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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२५

शास्त्रस्य प्रामाण्यं शक्यं प्रत्याख्यातुम्। न चानुमानगम्यं शास्त्रप्रामाण्यं, येनान्यत्र- दृष्टं निदर्शनमपेक्षेत। तस्मात्सिद्धं ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वम्। अत्रापरे प्रत्यवतिष्ठन्ते—यद्यपि शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्म, तथापि प्रतिपत्तिविधि-


भामती

तदर्थावगमादेवानपेक्षात् परमपुरुषार्थलाभादित्यर्थम्।

ननु विध्यसंस्पर्शिनो वेदस्यान्त्यस्य न प्रामाण्यं दृष्टमिति कथं वेदान्तानां तदस्पृशां तद्भविष्यतीत्यत आह ॐ न चानुमानगम्यम् इति ॐ। अबाधितानधिगतासन्दिग्धबोधजनकत्वं हि प्रमाणत्वं प्रमाणानां, तच्च स्वत इत्युपपादितम्। यद्यपि चैषामोद्बुद्धबोधजनकत्वं कार्यार्थापत्तिसमधिगम्यं तथापि तद्बोधोपजनने मानान्तरं नापेक्षन्ते, नापीमामेवार्थार्पत्तिं, परस्पराश्रयप्रसङ्गादिति स्वत इत्युक्तम्। ईदृग्बोधजनकत्वं च कार्य इव विधीनां वेदान्तानां ब्रह्मण्यस्तीति दृष्टान्तानपेक्षं तेषां ब्रह्मणि प्रामाण्यं सिद्धं भवति। अन्यथा नेन्द्रियान्तराणां रूपप्रकाशनं दृष्टमिति चक्षुरपि न रूपं प्रकाशयेदिति। प्रकृतमुपसंहरति ॐ तस्माद् इति ॐ।

आचार्यदेशीयानां मतमुत्थापयति — ॐ अत्रापरे प्रत्यवतिष्ठन्ते इति ॐ। तथाहि—अज्ञातसङ्गति-


भामती-व्याख्या

वेदान्त-वाक्यों में यह बात नहीं कि किसी विधि के साथ समन्वय की आवश्यकता हो, वे तो स्वयं अन्य प्रमाणों से निरपेक्ष होकर परम पुरुषार्थ के साधन होते हैं।

यदि कहा जाय कि वेदान्त से भिन्न अन्य किसी वैदिक वाक्य में विधि-सम्पर्क के विना प्रामाण्य नहीं देखा जाता, अतः किस उदाहरण के द्वारा वेदान्त-वाक्यों में प्रामाण्य का अनुमान किया जायगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"न चानुमानगम्यं शास्त्रप्रामाण्यं येनान्यत्र दृष्टं निदर्शनमपेक्षेत"। ज्ञानगत अबाधित, अनधिगत और असन्दिग्ध अर्थ की बोधकता ही प्रामाण्य पदार्थ है, जो कि वैदिक वाक्य-जनित ज्ञानों में स्वतः सिद्ध होता है—यह कहा जा चुका है, अतः किसी अनुमानादि प्रमाण के द्वारा प्रामाण्य की सिद्धि अपेक्षित ही नहीं, जिसके लिए किसी उदाहरण-घटित अनुमान की आवश्यकता हो। यद्यपि ज्ञान की अबाधितार्थकता रूप प्रमाणता सफलप्रवृत्तिरूप कार्य के द्वारा अवगत होती है, अतः वेदान्त-वाक्यों में सफल प्रवृत्ति-जनक बोध की जनकता कार्यलिङ्गक अनुमान के द्वारा ही सिद्ध होती है, अतः वेदान्त-वाक्यों को भी अनुमान की अपेक्षा अनिवार्य है—'वेदान्त-वाक्यं प्रमाज्ञानजनकम्, सफलप्रवृत्तिहेतुभूतज्ञानजनकत्वात्, सम्प्रतिपन्नवत्'। तथापि प्रमात्मक बोध की उत्पत्ति में वेदान्त-वाक्य इतर प्रमाण की अपेक्षा नहीं करते। कार्यलिङ्गक अनुमानरूप अर्थापत्ति की भी अपेक्षा नहीं, क्योंकि वह तो प्रमारूप कार्य हो जाने के पश्चात् प्रवृत्त होगा, पहले उसकी सत्ता ही सम्भव नहीं कि वेदान्त-वाक्य बोध की उत्पत्ति में उसकी अपेक्षा करते, अन्यथा अन्योऽन्याश्रयता प्रसक्त होती है। फलतः वेदान्त-वाक्यों में बोधजनकत्व इतर प्रमाण-निरपेक्ष स्वतः ही होता है। जैसे विधि वाक्य कार्यरूप अर्थ का ज्ञान दृष्टान्त-निरपेक्ष स्वतः ही उत्पन्न करते हैं, वैसे ही वेदान्त-वाक्य भी ब्रह्म का ज्ञान किसी दृष्टान्त की अपेक्षा के विना ही उत्पन्न करते हैं, अतः ब्रह्म में वेदान्त-वाक्यों को प्रमाण माना जाता है। यदि इसमें भी दृष्टान्त की अपेक्षा आवश्यक है, तब चक्षुरादि में भी रूपादि-ज्ञान की जनकता सिद्ध न होगी, क्योंकि अन्य इन्द्रियों में वह नहीं देखी जाती कि जिसे दृष्टान्त बनाकर चक्षुरादि में रूपादि-ज्ञान की जनकता सिद्ध करते। प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—"तस्मात् सिद्धं ब्रह्मणः शास्त्रप्रमाणकत्वम्"।

एकदेशिमत—वेदान्त के ही कतिपय माननीय आचार्यों का कहना है कि—

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