भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
भामती स्वेन शास्त्रत्वेनार्थवत्तया। मननाविप्रतीत्या च कार्यार्थाद् ब्रह्मनिश्चयः॥ न खलु वेदान्ताः सिद्धब्रह्मरूपपरा भवितुमर्हन्ति, तत्राविवित्सितसङ्गतित्वाद्, यत्र हि शब्दा लोकेन प्रयुज्यन्ते तत्र तेषां सङ्गतिग्रहः। न चाहेय-मनुपादेयं रूपमात्रं कश्चिद्विवक्षति प्रेक्षावान्, तस्यानुभुत्सितत्वात्। अनुभुत्सितावबोधने च प्रेक्षावत्ता-विधातात्। तस्मात् प्रतिपित्सितं प्रतिपिपादयिषन्नयं लोकः प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतुभूतमेवार्थं प्रतिपादयेत्, कार्यं चावगतं तद्धेतुरिति तदेव बोधयेत्। एवं च वृद्धव्यवहारप्रयोगात् पदानां कार्यपरत्वमवगच्छति। तत्र किञ्चित्साक्षात्कार्याभिधायकं, किञ्चित्कार्यार्थस्वार्थाभिधायकं, न तु भूतार्थपरता पदानाम्। अपि च नरान्तरस्य व्युत्पन्नस्यार्थप्रत्ययमनुमाय तस्य च शब्दभावाभावानुविधानमवगम्य शब्दस्य तद्विषयबोधकत्वं निश्चेतव्यं, न च भूतार्थरूपमात्रप्रत्यये परनरवर्त्तिनि किञ्चिल्लिङ्गमस्ति। कार्यप्रत्यये तु नरान्तरवर्त्तिनि प्रवृत्तिनिवृत्ती [स्तो हेतु इत्यज्ञातसङ्गतित्वान्न ब्रह्मरूपपरा वेदान्ताः। अपि च वेदान्तानां वेदत्वात् शास्त्रत्वप्रसिद्धिरस्ति, प्रवृत्तिनिवृत्तिपराणां च सन्दर्भाणां शास्त्रत्वम्। यथाहूः—
प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा।
पुंसां येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते ॥ इति।
भामती-व्याख्या
अज्ञातसंगतित्वेन शास्त्रत्वेनार्थवत्तया।
मननादिप्रतीत्या च कार्यार्थाद् ब्रह्मनिश्चयः॥
(१) अज्ञातसंगतित्व, (२) शास्त्रत्व, (३) अर्थवत्त्व और (४) मननादि-विधान—इन चार हेतुओं के द्वारा ब्रह्म में उपासना-विधि-शेषत्व निश्चित होता है—
(१) वेदान्त-वाक्यों का सिद्ध ब्रह्म में संगति-ग्रह (शक्ति-ज्ञान) सम्भव नहीं, क्योंकि जिस अर्थ में लोग शब्दों का प्रयोग नहीं करते, उस अर्थ में शब्दों का संगति-ग्रह नहीं हो सकता, लोकतः संगति-ग्रह के आधार पर ही वैदिक शब्दों से अर्थ-बोध होता है, जैसा कि मण्डन मिश्र कहते हैं—"लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः" (ब्र. सि. पृ. ८२)। लोक में कोई भी प्रेक्षावान् व्यक्ति हेय और उपादेय से रहित वस्तुमात्र की विवक्षा नहीं करता, क्योंकि ऐसी वस्तु बुभुत्सित (जिज्ञासित) ही नहीं होती। यदि अजिज्ञासित पदार्थ का कोई प्रतिपादन करता है, तब उसे प्रेक्षावान् (बुद्धिपूर्वककारी) नहीं कहा जायगा, अतः बुद्धिमान् मनुष्य प्रतिपित्सित (बुभुत्सित या जिज्ञासित) अर्थ की विवक्षा से प्रवृत्ति और निवृत्ति के हेतुभूत अर्थ का ही प्रतिपादन किया करता है। कार्य वस्तु ही वह पदार्थ है, जो अवगत होकर प्रवृत्ति का हेतु होता है, अतः कार्यरूप अर्थ का ही प्रतिपादन करना चाहिए। वृद्ध पुरुषों के व्यवहार की सहायता से पदों की शक्ति कार्यरूप अर्थ में ही निश्चित होती है। उनमें कुछ पद साक्षात् कार्य के अभिधायक होते हैं और कुछ पद कार्यार्थक स्वार्थ के अभिधायक होते हैं, सिद्धार्थपरता पदों में अवगत ही नहीं होती। दूसरी बात यह है कि मध्यम (प्रवृत्त होने वाले) वृद्ध के अन्दर अवस्थित प्रवर्तक ज्ञान का अनुमान करके शब्द विशेष के होने पर ही वह ज्ञान उत्पन्न होता है, अन्यथा नहीं—इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा शब्द में उस बोध की जनकता निश्चित की जाती है, किन्तु जिस ज्ञान से कोई प्रवृत्ति या निवृत्ति नहीं होती, ऐसे अन्यपुरुषगत सिद्धार्थविषयक ज्ञान का अनुमान नहीं हो सकता। कार्यविषयक ज्ञान के अनुमापक तो प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप लिङ्ग सुलभ हो जाते हैं। अतः वेदान्त शब्दों का ब्रह्म में संगति-ग्रह न हो सकने के कारण उनमें ब्रह्मपरता सम्भव नहीं।
(२) वेदान्त-वाक्य वेद होने के कारण शास्त्र कहे जाते हैं और प्रवृत्ति निवृत्तिपरक पद-संदर्भ ही शास्त्र की परिभाषा में आता है, जैसा कि श्रीकुमारिल भट्ट ने कहा है—