भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 145, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२७
भामती
तस्माच्छास्त्रत्वप्रसिद्ध्या व्याहतमेषां स्वरूपपरत्वम्। अपि च न ब्रह्मरूपप्रतिपादनपराणामेषामर्थवत्त्वं पश्यामः। न च रज्जुरियं न भुजङ्ग इति यथाकथञ्चिल्लक्षणया वाक्यार्थतत्त्वनिश्चये यथा भयकम्पादिनिवृत्तिः, एवं तत्त्वमसीतिवाक्यार्थावगमान्निवृत्तिर्भवति सांसारिकाणां धर्मांणाम्; श्रुतवाक्यार्थस्यापि पुंसस्तेषां तादवस्थ्यात्। अपि च यदि श्रुतब्रह्मणो भवति सांसारिकधर्मनिवृत्तिः कस्मात् पुनः श्रवणस्योपरि मननादयः श्रूयन्ते? तस्मात्तेषां वैयर्थ्यप्रसङ्गादपि न ब्रह्मस्वरूपपरा वेदान्ताः, किन्त्वात्मप्रतिपत्तिविषयकार्यपराः। तच्च कार्यं स्वात्मनि नियोज्यं नियुञ्जानं नियोग इति च मानान्तरापूर्वत्वाऽपूर्वमिति चाख्यायते। न च विषयानुष्ठानं विना तत्सिद्धिरिति स्वसिद्धयर्थं तदेव कार्यं स्वविषयस्य करणस्यात्मज्ञानस्यानुष्ठानमाक्षिपति। यथा च कार्यं स्वविषयाधीननिरूपणमिति ज्ञानेन विषयेण निरूप्यते, एवं
भामती-व्याख्या
प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा।
पुंसां येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते॥ (श्लो. वा. पृ० ४०६)
[जिस नित्य (अपौरुषेय) अथवा कृतक (पौरुषेय) पद-सन्दर्भ के द्वारा पुरुषों की किसी विषय में प्रवृत्ति या किसी विषय से निवृत्ति होती है, उस पद-सन्दर्भ को शास्त्र कहा जाता है, इसकी चर्चा पहले आ चुकी है]। अतः वेदान्त-वाक्यों में शास्त्रत्व की प्रसिद्धि होने के कारण सिद्धार्थपरता सम्भव नहीं।
(३) वेदान्त-वाक्य यदि ब्रह्मस्वरूप के ही प्रतिपादक माने जाते हैं, तब इनमें अर्थवत्ता (प्रयोजनवत्ता) नहीं रहती। यह जो कहा जाता है कि 'रज्जुरियं न सर्पः'—इत्यादि सिद्धार्थक शब्दों से यथाकथञ्चित् वाक्यार्थ का निश्चय हो जाने पर जैसे भय और कम्पादि की निवृत्ति देखी जाती है, वैसे ही "तत्त्वमसि"—इत्यादि शब्दों से वाक्यार्थ का निश्चय हो जाने पर कर्तृत्ववादि सांसारिक धर्मों की निवृत्ति हो जाती है। वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि जिन वेदान्तियों ने "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों से वाक्यार्थ का बोध प्राप्त कर लिया है, वे भी अपने को पहले की भांति ही कर्त्ता-भोक्ता मानते हैं, अतः उक्त वाक्यार्थ बोध से कर्तृत्ववादि सांसारिक धर्मों की निवृत्ति नहीं होती।
(४) यदि वेदान्त-वाक्यों के श्रवणमात्र से पुरुषार्थ की सिद्धि हो जाती है, तब “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह. उ. २।४।५) इत्यादि श्रुति वाक्यों में श्रवण के पश्चात् मननादि का विधान किस प्रयोजन के लिए किया गया? अतः श्रवणादि की व्यर्थतापत्ति का परिहार करने के लिए भी मानना पड़ता है कि वेदान्त-वाक्य ब्रह्म-स्वरूपमात्र के के बोधक नहीं माने जा सकते, अपितु आत्मा की प्रतिपत्ति (ज्ञान) को विषय करनेवाले कार्य पदार्थ के बोधन में ही वेदान्त-वाक्यों का तात्पर्य स्थिर होता है। वह कार्य पदार्थ अपनी उत्पत्ति में नियोज्य (अधिकारी) पुरुष का नियोजक होने के कारण नियोग एवं प्रमाणान्तर से अनधिगत होने के कारण अपूर्व भी कहलाता है, जैसा कि श्री शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—
क्रियादिभिन्नं यत्कार्यं वेद्यं मानान्तरैर्न तत्।
अतो मानान्तरापूर्वमपूर्वमिति गीयते॥
कार्यत्वेन वियोज्यं च स्वात्मनि प्रेरयन्नसौ।
नियोग इति मीमांसानिष्णा तैरभिधीयते॥ (प्र. पं. पृ. ४४१)
उस नियोगरूप कार्य की सिद्धि उसकी विषयीभूत आत्मप्रतिपत्ति के अनुष्ठान से विना सम्भव नहीं, अतः वह कार्य अपनी सिद्धि के लिए अपनी विषयीभूत आत्मप्रतिपत्ति