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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१२२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

भावस्य शास्त्रमन्तरेणानवगम्यमानत्वात् । यत्तु—हेयोपादेयरहितत्वादुपदेशानर्थक्यमिति, नैष दोषः; हेयोपादेयशून्यब्रह्मात्मतावगमादेव सर्वक्लेशप्रहाणात्पुरुषार्थ-

भामती

वेदान्तानां न सापेक्षतया प्रामाण्यविघातः, न चानधिगतगन्तृता नास्ति येन प्रामाण्यं न स्याज्जीवस्य ब्रह्मताया अन्यतोऽनधिगमात्, तदिदमुक्तं, ॐ न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपीति ॐ । द्वितीयं पूर्वपक्षबीजं स्मारयित्वा दूषयति ॐ "यत्तु हेयोपादेयरहितत्वाद् इति ॐ । विध्यर्थावगमात् खलु पारम्पर्येण पुरुषार्थप्रतिलम्भः, इह तु तत्त्वमसीत्यवगतिपर्यन्तवाक्यार्थज्ञानाद् बाह्यानुष्ठानानपेक्षात्साक्षादेव पुरुषार्थप्रतिलम्भो नायं सर्पो रज्जुरियमिति ज्ञानादिवेति । सोऽयमस्य विध्यर्थज्ञानात् प्रकर्षः ।

एतदुक्तं भवति—द्विविधं हीप्सितं पुरुषस्य किञ्चिदप्राप्तं ग्रामादि, किञ्चित् पुनः प्राप्तमपि भ्रमवशादप्राप्तमित्यवगतं, यथा स्वग्रीवावनद्धं ग्रैवेयकम् । एवं जिहासितमपि द्विविधं, किञ्चिदहीनं जिहासति, यथा वलयितचरणं फणिनं, किञ्चित् पुनर्हानमेव जिहासति, यथा चरणाभरणे नूपुरे फणिनमारोपितम् ।

भामती-व्याख्या

वेदान्त-वाक्यों में अनपेक्षत्व सिद्ध करने के लिए कार्यार्थकत्व मानने की क्या आवश्यकता ? वेदों में अपौरुषेयत्व का विस्तारपूर्वक उपपादन न्यायकलिका में किया गया है, अतः यहाँ अनावश्यक विस्तार के भय से उसका विशेषतः उपपादन नहीं किया जाता। वेदों में पौरुषेयत्व सिद्ध न होने के कारण सिद्धार्थक वेदान्त-वाक्यों में भी न प्रत्यक्षादि-सापेक्षत्व प्रसक्त होता है और अनपेक्षत्वात्मक प्रामाण्य का विघात होता है, क्योंकि अज्ञातार्थज्ञापकत्व ही प्रामाण्य का प्रयोजक है, वह तो वेदान्त-वाक्यों में विद्यमान ही है, अतः प्रामाण्य क्यों न होगा ? वेदान्त को छोड़ कर अन्य कोई ऐसा प्रमाण नहीं, जिसके द्वारा जीव में ब्रह्मरूपता का ज्ञान प्रथमतः उत्पन्न किया जा सके, अतः प्रमाणान्तर से अनधिगत जीव और ब्रह्म के अभेद का बोध कराने के कारण "तत्त्वमसि" आदि वेदान्त-वाक्य परमार्थतः प्रमाणभूत हैं। यही तथ्य भाष्यकार के शब्दों में व्यक्त किया गया है—"न च परिनिष्ठितवस्तुस्वरूपत्वेऽपि प्रत्यक्षादिविषयत्वं ब्रह्मणः, "तत्त्वमसि" (छां. ६।८।७) इति ब्रह्मात्मभावस्य शास्त्रमन्तरेणानवगम्यमानत्वात् ।"

पूर्वपक्ष के द्वितीय तर्क का स्मरण दिला कर निराकरण किया जाता है—"यत्तु हेयोपादेयरहितत्वात्तदुपदेशानर्थक्यमिति, नैष दोषः, हेयोपादेयशून्यब्रह्मात्मतावगमादेव सर्वक्लेशप्रहाणात्पुरुषार्थसिद्धेः" । अर्थात् कर्मरूप साध्यार्थ के विधि वाक्य से कर्म का ज्ञान और उस ज्ञान के पश्चात् कर्मानुष्ठान होता है, तब कहीं उससे स्वर्गादि के साधनीभूत अदृष्टरूप पुरुषार्थ की सिद्धि होती है, किन्तु प्रकृत में "तत्त्वमसि"—इस वेदान्त-वाक्य के द्वारा जीव में ब्रह्मरूपता के साक्षात्कार मात्र से वैसे ही परम पुरुषार्थ की सिद्धि हो जाती है, जैसे "नायं सर्पः, रज्जुरियम्"—इस प्रकार के ज्ञान से सर्प-भ्रम सदैव के लिए दूर हो जाता है। जीव में ब्रह्मरूपता अथवा रज्जु में रज्जुरूपता का ज्ञान हो जाने के पश्चात् किसी प्रकार के अनुष्ठान की अपेक्षा नहीं रहती। साध्यार्थ-ज्ञान की अपेक्षा सिद्धार्थ-ज्ञान का यह महान् प्रकर्ष (वैशिष्ट्य) है, जिसको भाष्यकार ने 'प्रहाण' पद में 'प्र' के प्रयोग से ध्वनित किया है।

कहने का अभिप्राय यह है कि जैसे पुरुष (के ईप्सित उपादेय) पदार्थों में दो प्रकार के पदार्थ आते हैं—(१) अप्राप्त पदार्थ, जैसे ग्रामादि और (२) प्राप्त पदार्थ, जैसे गले में पहना हुआ हार, जो कि किसी भ्रम के कारण खोया हुआ समझ लिया गया था। वैसे ही जिहासित (त्याज्य या हेय) पदार्थ भी द्विविध ही होते हैं—(१) अहीन (अत्यक्त या प्राप्त) पदार्थ, जैसे पैर में लिपटा हुआ सर्प और (२) हीन (अप्राप्त) पदार्थ, जैसे पायजेब में

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