भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१२८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४

विषयतयैव शास्त्रेण ब्रह्म समर्प्यते । यथा-यूपादहवनीयादीन्यलौकिकान्यपि विधिशेषतया शास्त्रेण समर्प्यन्ते, तद्वत् । कुत एतत् ? प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजनत्वा-


भामती

ज्ञानमपि स्वविषयमात्मानमन्तरेणाशक्यनिरूपणमिति तन्निरूपणाय तादृशमात्मानमाक्षिपति तदेव कार्यम् । यथाहुः—'यत्तु तत्सिद्धयर्थमुपादीयते आक्षिप्यते तदपि विधेयमिति तन्त्रे व्यवहारः' इति । विधेयता च नियोगविषयस्य ज्ञानस्य भावार्थतयाऽनुष्ठेयता, तद्विषयस्य स्वात्मनः स्वरूपसत्ताविनिश्चितिः । आरोपिततद्भावस्य त्वन्यस्य निरूपकत्वे तेन तन्निरूपितं न स्यात् । तस्मात्तादृगात्मप्रतिपत्तिविधिपरेभ्यो वेदान्तेभ्यस्तादृगात्मविनिश्चयः । तदेतस्सर्वमाह ॐ यद्यपि इति ॐ । विधिपरेभ्योऽपि वस्तुतत्त्वविनिश्चय इत्यत्र निदर्शनमुक्तं ॐ यथा यूप इति ॐ । यूपे पशुं बध्नातीति बन्धनाय विनियुक्ते यूपे तस्यालौकिकत्वात् कोऽसौ यूप इत्यपेक्षिते खादिरो यूपो भवति, यूपं तक्षति, यूपमष्टाश्रीकरोतीत्यादिभिर्वार्क्षस्तक्षणादिविधिपरैरपि संस्काराविष्टं विशिष्टसंस्थानं दारु यूप इति गम्यते । एवमाहवनीयादयोऽप्यवगन्तव्याः । प्रवृत्तिनिवृत्तिपरस्य शास्त्रत्वं न स्वरूपपरस्य, कार्य एव सम्बन्धो न स्वरूपे, इति हेतुद्वयं भाष्यवाक्येनोपपादितं


भामती-व्याख्या

(आत्मज्ञान) के अनुष्ठान का आक्षेपक (कल्पक) होता है। जैसे कार्य (नियोग) अपने विषयीभूत आत्मज्ञान के द्वारा निरूपित होता है—'आत्मज्ञानविषयो नियोगः'। वैसे ही ज्ञान भी अपने विषयीभूत आत्मा के विना निरूपित नहीं हो सकता, अतः ज्ञान का निरूपण करने के लिए वैसे ही आत्मा का आक्षेप वही कार्य (नियोग) करता है, जैसा कि श्री प्रभाकर मिश्र कहते हैं—"यस्मिन्नयं पुरुषो नियुज्यते, स तद्विषयः। तस्मान्नैव विधिः कर्त्तव्यतामाह, विषयतया त्पादत्ते। तस्माद् यद्यदुपदीयते तत्तद्विधेयमिति तन्त्रे व्यवहारः" (बृहती. पृ. ३९)। यहाँ 'उपादीयते' का अर्थ 'आक्षिप्यते' है। यद्यपि नियोग का विषयीभूत ज्ञान सिद्ध पदार्थ होने से विधेय नहीं, तथापि धात्वर्थत्वेन विधेयत्व बन जाता है अर्थात् यहाँ ज्ञान का अर्थ उपासना है, जो कि स्वरूपत अनुष्ठेय पदार्थ है। उस ज्ञान के विषयीभूत आत्मा की विधेयता है—आत्मस्वरूप की सत्ता का विनिश्चय, क्योंकि यहाँ विधेयता अज्ञातज्ञप्तिरूप मानी गई है, आत्मस्वरूप-सत्ता का निश्चय अज्ञातार्थ-ज्ञापक होता है। यहाँ अनात्मपदार्थों में आरोपित आत्मा ज्ञान का विषय नहीं, अतः आत्म-प्रतिपत्ति की विधि के बोधक वेदान्त-वाक्यों से वैसे (अनारोपित) आत्मा का निश्चय होता है। भाष्यकार इसी भाव की अभिव्यक्ति कर रहे हैं—"यद्यपि शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्म"। विधिपरक वाक्यों से भी वस्तुतत्त्व का निश्चय होता है—इसमें दृष्टान्त देते हैं—"यथा यूपादहवनीयादीन्यलौकिकान्यपि विधिशेषतया शास्त्रेण समर्प्यन्ते, तद्वत्"। "यूपे पशुं बध्नाति"—इस प्रकार विहित बन्धन को सम्पन्न करने के लिए विनियुक्त यूप एक अलौकिक पदार्थ माना जाता है, क्योंकि तक्षणादि दृष्ट और प्रोक्षणादि अदृष्ट संस्कारों से युक्त यूप पदार्थ केवल लौकिक नहीं माना जा सकता, किन्तु लोक में अप्रसिद्ध होने के कारण अलौकिक माना जाता है। वहाँ 'कोऽसौ यूपः?' इस प्रकार की आकांक्षा में "खादिरो यूपो भवति", 'यूपं तक्षति', 'यूपमष्टाश्रीकरोति'—इत्यादि वाक्यों के द्वारा खैर की लकड़ी को छील एवं आठ पहलूवाले एक खम्भे को प्रस्तुत किया जाता है। इसी प्रकार "यदाहवनीये जुहोति"—इस विधि वाक्य में 'क आहवनीयः' ऐसे प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि "वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत" इत्यादि श्रुतियों से विहित आधानादि संस्कारों से विशिष्ट लोकोत्तर अग्नि की अवगति 'आहवनीय' शब्द से होती है। यूप और आहवनीयादि के समान ही ब्रह्म वस्तु की अवगति विधिपरक वेदान्त-वाक्यों से हो सकती है।

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 146, कुल 639 में से · BharatKosha