौकिक माना जाता है। वहाँ 'कोऽसौ यूपः?' इस प्रकार की आकांक्षा में "खादिरो यूपो भवति", 'यूपं तक्षति', 'यूपमष्टाश्रीकरोति'—इत्यादि वाक्यों के द्वारा खैर की लकड़ी को छील एवं आठ पहलूवाले एक खम्भे को प्रस्तुत किया जाता है। इसी प्रकार "यदाहवनीये जुहोति"—इस विधि वाक्य में 'क आहवनीयः' ऐसे प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि "वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत" इत्यादि श्रुतियों से विहित आधानादि संस्कारों से विशिष्ट लोकोत्तर अग्नि की अवगति 'आहवनीय' शब्द से होती है। यूप और आहवनीयादि के समान ही ब्रह्म वस्तु की अवगति विधिपरक वेदान्त-वाक्यों से हो सकती है।

उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२९

च्छास्त्रस्य । तथा हि शास्त्रतात्पर्य्यविद आहुः—‘दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनम्’ (जै० सू० १।१।१) इति । ‘चोदनेति क्रियायाः प्रवर्तकं वचनम्’ । ‘तस्य ज्ञानमुपदेशः’ (जै० सू० १।१।५) । ‘तद्भूतानां क्रियार्थेन समाम्नायः’ (जै० सू० १।१।२५) । ‘आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्’ (जै० सू० १।२।१) इति च । अतः पुरुषं कचिद्विषयविशेषे प्रवर्त्तयत् कुतश्चिद्विषयविशेषात्निवर्त्तयच्चार्थवच्छास्त्रम् । तच्छेषतया चान्यदुपयुक्तम् । तत्सामान्याद्वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्यात् । सति

भामती

❄ प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजनत्वाद् ❄ इत्यादिना ❄ तत्सामान्याद्वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्याद् ❄ इत्यन्तेन । न च स्वतन्त्रं कार्यं नियोज्यमधिकारिणमनुष्ठातारमन्तरेणेति नियोज्यभेदमाह ❄ सति च विधिपरत्वे इति ❄ । ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतीति सिद्धवदर्थवादावगतस्यापि ब्रह्मभवनस्य नियोज्यविशेषाकाङ्क्षायां ब्रह्मबुभूषोर्नियोज्यविशेषस्य रात्रिसत्त्रन्यायेन प्रतिलम्भः । पिण्डपितृयज्ञन्यायेन तु स्वर्गकामस्य नियोज्यस्य कल्पनायामर्थवादस्यासमवेतार्थतयात्यन्तपरोक्षा वृत्तिः स्यादिति । ब्रह्मभावश्चामृतत्वमिति

भामती-व्याख्या

प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप कार्य के प्रतिपादक पद-सन्दर्भ को शास्त्र कहा जाता है एवं कार्यरूप अर्थ में ही शब्दों का संगति-ग्रह होता है—ये दो हेतु भाष्यवाक्य के द्वारा उपपादित हुए हैं—‘‘प्रवृत्तिनिवृत्ति-प्रयोजनत्वात्’’—यहाँ से लेकर ‘‘तत्सामान्याद् वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्यात्’’—यहाँ तक। नियोगरूप कार्य अपने नियोज्य (अधिकारी या अनुष्ठाता) पुरुष के बिना स्वतन्त्र नहीं हो सकता, अतः नियोज्य विशेष का कथन किया जाता है—‘‘सति च विधिपरत्वे।’’ जैसे स्वर्ग-कामनावान् नियोज्य के लिए अग्निहोत्रादि साधन पदार्थों का विधान किया जाता है, वैसे ही अमृतत्व-कामनावान् नियोज्य के लिए ब्रह्म-ज्ञान का विधान अत्यन्त युक्ति-युक्त है। अर्थात् जैसे ‘‘प्रतितिष्ठन्ति ह वैता रात्रीरुपयन्ति’’—इत्यादि अर्थवाद-वाक्य के द्वारा अवगत प्रतिष्ठाकामनावान् व्यक्ति रात्रिसत्र कर्म का नियोज्य माना जाता है, वैसे ही ‘‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’’—इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म-बुभूषु अथवा अमृतत्व-कामनावान् व्यक्ति ब्रह्म-ज्ञान का नियोज्य सिद्ध होता है।

यदि रात्रिसत्र-न्याय को छोड़ कर पिण्डपितृयज्ञन्याय का अवलम्बन किया जाता है, तब ब्रह्म-ज्ञान का स्वर्ग फल मानना होगा [अत्यन्त अश्रुत फल की कल्पना में पिण्डपितृयज्ञ-न्याय या विश्वजिन्त्याय को अपनाया जाता है, इन दोनों न्यायों का पर्यवसान लगभग समान अर्थ में माना जाता है। ‘‘अमावास्यायामपराह्णे पिण्डपितृयज्ञेन चरन्ति’’—इस प्रकार के अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा विहित पिण्डपितृयज्ञ के विषय में सन्देह होता है कि पिण्ड-पितृयज्ञ कर्म क्या दर्शपूर्णमास कर्म का अङ्गभूत कर्म है? अथवा स्वतन्त्र कर्म है? पूर्वपक्षी ने कहा—‘‘य एवं विद्वानमावास्यां यजते’’ इत्यादि वाक्यों के द्वारा निर्णय किया गया है कि ‘अमावास्या’ शब्द अमावास्या तिथि में विहित ‘आग्नेयः’, ‘ऐन्द्रं दधि’ और ‘ऐन्द्रं पयः’ इन तीन कर्मों की संज्ञा है, अतः पिण्डपितृयज्ञ कर्म ‘अमावास्या’ कर्म का अङ्ग है। वहाँ सिद्धान्त-सूत्र है—‘‘पिण्डपितृयज्ञः स्वकालत्वादनाङ्गं स्यात्’’ (जै. सू. ४।४।१९)। अर्थात् ‘‘अमावा-स्यायामपराह्णे’’—इस प्रकार ‘अपराह्न’ शब्द कालविशेष का वाचक है, अतः इस पद के समभिव्याहार में श्रुत ‘अमावास्या’ शब्द भी तिथि विशेष का ही बोधक है, दर्शपूर्णमास-घटक ‘अमावास्या’ नाम के कर्म का नहीं, फलतः पिण्डपितृयज्ञ किसी कर्म का अङ्ग न होकर स्वतन्त्र कर्म है और विश्वजिन्त्याय के आधार पर इस कर्म का स्वर्गरूप फल माना जाता है। प्रकृत में ब्रह्म-ज्ञान के लिए भी यही कहा जा सकता है कि ‘‘सः स्वर्गः स्यात् सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वात्’’

१७

१३० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४

न विधिपरत्वे यथा स्वर्गादिकामस्याग्निहोत्रादिसाधनं विधीयत एवममृतत्वकामस्य ब्रह्मज्ञानं विधीयत इति युक्तम् । नन्विह जिज्ञास्यवैलक्षण्यमुक्तम्—कर्मकाण्डे भव्यो धर्मो जिज्ञास्यः; इह तु भूतं नित्यनिर्वृत्तं ब्रह्म जिज्ञास्यमिति; तत्र धर्मज्ञानफलादनुष्ठानापेक्षाद्विलक्षणं ब्रह्मज्ञानफलं भवितुमर्हति । नार्हत्येवं भवितुम्; कार्यविधिप्रयुक्तस्यैव’

भामती

❖ अमृतत्वकामस्य ❖ । इत्युक्तम् । अमृतत्वं चामृतत्वादेव न कृतकत्वेन शक्यमनित्यमनुमातुम्, आगमविरोधादिति भावः ।

उक्तेन धर्मब्रह्मज्ञानयोर्वैलक्षण्येन विध्यविषयत्वं चोदयति ❖ ननु इति ❖ । परिहरति ❖ नार्हत्येवम् इति ❖ । अत्र चात्मदर्शनं न विधेयम् । तद्धि दृष्टोपलब्धिवचनत्वात् श्रावणं वा स्यात् प्रत्यक्षं

भामती-व्याख्या

(जै. सू. ४।३।१३) अर्थात् ऐसे कर्मों का स्वर्ग फल मानना सर्वाभीष्ट है ]। किन्तु ऐसा मानने पर “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा ब्रह्मभाव या अमृतत्वरूप फल एवं अमृतत्वकामनावान् नियोज्य का प्रतिपादन अत्यन्त असम्बद्ध हो जाता है, अतः रात्रिसत्रन्याय के द्वारा अमृतत्वरूप फल एवं अमृतत्वकामनावान् नियोज्य की कल्पना ही उचिततर है, अन्यथा “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—यह अर्थवाद वाक्य नितान्त निराधार, गौणार्थक एवं अविवक्षितवृत्तिक हो जाता है। यहाँ ब्रह्मभाव ही अमृतत्व है, अत एव भाष्यकार ने कहा है— “अमृतत्वकामस्य ब्रह्मज्ञानं विधीयते।” यहाँ कोई व्यक्ति 'ब्रह्मभावोऽनित्यः, कृतकत्वात्'—इस प्रकार ब्रह्मभाव की अनित्यता का अनुमान न कर सके, इस लिए ब्रह्मभाव का 'अमृतत्व' पद के द्वारा अभिधान किया गया है। 'अमृत' पद के द्वारा उत्पाद और विनाश से रहित वस्तु का अभिधान होता है, ब्रह्मभाव कृतक या उत्पन्न नहीं होता, केवल अभिव्यक्त होता है—“ब्रह्म सन् ब्रह्माप्येति”। इसी प्रकार “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यादि वाक्यों में अनन्तता को ही ब्रह्मभाव कहा गया है।

शङ्का—पूर्व मीमांसा में जिज्ञास्य धर्म और उत्तर मीमांसा में जिज्ञास्य ब्रह्म के ज्ञान का वैलक्षण्य पहले (विगत पृ. ८० पर) कहा गया—अभ्युदयफलं धर्मज्ञानम्, तच्चानुष्ठानापेक्षम्, निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मज्ञानं न चानुष्ठानान्तरापेक्षम्।” अतः धर्म और धर्म-ज्ञान में विधिविषयता होने पर भी ब्रह्म-ज्ञान में विधि-विषयता (विधेयता) नहीं हो सकती [ यद्यपि विगत पृ. ८० पर भाष्यकार ने धर्म और ब्रह्मरूप जिज्ञास्य पदार्थों का वैलक्षण्य कहा है और उनके ज्ञानों का भी, तथापि यहाँ प्रकृत शङ्का की साधनता के रूप में भाष्यकार जिज्ञास्य-वैलक्षण्य का स्मरण करते हैं—“ननु इह जिज्ञास्यवैलक्षण्यमुक्तम्” किन्तु वाचस्पति मिश्र धर्म-ज्ञान और ब्रह्म-ज्ञान के वैलक्षण्य को प्रकृत शङ्का का उपोद्वलक मानते हैं—‘धर्मब्रह्मज्ञानयोर्वैलक्षण्येन विध्यविषयत्वं चोदयति।’ श्री वाचस्पति मिश्र भाष्याक्षर की परिधि के इधर-उधर वहाँ ही पैर रखते हैं, जहाँ कहीं पौर्वापर्यादि का सामञ्जस्य सहज गति से नहीं हो पाता। यहाँ वस्तु-स्थिति यह है कि भाष्यकार ने “तत्र धर्मज्ञानफलाद् विलक्षणं ब्रह्मज्ञानफलं भवितुमर्हति”—इस शङ्का-वाक्य के द्वारा यह प्रतिज्ञा सूचित की है कि 'ब्रह्मज्ञानं धर्मज्ञानफलाद् विलक्षणफलकम्' ऐसी प्रतिज्ञा का साधन जिज्ञास्य-वैलक्षण्य नहीं हो सकता, क्योंकि पक्षधर्मतादि का सामञ्जस्य उसमें नहीं होता, अतः 'ब्रह्मज्ञानं धर्मज्ञानफलाद्विलक्षणफलकम्, धर्मज्ञानाद्विलक्षणत्वात्'—इस प्रकार के सुसंगत प्रयोग का आविष्कार करने के लिए वाचस्पति मिश्र ने साक्षात् ज्ञान-वैलक्षण्य का निर्देश किया और भाष्यकार ने विषय-वैलक्षण्य के द्वारा ज्ञान-वैलक्षण्य ध्वनित किया है ]।

उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३१

ब्रह्मणः प्रतिपाद्यमानत्वात् । 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (बृह० २।४।५) इति । 'य आत्माऽपहतपाप्मा', 'सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः' (छान्दो० ८।७।१), 'आत्मैत्येवोपासीत' (बृ० १।४।७) 'आत्मानमेव लोकमुपासीत' (बृ० १।४।१५) । 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' (मुण्ड० २।२।९) इत्यादिविधानेषु सत्सु 'कोऽसावात्मा, किं तद् ब्रह्म?'

भामती

वा । प्रत्यक्षमपि लौकिकमहंप्रत्ययो वा, भावनाप्रकर्षपर्यन्तजं वा ? तत्र श्रावणं न विधेयं, स्वाध्यायविधिनेवास्य प्राप्तित्वात्, कर्मश्रावणवत् । नापि लौकिकं प्रत्यक्षं, तस्य नैसर्गिकत्वात् । न चौपनिषदात्मविषयं भावनाध्येयवैशद्यं विधेयं, तस्योपासनविधानादेव वाजिनवदनुनिष्पादितत्वात् । तस्मादौपनिषदात्मोपासनाऽमृतत्वकाम नियोज्यं प्रति विधीयते । द्रष्टव्य इत्यादयस्तु विधिसरूपा न विधय इति । तवि-

भामती-व्याख्या

समाधान—एकदेशी आचार्य का कहना है कि "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै. उ. २।१।१) इत्यादि वाक्यों के द्वारा स्वतन्त्र ब्रह्म का प्रतिपादन नहीं किया जाता, अपितु "आत्मैत्येवोपासीत्" (बृह. उ. १।४।७) इत्यादि वेदान्त-वाक्यों के द्वारा विहित उपासना की विषय-वस्तु का प्रस्तुतीकरण किया गया है। यहाँ ज्ञानगत विधेयता के कथन का तात्पर्य उपासना की विधेयता में ही है, क्योंकि "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह. उ. २।४।५) यहाँ आत्मज्ञान दो प्रकार का अभिहित हुआ है—(१) प्रत्यक्षात्मक और (२) श्रावणादिरूप परोक्षज्ञान ! इनमें श्रावण ज्ञान यहाँ विधेय नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी प्राप्ति "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" इस विधि वाक्य से वैसे ही सम्पन्न हो जाती है, जैसे धर्म-ज्ञान की। प्रत्यक्ष ज्ञान दो प्रकार का होता है—(१) लौकिक और (२) अलौकिक (निरन्तरानुचिन्तन-जनित ।) लौकिक प्रत्यक्ष ज्ञान तो निसर्गतः अपनी इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षादि-घटित सामग्री से ही उत्पन्न होने के कारण विधेय नहीं होता। औपनिषद आत्मा की निदिध्यासनात्मक भावना (उपासना) से जनित अलौकिक आत्म-प्रत्यक्ष भी विधेय नहीं होता, क्योंकि आत्मोपासना का विधान कर देने से वैसे ही उस (ब्रह्मात्मप्रत्यक्ष) की अनुनिष्पत्ति हो जाती है, जैसे आमिक्षा बनाने के लिए तप्त दूध में डाले गए दधि से वाजिन अपने-आप निष्पन्न हो जाता है ["तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा"। प्रतप्त दूध में दधि डालने से दूध फट कर दो भागों में विभक्त हो जाता है—(१) पनीर और (२) पानी। जमे हुए (घनीभूत) भाग को पनीर या आमिक्षा कहते हैं और पानी को वाजिन कहा जाता है। वहाँ यह संशय होता है कि दध्यानयन (दधि डालने) का उद्देश्य क्या आमिक्षा है? अथवा वाजिन ? पूर्वपक्ष किया गया है—"एकनिष्पत्तेः सर्वं समं स्यात्" (जै. सू. ४।१।२२) अर्थात् तपते दूध में दही डालने पर आमिक्षा और वाजिन—दोनों की एक साथ निष्पत्ति होती है, अतः समानरूप से दोनों पदार्थ ही दध्यानयन के प्रयोजक होते हैं, किन्तु सिद्धान्त किया गया है—"संसर्गरसनिष्पत्तेरामिक्षा वा प्रधानं स्यात्" (जै. सू. ४।१।२३) अर्थात् "तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा"—इस विधि वाक्य में दधि-संसर्ग से निष्पन्न आमिक्षा का ही निर्देश 'सा वैश्वदेवो आमिक्षा'—इस वाक्य के द्वारा किया गया है, अतः प्रधानभूत आमिक्षा तत्त्व का विधान किया जाता है, वाजिन का नहीं, वह तो स्वयं अनुनिष्पन्न हो जाता है। फलतः यहाँ अमृतत्त्व-कामनावान् नियोज्य पुरुष के प्रति औपनिषद आत्मा की उपासना का विधान किया जाता है। "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" (बृह. उ. २।४।५) इस वाक्य के द्वारा ज्ञान का विधान नहीं किया जाता, क्योंकि यहाँ 'द्रष्टव्यः' पद में 'तव्य' प्रत्यय विध्यर्थक नहीं, केवल उसका अनुकरण विधि के समान प्रतीत होनेवाला विधि-सरूपमात्र है। पूर्व (पृ. १२६ पर)

१३२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

इत्याकाङ्क्षायां तत्स्वरूपसमर्पणेन सर्वे वेदान्ता उपयुक्ताः—‘नित्यः सर्वज्ञः सर्वगतो नित्यतृप्तो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावो विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ इत्येवमादयः तदुपासनाच्च शास्त्रदृष्टोऽदृष्टो मोक्षः फलं भविष्यतीति। कर्तव्यविध्यननुप्रवेशे वस्तुमात्रकथने हानोपादानासंभवात् ‘सप्तद्वीपा वसुमती’, ‘राजासौ गच्छति’ इत्यादिवाक्यवद्वेदान्तवाक्यानामानर्थक्यमेव स्यात्। ननु वस्तुमात्रकथनेऽपि ‘रज्जुरियं नायं सर्पः’ इत्यादौ भ्रान्तिजनितभीतिनिवर्तनेनार्थवत्त्वं दृष्टं, तथेहाप्यसंसार्यात्मवस्तुकथनेन संसारित्वभ्रान्तिनिवर्तनेनार्थवत्त्वं स्यात्। स्यादेतदेवम्, यदि रज्जुस्वरूपश्रवण इव सर्पभ्रान्तिः, संसारित्वभ्रान्तिर्ब्रह्मस्वरूपश्रवणमात्रेण निवर्तेत, नतु निवर्तते; श्रुतब्रह्मणोऽपि यथापूर्वं सुखदुःखादिसंसारिधर्मदर्शनात्, ‘श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’ (बृह० २४।५) इति च श्रवणोत्तरकालयोर्मनननिदिध्यासनयोर्विधिदर्शनात्। तस्मात्प्रतिपत्तिविधिविषयतयैव शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्माभ्युपगन्तव्यमिति।


भामती

यदुक्तम्' ॐ तदुपासनाच्च इति ॐ । अर्थवत्तया मननविप्रतीत्या चेत्यस्य शेषः प्रपञ्चो निगदव्याख्यातः ॥
तदेकदेशिमतं दूषयति ॐ अत्राभिधीयते ॐ । ॐ न ॐ एकदेशिमतम्, कुतः ? ॐ कर्मब्रह्मविद्याफल-


भामती-व्याख्या

कथित संग्रह श्लोक के 'अर्थवत्तया' और 'मननादि प्रतीत्या' इन पदों का विस्तार-भाष्य अत्यन्त सुगम है [अर्थात्—

अर्थवत्तया— पूर्वोक्त उपासना-वाक्यों के द्वारा विहित उपासना के विषयीभूत आत्मा और ब्रह्म के स्वरूप-बोध कराने में “नित्यः सर्वज्ञः सर्वगतो नित्यतृप्तो निरञ्जनः” इत्यादि सभी वेदान्त-वाक्य उपयुक्त होते हैं। इन्हीं वेदान्त-वाक्यों के द्वारा अवबोधित आत्मतत्त्व की उपासना से शास्त्र-प्रतिपादित और लोक में अनधिगत मोक्षरूप फल प्राप्त होता है। कर्त्तव्य-विधि में अननुप्रविष्ट वेदान्त-वाक्यों के द्वारा ब्रह्मरूप सिद्ध वस्तुमात्र के प्रतिपादन से किसी प्रकार की हान या उपादानात्मक प्रवृत्ति नहीं होती, फलतः वेदान्त-वाक्य वैसे ही अनर्थक होकर रह जाते हैं, जैसे—“सप्तद्वीपा वसुमती, राजासौ गच्छति” इत्यादि वाक्य।

यह जो कहा जाता है कि वस्तुमात्र का कथन करने से भी “रज्जुरियं न सर्पः”—इत्यादि स्थल पर सर्प-भ्रान्ति-जनित भय-कम्पादि दुःख की निवृत्ति होती है, दुःख-निवृत्ति भी पुरुषार्थ है। उसी प्रकार प्रकृत में असंसारी आत्म-वस्तु के श्रवण से कर्तृत्व-भोक्तृत्व जन्म-मरणादिरूप संसारित्व-भ्रान्ति निवृत्त हो जाती है और वेदान्त-वाक्यों में अर्थवत्ता (सप्रयोजनता) आ जाती है।

वह कहना तब सत्य हो सकता था, जब कि 'रज्जुरियम्'—इस प्रकार रज्जु-स्वरूप-श्रवण से सर्प-भ्रान्ति-निवृत्ति के समान ब्रह्मस्वरूप श्रवण मात्र से संसारित्व-भ्रान्ति निवृत्त हो जाती, किन्तु ऐसा नहीं, अपितु ब्रह्म-स्वरूप का जिन्होंने श्रवण कर लिया है, उन्हें भी पूर्ववत् सुखित्व-दुःखित्वरूप संसारित्व की भ्रान्ति बनी रहती है।

मननादिप्रतीत्या— “श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (बृह. उ. २।४।५) इस श्रुति में श्रवण के पश्चात् मनन और निदिध्यासन का विधान देखा जाता है। यदि आत्मा के श्रवणमात्र से सर्वानर्थ की निवृत्ति हो जाती, तब श्रवण के पश्चात् मननादि का विधान व्यर्थ था, अतः उपासना-विधि के परिवेश में ही ब्रह्म शास्त्रप्रमाणक सिद्ध होता है]।

एकदेशिमत दूषण— “अत्राभिधीयते” से भाष्यकार एकदेशी आचार्य के मत में

· उपासनाविधिनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३३

अत्राभिधीयते—न; कर्मब्रह्मविद्याफलयोर्वैलक्षण्यात् । शारीरं वाचिकं मानसं च कर्म श्रुतिस्मृतिसिद्धं धर्माख्यं, यद्विषया जिज्ञासा 'अथातो धर्मजिज्ञासा' (जै० सू० १।१।१) इति सूत्रिता ।

अधर्मोऽपि हिंसादिः प्रतिषेधचोदनालक्षणत्वाज्जिज्ञास्यः परिहाराय । तयोश्चोदनालक्षणयोरर्थानर्थयोर्धर्माधर्मयोः फले प्रत्यक्षे सुखदुःखे शरीरवाङ्मनोभिरेवोपभुज्यमाने विषयेन्द्रियसंयोगजन्ये ब्रह्मादिषु स्थावरान्तेषु प्रसिद्धे । मनुष्यत्वादारभ्य ब्रह्मान्तेषु देहवत्सु सुखतारतम्यमनुश्रूयते । ततश्च तद्धेतोर्धर्मस्य तारतम्यं गम्यते । धर्मतारतम्यादधिकारितारतम्यम् । प्रसिद्धं चार्थित्वसामर्थ्यादिकृतमधिकारितारतम्यम् । तथा च यागाद्यनुष्ठायिनामेव विद्यासमाधिविशेषादुत्तरेण पथा गमनं, केवलैरिष्टापूर्तदत्तसाधनैर्धूमादिक्रमेण दक्षिणेन पथा गमनं, तत्रापि सुखतारतम्यं तत्साधनतारतम्यं च शास्त्रात् 'यावत्संपातमुषित्वा' (छान्दो० ५।१०।५) इत्यस्माद् गम्यते । तथा मनुष्यादिषु नारकस्थावरान्तेषु सुखलवश्चोदनालक्षणधर्मसाध्य एवेति गम्यते तारतम्येन वर्तमानः । तथोर्ध्वगतेष्वधोगतेषु च देहवत्सु दुःखतारतम्यदर्शनात्तद्धेतोरधर्मस्य प्रतिषेधचोदना-


भामती

योर्वैलक्षण्यात् ॐ । पुण्यापुण्यकर्मफले सुखदुःखे तत्र मनुष्यलोकमारभ्याब्रह्मलोकात् सुखस्य तारतम्यम् अधिकाधिकोत्कर्षः एवं मनुष्यलोकमारभ्य दुःखतारतम्यमावीचिलोकात्, तच्च सर्वं कार्यं च विनाशि च । आत्यन्तिकं त्वशरीरत्वमनतिशयं स्वभावसिद्धतया नित्यमकार्यमात्मज्ञानस्य फलम् । तद्धि फलमिव फलम् , अविद्यापनयनमात्रेणाविर्भावात् । एतदुक्तं भवति — त्वयाप्युपासनाविधिपरत्वं वेदान्तानामभ्युपगच्छता नित्यशुद्धबुद्धत्वादिपरब्रह्मात्मता जीवस्य स्वाभाविकी वेदान्तगम्याऽऽस्थीयते । सा चोपासनाविषयस्य विधेर्न


भामती-व्याख्या

दोषाभिधान कर रहे हैं कि एकदेशिमत युक्ति-युक्त इस लिए नहीं कि “कर्मब्रह्मविद्याफलयोर्वैलक्षण्यात्।” कर्म-विद्या और ब्रह्म-विद्या के फलों में यह विलक्षणता है कि कर्म या धर्माधर्म के ज्ञान से धर्म और अधर्म का अनुष्ठान होता है, धर्मानुष्ठान से पुण्य और अधर्माचरण से अपुण्य (पाप) उत्पन्न होता है, पुण्य का फल सुख और अपुण्य का फल दुःख है। यह सुख और दुःख सातिशय (तरतमभाव-युक्त) होता है अर्थात् इस मनुष्य लोक से लेकर ब्रह्म-लोक तक उत्तरोत्तर सुख उत्कृष्ट होता है एवं मनुष्य-लोक से लेकर अवीचि लोक तक दुःख अधिकाधिक होता जाता है। [ आगे चल कर ब्र. सू. ३।१।१५ में नरक लोकों की संख्या सात बताई गई है— “अपि च सप्त”। विष्णुपुराण, मार्कण्डेयादि पुराणों एवं मन्वादि स्मृतियों में संख्या अधिक उपलब्ध होती है। योग-भाष्यकार (३।२६) की व्यवस्था प्रसङ्ग के अनुरूप है— “अवीचेः प्रभृति मेरुपृष्ठं यावदित्येष भूर्लोकः, मेरुपृष्ठादारभ्या ध्रुवाद् ग्रहनक्षत्रतारा-विचित्रोऽन्तरिक्षलोकः, तत्परः स्वर्लोकः पञ्चविधो माहेन्द्रस्तृतीयो लोकः, चतुर्थः प्राजापत्यो महर्लोकः, त्रिविधो ब्राह्मः-जनस्तपोलोकः सत्यलोकः। तत्रावीचेरुपर्युपरि निविष्टा षण्महानरकभूमय महाकालाम्बरीषरौरवमहारौरवकालसूत्रान्धतामिस्राः ] वह (कर्म-ज्ञान का) सुखाद्यात्मक समस्त फल उत्पत्ति-विनाशशाली होता है किन्तु आत्म-ज्ञान का अशरीरत्वरूप मोक्षफल आत्यन्तिक (अविनाशी) निरतिशय (तरतमभाव या न्यूनाधिकभाव से रहित) स्वभाव-सिद्ध एवं अविद्या की निवृत्तिमात्र से आविर्भूत होता है। आशय है कि वेदान्त-वाक्यों को उपासना विधिपरक माननेवाले एकदेशी आचार्य को भी जीव में नित्यत्वात्मक ब्रह्मरूपता स्वाभाविकी एवं वेदान्त-गम्य अभीष्ट है। वह ब्रह्मरूपता उपासना-विधि का फल नहीं हो सकती, क्योंकि नित्य है। अविद्या-निवृत्ति को भी उपासना का फल नहीं कह सकते, क्योंकि अविद्या की निवृत्ति तो अविद्या का उदयमात्र हो जाने से सम्पन्न हो जाती है। विद्योदय को भी उपासना-

१३४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

लक्षणस्य तदनुष्ठायिनां च तारतम्यं गम्यते । एवमविद्यादिदोषवतां धर्माधर्मतारतम्य-

भामती फलं, नित्यत्वादकार्यत्वात् । नाप्यनाद्यविद्याविधानापनयः, तस्य स्वविरोधिद्योत्यादेव भावात् । नापि विद्योदयः, तस्यापि श्रवणमननपूर्वकौपासनाजनितसंस्कारसचिवादेव चेतसो भावात् । उपासनासंस्कारव- दुपासनापूर्वमपि चेतःसहकारीति चेत्, दृष्टं च खलु नैयोगिकं फलमैहिकमपि, यथा चित्राकारीर्यादि- नियोगानामनियतनियतफलानाम् । न, गान्धर्वशास्त्रोपासनावासनाया इवापूर्वानपेक्षायाः षड्जादिसाक्षा- त्कारे वेदान्तार्थोपासनावासनाया जीवब्रह्मभावसाक्षात्कारेऽनपेक्षाया एव सामर्थ्यात् । तथा चामृतीभावं प्रत्यहेतुत्वादुपासनापूर्वस्य नामृतत्वकामस्तत्कार्यमवबोद्धुमर्हति, अन्यदिच्छत्यन्यत् करोतीति हि विप्रति- षिद्धम् । न च तत्कामः क्रियामेव कार्यमवगमिष्यति नापूर्वमिति साम्प्रतम्, तस्या मानान्तरादेव-

भामती-व्याख्या

विधि का फल नहीं कह सकते, क्योंकि श्रवण-मननपूर्वक उपासना-जनित संस्कारों से युक्त चित्त के द्वारा ही विद्या का उदय माना जाता है । [ जैसे बाणादिगत बाह्य क्रिया से जनित वेगसंज्ञक संस्कारों में विधि-विषयता नहीं होती, अत एव उन्हें 'नियोग' या 'अपूर्व' पद के द्वारा अभिहित नहीं किया जाता, वैसे ही उपासनादि आन्तरिक (मानस क्रिया) से जनित संस्कार ऐहिक (तात्कालिक) फल के जनक होने के कारण न तो नियोगपदास्पद होते हैं और न विधि के विषय ] ।

शङ्का— उपासना-जनित ऐहिकफलक संस्कार जैसे चित्त के सहकारी होते हैं, वैसे ही उपासना-जनित पारलौकिकफलक नियोगरूप संस्कार भी उपासना-जनित ऐहिकफलक संस्कारों के सहकारी होते हैं, क्योंकि नियोग (अपूर्व) से केवल पारलौकिक फल नहीं, ऐहिक फल भी उत्पन्न होता देखा जाता है, जैसे कि “चित्रया यजेत पशुकामः", "कारीर्या यजेत वृष्टिकामः" इत्यादि वाक्यों के द्वारा विहित कर्मों का फल ऐहिक ही होता है । हाँ, चित्रा याग-साध्य अपूर्व का पशुरूप फल नियमतः ऐहिक नहीं, किन्तु कारीरी याग-साध्य अपूर्व का वृष्टिरूप फल नियमतः ऐहिक ही होता है, क्योंकि "यदि वर्षेत् तावत्येव होतव्यम्, यदि न वर्षेत् श्वोभूते हविर्निर्वपेत्”—इत्यादि प्राकरणिक वाक्यों का सामर्थ्य यह अत्यन्त स्पष्ट कर रहा है कि कारीरी याग केवल ऐहिक (तात्कालिक) वृष्टि के उद्देश्य से ही किया जाता है । फलतः उपासना-जनित संस्कारों के सहायक अपूर्व को लेकर विधि-विषयता का सामञ्जस्य किया जा सकता है ।

समाधान— जीवगत ब्रह्मात्मता के साक्षात्कार को वेदान्तार्थ की उपासना से जनित केवल ऐहिकफलक संस्कार वैसे ही उत्पन्न कर देते हैं, जैसे गान्धर्व शास्त्राभिहित अर्थ की उपासना से जनित संस्कार षड्जादि स्वर-ग्राम के साक्षात्कार को उत्पन्न कर देते हैं । जीवगत ब्रह्मभाव के साक्षात्कार की उत्पत्ति में वेदान्तार्थोपासना-जनित संस्कारों को अपूर्व की अपेक्षा नहीं होती, अतः वेदान्त वाक्यार्थ विधि के विषय क्योकर होंगे ? जब अमृतीभाव (ब्रह्मभाव) के प्रति उपासनापूर्व हेतु ही नहीं, तब अमृतत्व की कामना रखनेवाला व्यक्ति उसको अपना कर्तव्य नहीं मान सकता । अन्यथा 'अन्यदिच्छति अन्यत्करोति' चाहता कुछ और है और करता कुछ और ] यह कहावत लागू होगी । चाहना स्वर्ग और नरक के मार्ग पर चलना अत्यन्त विरुद्धाचरण है ।

अमृतत्व-कामनावान् व्यक्ति केवल “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—इत्यादि वाक्यार्थ की अभ्यास रूप क्रिया को ही अपना कार्य (कर्तव्य) समझेगा—ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि केवल

उपासनाविधिनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३५

निमित्तं शरीरोपादानपूर्वकं सुखदुःखतारतम्यमनित्यं संसाररूपं श्रुतिस्मृतिन्याय-

भामती तत्साधनत्वप्रतीतेर्विधेर्वैयर्थ्यात् । न चावघातादिविधितुल्यता, तत्रापि नियमापूर्वस्यान्यतोऽनवगतेः । न च ब्रह्मभूयादन्यदमृतत्वमार्थवादिकं किञ्चिदस्ति, येन तत्काम उपासनायामधिक्रियेत । विश्वजिन्न्‍यायेन तु स्वर्गकल्पनायां तस्य सातिशयत्वं क्षयित्वं चेति न नित्यफलत्वमुपासनायाः । तस्माद् ब्रह्मभूयस्याविद्यापिधानापनयमात्रेणाविर्भावाद्, अविद्यापनयस्य च वेदान्तार्थज्ञानावगतिपर्यन्तादेव सम्भवाद्, उपासनायाः संस्कारहेतुभावस्य संस्कारस्य च साक्षात्कारोपजनने मनःसाचिव्यस्य च मानान्तरसिद्धत्वात्, आत्मेत्येवोपासीतेति न विधिः, अपि तु विधिसरूपोऽयं, यथौपांशुयाजवाक्ये विष्णुरुपांशु यष्टव्य इत्यादयो विधि-

भामती-व्याख्या वैसे अभ्यास में साक्षात्कार की साधनता लौकिक अन्वय-व्यतिरेकरूप न्याय से ही सम्पन्न हो जाती है, उसके लिए किसी प्रकार के विधि-वाक्य की आवश्यकता नहीं होती। "व्रीहीनवहन्ति"-इत्यादि विधि वाक्य जैसे तुष-विमोकरूप दृष्टफल के उद्देश्य से अवघातादि क्रिया का विधान करते हैं, वैसे ही "आत्मेत्येवोपासीत"-इत्यादि वेदान्त वाक्य ब्रह्मात्मता-साक्षात्कार के लिए केवल आत्मोपासनारूप क्रिया का विधान करते हैं-ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि 'व्रीहीनवहन्ति'-इत्यादि वाक्य केवल अवघातरूप क्रिया का विधान नहीं करते, अपितु अवघातापूर्व का विधान करते हैं [ 'दर्शपूर्णमास' कर्म के प्रकरण में पठित "व्रीहीनवहन्ति"-यह वाक्य केवल तुष-विमोकरूप (धान की भूसी उतारने के लिए) अवघात ओखली में मूसल से कूटने) का विधान नहीं कर सकता, क्योंकि लोक-प्रसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक के आधार पर ही तुष-निवृत्ति के लिए नख-विदलन, पाषाण-घर्षणादि के समान अवघात भी निसर्गतः प्राप्त है, अतः अवघात-विधि को नियमार्थक माना गया है-"नियमाथवा पुनः श्रुतिः" (जै. सू. ४।२।२४) अर्थात् अवघात को छोड़ कर नख-विदलनादि के द्वारा तुष-निवृत्ति करने पर तण्डुल-निष्पत्तिरूप दृष्ट फल का लाभ तो हो जायगा, किन्तु दर्शपूर्णमास-जन्य परमापूर्व या उसके जनकीभूत उत्पत्त्यपूर्व की सम्पत्ति नहीं होगी, उसकी सम्पत्ति तभी होगी, जब कि नियमतः अवघात का अनुष्ठान किया जाय, फलतः 'व्रीहीनवहन्ति'-इस वाक्य के द्वारा अवघातनियम-जन्य नियमापूर्व का अवबोधन किया जाता है]। "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" (मुण्ड. ३।२।९) इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मभाव अमृतत्व से भिन्न नहीं, यदि अमृतत्व से ब्रह्मभाव भिन्न होता, तब अवश्य उसकी कामना रखनेवाला व्यक्ति ब्रह्मोपासना का अधिकारी बन जाता। 'विश्वजित्' न्याय (जै. सू. ४।३।७) के आधार पर ब्रह्मोपासना का यदि स्वर्ग फल मान कर स्वर्गकामानावान् व्यक्ति को अधिकारी माना जाता है, तब स्वर्गरूप फल के सातिशय और नश्वर होने के कारण ब्रह्मोपासना में अनित्य-फलकत्वापत्ति होती है और "न स पुनरावर्तते" (छां. ८।१५।१) इत्यादि श्रुतियों का विरोध उपस्थित होता है। अतः जीव में ब्रह्मभाव का अविद्या की निवृत्तिमात्र से आविर्भाव माना जाता है। अविद्या की निवृत्ति तो वेदान्ताभिहित अर्थ के साक्षात्कारात्मक ज्ञान से ही हो जाती है, उसके लिए उपासना की आवश्यकता ही नहीं। उपासना में संस्कार-जनकता और मन के द्वारा साक्षात्काररूप फल की उत्पत्ति के लिए संस्कार मन के सहायक होते हैं-यह ज्ञान लौकिक अन्वय-व्यतिरेक से ही हो जाता है, उसके लिए उपासना-विधि की आवश्यकता नहीं, फलतः "आत्मेत्येवोपासीत" (बृह. उ. १।४।७) यह वाक्य विधिरूप नहीं, केवल वैसे ही विधि का अनुकरणमात्र है, जैसे- उपांशुयाग के प्रकरण में "विष्णुरुपांशु यष्टव्यः" इत्यादि वाक्य ।

१३६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

सिद्धम् । तथा च श्रुतिः--'न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति' (छान्दो० ८।१२।१) इति यथावर्णितं संसाररूपमनुवदति । 'अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः' (छान्दो० ८।१२।१) इति प्रियाप्रियस्पर्शनप्रतिषेधाच्चोदनालक्षण-धर्मकार्यत्वं मोक्षाख्यस्याशरीरत्वस्य प्रतिषिध्यत इति गम्यते । धर्मकार्यत्वे हि प्रियाप्रियस्पर्शनप्रतिषेधो नोपपद्यते । अशरीरत्वमेव धर्मकार्यमिति चेन्न; तस्य स्वाभाविकत्वात् । 'अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति' (काठ० १।२।२१) 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' (मुण्ड० २।१।२) 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः' (बृह० ४।३।१५) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अत एवानुष्ठेयकर्मफलविलक्षणं मोक्षाख्यमशरीरत्वं नित्यमिति सिद्धम् । तत्र किञ्चित्परिणामिनित्यं यस्मिन्विक्रिय-माणेऽपि तदेवेदमिति बुद्धिर्न विहन्यते, यथा पृथिव्यादिजगन्नित्यत्ववादिनाम् । यथा च सांख्यानां गुणाः, इदं तु पारमार्थिकं, कूटस्थनित्यं, व्योमवत्सर्वव्यापि, सर्वविक्रि-

भामती

सरूपा न विधय इति तात्पर्यार्थः । श्रुतिस्मृतिन्यायसिद्धमित्युक्तं, तत्र श्रुतिं दर्शयति ॐ तथा च श्रुतिः इति ॐ । न्यायमाह ॐ अत एव इति ॐ । यत् किल स्वाभाविकं तन्नित्यं, यथा चैतन्यं, स्वाभाविकं चेदं, तस्मान्नित्यम् । परे हि द्वयीं नित्यतानाहुः- कूटस्थनित्यतां परिणामिनित्यतां च, तत्र नित्यमित्युक्ते मा भूदस्य परिणामिनित्यतेत्यत आह ॐ तत्र किञ्चिद् इति ॐ । परिणामिनित्यता हि न पारमार्थिकी । तथा हि- तत्सर्वात्मना वा परिणमेदेकदेशेन वा ? सर्वात्मना परिणामे कथं न तत्त्वव्याहतिः ? एकदेश-

भामती-व्याख्या

विष्णुरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्या-वजामित्वाय'' (तै. सं. २।६।६) इस वाक्य को लेकर जै. सू. २।१।४ में पूर्वपक्ष किया गया है कि विष्णुवादि तीन वाक्यों के द्वारा विहित तीन कर्मों का अनुवादक प्रथम वाक्य है। उसका निराकरण करते हुए सिद्धान्ती ने कहा है कि उपक्रम और उपसंहार को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि निरन्तर पुरोडाशद्रव्यक दो कर्मों का अनुष्ठान करने पर आलस्य या उकताहट होती है, अतः उन कर्मों के मध्य में घृतादि विजातीय द्रव्यवाले कर्म का विधान अपेक्षित है, अतः 'उपांशुयाजमन्तरा यजति'—यह वाक्य उपांशुयाज का विधायक है और विष्णुवादि वाक्य विधायक नहीं, अपितु अर्थवादमात्र हैं, केवल विधि के सरूप हैं, विधि नहीं] ।

भाष्यकार ने जो धर्माधर्म के फलभूत सुख-दुःख में तारतम्य (न्यूनाधिकभाव) दिखाते हुए कहा है—"एवमविद्याऽदिदोषवतां धर्माधर्मतारतम्यनिमित्तं शरीरोपादानपूर्वकं सुखदुःखतारतम्यमनित्यं संसाररूपं श्रुतिस्मृतिन्यायसिद्धम्।" वहाँ प्रक्रान्त श्रुति का निदर्शन प्रस्तुत किया गया है—"तथा च श्रुतिः—'न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति' (छां. ८।१२।१)। अर्थात् धर्म और अधर्म के फलोपभोग में आत्मा को शरीराभिमान बना रहता है और जब तक शरीराभिमान है, तब तक प्रिय (सुख) एवं अप्रिय (दुःख) की अपहति (निवृत्ति) नहीं हो सकती । कथित न्याय-सिद्धता दिखाने के लिए न्याय दिखाया गया है—"अत एवानुष्ठेयकर्मफलविलक्षणं मोक्षाख्यमशरीरत्वं नित्यमिति सिद्धम्।" उक्त 'न्याय' पद से अनुमान विवक्षित है, अनुमान के वेदान्त-सिद्धान्त में उदाहरण, उपनय और निगमन अथवा प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण नाम के तीन अवयव माने जाते हैं, उसके अनुरूप न्याय का पूर्ण कलेवर इस प्रकार कहा जाता है—'यत् स्वाभाविकं, तन्नित्यं, यथा चैतन्यम् । स्वाभाविकं चेदम् । तस्मान्नितम् ।' इसी तथ्य को प्रतिज्ञादिरूप में इस प्रकार कह सकते हैं—'अशरीरत्वात्मकं मोक्षफलं नित्यम्, स्वाभाविकत्वाद्, यत्स्वाभाविकं तन्नित्यं यथा जीवस्य

कूटस्थनित्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३७

भामती परिणामे वा स एकदेशस्ततो भिन्नो वाऽभिन्नो वा ? भिन्नश्चेत् कथं तस्य परिणामः ? न ह्यन्यस्मिन् परिणममानेऽन्यः परिणमतेऽतिप्रसङ्गात् । अभेदे वा कथं न सर्वात्मना परिणामः ? भिन्नाभिन्नं तदिति चेत्, तथा हि तदेव कारणात्मनाऽभिन्नं भिन्नं च कार्यात्मना कटकादय इवाभिन्ना हाटकात्मना भिन्नाश्च कटकाद्यात्मना । न च भेदाभेदयोर्विरोधान्नैकत्र समावेश इति युक्तम्, विरुद्धमिति नः क्व संप्रत्ययः ? यत्प्रमाणविपर्ययेण वर्त्तते । यत्तु यथा प्रमाणेनावगम्यते तस्य तथा भाव एव । कुण्डलमिदं सुवर्णमिति सामानाधिकरण्यप्रत्यये व्यक्तं भेदाभेदौ चकास्तः । तथा ह्यात्यन्तिकेऽभेदेऽन्यतरस्य द्विरवभासप्रसङ्गः । भेदे चात्यन्तिके न सामानाधिकरण्यं, गवाश्ववत् । आधाराधेयभावे एकाश्रयत्वे वा न सामानाधिकरण्यं

भामती-व्याख्या चैतन्यम् ।' 'सांख्यादिमतवाद के अनुसार दो प्रकार की नित्यता मानी जाती है—(१) कूटस्थ-नित्यता और (२) परिणामिनित्यता । ब्रह्माभावरूप मोक्ष में परिणामिनित्यता की भ्रांति हटाने के लिए नित्यता के दो भेद प्रदर्शित किए गए हैं—"तत्र किंचित्परिणामिनित्यमित्यादि ।" जो वस्तु परिणत ( विकृत ) होने पर भी अपने मौलिक रूप में प्रत्यभिज्ञात होती रहती है, उसे परिणामिनित्य कहते हैं, जैसे स्वर्ण-मृदादि पदार्थ कटक-घटादिरूप में परिणत होकर भी अपनी तात्त्विक स्वर्णरूपता मृद्रूपता को कभी नहीं गँवाते, अतः परिणामिनित्य कहे जाते हैं। परिणामिनित्यता कभी पारमार्थिकी नहीं होती, क्योंकि परिणमनशील वस्तु क्या पूर्णरूपेण परिणत होती है ? अथवा एकदेशेन ? पूर्णरूपेण परिणत होने पर तात्त्विक व्याहृति (विनाश) क्यों नहीं होता ? एकदेशेन परिणत होने पर वह एकदेश उस वस्तु से भिन्न माना जाता है ? अथवा अभिन्न ? यदि भिन्न है, तब उस अपने से भिन्न एक देश के परिणत होने पर वह वस्तु क्योंकर परिणत मानी जायगी ? क्योंकि अन्य ( भिन्न ) वस्तु के परिणत होने पर अन्य वस्तु में 'परिणमते'—ऐसा व्यवहार कभी नहीं होता । अन्यथा एक स्वर्ण-पिण्ड के परिणत होने पर 'विश्वं परिणमते'—ऐसा व्यवहार अतिप्रसक्त होगा । यदि वह ( परिणममान ) एकदेश उस वस्तु से अभिन्न है, तब उस एकदेश के परिणत होने पर उससे अभिन्न वस्तु का सर्वात्मना परिणाम क्यों नहीं माना जाता ?

शङ्का—वस्तु का परिणममान अवयव वस्तु से भिन्न भी है और अभिन्न भी, क्योंकि एक ही सुवर्णरूप कारण के कटक-कुण्डलादि कार्य परस्पर कार्यरूपेण ( कटकत्वादिरूपेण ) भिन्न और कारणगत सुवर्णत्वरूपेण अभिन्न । 'कटकं कुण्डलाद् भिन्नमभिन्नं च'—ऐसी प्रतीति को विरुद्ध भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्रमाण से बाधित पदार्थ को विरुद्ध कहा जाता है, किन्तु जैसे एक ही कुण्डल में 'कुण्डलमिदं' और 'सुवर्णमिदम्'—इस प्रकार दोनों प्रतीतियाँ प्रामाणिक मानी जाती हैं, वैसे ही कटक में भी 'कटकमिदम्' और 'सुवर्णमिदम्'—इस प्रकार दोनों प्रतीतियाँ अनुभव-सिद्ध हैं, फलतः कटक और कुण्डल—दोनों सुवर्णरूप होने से अभिन्न और कटकत्वादिरूपेण भिन्न हैं— ऐसा मानना प्रमाण-बाधित नहीं, अपितु प्रमाण के अनुरूप ही है, तब इसे विरुद्ध क्योंकर कहा जा सकता है ? जिन पदार्थों में भेद और अभेद—दोनों प्रमाण-सिद्ध हैं, उन्हें भिन्नाभिन्न कहना विरुद्ध कदापि नहीं ।

कटक और कुण्डल का ऐकान्तिक अभेद मानने पर 'इमे कटककुण्डले'—ऐसी प्रतीति न होकर 'इमे कटके या इमे कुण्डले'—इस प्रकार एक-एक कार्य का दो बार भान होना चाहिए । इसी प्रकार दोनों का ऐकान्तिक भेद मानने पर जैसे कटक को कुण्डल नहीं कहा जाता, वैसे कटक को सुवर्ण भी नहीं कह सकते, अतः 'कटकं सुवर्णम्'—इस प्रकार का सामानाधिकरण्य-व्यपदेश न हो सकेगा, क्योंकि अत्यन्त भिन्न गौ और अश्व का कहीं भी 'गौरश्वः'—इस प्रकार का सामानाधिकरण्य-व्यवहार कभी नहीं होता । यद्यपि अपर्याय शब्दों

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१३८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

भामती

न हि भवति कुण्डं बदरमिति। नाप्येकासनस्थयोश्चैत्रमैत्रयोश्चैत्रो मैत्र इति। सोऽयमबाधितोऽसन्दिग्धः सर्वजनीनः सामानाधिकरण्यप्रत्यय एव कार्यकारणयोर्भेदाभेदौ व्यवस्थापयति। तथा च कार्याणां कारणात्मकत्वात् कारणस्य च सद्रूपस्य सर्वत्रानुगमात् सद्रूपेणाभेदः कार्यस्य जगतो भेदः कार्यरूपेण गोघटादिनेति। यथाहुः—

कार्यरूपेण नानात्वमभेदः कारणात्मना।
हेमात्मना यथाऽभेदः कुण्डलाद्यात्मना भिदा॥ इति।

अत्रोच्यते—कः पुनरयं भेदो नाम, यः सहाभेदेनेकत्र भवेत्। परस्पराभाव इति चेत्, किमयं कार्यकारणयोः कटकहाटकयोरस्ति न वा। न चेदेकत्वमेवास्ति न च भेदः। अस्ति चेद् भेद एव नाभेदः। न च भावाभावयोर्विरोधः, सहावस्थानासम्भवात्। सम्भवे वा कटकवर्धमानकयोरपि तत्त्वेनाभेदप्रसङ्गः, भेदस्याभेदाविरोधात्। अपि च कटकस्य हाटकादभेदे यथा हाटकात्मना कटकमुकुटकुण्डलादयो न भिद्यन्ते


भामती-व्याख्या

का एक ही अर्थ में वाच्यत्वेन प्रवृत्त होना सामानाधिकरण्य कहलाता है, वह भेदाभेद-पक्ष में ही बनता है—ऐसा नहीं, अपितु आधाराधेयभाव और एकाश्रयवृत्तिता को लेकर भी देखा जाता है, जैसे 'मृद् घटः'—यहाँ पर मृत्तिका आधार और घट आधेय है, एवं 'एकं रूपम्'—यहाँ 'एकत्व' संख्या और 'रूप'—दोनों पदार्थ एक ही घटादि आश्रय में रहते हैं, अतः उनका भी सामानाधिकरण्य-व्यवहार देखा जाता है। तथापि वह काचित्क है, सार्वत्रिक नहीं, अन्यथा कुण्डाद्यात्मक आधार और बदराद्यात्मक आधेय का भी 'कुण्डं बदरम्'—ऐसा व्यवहार होना चाहिए। इसी प्रकार एक ही आसन पर बैठे हुए चैत्र और मैत्र का भी 'चैत्रो-मैत्रः'—इस प्रकार सामानाधिकरण्य-प्रत्यय होना चाहिए। परिशेषतः सभी सुवर्णादि कारणपदार्थों और कटकादि कार्य पदार्थों का सार्वत्रिक और सर्वजनीन अबाधित सामानाधिकरण्य-व्यवहार कार्य और कारण में भेदाभेद सम्बन्ध का व्यवस्थापक होता है। फलतः सभी गो-घटादि कार्य पदार्थों में अनुगतरूप से प्रतीत होनेवाले सद्रूप कारण का अपने कार्य-वर्ग के साथ भेदाभेद मानना आवश्यक है, जैसा कि अनेकान्तवादियों ने कहा है—

कार्यरूपेण नानात्वमभेदः कारणात्मना।
हेमात्मना यथाऽभेदः कुण्डलाद्यात्मना भिदा॥

[ इस पद्य में 'भिदा' पद का अर्थ भेद है। सुवर्ण और कुण्डलादि का 'सुवर्णं कुण्डलम्' और 'सुवर्णस्य कुण्डलम्'—इस प्रकार के दोनों व्यवहारों का भेदाभेद सम्बन्ध के द्वारा निर्वाह हो जाता है ]।

समाधान—वह भेद पदार्थ कौन है जो कि अभेद के साथ एक आधार में रह जाता है? यदि वह अन्योऽन्याभावात्मक है, तब जिज्ञासा होती है कि वह (अन्योऽन्याभाव) सुवर्ण और कटकादिरूप कारण और कार्य पदार्थों में रहता है? अथवा नहीं? यदि नहीं रहता, तब कार्य और कारण का आत्यन्तिक अभेद ही स्थिर होता है, भेद नहीं। कार्य और कारण पदार्थों में यदि अन्योऽन्याभाव रहता है, तब उनमें भेद ही पर्यवसित होता है, अभेद नहीं। 'भेदाभेद या भावाभाव का विरोध नहीं—ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दो विरोधी पदार्थों का सहावस्थान (एकत्र रहना) सम्भव नहीं। यदि सम्भव माना जाता है, तब कटक, कुण्डल और वर्धमानक (प्याला) आदि कार्य पदार्थों का आत्यन्तिक अभेद होना चाहिए, क्योंकि भेद अत्र अभेद का विरोधी होता है। दूसरी बात यह भी है कि कटक जिस सुवर्ण से अभिन्न है, उसी सुवर्ण से मुकुट और कुण्डलादि अभिन्न हैं, अतः कटक, मुकुट और कुण्डलादि का