भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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सिद्धार्थत्वविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२३

सिद्धेः । देवतादिप्रतिपादनस्य तु स्ववाक्यगतोपासनाद्यर्थत्वेऽपि न कश्चिद्विरोधः । न तु तथा ब्रह्मण उपासनाविधिशेषत्वं संभवति; एकत्वे हेयोपादेयशून्यतया क्रियाकार-

भामती

तत्राप्राप्तप्राप्तौ चात्यक्तत्यागे च बाह्योपायानुष्ठानसाध्यत्वात् तदुपायतत्त्वज्ञानादस्ति पराचीनानुष्ठानापेक्षा । न जातु ज्ञानमात्रं वस्त्वपनयति । न हि सहस्रमपि रज्जुप्रत्यया वस्तुसन्तं फणिनमपनयितुमीशते । समारोपिते तु प्रेप्सितजिहासिते तत्त्वसाक्षात्कारमात्रेण बाह्यानुष्ठानानपेक्षेण शक्येते प्राप्तुमिव हातुमिव । समारोपमात्रजीविते हि ते, समारोपितं च तत्त्वसाक्षात्कारः समूलघातमुपहन्तीति । तथेहाप्यविद्यासमारोपितजीवभावे ब्रह्मण्यानन्दे वस्तुतः शोकदुःखादिरहिते समारोपितनिवन्धनस्तद्भावस्तत्त्वमसीतिवाक्या-त्थंतत्त्वज्ञानावगतिपर्यन्तान्निवर्त्तते । तन्निवृत्तौ प्राप्तमप्यानन्दरूपमप्राप्तमिव प्राप्तं भवति, त्यक्तमपि शोकदुःखाद्यत्यक्तमिव त्यक्तं भवति, तदिदमुक्तं ❀ ब्रह्मात्मावगमादेव ❀ । जीवस्य सर्वक्लेशस्य सवासनस्य विपर्य्यासस्य, स हि क्लिश्नाति जन्तूनतः क्लेशः, तस्य प्रकर्षेण हानात् पुरुषार्थस्य दुःखनिवृत्तिसुखाति-लक्षणस्य सिद्धेरिति । यत्त्वात्मेत्येवोपासीतात्मानमेव लोकमुपासीतेत्युपासनावाक्यगतदेवतादिप्रतिपादनेनो-पासनापरत्वं वेदान्तानामुक्तं, तद् दूषयति ❀ देवतादिप्रतिपादनस्य तु ❀ आत्मेत्येतावन्मात्रस्य । ❀ स्ववा-क्यगतोपासनाथंत्त्वेऽपि न कश्चिद्विरोधः ❀ । यदि न विरोधः, सन्तु तर्हि वेदान्ता देवताप्रतिपादनद्वारेणो-पासनाविधिपरा एवेत्यत आह ❀ न तु तथा ब्रह्मणः इति ❀ । उपास्योपासकोपासनादिभेदप्रसिद्धयधीनो-

भामती-व्याख्या

आरोपित सर्प। इनमें अप्राप्त पदार्थ की प्राप्ति और अत्यक्त का त्याग बाह्य अनुष्ठान (व्यापार) की अपेक्षा करता है, केवल साधन तत्त्व के ज्ञान से साध्य नहीं होता, अपितु उपायभूत वस्तु का ज्ञान हो जाने के पश्चात् अनुष्ठान (क्रिया या व्यापार) की अपेक्षा होती है, क्योंकि प्राप्त अत्यक्त पदार्थ का ज्ञानमात्र से परिहाण लोक में नहीं देखा जाता, जैसे कि रज्जु तत्त्व के हजारों ज्ञानों के द्वारा भी पैर में लिपटे वास्तविक (अनारोपित) सर्प की निवृत्ति नहीं कर सकते, हाँ, जीव में नित्य प्राप्त किन्तु विस्मृत ब्रह्मरूपता की प्राप्ति और पायजेब में आरोपित सर्प की निवृत्ति वस्तु तत्त्व के साक्षात्कार मात्र से हो जाती है, उसके लिए किसी प्रकार के बाह्य व्यापार की अपेक्षा नहीं होतो, क्योंकि जो पदार्थ केवल भ्रमतः आरोपित मात्र होते हैं, उनका तत्त्व-साक्षात्कार से समूल नाश हो जाता है। प्रकृत में वैसा ही है कि आनन्द ब्रह्म में अविद्या के द्वारा आरोपित जीवभाव एवं जन्म-मरणादि अनन्त दुःख केवल 'तत्त्वमसि'-इत्यादि वेदान्त-वाक्यों से जनित तत्त्व-साक्षात्कार से निवृत्त हो जाता है। उसकी निवृत्ति हो जाने पर प्राप्त आनन्दरूपता भी प्राप्त-जैसी और त्यक्त दुःख-राशि त्यक्त-जैसी हो जाती है, भाष्यकार यही कह रहे हैं- “ब्रह्मात्मावगमादेव”। जीव के वासना-सहित विपर्यय रूप क्लेश की निवृत्ति हो जाती है। वह विपर्यय (मिथ्या ज्ञान) ही क्लेश है, जो कि जीवों को क्लेशित (दुःखी) करता है। उस क्लेश की निवृत्ति से दुःख-निवृत्ति और परमा-नन्द-प्राप्तिरूप पुरुषार्थ की सिद्धि हो जाती है।

यह जो पूर्वपक्षी ने कहा था कि "आत्मेत्येवोपासीत" (बृह० उ० १।४।७), आत्मान-मेव लोकमुपासीत' (बृह० उ० १।४।१५) इत्यादि उपासना-वाक्यगत देवतादि चेतन पदार्थों के प्रतिपादन में वेदान्त-वाक्यों का उपयोग है। उस पक्ष को दूषित किया जाता है- "देवतादि प्रतिपादनस्य तु न कश्चिद् विरोधः"। यदि किसी प्रकार का विरोध नहीं, तब वेदान्त-वाक्यों में देवतादि-प्रतिपादन के द्वारा उपासना-विधि-परत्व मान लेना चाहिए इस शङ्का का निराकरण किया गया है-"न तु तथा उपासनाविधिशेषत्वम्"। (फिर भी ब्रह्म उपासना-विधि का अङ्ग क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि उपाश्य, उपासक