भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १२४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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काद्वैतविज्ञानापमर्दोपपत्तेः । न ह्येकत्वविज्ञानेनोन्मथितस्य द्वैतविज्ञानस्य पुनः संभवो- ऽस्ति, येनोपासनाविधिशेषत्वं ब्रह्मणः प्रतिपद्येत । यद्यप्यन्यत्र वेदवाक्यानां न विधि- संस्पर्शमन्तरेण प्रमाणत्वं दृष्टम् ; तथाप्यात्मविज्ञानस्य फलपर्यन्तत्वान्न तद्विषयस्य
भामती
पासना न निरस्तसमस्तभेदप्रपञ्चे वेदान्तवेद्ये ब्रह्मणि सम्भवतीति नोपासनाविधिशेषत्वम्, वेदान्तानां तद्वि- रोधित्वादित्यर्थः ।
स्यादेतत्—यदि विधिविरहेऽपि वेदान्तानां प्रामाण्यं, हन्त तर्हि सोऽरोदीदित्यादीनामप्यस्तु स्वतन्त्राणामेवोपेक्षणीयार्थानां प्रामाण्यम् , न हि हानोपादानबुद्धी एव प्रमाणस्य फले, उपेक्षाबुद्धेरपि तत्फलत्वेन प्रामाणिकैरभ्युपेतत्वादिति कृतं बर्हिषि रजतं न देयमित्यादिनिषेधविधिपरत्वेनैतेषामित्यत आह ॐ यद्यपि इति ॐ । स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणतया हि सर्वो वेदराशिः पुरुषार्थतन्त्र इत्यवगतं, तत्रैकेनापि वर्णेन नापुरुषार्थेन भवितुं युक्तं, किं पुनरियता सोऽरोदीत्यादिना पदप्रबन्धेन । न च वेदान्तेभ्य इव तदर्थावगममात्रादेव कश्चित् पुरुषार्थं उपलभ्यते, तेनैष पदसन्दर्भः साकाङ्क्ष एवास्ते पुरुषार्थमुदीक्ष- माणः । बर्हिषि रजतं न देयमित्ययमपि निषेधविधिः स्वनिषेध्यस्य निन्दामपेक्षते, न ह्यन्यथा ततश्चेतनः शक्यो निवर्तयितुम् । तद्यदि दूरतोऽपि न निन्दामवाप्स्यत्ततो निषेधविधिरेव रजतनिषेधे च निन्दायां च बर्विहोमवत् सामर्थ्यद्वयमकल्पयिष्यत् । तदेवमुक्तसयोः सोऽरोदीदिति च बर्हिषि रजतं न देयमिति च पदसन्दर्भयोर्लक्ष्यमाणनिन्दाद्वारेण नष्टाश्वदग्धरथवत् परस्परं समन्वयः । न त्वेवं वेदान्तेषु पुरुषार्थापेक्षा,
भामती-व्याख्या
और उपासना का भेद सिद्ध हो जाने पर ही उपासना सम्भव हो सकती है, किन्तु समस्त भेद-प्रपञ्च का निरास जिस अद्वैत ब्रह्म तत्त्व में किया जाता है, उसमें उपासना-विधि की शेषता ( अङ्गता ) सम्भावित नहीं, क्योंकि वेदान्त-वाक्य भेद के सर्वथा विरोधी हैं।
शङ्का—विधि-सम्पर्क के बिना यदि वेदान्त-वाक्यों को प्रमाण माना जाता है, तब तो 'सोऽरोदीत्'—इत्यादि उपेक्षणीयार्थक अर्थवाद वाक्यों में भी विधि वाक्य से एकवाक्यता के बिना स्वातन्त्र्येण प्रामाण्य मानना चाहिए, क्योंकि केवल हान और उपादान का ज्ञान ही प्रमाण का फल नहीं माना जाता, किन्तु उपेक्षा-ज्ञान को भी वेदान्तियों ने प्रमाण-फल के रूप में स्वीकार कर लिया है, अतः “बर्हिषि रजतं न देयम्'—इत्यादि निषेध-विधि की शेषता ( अङ्गता ) उक्त अर्थवाद वाक्यों में माननी व्यर्थ है।
समाधान—भाष्यकार कहते हैं कि "यद्यपि अन्यत्र वेदवाक्यानां न विधिसंस्पर्शमन्तरेण प्रमाणत्वं दृष्टम्” । आशय यह है कि “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः”—इस स्वाध्याय विधि के द्वारा गृहीत होने के कारण समस्त वेद-राशि पुरुषार्थ की साधन है—यह भली प्रकार अवगत हो चुका है, अतः वेद का एक वर्ण भी अपुरुषार्थ नहीं हो सकता, तब भला "सोऽरोदीद् यदरोदीत् तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्”—इतना बड़ा पद-सन्दर्भ निरर्थक और अप्रमाण क्योंकर होगा ? वेदान्त वाक्यों के समान अर्थवाद वाक्यों के द्वारा किसी पदार्थ के ज्ञानमात्र से किसी पुरुषार्थ की सिद्धि भी नहीं होती, अतः 'किमर्थोऽयं पदसन्दर्भः ?' इस प्रकार की आकांक्षा एवं “बर्हिषि रजतं न देयम्—इस विधि की 'कस्मात्'—इस प्रकार की आकांक्षा है, नष्टाश्वदग्धरथ-न्याय का सहारा लेकर उक्त अर्थवाद वाक्य का रजत की निन्दा में तात्पर्य मानकर अर्थवाद और विधि—दोनों की एकवाक्यता पर्यवसित होती है। विधि वाक्य को अपने विधेय की प्रशंसा और निषेध वाक्य को अपने निषेध्य की निन्दा निसर्गतः अपेक्षित होती है। विधि वाक्यों को जहाँ समीप या दूर के किसी अर्थवाद की सहायता नहीं मिलती, वहाँ अगत्या विधि वाक्य से ही प्रशंसा और निन्दा की कल्पना वैसे ही हो जाती है, जैसे “दविहोमं कुर्यात्” (जै० सू० ८।४।१९) से ।