भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१३० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४

न विधिपरत्वे यथा स्वर्गादिकामस्याग्निहोत्रादिसाधनं विधीयत एवममृतत्वकामस्य ब्रह्मज्ञानं विधीयत इति युक्तम् । नन्विह जिज्ञास्यवैलक्षण्यमुक्तम्—कर्मकाण्डे भव्यो धर्मो जिज्ञास्यः; इह तु भूतं नित्यनिर्वृत्तं ब्रह्म जिज्ञास्यमिति; तत्र धर्मज्ञानफलादनुष्ठानापेक्षाद्विलक्षणं ब्रह्मज्ञानफलं भवितुमर्हति । नार्हत्येवं भवितुम्; कार्यविधिप्रयुक्तस्यैव’

भामती

❖ अमृतत्वकामस्य ❖ । इत्युक्तम् । अमृतत्वं चामृतत्वादेव न कृतकत्वेन शक्यमनित्यमनुमातुम्, आगमविरोधादिति भावः ।

उक्तेन धर्मब्रह्मज्ञानयोर्वैलक्षण्येन विध्यविषयत्वं चोदयति ❖ ननु इति ❖ । परिहरति ❖ नार्हत्येवम् इति ❖ । अत्र चात्मदर्शनं न विधेयम् । तद्धि दृष्टोपलब्धिवचनत्वात् श्रावणं वा स्यात् प्रत्यक्षं

भामती-व्याख्या

(जै. सू. ४।३।१३) अर्थात् ऐसे कर्मों का स्वर्ग फल मानना सर्वाभीष्ट है ]। किन्तु ऐसा मानने पर “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा ब्रह्मभाव या अमृतत्वरूप फल एवं अमृतत्वकामनावान् नियोज्य का प्रतिपादन अत्यन्त असम्बद्ध हो जाता है, अतः रात्रिसत्रन्याय के द्वारा अमृतत्वरूप फल एवं अमृतत्वकामनावान् नियोज्य की कल्पना ही उचिततर है, अन्यथा “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—यह अर्थवाद वाक्य नितान्त निराधार, गौणार्थक एवं अविवक्षितवृत्तिक हो जाता है। यहाँ ब्रह्मभाव ही अमृतत्व है, अत एव भाष्यकार ने कहा है— “अमृतत्वकामस्य ब्रह्मज्ञानं विधीयते।” यहाँ कोई व्यक्ति 'ब्रह्मभावोऽनित्यः, कृतकत्वात्'—इस प्रकार ब्रह्मभाव की अनित्यता का अनुमान न कर सके, इस लिए ब्रह्मभाव का 'अमृतत्व' पद के द्वारा अभिधान किया गया है। 'अमृत' पद के द्वारा उत्पाद और विनाश से रहित वस्तु का अभिधान होता है, ब्रह्मभाव कृतक या उत्पन्न नहीं होता, केवल अभिव्यक्त होता है—“ब्रह्म सन् ब्रह्माप्येति”। इसी प्रकार “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यादि वाक्यों में अनन्तता को ही ब्रह्मभाव कहा गया है।

शङ्का—पूर्व मीमांसा में जिज्ञास्य धर्म और उत्तर मीमांसा में जिज्ञास्य ब्रह्म के ज्ञान का वैलक्षण्य पहले (विगत पृ. ८० पर) कहा गया—अभ्युदयफलं धर्मज्ञानम्, तच्चानुष्ठानापेक्षम्, निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मज्ञानं न चानुष्ठानान्तरापेक्षम्।” अतः धर्म और धर्म-ज्ञान में विधिविषयता होने पर भी ब्रह्म-ज्ञान में विधि-विषयता (विधेयता) नहीं हो सकती [ यद्यपि विगत पृ. ८० पर भाष्यकार ने धर्म और ब्रह्मरूप जिज्ञास्य पदार्थों का वैलक्षण्य कहा है और उनके ज्ञानों का भी, तथापि यहाँ प्रकृत शङ्का की साधनता के रूप में भाष्यकार जिज्ञास्य-वैलक्षण्य का स्मरण करते हैं—“ननु इह जिज्ञास्यवैलक्षण्यमुक्तम्” किन्तु वाचस्पति मिश्र धर्म-ज्ञान और ब्रह्म-ज्ञान के वैलक्षण्य को प्रकृत शङ्का का उपोद्वलक मानते हैं—‘धर्मब्रह्मज्ञानयोर्वैलक्षण्येन विध्यविषयत्वं चोदयति।’ श्री वाचस्पति मिश्र भाष्याक्षर की परिधि के इधर-उधर वहाँ ही पैर रखते हैं, जहाँ कहीं पौर्वापर्यादि का सामञ्जस्य सहज गति से नहीं हो पाता। यहाँ वस्तु-स्थिति यह है कि भाष्यकार ने “तत्र धर्मज्ञानफलाद् विलक्षणं ब्रह्मज्ञानफलं भवितुमर्हति”—इस शङ्का-वाक्य के द्वारा यह प्रतिज्ञा सूचित की है कि 'ब्रह्मज्ञानं धर्मज्ञानफलाद् विलक्षणफलकम्' ऐसी प्रतिज्ञा का साधन जिज्ञास्य-वैलक्षण्य नहीं हो सकता, क्योंकि पक्षधर्मतादि का सामञ्जस्य उसमें नहीं होता, अतः 'ब्रह्मज्ञानं धर्मज्ञानफलाद्विलक्षणफलकम्, धर्मज्ञानाद्विलक्षणत्वात्'—इस प्रकार के सुसंगत प्रयोग का आविष्कार करने के लिए वाचस्पति मिश्र ने साक्षात् ज्ञान-वैलक्षण्य का निर्देश किया और भाष्यकार ने विषय-वैलक्षण्य के द्वारा ज्ञान-वैलक्षण्य ध्वनित किया है ]।