भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२९
च्छास्त्रस्य । तथा हि शास्त्रतात्पर्य्यविद आहुः—‘दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनम्’ (जै० सू० १।१।१) इति । ‘चोदनेति क्रियायाः प्रवर्तकं वचनम्’ । ‘तस्य ज्ञानमुपदेशः’ (जै० सू० १।१।५) । ‘तद्भूतानां क्रियार्थेन समाम्नायः’ (जै० सू० १।१।२५) । ‘आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्’ (जै० सू० १।२।१) इति च । अतः पुरुषं कचिद्विषयविशेषे प्रवर्त्तयत् कुतश्चिद्विषयविशेषात्निवर्त्तयच्चार्थवच्छास्त्रम् । तच्छेषतया चान्यदुपयुक्तम् । तत्सामान्याद्वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्यात् । सति
भामती
❄ प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजनत्वाद् ❄ इत्यादिना ❄ तत्सामान्याद्वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्याद् ❄ इत्यन्तेन । न च स्वतन्त्रं कार्यं नियोज्यमधिकारिणमनुष्ठातारमन्तरेणेति नियोज्यभेदमाह ❄ सति च विधिपरत्वे इति ❄ । ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतीति सिद्धवदर्थवादावगतस्यापि ब्रह्मभवनस्य नियोज्यविशेषाकाङ्क्षायां ब्रह्मबुभूषोर्नियोज्यविशेषस्य रात्रिसत्त्रन्यायेन प्रतिलम्भः । पिण्डपितृयज्ञन्यायेन तु स्वर्गकामस्य नियोज्यस्य कल्पनायामर्थवादस्यासमवेतार्थतयात्यन्तपरोक्षा वृत्तिः स्यादिति । ब्रह्मभावश्चामृतत्वमिति
भामती-व्याख्या
प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप कार्य के प्रतिपादक पद-सन्दर्भ को शास्त्र कहा जाता है एवं कार्यरूप अर्थ में ही शब्दों का संगति-ग्रह होता है—ये दो हेतु भाष्यवाक्य के द्वारा उपपादित हुए हैं—‘‘प्रवृत्तिनिवृत्ति-प्रयोजनत्वात्’’—यहाँ से लेकर ‘‘तत्सामान्याद् वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्यात्’’—यहाँ तक। नियोगरूप कार्य अपने नियोज्य (अधिकारी या अनुष्ठाता) पुरुष के बिना स्वतन्त्र नहीं हो सकता, अतः नियोज्य विशेष का कथन किया जाता है—‘‘सति च विधिपरत्वे।’’ जैसे स्वर्ग-कामनावान् नियोज्य के लिए अग्निहोत्रादि साधन पदार्थों का विधान किया जाता है, वैसे ही अमृतत्व-कामनावान् नियोज्य के लिए ब्रह्म-ज्ञान का विधान अत्यन्त युक्ति-युक्त है। अर्थात् जैसे ‘‘प्रतितिष्ठन्ति ह वैता रात्रीरुपयन्ति’’—इत्यादि अर्थवाद-वाक्य के द्वारा अवगत प्रतिष्ठाकामनावान् व्यक्ति रात्रिसत्र कर्म का नियोज्य माना जाता है, वैसे ही ‘‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’’—इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म-बुभूषु अथवा अमृतत्व-कामनावान् व्यक्ति ब्रह्म-ज्ञान का नियोज्य सिद्ध होता है।
यदि रात्रिसत्र-न्याय को छोड़ कर पिण्डपितृयज्ञन्याय का अवलम्बन किया जाता है, तब ब्रह्म-ज्ञान का स्वर्ग फल मानना होगा [अत्यन्त अश्रुत फल की कल्पना में पिण्डपितृयज्ञ-न्याय या विश्वजिन्त्याय को अपनाया जाता है, इन दोनों न्यायों का पर्यवसान लगभग समान अर्थ में माना जाता है। ‘‘अमावास्यायामपराह्णे पिण्डपितृयज्ञेन चरन्ति’’—इस प्रकार के अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा विहित पिण्डपितृयज्ञ के विषय में सन्देह होता है कि पिण्ड-पितृयज्ञ कर्म क्या दर्शपूर्णमास कर्म का अङ्गभूत कर्म है? अथवा स्वतन्त्र कर्म है? पूर्वपक्षी ने कहा—‘‘य एवं विद्वानमावास्यां यजते’’ इत्यादि वाक्यों के द्वारा निर्णय किया गया है कि ‘अमावास्या’ शब्द अमावास्या तिथि में विहित ‘आग्नेयः’, ‘ऐन्द्रं दधि’ और ‘ऐन्द्रं पयः’ इन तीन कर्मों की संज्ञा है, अतः पिण्डपितृयज्ञ कर्म ‘अमावास्या’ कर्म का अङ्ग है। वहाँ सिद्धान्त-सूत्र है—‘‘पिण्डपितृयज्ञः स्वकालत्वादनाङ्गं स्यात्’’ (जै. सू. ४।४।१९)। अर्थात् ‘‘अमावा-स्यायामपराह्णे’’—इस प्रकार ‘अपराह्न’ शब्द कालविशेष का वाचक है, अतः इस पद के समभिव्याहार में श्रुत ‘अमावास्या’ शब्द भी तिथि विशेष का ही बोधक है, दर्शपूर्णमास-घटक ‘अमावास्या’ नाम के कर्म का नहीं, फलतः पिण्डपितृयज्ञ किसी कर्म का अङ्ग न होकर स्वतन्त्र कर्म है और विश्वजिन्त्याय के आधार पर इस कर्म का स्वर्गरूप फल माना जाता है। प्रकृत में ब्रह्म-ज्ञान के लिए भी यही कहा जा सकता है कि ‘‘सः स्वर्गः स्यात् सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वात्’’
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