भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३१

ब्रह्मणः प्रतिपाद्यमानत्वात् । 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (बृह० २।४।५) इति । 'य आत्माऽपहतपाप्मा', 'सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः' (छान्दो० ८।७।१), 'आत्मैत्येवोपासीत' (बृ० १।४।७) 'आत्मानमेव लोकमुपासीत' (बृ० १।४।१५) । 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' (मुण्ड० २।२।९) इत्यादिविधानेषु सत्सु 'कोऽसावात्मा, किं तद् ब्रह्म?'

भामती

वा । प्रत्यक्षमपि लौकिकमहंप्रत्ययो वा, भावनाप्रकर्षपर्यन्तजं वा ? तत्र श्रावणं न विधेयं, स्वाध्यायविधिनेवास्य प्राप्तित्वात्, कर्मश्रावणवत् । नापि लौकिकं प्रत्यक्षं, तस्य नैसर्गिकत्वात् । न चौपनिषदात्मविषयं भावनाध्येयवैशद्यं विधेयं, तस्योपासनविधानादेव वाजिनवदनुनिष्पादितत्वात् । तस्मादौपनिषदात्मोपासनाऽमृतत्वकाम नियोज्यं प्रति विधीयते । द्रष्टव्य इत्यादयस्तु विधिसरूपा न विधय इति । तवि-

भामती-व्याख्या

समाधान—एकदेशी आचार्य का कहना है कि "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै. उ. २।१।१) इत्यादि वाक्यों के द्वारा स्वतन्त्र ब्रह्म का प्रतिपादन नहीं किया जाता, अपितु "आत्मैत्येवोपासीत्" (बृह. उ. १।४।७) इत्यादि वेदान्त-वाक्यों के द्वारा विहित उपासना की विषय-वस्तु का प्रस्तुतीकरण किया गया है। यहाँ ज्ञानगत विधेयता के कथन का तात्पर्य उपासना की विधेयता में ही है, क्योंकि "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह. उ. २।४।५) यहाँ आत्मज्ञान दो प्रकार का अभिहित हुआ है—(१) प्रत्यक्षात्मक और (२) श्रावणादिरूप परोक्षज्ञान ! इनमें श्रावण ज्ञान यहाँ विधेय नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी प्राप्ति "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" इस विधि वाक्य से वैसे ही सम्पन्न हो जाती है, जैसे धर्म-ज्ञान की। प्रत्यक्ष ज्ञान दो प्रकार का होता है—(१) लौकिक और (२) अलौकिक (निरन्तरानुचिन्तन-जनित ।) लौकिक प्रत्यक्ष ज्ञान तो निसर्गतः अपनी इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षादि-घटित सामग्री से ही उत्पन्न होने के कारण विधेय नहीं होता। औपनिषद आत्मा की निदिध्यासनात्मक भावना (उपासना) से जनित अलौकिक आत्म-प्रत्यक्ष भी विधेय नहीं होता, क्योंकि आत्मोपासना का विधान कर देने से वैसे ही उस (ब्रह्मात्मप्रत्यक्ष) की अनुनिष्पत्ति हो जाती है, जैसे आमिक्षा बनाने के लिए तप्त दूध में डाले गए दधि से वाजिन अपने-आप निष्पन्न हो जाता है ["तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा"। प्रतप्त दूध में दधि डालने से दूध फट कर दो भागों में विभक्त हो जाता है—(१) पनीर और (२) पानी। जमे हुए (घनीभूत) भाग को पनीर या आमिक्षा कहते हैं और पानी को वाजिन कहा जाता है। वहाँ यह संशय होता है कि दध्यानयन (दधि डालने) का उद्देश्य क्या आमिक्षा है? अथवा वाजिन ? पूर्वपक्ष किया गया है—"एकनिष्पत्तेः सर्वं समं स्यात्" (जै. सू. ४।१।२२) अर्थात् तपते दूध में दही डालने पर आमिक्षा और वाजिन—दोनों की एक साथ निष्पत्ति होती है, अतः समानरूप से दोनों पदार्थ ही दध्यानयन के प्रयोजक होते हैं, किन्तु सिद्धान्त किया गया है—"संसर्गरसनिष्पत्तेरामिक्षा वा प्रधानं स्यात्" (जै. सू. ४।१।२३) अर्थात् "तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा"—इस विधि वाक्य में दधि-संसर्ग से निष्पन्न आमिक्षा का ही निर्देश 'सा वैश्वदेवो आमिक्षा'—इस वाक्य के द्वारा किया गया है, अतः प्रधानभूत आमिक्षा तत्त्व का विधान किया जाता है, वाजिन का नहीं, वह तो स्वयं अनुनिष्पन्न हो जाता है। फलतः यहाँ अमृतत्त्व-कामनावान् नियोज्य पुरुष के प्रति औपनिषद आत्मा की उपासना का विधान किया जाता है। "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" (बृह. उ. २।४।५) इस वाक्य के द्वारा ज्ञान का विधान नहीं किया जाता, क्योंकि यहाँ 'द्रष्टव्यः' पद में 'तव्य' प्रत्यय विध्यर्थक नहीं, केवल उसका अनुकरण विधि के समान प्रतीत होनेवाला विधि-सरूपमात्र है। पूर्व (पृ. १२६ पर)