भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१३२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

इत्याकाङ्क्षायां तत्स्वरूपसमर्पणेन सर्वे वेदान्ता उपयुक्ताः—‘नित्यः सर्वज्ञः सर्वगतो नित्यतृप्तो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावो विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ इत्येवमादयः तदुपासनाच्च शास्त्रदृष्टोऽदृष्टो मोक्षः फलं भविष्यतीति। कर्तव्यविध्यननुप्रवेशे वस्तुमात्रकथने हानोपादानासंभवात् ‘सप्तद्वीपा वसुमती’, ‘राजासौ गच्छति’ इत्यादिवाक्यवद्वेदान्तवाक्यानामानर्थक्यमेव स्यात्। ननु वस्तुमात्रकथनेऽपि ‘रज्जुरियं नायं सर्पः’ इत्यादौ भ्रान्तिजनितभीतिनिवर्तनेनार्थवत्त्वं दृष्टं, तथेहाप्यसंसार्यात्मवस्तुकथनेन संसारित्वभ्रान्तिनिवर्तनेनार्थवत्त्वं स्यात्। स्यादेतदेवम्, यदि रज्जुस्वरूपश्रवण इव सर्पभ्रान्तिः, संसारित्वभ्रान्तिर्ब्रह्मस्वरूपश्रवणमात्रेण निवर्तेत, नतु निवर्तते; श्रुतब्रह्मणोऽपि यथापूर्वं सुखदुःखादिसंसारिधर्मदर्शनात्, ‘श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’ (बृह० २४।५) इति च श्रवणोत्तरकालयोर्मनननिदिध्यासनयोर्विधिदर्शनात्। तस्मात्प्रतिपत्तिविधिविषयतयैव शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्माभ्युपगन्तव्यमिति।


भामती

यदुक्तम्' ॐ तदुपासनाच्च इति ॐ । अर्थवत्तया मननविप्रतीत्या चेत्यस्य शेषः प्रपञ्चो निगदव्याख्यातः ॥
तदेकदेशिमतं दूषयति ॐ अत्राभिधीयते ॐ । ॐ न ॐ एकदेशिमतम्, कुतः ? ॐ कर्मब्रह्मविद्याफल-


भामती-व्याख्या

कथित संग्रह श्लोक के 'अर्थवत्तया' और 'मननादि प्रतीत्या' इन पदों का विस्तार-भाष्य अत्यन्त सुगम है [अर्थात्—

अर्थवत्तया— पूर्वोक्त उपासना-वाक्यों के द्वारा विहित उपासना के विषयीभूत आत्मा और ब्रह्म के स्वरूप-बोध कराने में “नित्यः सर्वज्ञः सर्वगतो नित्यतृप्तो निरञ्जनः” इत्यादि सभी वेदान्त-वाक्य उपयुक्त होते हैं। इन्हीं वेदान्त-वाक्यों के द्वारा अवबोधित आत्मतत्त्व की उपासना से शास्त्र-प्रतिपादित और लोक में अनधिगत मोक्षरूप फल प्राप्त होता है। कर्त्तव्य-विधि में अननुप्रविष्ट वेदान्त-वाक्यों के द्वारा ब्रह्मरूप सिद्ध वस्तुमात्र के प्रतिपादन से किसी प्रकार की हान या उपादानात्मक प्रवृत्ति नहीं होती, फलतः वेदान्त-वाक्य वैसे ही अनर्थक होकर रह जाते हैं, जैसे—“सप्तद्वीपा वसुमती, राजासौ गच्छति” इत्यादि वाक्य।

यह जो कहा जाता है कि वस्तुमात्र का कथन करने से भी “रज्जुरियं न सर्पः”—इत्यादि स्थल पर सर्प-भ्रान्ति-जनित भय-कम्पादि दुःख की निवृत्ति होती है, दुःख-निवृत्ति भी पुरुषार्थ है। उसी प्रकार प्रकृत में असंसारी आत्म-वस्तु के श्रवण से कर्तृत्व-भोक्तृत्व जन्म-मरणादिरूप संसारित्व-भ्रान्ति निवृत्त हो जाती है और वेदान्त-वाक्यों में अर्थवत्ता (सप्रयोजनता) आ जाती है।

वह कहना तब सत्य हो सकता था, जब कि 'रज्जुरियम्'—इस प्रकार रज्जु-स्वरूप-श्रवण से सर्प-भ्रान्ति-निवृत्ति के समान ब्रह्मस्वरूप श्रवण मात्र से संसारित्व-भ्रान्ति निवृत्त हो जाती, किन्तु ऐसा नहीं, अपितु ब्रह्म-स्वरूप का जिन्होंने श्रवण कर लिया है, उन्हें भी पूर्ववत् सुखित्व-दुःखित्वरूप संसारित्व की भ्रान्ति बनी रहती है।

मननादिप्रतीत्या— “श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (बृह. उ. २।४।५) इस श्रुति में श्रवण के पश्चात् मनन और निदिध्यासन का विधान देखा जाता है। यदि आत्मा के श्रवणमात्र से सर्वानर्थ की निवृत्ति हो जाती, तब श्रवण के पश्चात् मननादि का विधान व्यर्थ था, अतः उपासना-विधि के परिवेश में ही ब्रह्म शास्त्रप्रमाणक सिद्ध होता है]।

एकदेशिमत दूषण— “अत्राभिधीयते” से भाष्यकार एकदेशी आचार्य के मत में