भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२७
भामती
तस्माच्छास्त्रत्वप्रसिद्ध्या व्याहतमेषां स्वरूपपरत्वम्। अपि च न ब्रह्मरूपप्रतिपादनपराणामेषामर्थवत्त्वं पश्यामः। न च रज्जुरियं न भुजङ्ग इति यथाकथञ्चिल्लक्षणया वाक्यार्थतत्त्वनिश्चये यथा भयकम्पादिनिवृत्तिः, एवं तत्त्वमसीतिवाक्यार्थावगमान्निवृत्तिर्भवति सांसारिकाणां धर्मांणाम्; श्रुतवाक्यार्थस्यापि पुंसस्तेषां तादवस्थ्यात्। अपि च यदि श्रुतब्रह्मणो भवति सांसारिकधर्मनिवृत्तिः कस्मात् पुनः श्रवणस्योपरि मननादयः श्रूयन्ते? तस्मात्तेषां वैयर्थ्यप्रसङ्गादपि न ब्रह्मस्वरूपपरा वेदान्ताः, किन्त्वात्मप्रतिपत्तिविषयकार्यपराः। तच्च कार्यं स्वात्मनि नियोज्यं नियुञ्जानं नियोग इति च मानान्तरापूर्वत्वाऽपूर्वमिति चाख्यायते। न च विषयानुष्ठानं विना तत्सिद्धिरिति स्वसिद्धयर्थं तदेव कार्यं स्वविषयस्य करणस्यात्मज्ञानस्यानुष्ठानमाक्षिपति। यथा च कार्यं स्वविषयाधीननिरूपणमिति ज्ञानेन विषयेण निरूप्यते, एवं
भामती-व्याख्या
प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा।
पुंसां येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते॥ (श्लो. वा. पृ० ४०६)
[जिस नित्य (अपौरुषेय) अथवा कृतक (पौरुषेय) पद-सन्दर्भ के द्वारा पुरुषों की किसी विषय में प्रवृत्ति या किसी विषय से निवृत्ति होती है, उस पद-सन्दर्भ को शास्त्र कहा जाता है, इसकी चर्चा पहले आ चुकी है]। अतः वेदान्त-वाक्यों में शास्त्रत्व की प्रसिद्धि होने के कारण सिद्धार्थपरता सम्भव नहीं।
(३) वेदान्त-वाक्य यदि ब्रह्मस्वरूप के ही प्रतिपादक माने जाते हैं, तब इनमें अर्थवत्ता (प्रयोजनवत्ता) नहीं रहती। यह जो कहा जाता है कि 'रज्जुरियं न सर्पः'—इत्यादि सिद्धार्थक शब्दों से यथाकथञ्चित् वाक्यार्थ का निश्चय हो जाने पर जैसे भय और कम्पादि की निवृत्ति देखी जाती है, वैसे ही "तत्त्वमसि"—इत्यादि शब्दों से वाक्यार्थ का निश्चय हो जाने पर कर्तृत्ववादि सांसारिक धर्मों की निवृत्ति हो जाती है। वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि जिन वेदान्तियों ने "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों से वाक्यार्थ का बोध प्राप्त कर लिया है, वे भी अपने को पहले की भांति ही कर्त्ता-भोक्ता मानते हैं, अतः उक्त वाक्यार्थ बोध से कर्तृत्ववादि सांसारिक धर्मों की निवृत्ति नहीं होती।
(४) यदि वेदान्त-वाक्यों के श्रवणमात्र से पुरुषार्थ की सिद्धि हो जाती है, तब “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह. उ. २।४।५) इत्यादि श्रुति वाक्यों में श्रवण के पश्चात् मननादि का विधान किस प्रयोजन के लिए किया गया? अतः श्रवणादि की व्यर्थतापत्ति का परिहार करने के लिए भी मानना पड़ता है कि वेदान्त-वाक्य ब्रह्म-स्वरूपमात्र के के बोधक नहीं माने जा सकते, अपितु आत्मा की प्रतिपत्ति (ज्ञान) को विषय करनेवाले कार्य पदार्थ के बोधन में ही वेदान्त-वाक्यों का तात्पर्य स्थिर होता है। वह कार्य पदार्थ अपनी उत्पत्ति में नियोज्य (अधिकारी) पुरुष का नियोजक होने के कारण नियोग एवं प्रमाणान्तर से अनधिगत होने के कारण अपूर्व भी कहलाता है, जैसा कि श्री शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—
क्रियादिभिन्नं यत्कार्यं वेद्यं मानान्तरैर्न तत्।
अतो मानान्तरापूर्वमपूर्वमिति गीयते॥
कार्यत्वेन वियोज्यं च स्वात्मनि प्रेरयन्नसौ।
नियोग इति मीमांसानिष्णा तैरभिधीयते॥ (प्र. पं. पृ. ४४१)
उस नियोगरूप कार्य की सिद्धि उसकी विषयीभूत आत्मप्रतिपत्ति के अनुष्ठान से विना सम्भव नहीं, अतः वह कार्य अपनी सिद्धि के लिए अपनी विषयीभूत आत्मप्रतिपत्ति
१२८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४
विषयतयैव शास्त्रेण ब्रह्म समर्प्यते । यथा-यूपादहवनीयादीन्यलौकिकान्यपि विधिशेषतया शास्त्रेण समर्प्यन्ते, तद्वत् । कुत एतत् ? प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजनत्वा-
भामती
ज्ञानमपि स्वविषयमात्मानमन्तरेणाशक्यनिरूपणमिति तन्निरूपणाय तादृशमात्मानमाक्षिपति तदेव कार्यम् । यथाहुः—'यत्तु तत्सिद्धयर्थमुपादीयते आक्षिप्यते तदपि विधेयमिति तन्त्रे व्यवहारः' इति । विधेयता च नियोगविषयस्य ज्ञानस्य भावार्थतयाऽनुष्ठेयता, तद्विषयस्य स्वात्मनः स्वरूपसत्ताविनिश्चितिः । आरोपिततद्भावस्य त्वन्यस्य निरूपकत्वे तेन तन्निरूपितं न स्यात् । तस्मात्तादृगात्मप्रतिपत्तिविधिपरेभ्यो वेदान्तेभ्यस्तादृगात्मविनिश्चयः । तदेतस्सर्वमाह ॐ यद्यपि इति ॐ । विधिपरेभ्योऽपि वस्तुतत्त्वविनिश्चय इत्यत्र निदर्शनमुक्तं ॐ यथा यूप इति ॐ । यूपे पशुं बध्नातीति बन्धनाय विनियुक्ते यूपे तस्यालौकिकत्वात् कोऽसौ यूप इत्यपेक्षिते खादिरो यूपो भवति, यूपं तक्षति, यूपमष्टाश्रीकरोतीत्यादिभिर्वार्क्षस्तक्षणादिविधिपरैरपि संस्काराविष्टं विशिष्टसंस्थानं दारु यूप इति गम्यते । एवमाहवनीयादयोऽप्यवगन्तव्याः । प्रवृत्तिनिवृत्तिपरस्य शास्त्रत्वं न स्वरूपपरस्य, कार्य एव सम्बन्धो न स्वरूपे, इति हेतुद्वयं भाष्यवाक्येनोपपादितं
भामती-व्याख्या
(आत्मज्ञान) के अनुष्ठान का आक्षेपक (कल्पक) होता है। जैसे कार्य (नियोग) अपने विषयीभूत आत्मज्ञान के द्वारा निरूपित होता है—'आत्मज्ञानविषयो नियोगः'। वैसे ही ज्ञान भी अपने विषयीभूत आत्मा के विना निरूपित नहीं हो सकता, अतः ज्ञान का निरूपण करने के लिए वैसे ही आत्मा का आक्षेप वही कार्य (नियोग) करता है, जैसा कि श्री प्रभाकर मिश्र कहते हैं—"यस्मिन्नयं पुरुषो नियुज्यते, स तद्विषयः। तस्मान्नैव विधिः कर्त्तव्यतामाह, विषयतया त्पादत्ते। तस्माद् यद्यदुपदीयते तत्तद्विधेयमिति तन्त्रे व्यवहारः" (बृहती. पृ. ३९)। यहाँ 'उपादीयते' का अर्थ 'आक्षिप्यते' है। यद्यपि नियोग का विषयीभूत ज्ञान सिद्ध पदार्थ होने से विधेय नहीं, तथापि धात्वर्थत्वेन विधेयत्व बन जाता है अर्थात् यहाँ ज्ञान का अर्थ उपासना है, जो कि स्वरूपत अनुष्ठेय पदार्थ है। उस ज्ञान के विषयीभूत आत्मा की विधेयता है—आत्मस्वरूप की सत्ता का विनिश्चय, क्योंकि यहाँ विधेयता अज्ञातज्ञप्तिरूप मानी गई है, आत्मस्वरूप-सत्ता का निश्चय अज्ञातार्थ-ज्ञापक होता है। यहाँ अनात्मपदार्थों में आरोपित आत्मा ज्ञान का विषय नहीं, अतः आत्म-प्रतिपत्ति की विधि के बोधक वेदान्त-वाक्यों से वैसे (अनारोपित) आत्मा का निश्चय होता है। भाष्यकार इसी भाव की अभिव्यक्ति कर रहे हैं—"यद्यपि शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्म"। विधिपरक वाक्यों से भी वस्तुतत्त्व का निश्चय होता है—इसमें दृष्टान्त देते हैं—"यथा यूपादहवनीयादीन्यलौकिकान्यपि विधिशेषतया शास्त्रेण समर्प्यन्ते, तद्वत्"। "यूपे पशुं बध्नाति"—इस प्रकार विहित बन्धन को सम्पन्न करने के लिए विनियुक्त यूप एक अलौकिक पदार्थ माना जाता है, क्योंकि तक्षणादि दृष्ट और प्रोक्षणादि अदृष्ट संस्कारों से युक्त यूप पदार्थ केवल लौकिक नहीं माना जा सकता, किन्तु लोक में अप्रसिद्ध होने के कारण अलौकिक माना जाता है। वहाँ 'कोऽसौ यूपः?' इस प्रकार की आकांक्षा में "खादिरो यूपो भवति", 'यूपं तक्षति', 'यूपमष्टाश्रीकरोति'—इत्यादि वाक्यों के द्वारा खैर की लकड़ी को छील एवं आठ पहलूवाले एक खम्भे को प्रस्तुत किया जाता है। इसी प्रकार "यदाहवनीये जुहोति"—इस विधि वाक्य में 'क आहवनीयः' ऐसे प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि "वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत" इत्यादि श्रुतियों से विहित आधानादि संस्कारों से विशिष्ट लोकोत्तर अग्नि की अवगति 'आहवनीय' शब्द से होती है। यूप और आहवनीयादि के समान ही ब्रह्म वस्तु की अवगति विधिपरक वेदान्त-वाक्यों से हो सकती है।
उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १२९
च्छास्त्रस्य । तथा हि शास्त्रतात्पर्य्यविद आहुः—‘दृष्टो हि तस्यार्थः कर्मावबोधनम्’ (जै० सू० १।१।१) इति । ‘चोदनेति क्रियायाः प्रवर्तकं वचनम्’ । ‘तस्य ज्ञानमुपदेशः’ (जै० सू० १।१।५) । ‘तद्भूतानां क्रियार्थेन समाम्नायः’ (जै० सू० १।१।२५) । ‘आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्यमतदर्थानाम्’ (जै० सू० १।२।१) इति च । अतः पुरुषं कचिद्विषयविशेषे प्रवर्त्तयत् कुतश्चिद्विषयविशेषात्निवर्त्तयच्चार्थवच्छास्त्रम् । तच्छेषतया चान्यदुपयुक्तम् । तत्सामान्याद्वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्यात् । सति
भामती
❄ प्रवृत्तिनिवृत्तिप्रयोजनत्वाद् ❄ इत्यादिना ❄ तत्सामान्याद्वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्याद् ❄ इत्यन्तेन । न च स्वतन्त्रं कार्यं नियोज्यमधिकारिणमनुष्ठातारमन्तरेणेति नियोज्यभेदमाह ❄ सति च विधिपरत्वे इति ❄ । ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतीति सिद्धवदर्थवादावगतस्यापि ब्रह्मभवनस्य नियोज्यविशेषाकाङ्क्षायां ब्रह्मबुभूषोर्नियोज्यविशेषस्य रात्रिसत्त्रन्यायेन प्रतिलम्भः । पिण्डपितृयज्ञन्यायेन तु स्वर्गकामस्य नियोज्यस्य कल्पनायामर्थवादस्यासमवेतार्थतयात्यन्तपरोक्षा वृत्तिः स्यादिति । ब्रह्मभावश्चामृतत्वमिति
भामती-व्याख्या
प्रवृत्ति-निवृत्तिरूप कार्य के प्रतिपादक पद-सन्दर्भ को शास्त्र कहा जाता है एवं कार्यरूप अर्थ में ही शब्दों का संगति-ग्रह होता है—ये दो हेतु भाष्यवाक्य के द्वारा उपपादित हुए हैं—‘‘प्रवृत्तिनिवृत्ति-प्रयोजनत्वात्’’—यहाँ से लेकर ‘‘तत्सामान्याद् वेदान्तानामपि तथैवार्थवत्त्वं स्यात्’’—यहाँ तक। नियोगरूप कार्य अपने नियोज्य (अधिकारी या अनुष्ठाता) पुरुष के बिना स्वतन्त्र नहीं हो सकता, अतः नियोज्य विशेष का कथन किया जाता है—‘‘सति च विधिपरत्वे।’’ जैसे स्वर्ग-कामनावान् नियोज्य के लिए अग्निहोत्रादि साधन पदार्थों का विधान किया जाता है, वैसे ही अमृतत्व-कामनावान् नियोज्य के लिए ब्रह्म-ज्ञान का विधान अत्यन्त युक्ति-युक्त है। अर्थात् जैसे ‘‘प्रतितिष्ठन्ति ह वैता रात्रीरुपयन्ति’’—इत्यादि अर्थवाद-वाक्य के द्वारा अवगत प्रतिष्ठाकामनावान् व्यक्ति रात्रिसत्र कर्म का नियोज्य माना जाता है, वैसे ही ‘‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’’—इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म-बुभूषु अथवा अमृतत्व-कामनावान् व्यक्ति ब्रह्म-ज्ञान का नियोज्य सिद्ध होता है।
यदि रात्रिसत्र-न्याय को छोड़ कर पिण्डपितृयज्ञन्याय का अवलम्बन किया जाता है, तब ब्रह्म-ज्ञान का स्वर्ग फल मानना होगा [अत्यन्त अश्रुत फल की कल्पना में पिण्डपितृयज्ञ-न्याय या विश्वजिन्त्याय को अपनाया जाता है, इन दोनों न्यायों का पर्यवसान लगभग समान अर्थ में माना जाता है। ‘‘अमावास्यायामपराह्णे पिण्डपितृयज्ञेन चरन्ति’’—इस प्रकार के अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा विहित पिण्डपितृयज्ञ के विषय में सन्देह होता है कि पिण्ड-पितृयज्ञ कर्म क्या दर्शपूर्णमास कर्म का अङ्गभूत कर्म है? अथवा स्वतन्त्र कर्म है? पूर्वपक्षी ने कहा—‘‘य एवं विद्वानमावास्यां यजते’’ इत्यादि वाक्यों के द्वारा निर्णय किया गया है कि ‘अमावास्या’ शब्द अमावास्या तिथि में विहित ‘आग्नेयः’, ‘ऐन्द्रं दधि’ और ‘ऐन्द्रं पयः’ इन तीन कर्मों की संज्ञा है, अतः पिण्डपितृयज्ञ कर्म ‘अमावास्या’ कर्म का अङ्ग है। वहाँ सिद्धान्त-सूत्र है—‘‘पिण्डपितृयज्ञः स्वकालत्वादनाङ्गं स्यात्’’ (जै. सू. ४।४।१९)। अर्थात् ‘‘अमावा-स्यायामपराह्णे’’—इस प्रकार ‘अपराह्न’ शब्द कालविशेष का वाचक है, अतः इस पद के समभिव्याहार में श्रुत ‘अमावास्या’ शब्द भी तिथि विशेष का ही बोधक है, दर्शपूर्णमास-घटक ‘अमावास्या’ नाम के कर्म का नहीं, फलतः पिण्डपितृयज्ञ किसी कर्म का अङ्ग न होकर स्वतन्त्र कर्म है और विश्वजिन्त्याय के आधार पर इस कर्म का स्वर्गरूप फल माना जाता है। प्रकृत में ब्रह्म-ज्ञान के लिए भी यही कहा जा सकता है कि ‘‘सः स्वर्गः स्यात् सर्वान् प्रत्यविशिष्टत्वात्’’
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१३० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४
न विधिपरत्वे यथा स्वर्गादिकामस्याग्निहोत्रादिसाधनं विधीयत एवममृतत्वकामस्य ब्रह्मज्ञानं विधीयत इति युक्तम् । नन्विह जिज्ञास्यवैलक्षण्यमुक्तम्—कर्मकाण्डे भव्यो धर्मो जिज्ञास्यः; इह तु भूतं नित्यनिर्वृत्तं ब्रह्म जिज्ञास्यमिति; तत्र धर्मज्ञानफलादनुष्ठानापेक्षाद्विलक्षणं ब्रह्मज्ञानफलं भवितुमर्हति । नार्हत्येवं भवितुम्; कार्यविधिप्रयुक्तस्यैव’
भामती
❖ अमृतत्वकामस्य ❖ । इत्युक्तम् । अमृतत्वं चामृतत्वादेव न कृतकत्वेन शक्यमनित्यमनुमातुम्, आगमविरोधादिति भावः ।
उक्तेन धर्मब्रह्मज्ञानयोर्वैलक्षण्येन विध्यविषयत्वं चोदयति ❖ ननु इति ❖ । परिहरति ❖ नार्हत्येवम् इति ❖ । अत्र चात्मदर्शनं न विधेयम् । तद्धि दृष्टोपलब्धिवचनत्वात् श्रावणं वा स्यात् प्रत्यक्षं
भामती-व्याख्या
(जै. सू. ४।३।१३) अर्थात् ऐसे कर्मों का स्वर्ग फल मानना सर्वाभीष्ट है ]। किन्तु ऐसा मानने पर “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा ब्रह्मभाव या अमृतत्वरूप फल एवं अमृतत्वकामनावान् नियोज्य का प्रतिपादन अत्यन्त असम्बद्ध हो जाता है, अतः रात्रिसत्रन्याय के द्वारा अमृतत्वरूप फल एवं अमृतत्वकामनावान् नियोज्य की कल्पना ही उचिततर है, अन्यथा “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—यह अर्थवाद वाक्य नितान्त निराधार, गौणार्थक एवं अविवक्षितवृत्तिक हो जाता है। यहाँ ब्रह्मभाव ही अमृतत्व है, अत एव भाष्यकार ने कहा है— “अमृतत्वकामस्य ब्रह्मज्ञानं विधीयते।” यहाँ कोई व्यक्ति 'ब्रह्मभावोऽनित्यः, कृतकत्वात्'—इस प्रकार ब्रह्मभाव की अनित्यता का अनुमान न कर सके, इस लिए ब्रह्मभाव का 'अमृतत्व' पद के द्वारा अभिधान किया गया है। 'अमृत' पद के द्वारा उत्पाद और विनाश से रहित वस्तु का अभिधान होता है, ब्रह्मभाव कृतक या उत्पन्न नहीं होता, केवल अभिव्यक्त होता है—“ब्रह्म सन् ब्रह्माप्येति”। इसी प्रकार “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यादि वाक्यों में अनन्तता को ही ब्रह्मभाव कहा गया है।
शङ्का—पूर्व मीमांसा में जिज्ञास्य धर्म और उत्तर मीमांसा में जिज्ञास्य ब्रह्म के ज्ञान का वैलक्षण्य पहले (विगत पृ. ८० पर) कहा गया—अभ्युदयफलं धर्मज्ञानम्, तच्चानुष्ठानापेक्षम्, निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मज्ञानं न चानुष्ठानान्तरापेक्षम्।” अतः धर्म और धर्म-ज्ञान में विधिविषयता होने पर भी ब्रह्म-ज्ञान में विधि-विषयता (विधेयता) नहीं हो सकती [ यद्यपि विगत पृ. ८० पर भाष्यकार ने धर्म और ब्रह्मरूप जिज्ञास्य पदार्थों का वैलक्षण्य कहा है और उनके ज्ञानों का भी, तथापि यहाँ प्रकृत शङ्का की साधनता के रूप में भाष्यकार जिज्ञास्य-वैलक्षण्य का स्मरण करते हैं—“ननु इह जिज्ञास्यवैलक्षण्यमुक्तम्” किन्तु वाचस्पति मिश्र धर्म-ज्ञान और ब्रह्म-ज्ञान के वैलक्षण्य को प्रकृत शङ्का का उपोद्वलक मानते हैं—‘धर्मब्रह्मज्ञानयोर्वैलक्षण्येन विध्यविषयत्वं चोदयति।’ श्री वाचस्पति मिश्र भाष्याक्षर की परिधि के इधर-उधर वहाँ ही पैर रखते हैं, जहाँ कहीं पौर्वापर्यादि का सामञ्जस्य सहज गति से नहीं हो पाता। यहाँ वस्तु-स्थिति यह है कि भाष्यकार ने “तत्र धर्मज्ञानफलाद् विलक्षणं ब्रह्मज्ञानफलं भवितुमर्हति”—इस शङ्का-वाक्य के द्वारा यह प्रतिज्ञा सूचित की है कि 'ब्रह्मज्ञानं धर्मज्ञानफलाद् विलक्षणफलकम्' ऐसी प्रतिज्ञा का साधन जिज्ञास्य-वैलक्षण्य नहीं हो सकता, क्योंकि पक्षधर्मतादि का सामञ्जस्य उसमें नहीं होता, अतः 'ब्रह्मज्ञानं धर्मज्ञानफलाद्विलक्षणफलकम्, धर्मज्ञानाद्विलक्षणत्वात्'—इस प्रकार के सुसंगत प्रयोग का आविष्कार करने के लिए वाचस्पति मिश्र ने साक्षात् ज्ञान-वैलक्षण्य का निर्देश किया और भाष्यकार ने विषय-वैलक्षण्य के द्वारा ज्ञान-वैलक्षण्य ध्वनित किया है ]।
उपासनाविधिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३१
ब्रह्मणः प्रतिपाद्यमानत्वात् । 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' (बृह० २।४।५) इति । 'य आत्माऽपहतपाप्मा', 'सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः' (छान्दो० ८।७।१), 'आत्मैत्येवोपासीत' (बृ० १।४।७) 'आत्मानमेव लोकमुपासीत' (बृ० १।४।१५) । 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' (मुण्ड० २।२।९) इत्यादिविधानेषु सत्सु 'कोऽसावात्मा, किं तद् ब्रह्म?'
भामती
वा । प्रत्यक्षमपि लौकिकमहंप्रत्ययो वा, भावनाप्रकर्षपर्यन्तजं वा ? तत्र श्रावणं न विधेयं, स्वाध्यायविधिनेवास्य प्राप्तित्वात्, कर्मश्रावणवत् । नापि लौकिकं प्रत्यक्षं, तस्य नैसर्गिकत्वात् । न चौपनिषदात्मविषयं भावनाध्येयवैशद्यं विधेयं, तस्योपासनविधानादेव वाजिनवदनुनिष्पादितत्वात् । तस्मादौपनिषदात्मोपासनाऽमृतत्वकाम नियोज्यं प्रति विधीयते । द्रष्टव्य इत्यादयस्तु विधिसरूपा न विधय इति । तवि-
भामती-व्याख्या
समाधान—एकदेशी आचार्य का कहना है कि "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै. उ. २।१।१) इत्यादि वाक्यों के द्वारा स्वतन्त्र ब्रह्म का प्रतिपादन नहीं किया जाता, अपितु "आत्मैत्येवोपासीत्" (बृह. उ. १।४।७) इत्यादि वेदान्त-वाक्यों के द्वारा विहित उपासना की विषय-वस्तु का प्रस्तुतीकरण किया गया है। यहाँ ज्ञानगत विधेयता के कथन का तात्पर्य उपासना की विधेयता में ही है, क्योंकि "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह. उ. २।४।५) यहाँ आत्मज्ञान दो प्रकार का अभिहित हुआ है—(१) प्रत्यक्षात्मक और (२) श्रावणादिरूप परोक्षज्ञान ! इनमें श्रावण ज्ञान यहाँ विधेय नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी प्राप्ति "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" इस विधि वाक्य से वैसे ही सम्पन्न हो जाती है, जैसे धर्म-ज्ञान की। प्रत्यक्ष ज्ञान दो प्रकार का होता है—(१) लौकिक और (२) अलौकिक (निरन्तरानुचिन्तन-जनित ।) लौकिक प्रत्यक्ष ज्ञान तो निसर्गतः अपनी इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षादि-घटित सामग्री से ही उत्पन्न होने के कारण विधेय नहीं होता। औपनिषद आत्मा की निदिध्यासनात्मक भावना (उपासना) से जनित अलौकिक आत्म-प्रत्यक्ष भी विधेय नहीं होता, क्योंकि आत्मोपासना का विधान कर देने से वैसे ही उस (ब्रह्मात्मप्रत्यक्ष) की अनुनिष्पत्ति हो जाती है, जैसे आमिक्षा बनाने के लिए तप्त दूध में डाले गए दधि से वाजिन अपने-आप निष्पन्न हो जाता है ["तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा"। प्रतप्त दूध में दधि डालने से दूध फट कर दो भागों में विभक्त हो जाता है—(१) पनीर और (२) पानी। जमे हुए (घनीभूत) भाग को पनीर या आमिक्षा कहते हैं और पानी को वाजिन कहा जाता है। वहाँ यह संशय होता है कि दध्यानयन (दधि डालने) का उद्देश्य क्या आमिक्षा है? अथवा वाजिन ? पूर्वपक्ष किया गया है—"एकनिष्पत्तेः सर्वं समं स्यात्" (जै. सू. ४।१।२२) अर्थात् तपते दूध में दही डालने पर आमिक्षा और वाजिन—दोनों की एक साथ निष्पत्ति होती है, अतः समानरूप से दोनों पदार्थ ही दध्यानयन के प्रयोजक होते हैं, किन्तु सिद्धान्त किया गया है—"संसर्गरसनिष्पत्तेरामिक्षा वा प्रधानं स्यात्" (जै. सू. ४।१।२३) अर्थात् "तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा"—इस विधि वाक्य में दधि-संसर्ग से निष्पन्न आमिक्षा का ही निर्देश 'सा वैश्वदेवो आमिक्षा'—इस वाक्य के द्वारा किया गया है, अतः प्रधानभूत आमिक्षा तत्त्व का विधान किया जाता है, वाजिन का नहीं, वह तो स्वयं अनुनिष्पन्न हो जाता है। फलतः यहाँ अमृतत्त्व-कामनावान् नियोज्य पुरुष के प्रति औपनिषद आत्मा की उपासना का विधान किया जाता है। "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" (बृह. उ. २।४।५) इस वाक्य के द्वारा ज्ञान का विधान नहीं किया जाता, क्योंकि यहाँ 'द्रष्टव्यः' पद में 'तव्य' प्रत्यय विध्यर्थक नहीं, केवल उसका अनुकरण विधि के समान प्रतीत होनेवाला विधि-सरूपमात्र है। पूर्व (पृ. १२६ पर)
१३२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
इत्याकाङ्क्षायां तत्स्वरूपसमर्पणेन सर्वे वेदान्ता उपयुक्ताः—‘नित्यः सर्वज्ञः सर्वगतो नित्यतृप्तो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावो विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ इत्येवमादयः तदुपासनाच्च शास्त्रदृष्टोऽदृष्टो मोक्षः फलं भविष्यतीति। कर्तव्यविध्यननुप्रवेशे वस्तुमात्रकथने हानोपादानासंभवात् ‘सप्तद्वीपा वसुमती’, ‘राजासौ गच्छति’ इत्यादिवाक्यवद्वेदान्तवाक्यानामानर्थक्यमेव स्यात्। ननु वस्तुमात्रकथनेऽपि ‘रज्जुरियं नायं सर्पः’ इत्यादौ भ्रान्तिजनितभीतिनिवर्तनेनार्थवत्त्वं दृष्टं, तथेहाप्यसंसार्यात्मवस्तुकथनेन संसारित्वभ्रान्तिनिवर्तनेनार्थवत्त्वं स्यात्। स्यादेतदेवम्, यदि रज्जुस्वरूपश्रवण इव सर्पभ्रान्तिः, संसारित्वभ्रान्तिर्ब्रह्मस्वरूपश्रवणमात्रेण निवर्तेत, नतु निवर्तते; श्रुतब्रह्मणोऽपि यथापूर्वं सुखदुःखादिसंसारिधर्मदर्शनात्, ‘श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः’ (बृह० २४।५) इति च श्रवणोत्तरकालयोर्मनननिदिध्यासनयोर्विधिदर्शनात्। तस्मात्प्रतिपत्तिविधिविषयतयैव शास्त्रप्रमाणकं ब्रह्माभ्युपगन्तव्यमिति।
भामती
यदुक्तम्' ॐ तदुपासनाच्च इति ॐ । अर्थवत्तया मननविप्रतीत्या चेत्यस्य शेषः प्रपञ्चो निगदव्याख्यातः ॥
तदेकदेशिमतं दूषयति ॐ अत्राभिधीयते ॐ । ॐ न ॐ एकदेशिमतम्, कुतः ? ॐ कर्मब्रह्मविद्याफल-
भामती-व्याख्या
कथित संग्रह श्लोक के 'अर्थवत्तया' और 'मननादि प्रतीत्या' इन पदों का विस्तार-भाष्य अत्यन्त सुगम है [अर्थात्—
अर्थवत्तया— पूर्वोक्त उपासना-वाक्यों के द्वारा विहित उपासना के विषयीभूत आत्मा और ब्रह्म के स्वरूप-बोध कराने में “नित्यः सर्वज्ञः सर्वगतो नित्यतृप्तो निरञ्जनः” इत्यादि सभी वेदान्त-वाक्य उपयुक्त होते हैं। इन्हीं वेदान्त-वाक्यों के द्वारा अवबोधित आत्मतत्त्व की उपासना से शास्त्र-प्रतिपादित और लोक में अनधिगत मोक्षरूप फल प्राप्त होता है। कर्त्तव्य-विधि में अननुप्रविष्ट वेदान्त-वाक्यों के द्वारा ब्रह्मरूप सिद्ध वस्तुमात्र के प्रतिपादन से किसी प्रकार की हान या उपादानात्मक प्रवृत्ति नहीं होती, फलतः वेदान्त-वाक्य वैसे ही अनर्थक होकर रह जाते हैं, जैसे—“सप्तद्वीपा वसुमती, राजासौ गच्छति” इत्यादि वाक्य।
यह जो कहा जाता है कि वस्तुमात्र का कथन करने से भी “रज्जुरियं न सर्पः”—इत्यादि स्थल पर सर्प-भ्रान्ति-जनित भय-कम्पादि दुःख की निवृत्ति होती है, दुःख-निवृत्ति भी पुरुषार्थ है। उसी प्रकार प्रकृत में असंसारी आत्म-वस्तु के श्रवण से कर्तृत्व-भोक्तृत्व जन्म-मरणादिरूप संसारित्व-भ्रान्ति निवृत्त हो जाती है और वेदान्त-वाक्यों में अर्थवत्ता (सप्रयोजनता) आ जाती है।
वह कहना तब सत्य हो सकता था, जब कि 'रज्जुरियम्'—इस प्रकार रज्जु-स्वरूप-श्रवण से सर्प-भ्रान्ति-निवृत्ति के समान ब्रह्मस्वरूप श्रवण मात्र से संसारित्व-भ्रान्ति निवृत्त हो जाती, किन्तु ऐसा नहीं, अपितु ब्रह्म-स्वरूप का जिन्होंने श्रवण कर लिया है, उन्हें भी पूर्ववत् सुखित्व-दुःखित्वरूप संसारित्व की भ्रान्ति बनी रहती है।
मननादिप्रतीत्या— “श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” (बृह. उ. २।४।५) इस श्रुति में श्रवण के पश्चात् मनन और निदिध्यासन का विधान देखा जाता है। यदि आत्मा के श्रवणमात्र से सर्वानर्थ की निवृत्ति हो जाती, तब श्रवण के पश्चात् मननादि का विधान व्यर्थ था, अतः उपासना-विधि के परिवेश में ही ब्रह्म शास्त्रप्रमाणक सिद्ध होता है]।
एकदेशिमत दूषण— “अत्राभिधीयते” से भाष्यकार एकदेशी आचार्य के मत में
· उपासनाविधिनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३३
अत्राभिधीयते—न; कर्मब्रह्मविद्याफलयोर्वैलक्षण्यात् । शारीरं वाचिकं मानसं च कर्म श्रुतिस्मृतिसिद्धं धर्माख्यं, यद्विषया जिज्ञासा 'अथातो धर्मजिज्ञासा' (जै० सू० १।१।१) इति सूत्रिता ।
अधर्मोऽपि हिंसादिः प्रतिषेधचोदनालक्षणत्वाज्जिज्ञास्यः परिहाराय । तयोश्चोदनालक्षणयोरर्थानर्थयोर्धर्माधर्मयोः फले प्रत्यक्षे सुखदुःखे शरीरवाङ्मनोभिरेवोपभुज्यमाने विषयेन्द्रियसंयोगजन्ये ब्रह्मादिषु स्थावरान्तेषु प्रसिद्धे । मनुष्यत्वादारभ्य ब्रह्मान्तेषु देहवत्सु सुखतारतम्यमनुश्रूयते । ततश्च तद्धेतोर्धर्मस्य तारतम्यं गम्यते । धर्मतारतम्यादधिकारितारतम्यम् । प्रसिद्धं चार्थित्वसामर्थ्यादिकृतमधिकारितारतम्यम् । तथा च यागाद्यनुष्ठायिनामेव विद्यासमाधिविशेषादुत्तरेण पथा गमनं, केवलैरिष्टापूर्तदत्तसाधनैर्धूमादिक्रमेण दक्षिणेन पथा गमनं, तत्रापि सुखतारतम्यं तत्साधनतारतम्यं च शास्त्रात् 'यावत्संपातमुषित्वा' (छान्दो० ५।१०।५) इत्यस्माद् गम्यते । तथा मनुष्यादिषु नारकस्थावरान्तेषु सुखलवश्चोदनालक्षणधर्मसाध्य एवेति गम्यते तारतम्येन वर्तमानः । तथोर्ध्वगतेष्वधोगतेषु च देहवत्सु दुःखतारतम्यदर्शनात्तद्धेतोरधर्मस्य प्रतिषेधचोदना-
भामती
योर्वैलक्षण्यात् ॐ । पुण्यापुण्यकर्मफले सुखदुःखे तत्र मनुष्यलोकमारभ्याब्रह्मलोकात् सुखस्य तारतम्यम् अधिकाधिकोत्कर्षः एवं मनुष्यलोकमारभ्य दुःखतारतम्यमावीचिलोकात्, तच्च सर्वं कार्यं च विनाशि च । आत्यन्तिकं त्वशरीरत्वमनतिशयं स्वभावसिद्धतया नित्यमकार्यमात्मज्ञानस्य फलम् । तद्धि फलमिव फलम् , अविद्यापनयनमात्रेणाविर्भावात् । एतदुक्तं भवति — त्वयाप्युपासनाविधिपरत्वं वेदान्तानामभ्युपगच्छता नित्यशुद्धबुद्धत्वादिपरब्रह्मात्मता जीवस्य स्वाभाविकी वेदान्तगम्याऽऽस्थीयते । सा चोपासनाविषयस्य विधेर्न
भामती-व्याख्या
दोषाभिधान कर रहे हैं कि एकदेशिमत युक्ति-युक्त इस लिए नहीं कि “कर्मब्रह्मविद्याफलयोर्वैलक्षण्यात्।” कर्म-विद्या और ब्रह्म-विद्या के फलों में यह विलक्षणता है कि कर्म या धर्माधर्म के ज्ञान से धर्म और अधर्म का अनुष्ठान होता है, धर्मानुष्ठान से पुण्य और अधर्माचरण से अपुण्य (पाप) उत्पन्न होता है, पुण्य का फल सुख और अपुण्य का फल दुःख है। यह सुख और दुःख सातिशय (तरतमभाव-युक्त) होता है अर्थात् इस मनुष्य लोक से लेकर ब्रह्म-लोक तक उत्तरोत्तर सुख उत्कृष्ट होता है एवं मनुष्य-लोक से लेकर अवीचि लोक तक दुःख अधिकाधिक होता जाता है। [ आगे चल कर ब्र. सू. ३।१।१५ में नरक लोकों की संख्या सात बताई गई है— “अपि च सप्त”। विष्णुपुराण, मार्कण्डेयादि पुराणों एवं मन्वादि स्मृतियों में संख्या अधिक उपलब्ध होती है। योग-भाष्यकार (३।२६) की व्यवस्था प्रसङ्ग के अनुरूप है— “अवीचेः प्रभृति मेरुपृष्ठं यावदित्येष भूर्लोकः, मेरुपृष्ठादारभ्या ध्रुवाद् ग्रहनक्षत्रतारा-विचित्रोऽन्तरिक्षलोकः, तत्परः स्वर्लोकः पञ्चविधो माहेन्द्रस्तृतीयो लोकः, चतुर्थः प्राजापत्यो महर्लोकः, त्रिविधो ब्राह्मः-जनस्तपोलोकः सत्यलोकः। तत्रावीचेरुपर्युपरि निविष्टा षण्महानरकभूमय महाकालाम्बरीषरौरवमहारौरवकालसूत्रान्धतामिस्राः ] वह (कर्म-ज्ञान का) सुखाद्यात्मक समस्त फल उत्पत्ति-विनाशशाली होता है किन्तु आत्म-ज्ञान का अशरीरत्वरूप मोक्षफल आत्यन्तिक (अविनाशी) निरतिशय (तरतमभाव या न्यूनाधिकभाव से रहित) स्वभाव-सिद्ध एवं अविद्या की निवृत्तिमात्र से आविर्भूत होता है। आशय है कि वेदान्त-वाक्यों को उपासना विधिपरक माननेवाले एकदेशी आचार्य को भी जीव में नित्यत्वात्मक ब्रह्मरूपता स्वाभाविकी एवं वेदान्त-गम्य अभीष्ट है। वह ब्रह्मरूपता उपासना-विधि का फल नहीं हो सकती, क्योंकि नित्य है। अविद्या-निवृत्ति को भी उपासना का फल नहीं कह सकते, क्योंकि अविद्या की निवृत्ति तो अविद्या का उदयमात्र हो जाने से सम्पन्न हो जाती है। विद्योदय को भी उपासना-
१३४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
लक्षणस्य तदनुष्ठायिनां च तारतम्यं गम्यते । एवमविद्यादिदोषवतां धर्माधर्मतारतम्य-
भामती फलं, नित्यत्वादकार्यत्वात् । नाप्यनाद्यविद्याविधानापनयः, तस्य स्वविरोधिद्योत्यादेव भावात् । नापि विद्योदयः, तस्यापि श्रवणमननपूर्वकौपासनाजनितसंस्कारसचिवादेव चेतसो भावात् । उपासनासंस्कारव- दुपासनापूर्वमपि चेतःसहकारीति चेत्, दृष्टं च खलु नैयोगिकं फलमैहिकमपि, यथा चित्राकारीर्यादि- नियोगानामनियतनियतफलानाम् । न, गान्धर्वशास्त्रोपासनावासनाया इवापूर्वानपेक्षायाः षड्जादिसाक्षा- त्कारे वेदान्तार्थोपासनावासनाया जीवब्रह्मभावसाक्षात्कारेऽनपेक्षाया एव सामर्थ्यात् । तथा चामृतीभावं प्रत्यहेतुत्वादुपासनापूर्वस्य नामृतत्वकामस्तत्कार्यमवबोद्धुमर्हति, अन्यदिच्छत्यन्यत् करोतीति हि विप्रति- षिद्धम् । न च तत्कामः क्रियामेव कार्यमवगमिष्यति नापूर्वमिति साम्प्रतम्, तस्या मानान्तरादेव-
भामती-व्याख्या
विधि का फल नहीं कह सकते, क्योंकि श्रवण-मननपूर्वक उपासना-जनित संस्कारों से युक्त चित्त के द्वारा ही विद्या का उदय माना जाता है । [ जैसे बाणादिगत बाह्य क्रिया से जनित वेगसंज्ञक संस्कारों में विधि-विषयता नहीं होती, अत एव उन्हें 'नियोग' या 'अपूर्व' पद के द्वारा अभिहित नहीं किया जाता, वैसे ही उपासनादि आन्तरिक (मानस क्रिया) से जनित संस्कार ऐहिक (तात्कालिक) फल के जनक होने के कारण न तो नियोगपदास्पद होते हैं और न विधि के विषय ] ।
शङ्का— उपासना-जनित ऐहिकफलक संस्कार जैसे चित्त के सहकारी होते हैं, वैसे ही उपासना-जनित पारलौकिकफलक नियोगरूप संस्कार भी उपासना-जनित ऐहिकफलक संस्कारों के सहकारी होते हैं, क्योंकि नियोग (अपूर्व) से केवल पारलौकिक फल नहीं, ऐहिक फल भी उत्पन्न होता देखा जाता है, जैसे कि “चित्रया यजेत पशुकामः", "कारीर्या यजेत वृष्टिकामः" इत्यादि वाक्यों के द्वारा विहित कर्मों का फल ऐहिक ही होता है । हाँ, चित्रा याग-साध्य अपूर्व का पशुरूप फल नियमतः ऐहिक नहीं, किन्तु कारीरी याग-साध्य अपूर्व का वृष्टिरूप फल नियमतः ऐहिक ही होता है, क्योंकि "यदि वर्षेत् तावत्येव होतव्यम्, यदि न वर्षेत् श्वोभूते हविर्निर्वपेत्”—इत्यादि प्राकरणिक वाक्यों का सामर्थ्य यह अत्यन्त स्पष्ट कर रहा है कि कारीरी याग केवल ऐहिक (तात्कालिक) वृष्टि के उद्देश्य से ही किया जाता है । फलतः उपासना-जनित संस्कारों के सहायक अपूर्व को लेकर विधि-विषयता का सामञ्जस्य किया जा सकता है ।
समाधान— जीवगत ब्रह्मात्मता के साक्षात्कार को वेदान्तार्थ की उपासना से जनित केवल ऐहिकफलक संस्कार वैसे ही उत्पन्न कर देते हैं, जैसे गान्धर्व शास्त्राभिहित अर्थ की उपासना से जनित संस्कार षड्जादि स्वर-ग्राम के साक्षात्कार को उत्पन्न कर देते हैं । जीवगत ब्रह्मभाव के साक्षात्कार की उत्पत्ति में वेदान्तार्थोपासना-जनित संस्कारों को अपूर्व की अपेक्षा नहीं होती, अतः वेदान्त वाक्यार्थ विधि के विषय क्योकर होंगे ? जब अमृतीभाव (ब्रह्मभाव) के प्रति उपासनापूर्व हेतु ही नहीं, तब अमृतत्व की कामना रखनेवाला व्यक्ति उसको अपना कर्तव्य नहीं मान सकता । अन्यथा 'अन्यदिच्छति अन्यत्करोति' चाहता कुछ और है और करता कुछ और ] यह कहावत लागू होगी । चाहना स्वर्ग और नरक के मार्ग पर चलना अत्यन्त विरुद्धाचरण है ।
अमृतत्व-कामनावान् व्यक्ति केवल “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति”—इत्यादि वाक्यार्थ की अभ्यास रूप क्रिया को ही अपना कार्य (कर्तव्य) समझेगा—ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि केवल
उपासनाविधिनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३५
निमित्तं शरीरोपादानपूर्वकं सुखदुःखतारतम्यमनित्यं संसाररूपं श्रुतिस्मृतिन्याय-
भामती तत्साधनत्वप्रतीतेर्विधेर्वैयर्थ्यात् । न चावघातादिविधितुल्यता, तत्रापि नियमापूर्वस्यान्यतोऽनवगतेः । न च ब्रह्मभूयादन्यदमृतत्वमार्थवादिकं किञ्चिदस्ति, येन तत्काम उपासनायामधिक्रियेत । विश्वजिन्न्यायेन तु स्वर्गकल्पनायां तस्य सातिशयत्वं क्षयित्वं चेति न नित्यफलत्वमुपासनायाः । तस्माद् ब्रह्मभूयस्याविद्यापिधानापनयमात्रेणाविर्भावाद्, अविद्यापनयस्य च वेदान्तार्थज्ञानावगतिपर्यन्तादेव सम्भवाद्, उपासनायाः संस्कारहेतुभावस्य संस्कारस्य च साक्षात्कारोपजनने मनःसाचिव्यस्य च मानान्तरसिद्धत्वात्, आत्मेत्येवोपासीतेति न विधिः, अपि तु विधिसरूपोऽयं, यथौपांशुयाजवाक्ये विष्णुरुपांशु यष्टव्य इत्यादयो विधि-
भामती-व्याख्या वैसे अभ्यास में साक्षात्कार की साधनता लौकिक अन्वय-व्यतिरेकरूप न्याय से ही सम्पन्न हो जाती है, उसके लिए किसी प्रकार के विधि-वाक्य की आवश्यकता नहीं होती। "व्रीहीनवहन्ति"-इत्यादि विधि वाक्य जैसे तुष-विमोकरूप दृष्टफल के उद्देश्य से अवघातादि क्रिया का विधान करते हैं, वैसे ही "आत्मेत्येवोपासीत"-इत्यादि वेदान्त वाक्य ब्रह्मात्मता-साक्षात्कार के लिए केवल आत्मोपासनारूप क्रिया का विधान करते हैं-ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि 'व्रीहीनवहन्ति'-इत्यादि वाक्य केवल अवघातरूप क्रिया का विधान नहीं करते, अपितु अवघातापूर्व का विधान करते हैं [ 'दर्शपूर्णमास' कर्म के प्रकरण में पठित "व्रीहीनवहन्ति"-यह वाक्य केवल तुष-विमोकरूप (धान की भूसी उतारने के लिए) अवघात ओखली में मूसल से कूटने) का विधान नहीं कर सकता, क्योंकि लोक-प्रसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक के आधार पर ही तुष-निवृत्ति के लिए नख-विदलन, पाषाण-घर्षणादि के समान अवघात भी निसर्गतः प्राप्त है, अतः अवघात-विधि को नियमार्थक माना गया है-"नियमाथवा पुनः श्रुतिः" (जै. सू. ४।२।२४) अर्थात् अवघात को छोड़ कर नख-विदलनादि के द्वारा तुष-निवृत्ति करने पर तण्डुल-निष्पत्तिरूप दृष्ट फल का लाभ तो हो जायगा, किन्तु दर्शपूर्णमास-जन्य परमापूर्व या उसके जनकीभूत उत्पत्त्यपूर्व की सम्पत्ति नहीं होगी, उसकी सम्पत्ति तभी होगी, जब कि नियमतः अवघात का अनुष्ठान किया जाय, फलतः 'व्रीहीनवहन्ति'-इस वाक्य के द्वारा अवघातनियम-जन्य नियमापूर्व का अवबोधन किया जाता है]। "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" (मुण्ड. ३।२।९) इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मभाव अमृतत्व से भिन्न नहीं, यदि अमृतत्व से ब्रह्मभाव भिन्न होता, तब अवश्य उसकी कामना रखनेवाला व्यक्ति ब्रह्मोपासना का अधिकारी बन जाता। 'विश्वजित्' न्याय (जै. सू. ४।३।७) के आधार पर ब्रह्मोपासना का यदि स्वर्ग फल मान कर स्वर्गकामानावान् व्यक्ति को अधिकारी माना जाता है, तब स्वर्गरूप फल के सातिशय और नश्वर होने के कारण ब्रह्मोपासना में अनित्य-फलकत्वापत्ति होती है और "न स पुनरावर्तते" (छां. ८।१५।१) इत्यादि श्रुतियों का विरोध उपस्थित होता है। अतः जीव में ब्रह्मभाव का अविद्या की निवृत्तिमात्र से आविर्भाव माना जाता है। अविद्या की निवृत्ति तो वेदान्ताभिहित अर्थ के साक्षात्कारात्मक ज्ञान से ही हो जाती है, उसके लिए उपासना की आवश्यकता ही नहीं। उपासना में संस्कार-जनकता और मन के द्वारा साक्षात्काररूप फल की उत्पत्ति के लिए संस्कार मन के सहायक होते हैं-यह ज्ञान लौकिक अन्वय-व्यतिरेक से ही हो जाता है, उसके लिए उपासना-विधि की आवश्यकता नहीं, फलतः "आत्मेत्येवोपासीत" (बृह. उ. १।४।७) यह वाक्य विधिरूप नहीं, केवल वैसे ही विधि का अनुकरणमात्र है, जैसे- उपांशुयाग के प्रकरण में "विष्णुरुपांशु यष्टव्यः" इत्यादि वाक्य ।
| १३६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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सिद्धम् । तथा च श्रुतिः--'न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति' (छान्दो० ८।१२।१) इति यथावर्णितं संसाररूपमनुवदति । 'अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः' (छान्दो० ८।१२।१) इति प्रियाप्रियस्पर्शनप्रतिषेधाच्चोदनालक्षण-धर्मकार्यत्वं मोक्षाख्यस्याशरीरत्वस्य प्रतिषिध्यत इति गम्यते । धर्मकार्यत्वे हि प्रियाप्रियस्पर्शनप्रतिषेधो नोपपद्यते । अशरीरत्वमेव धर्मकार्यमिति चेन्न; तस्य स्वाभाविकत्वात् । 'अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति' (काठ० १।२।२१) 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' (मुण्ड० २।१।२) 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः' (बृह० ४।३।१५) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अत एवानुष्ठेयकर्मफलविलक्षणं मोक्षाख्यमशरीरत्वं नित्यमिति सिद्धम् । तत्र किञ्चित्परिणामिनित्यं यस्मिन्विक्रिय-माणेऽपि तदेवेदमिति बुद्धिर्न विहन्यते, यथा पृथिव्यादिजगन्नित्यत्ववादिनाम् । यथा च सांख्यानां गुणाः, इदं तु पारमार्थिकं, कूटस्थनित्यं, व्योमवत्सर्वव्यापि, सर्वविक्रि-
भामती
सरूपा न विधय इति तात्पर्यार्थः । श्रुतिस्मृतिन्यायसिद्धमित्युक्तं, तत्र श्रुतिं दर्शयति ॐ तथा च श्रुतिः इति ॐ । न्यायमाह ॐ अत एव इति ॐ । यत् किल स्वाभाविकं तन्नित्यं, यथा चैतन्यं, स्वाभाविकं चेदं, तस्मान्नित्यम् । परे हि द्वयीं नित्यतानाहुः- कूटस्थनित्यतां परिणामिनित्यतां च, तत्र नित्यमित्युक्ते मा भूदस्य परिणामिनित्यतेत्यत आह ॐ तत्र किञ्चिद् इति ॐ । परिणामिनित्यता हि न पारमार्थिकी । तथा हि- तत्सर्वात्मना वा परिणमेदेकदेशेन वा ? सर्वात्मना परिणामे कथं न तत्त्वव्याहतिः ? एकदेश-
भामती-व्याख्या
विष्णुरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्या-वजामित्वाय'' (तै. सं. २।६।६) इस वाक्य को लेकर जै. सू. २।१।४ में पूर्वपक्ष किया गया है कि विष्णुवादि तीन वाक्यों के द्वारा विहित तीन कर्मों का अनुवादक प्रथम वाक्य है। उसका निराकरण करते हुए सिद्धान्ती ने कहा है कि उपक्रम और उपसंहार को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि निरन्तर पुरोडाशद्रव्यक दो कर्मों का अनुष्ठान करने पर आलस्य या उकताहट होती है, अतः उन कर्मों के मध्य में घृतादि विजातीय द्रव्यवाले कर्म का विधान अपेक्षित है, अतः 'उपांशुयाजमन्तरा यजति'—यह वाक्य उपांशुयाज का विधायक है और विष्णुवादि वाक्य विधायक नहीं, अपितु अर्थवादमात्र हैं, केवल विधि के सरूप हैं, विधि नहीं] ।
भाष्यकार ने जो धर्माधर्म के फलभूत सुख-दुःख में तारतम्य (न्यूनाधिकभाव) दिखाते हुए कहा है—"एवमविद्याऽदिदोषवतां धर्माधर्मतारतम्यनिमित्तं शरीरोपादानपूर्वकं सुखदुःखतारतम्यमनित्यं संसाररूपं श्रुतिस्मृतिन्यायसिद्धम्।" वहाँ प्रक्रान्त श्रुति का निदर्शन प्रस्तुत किया गया है—"तथा च श्रुतिः—'न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति' (छां. ८।१२।१)। अर्थात् धर्म और अधर्म के फलोपभोग में आत्मा को शरीराभिमान बना रहता है और जब तक शरीराभिमान है, तब तक प्रिय (सुख) एवं अप्रिय (दुःख) की अपहति (निवृत्ति) नहीं हो सकती । कथित न्याय-सिद्धता दिखाने के लिए न्याय दिखाया गया है—"अत एवानुष्ठेयकर्मफलविलक्षणं मोक्षाख्यमशरीरत्वं नित्यमिति सिद्धम्।" उक्त 'न्याय' पद से अनुमान विवक्षित है, अनुमान के वेदान्त-सिद्धान्त में उदाहरण, उपनय और निगमन अथवा प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण नाम के तीन अवयव माने जाते हैं, उसके अनुरूप न्याय का पूर्ण कलेवर इस प्रकार कहा जाता है—'यत् स्वाभाविकं, तन्नित्यं, यथा चैतन्यम् । स्वाभाविकं चेदम् । तस्मान्नितम् ।' इसी तथ्य को प्रतिज्ञादिरूप में इस प्रकार कह सकते हैं—'अशरीरत्वात्मकं मोक्षफलं नित्यम्, स्वाभाविकत्वाद्, यत्स्वाभाविकं तन्नित्यं यथा जीवस्य
कूटस्थनित्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३७
भामती परिणामे वा स एकदेशस्ततो भिन्नो वाऽभिन्नो वा ? भिन्नश्चेत् कथं तस्य परिणामः ? न ह्यन्यस्मिन् परिणममानेऽन्यः परिणमतेऽतिप्रसङ्गात् । अभेदे वा कथं न सर्वात्मना परिणामः ? भिन्नाभिन्नं तदिति चेत्, तथा हि तदेव कारणात्मनाऽभिन्नं भिन्नं च कार्यात्मना कटकादय इवाभिन्ना हाटकात्मना भिन्नाश्च कटकाद्यात्मना । न च भेदाभेदयोर्विरोधान्नैकत्र समावेश इति युक्तम्, विरुद्धमिति नः क्व संप्रत्ययः ? यत्प्रमाणविपर्ययेण वर्त्तते । यत्तु यथा प्रमाणेनावगम्यते तस्य तथा भाव एव । कुण्डलमिदं सुवर्णमिति सामानाधिकरण्यप्रत्यये व्यक्तं भेदाभेदौ चकास्तः । तथा ह्यात्यन्तिकेऽभेदेऽन्यतरस्य द्विरवभासप्रसङ्गः । भेदे चात्यन्तिके न सामानाधिकरण्यं, गवाश्ववत् । आधाराधेयभावे एकाश्रयत्वे वा न सामानाधिकरण्यं
भामती-व्याख्या चैतन्यम् ।' 'सांख्यादिमतवाद के अनुसार दो प्रकार की नित्यता मानी जाती है—(१) कूटस्थ-नित्यता और (२) परिणामिनित्यता । ब्रह्माभावरूप मोक्ष में परिणामिनित्यता की भ्रांति हटाने के लिए नित्यता के दो भेद प्रदर्शित किए गए हैं—"तत्र किंचित्परिणामिनित्यमित्यादि ।" जो वस्तु परिणत ( विकृत ) होने पर भी अपने मौलिक रूप में प्रत्यभिज्ञात होती रहती है, उसे परिणामिनित्य कहते हैं, जैसे स्वर्ण-मृदादि पदार्थ कटक-घटादिरूप में परिणत होकर भी अपनी तात्त्विक स्वर्णरूपता मृद्रूपता को कभी नहीं गँवाते, अतः परिणामिनित्य कहे जाते हैं। परिणामिनित्यता कभी पारमार्थिकी नहीं होती, क्योंकि परिणमनशील वस्तु क्या पूर्णरूपेण परिणत होती है ? अथवा एकदेशेन ? पूर्णरूपेण परिणत होने पर तात्त्विक व्याहृति (विनाश) क्यों नहीं होता ? एकदेशेन परिणत होने पर वह एकदेश उस वस्तु से भिन्न माना जाता है ? अथवा अभिन्न ? यदि भिन्न है, तब उस अपने से भिन्न एक देश के परिणत होने पर वह वस्तु क्योंकर परिणत मानी जायगी ? क्योंकि अन्य ( भिन्न ) वस्तु के परिणत होने पर अन्य वस्तु में 'परिणमते'—ऐसा व्यवहार कभी नहीं होता । अन्यथा एक स्वर्ण-पिण्ड के परिणत होने पर 'विश्वं परिणमते'—ऐसा व्यवहार अतिप्रसक्त होगा । यदि वह ( परिणममान ) एकदेश उस वस्तु से अभिन्न है, तब उस एकदेश के परिणत होने पर उससे अभिन्न वस्तु का सर्वात्मना परिणाम क्यों नहीं माना जाता ?
शङ्का—वस्तु का परिणममान अवयव वस्तु से भिन्न भी है और अभिन्न भी, क्योंकि एक ही सुवर्णरूप कारण के कटक-कुण्डलादि कार्य परस्पर कार्यरूपेण ( कटकत्वादिरूपेण ) भिन्न और कारणगत सुवर्णत्वरूपेण अभिन्न । 'कटकं कुण्डलाद् भिन्नमभिन्नं च'—ऐसी प्रतीति को विरुद्ध भी नहीं कह सकते, क्योंकि प्रमाण से बाधित पदार्थ को विरुद्ध कहा जाता है, किन्तु जैसे एक ही कुण्डल में 'कुण्डलमिदं' और 'सुवर्णमिदम्'—इस प्रकार दोनों प्रतीतियाँ प्रामाणिक मानी जाती हैं, वैसे ही कटक में भी 'कटकमिदम्' और 'सुवर्णमिदम्'—इस प्रकार दोनों प्रतीतियाँ अनुभव-सिद्ध हैं, फलतः कटक और कुण्डल—दोनों सुवर्णरूप होने से अभिन्न और कटकत्वादिरूपेण भिन्न हैं— ऐसा मानना प्रमाण-बाधित नहीं, अपितु प्रमाण के अनुरूप ही है, तब इसे विरुद्ध क्योंकर कहा जा सकता है ? जिन पदार्थों में भेद और अभेद—दोनों प्रमाण-सिद्ध हैं, उन्हें भिन्नाभिन्न कहना विरुद्ध कदापि नहीं ।
कटक और कुण्डल का ऐकान्तिक अभेद मानने पर 'इमे कटककुण्डले'—ऐसी प्रतीति न होकर 'इमे कटके या इमे कुण्डले'—इस प्रकार एक-एक कार्य का दो बार भान होना चाहिए । इसी प्रकार दोनों का ऐकान्तिक भेद मानने पर जैसे कटक को कुण्डल नहीं कहा जाता, वैसे कटक को सुवर्ण भी नहीं कह सकते, अतः 'कटकं सुवर्णम्'—इस प्रकार का सामानाधिकरण्य-व्यपदेश न हो सकेगा, क्योंकि अत्यन्त भिन्न गौ और अश्व का कहीं भी 'गौरश्वः'—इस प्रकार का सामानाधिकरण्य-व्यवहार कभी नहीं होता । यद्यपि अपर्याय शब्दों
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| १३८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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भामती
न हि भवति कुण्डं बदरमिति। नाप्येकासनस्थयोश्चैत्रमैत्रयोश्चैत्रो मैत्र इति। सोऽयमबाधितोऽसन्दिग्धः सर्वजनीनः सामानाधिकरण्यप्रत्यय एव कार्यकारणयोर्भेदाभेदौ व्यवस्थापयति। तथा च कार्याणां कारणात्मकत्वात् कारणस्य च सद्रूपस्य सर्वत्रानुगमात् सद्रूपेणाभेदः कार्यस्य जगतो भेदः कार्यरूपेण गोघटादिनेति। यथाहुः—
कार्यरूपेण नानात्वमभेदः कारणात्मना।
हेमात्मना यथाऽभेदः कुण्डलाद्यात्मना भिदा॥ इति।
अत्रोच्यते—कः पुनरयं भेदो नाम, यः सहाभेदेनेकत्र भवेत्। परस्पराभाव इति चेत्, किमयं कार्यकारणयोः कटकहाटकयोरस्ति न वा। न चेदेकत्वमेवास्ति न च भेदः। अस्ति चेद् भेद एव नाभेदः। न च भावाभावयोर्विरोधः, सहावस्थानासम्भवात्। सम्भवे वा कटकवर्धमानकयोरपि तत्त्वेनाभेदप्रसङ्गः, भेदस्याभेदाविरोधात्। अपि च कटकस्य हाटकादभेदे यथा हाटकात्मना कटकमुकुटकुण्डलादयो न भिद्यन्ते
भामती-व्याख्या
का एक ही अर्थ में वाच्यत्वेन प्रवृत्त होना सामानाधिकरण्य कहलाता है, वह भेदाभेद-पक्ष में ही बनता है—ऐसा नहीं, अपितु आधाराधेयभाव और एकाश्रयवृत्तिता को लेकर भी देखा जाता है, जैसे 'मृद् घटः'—यहाँ पर मृत्तिका आधार और घट आधेय है, एवं 'एकं रूपम्'—यहाँ 'एकत्व' संख्या और 'रूप'—दोनों पदार्थ एक ही घटादि आश्रय में रहते हैं, अतः उनका भी सामानाधिकरण्य-व्यवहार देखा जाता है। तथापि वह काचित्क है, सार्वत्रिक नहीं, अन्यथा कुण्डाद्यात्मक आधार और बदराद्यात्मक आधेय का भी 'कुण्डं बदरम्'—ऐसा व्यवहार होना चाहिए। इसी प्रकार एक ही आसन पर बैठे हुए चैत्र और मैत्र का भी 'चैत्रो-मैत्रः'—इस प्रकार सामानाधिकरण्य-प्रत्यय होना चाहिए। परिशेषतः सभी सुवर्णादि कारणपदार्थों और कटकादि कार्य पदार्थों का सार्वत्रिक और सर्वजनीन अबाधित सामानाधिकरण्य-व्यवहार कार्य और कारण में भेदाभेद सम्बन्ध का व्यवस्थापक होता है। फलतः सभी गो-घटादि कार्य पदार्थों में अनुगतरूप से प्रतीत होनेवाले सद्रूप कारण का अपने कार्य-वर्ग के साथ भेदाभेद मानना आवश्यक है, जैसा कि अनेकान्तवादियों ने कहा है—
कार्यरूपेण नानात्वमभेदः कारणात्मना।
हेमात्मना यथाऽभेदः कुण्डलाद्यात्मना भिदा॥
[ इस पद्य में 'भिदा' पद का अर्थ भेद है। सुवर्ण और कुण्डलादि का 'सुवर्णं कुण्डलम्' और 'सुवर्णस्य कुण्डलम्'—इस प्रकार के दोनों व्यवहारों का भेदाभेद सम्बन्ध के द्वारा निर्वाह हो जाता है ]।
समाधान—वह भेद पदार्थ कौन है जो कि अभेद के साथ एक आधार में रह जाता है? यदि वह अन्योऽन्याभावात्मक है, तब जिज्ञासा होती है कि वह (अन्योऽन्याभाव) सुवर्ण और कटकादिरूप कारण और कार्य पदार्थों में रहता है? अथवा नहीं? यदि नहीं रहता, तब कार्य और कारण का आत्यन्तिक अभेद ही स्थिर होता है, भेद नहीं। कार्य और कारण पदार्थों में यदि अन्योऽन्याभाव रहता है, तब उनमें भेद ही पर्यवसित होता है, अभेद नहीं। 'भेदाभेद या भावाभाव का विरोध नहीं—ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दो विरोधी पदार्थों का सहावस्थान (एकत्र रहना) सम्भव नहीं। यदि सम्भव माना जाता है, तब कटक, कुण्डल और वर्धमानक (प्याला) आदि कार्य पदार्थों का आत्यन्तिक अभेद होना चाहिए, क्योंकि भेद अत्र अभेद का विरोधी होता है। दूसरी बात यह भी है कि कटक जिस सुवर्ण से अभिन्न है, उसी सुवर्ण से मुकुट और कुण्डलादि अभिन्न हैं, अतः कटक, मुकुट और कुण्डलादि का
कूटस्थनित्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १३९
भामती
एवं कटकात्मनापि न भिद्येरन्, कटकस्य हाटकादभेदात् । तथा च हाटकमेव वस्तु सन्न कटकादयो भेदस्याप्रतिभासनात् । अथ हाटकत्वेनाप्यभेदो न कटकत्वेन तेन तु भेद एव कुण्डलादेः । यदि हाटकादभिन्नः कटकः कथमयं कुण्डलादिषु नानुवर्त्तते । नानुवर्त्तते चेत्, कथं हाटकादभिन्नः कटकः । ये हि यस्मिन्ननुवर्त्तमाने व्यावर्तन्ते ते ततो भिन्ना एव, यथा सूत्रात् कुसुमभेदाः । नानुवर्त्तन्ते चानुवर्त्तमानेऽपि हाटकत्वे कुण्डलादयः, तस्मात्तेऽपि हाटकाद्भिन्ना एवेति । सत्तानुवृत्त्या च सर्ववस्त्वनुगमे इदमिह नेदमिदमस्मान्नेदमिदानीं नेदमिदमेवं नेदमिति विभागो न स्यात् । कस्यचित् क्वचित् कदाचित् कथञ्चिद्विवेकहेतोरभावात् । अपि च दूरात्कनकमित्यवगते न तस्य कुण्डलादयो विशेषा जिज्ञास्येरन्, कनकादभेदात्तेषां, तस्य च ज्ञातत्वात् । अथ भेदोऽप्यस्ति कनकात् कुण्डलादीनामिति कनकावगमेऽप्यज्ञातास्ते । नन्वभेदोऽप्यस्तीति किं न ज्ञाताः । प्रत्युत ज्ञानमेव तेषां युक्तं, कारणाभावे हि कार्याभाव औत्सर्गिकः, स च कारण-
भामती-व्याख्या
आत्यन्तिक अभेद होना चाहिए, क्योंकि 'स्वाभिन्नाभिन्नस्य स्वाभिन्नत्वम्'—ऐसा नियम लोक-प्रसिद्ध है, तब तो कटकादि के रूप में सर्वत्र 'सुवर्णम्-सुवर्णम्'—ऐसा ही भान होना चाहिए, कटकादि की कोई वस्तु-सत्ता नहीं रह जाती ।
यदि कहा जाय कि कटक में दो धर्म रहते हैं—( १ ) सुवर्णत्व और ( २ ) कटकत्व । कटक का कुण्डलादि से जो अभेद माना जाता है, वह सुवर्णत्वेन ही माना जाता है, कटकत्वेन नहीं । तब यह प्रश्न उठता है कि यदि सुवर्ण से कटक अभिन्न है, तब कुण्डलादि से अभिन्न क्यों नहीं । यदि कुण्डलादि से कटक अभिन्न नहीं, तब वह सुवर्ण से भी अभिन्न न हो सकेगा, क्योंकि अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा सुवर्ण से कटकादि का भेद सिद्ध होता है—'यस्मिन् अनुवर्तमानं यद् व्यावर्तते, तत् ततो भिन्नम्' इस नियम के अनुसार जैसे पुष्पमाला के द्वितीयादि पुष्पों के स्थान पर अनुवृत्त न रहनेवाले प्रथमादि पुष्प सर्वत्रान्वयी सूत्र (धागे) से भिन्न होते हैं, वैसे ही कुण्डलादि में अनुवर्तमान सुवर्ण से व्यावर्तमान कटक का भेद न्यायसिद्ध है । कुण्डलादि में सुवर्ण की अनुवृत्ति होने के कारण यदि कुण्डलादि का सुवर्ण से अभेद माना जाता है, तब सत्तारूप कारण का 'घटः सन्', 'पटः सन्' इस प्रकार समस्त कार्यों में अनुवर्तन होने के कारण सभी कार्य सदात्मक हो जाते हैं और असत् कोई नहीं रहता, तब 'इदमिह नेदम्', 'इदमस्मान्नेदम्', 'इदमिदानीं नेदम्', 'इदमेव नेदम्'—ऐसा विभाग न हो सकेगा, क्योंकि किसी वस्तु का कहीं पर भी कोई विभाजक धर्म नहीं रह जाता । यह भी एक प्रश्न उठ खड़ा होता है कि दूर से 'सुवर्णमिदम्'—इस प्रकार का ज्ञान हो जाने पर जैसे सुवर्ण के विषय में सन्देह नहीं होता, वैसे ही कुण्डलादि का सन्देह नहीं होना चाहिए, क्योंकि सुवर्ण से कुण्डलादि का अभेद माना जाता है । यदि कहा जाता है कि सुवर्ण से कुण्डलादि का भेद भी माना जाता है, अतः सुवर्ण का ज्ञान हो जाने पर भी कुण्डलादि अज्ञात रह जाते हैं, फलतः उनकी जिज्ञासा होती है । तब यह भी स्मरण दिलाया जा सकता है कि कुण्डलादि से सुवर्ण का अभेद भी तो माना जाता है, अतः ज्ञात हो जाने पर कुण्डलादि की जिज्ञासा क्यों होगी ? कुण्डलादि के ज्ञान का कारण न होने पर ज्ञानरूप कार्य का अभाव हो सकता था, किन्तु सुवर्णाभेद रूप कारण का सद्भाव होने से कारणाभाव बाधित हो जाता है, ज्ञात सुवर्ण से अभिन्न होने के कारण जब कुण्डलादि भी ज्ञात ही हो जाते हैं, तब उनकी जिज्ञासा एवं जिज्ञासा-निवृत्ति के लिए उनका ज्ञान करना निरर्थक ही हो जाता है । अतः जिज्ञास्य अत एव अज्ञात कुण्डलादि ज्ञात सुवर्ण से भिन्न ही सिद्ध होते हैं, क्योंकि 'यस्मिन् ज्ञाते यन्न
| १४० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४ |
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भामती
सत्तयाऽपोद्यते। अस्ति चाभेदे कारणसत्तेति कनके ज्ञाते ज्ञाता एव कुण्डलादय इति तज्जिज्ञासाज्ञानानि चानर्थकानि स्युः। तेन यस्मिन् गृह्यमाणे यन्न गृह्यते तत्ततो भिद्यते। यथा करभे गृह्यमाणेऽगृह्यमाणो रासभः करभात्। गृह्यमाणे च दूरतो हेम्नि न गृह्यन्ते तस्य भेदाः कुण्डलादयः, तस्मात्ते हेम्नो भिद्यन्ते। कथं तर्हि हेम कुण्डलमिति सामानाधिकरण्यमिति चेत् न ह्याधाराधेयभावे समानाश्रयत्वे वा सामानाधि-करण्यमित्युक्तम्। अथानुवृत्तिव्यावृत्तिव्यवस्था च हेम्नि ज्ञाते कुण्डलादिविजिज्ञासा च कथम्। न खल्वभेद ऐकान्तिकेऽनेकान्तिके चेतदुभयमुपपद्यते यत इत्युक्तम्। तस्माद् भेदाभेदयोरन्यतरस्मिन्नवधेयेऽभेदोपादानैव भेदकल्पना न भेदोपादानाऽभेदकल्पनेति युक्तम्। भिद्यमानतन्त्रत्वाद्भेदस्य भिद्यमानानां च प्रत्येकमेकत्वात्, एकाभावे चानाश्रयस्य भेदस्यायोगात्, एकस्य च भेदानधीनत्वात्, नायमयमिति च भेदग्रहस्य प्रतियोगिग्रह-सापेक्षत्वादेकत्वग्रहस्य चान्यानपेक्षत्वादभेदोपादानेवानिर्वचनीयभेदकल्पनेति साम्प्रतम्। तथा च श्रुतिः— 'मृत्तिकेत्येव सत्यम्' इति तस्मात् कूटस्थनित्यतैव पारमार्थिकी न परिणामिनित्यतेति सिद्धम्। ॐ व्योम-वद् ॐ इति च दृष्टान्तः परसिद्धः अस्मन्मते तस्यापि कार्यत्वेनानित्यत्वात्।
अत्र च ॐ कूटस्थनित्यम् ॐ। इति निर्वर्त्यकर्मतामपाकरोति ॐ सर्वव्यापि ॐ। इति प्राप्य-
भामती-व्याख्या
ज्ञायते तत् ततो भिद्यते'—इस न्याय के अनुसार जैसे करभ (ऊँट) का ज्ञान हो जाने पर भी रासभ (गर्दभ) अज्ञात ही रह जाता है, अतः वह करभ से भिन्न होता है, वैसे ही कुण्डलादि सुवर्ण से भिन्न क्यों न होंगे ?
यदि सुवर्ण से कुण्डलादि भिन्न हैं, तब 'सुवर्णं कुण्डलम्'—ऐसा सामानाधिकरण्य-व्यवहार क्योंकर होगा ? आधाराधेयभाव या एकाश्रयवृत्तित्व को लेकर सामानाधिकरण्य, व्यवस्था नहीं हो सकती—यह कहा जा चुका है। अनुवृत्ति (अन्वय-व्यतिरेक) के आधार पर कारण और कार्य का भेद सम्भव नहीं, क्योंकि इस पक्ष में भी दूर से 'सुवर्णमिदं' ऐसा ज्ञान हो जाने पर कुण्डलादि की जिज्ञासा कैसे होगी ? जैसे ऐकान्तिक अभेद मानने पर कुण्डलादि की जिज्ञासा उपपन्न नहीं होती, वैसे ही अनैकान्तिक (भेदाभेद) पक्ष में भी ये दोनों (अनुवृत्ति-व्यावृत्ति-व्यवस्था एवं कुण्डलादि-जिज्ञासा) उपपन्न नहीं हो सकते। फलतः भेद और अभेद में से एक का परित्याग आवश्यक हो जाने पर भेद का परित्याग एवं भेदाश्रित भेद का कल्पन मानना उचित है, भेदाश्रित अभेद की कल्पना युक्त नहीं, क्योंकि भेद सदैव भिद्यमान पदार्थों के आश्रित होता है, भिद्यमान पदार्थों में से प्रत्येक को भिन्न नहीं, अभिन्न या एक ही माना जाता है, क्योंकि एक पदार्थ के न होने पर भेद किसके आश्रित रहेगा ? एकात्मक वस्तु भेद के अधीन नहीं होती, क्योंकि 'अयम् अयं (घटः पटो) न भवति'—इस प्रकार प्रतीयमान भेद सदैव प्रतियोगी के ज्ञान की अपेक्षा करता है, किन्तु एकत्व-ज्ञान अन्य किसी की भी अपेक्षा नहीं करता, परिशेषतः अभेद के आश्रित अनिर्वचनीय भेद की कल्पना ही युक्ति-संगत है, जैसा कि श्रुति कहती है—"मृत्तिकेत्येव सत्यम्"। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कूटस्थ-नित्यता ही पारमार्थिक है, परिणामि-नित्यता नहीं। भाष्यकार ने जो कूटस्थ-नित्यता में दृष्टान्त दिया है—'व्योमवत्', वह न्याय-मत के अनुसार है, क्योंकि वेदान्त-सिद्धान्त में व्योम भी जन्य होने के कारण अनित्य ही है। उत्पत्ति, प्राप्ति, विकृति और संस्कृति क्रिया के भेद से कर्मता (क्रियाश्रितता) भी चार प्रकार की होती है—(१) उत्पाद्यता, (२) प्राप्यता, (३) विकृतता तथा (४) संस्कृतता। ब्रह्मभाव में 'कूटस्थनित्य' पद के द्वारा उत्पाद्यकर्मता, 'सर्वव्यापि' विशेषण के द्वारा प्राप्यकर्मता, 'सर्वविक्रियारहितम्' ऐसा कहकर विकार्यतात्मक कर्मता और 'निरवयवम्' पद के द्वारा संस्कार्य कर्मता की निवृत्ति
कूटस्थनित्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४१
यारहितं, नित्यतृप्तं, निरवयवं, स्वयंज्योतिःस्वभावम्। यत्र धर्माधर्मौ सह कार्येण कालत्रयं च नोपावर्तेते। तदेतदशरीरत्वं मोक्षाख्यम्। 'अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च' कठ० २।१४) इत्यादिश्रुतिभ्यः। अतस्तद् ब्रह्म यस्येयं जिज्ञासा प्रस्तुता, तद्यदि कर्तव्यशेषत्वेनोपदिश्येत, तेन च कर्तव्येन साध्यश्चेन्मोक्षोऽभ्युपगम्येत, अनित्य एव स्यात्। तत्रैवं सति यथोक्तकर्मफलेष्वेव तारतम्यावस्थितेष्वनित्येषु कश्चिदतिशयो मोक्ष इति प्रसज्येत। नित्यश्च मोक्षः सर्वैर्मोक्षवादिभिरभ्युपगम्यते, अतो न कर्तव्यशेषत्वेन ब्रह्मोपदेशो युक्तः। अपि च 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' (मुण्ड० ३।२।९) 'क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे' (मुण्ड० २।२।८)। 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन' (तैत्ति० २।९)। 'अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि' (बृह० ४।२।४)। 'तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत्' (वाजसनेयिब्राह्मणोप० १।४।१०)। 'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः' (ईशा० ७) इत्येवमाद्याः श्रुतयो ब्रह्मविद्यानन्तरं मोक्षं दर्शयन्त्यो मध्ये कार्यान्तरं वारयन्ति। तथा 'तद्वैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्च' (बृह० १।४।१०) इति ब्रह्मदर्शनसर्वात्मभावयोर्मध्ये कर्तव्यान्तरवारणायोदाहार्यम्। यथा तिष्ठन्गायतीति तिष्ठतिगायतयोर्मध्ये तत्कर्तृकं कार्यान्तरं नास्तीति
भामती
कर्मताम् ॐ सर्वविक्रियारहितम् ॐ । इति विकार्यकर्मताम्, ॐ निरवयवम् ॐ । इति संस्कार्यकर्मताम् । व्रीहीणां खलु प्रोक्षणेन संस्काराख्योऽतिशयो यथा जन्यते, नैवं ब्रह्मणि कश्चिदंशः क्रियाध्येयोऽस्त्यनवयवत्वात् । अनंशत्वादित्यर्थः । पुरुषार्थतामाह ॐ नित्यतृप्तम् इति ॐ । तृप्त्या दुःखरहितं सुखमुपलक्षयति । क्षुद्दुःख-निवृत्तिसहितं हि सुखं तृप्तिः । सुखं चाप्रतीयमानं न पुरुषार्थ इत्यत आह ॐ स्वयंज्योतिः इति ॐ । तदेवं स्वमतेन मोक्षाख्यं फलं नित्यं श्रुत्यादिभिरुपपाद्य क्रियानिष्पाद्यस्य तु मोक्षस्यानित्यत्वं प्रसञ्जयति ॐ तद्यदि इति ॐ । न चागमबाधः, आगमस्योक्तेन प्रकारेणोपपत्तेः । अपि च ज्ञानजन्यापूर्वजनितो मोक्षो नैयोगिक इत्यस्यार्थस्य सन्ति भूयस्यः श्रुतयो निवारिका इत्याह ॐ अपि च ब्रह्म वेद इति ॐ । अविद्या-
भामती-व्याख्या
की गई है, क्योंकि जैसे "व्रीहीन् प्रोक्षति"—इस श्रुति से विहित व्रीहि में प्रोक्षणरूप संस्कार के द्वारा अदृष्ट उत्पन्न होता है, वैसा ब्रह्म में कोई अंश उत्पन्न नहीं होता, ब्रह्म सर्वथा निरवयव और निरंश होता है। ब्रह्मभाव में पुरुषार्थता (पुरुषाभिलाषा) प्रकट करने के लिए 'नित्यतृप्तम्'—ऐसा कहा गया है। यहाँ 'तृप्ति' पद की दुःखाभावरूप सुख में लक्षणा विवक्षित है, क्योंकि क्षुधारूप दुःख की निवृत्ति का ही नाम तृप्ति है। अप्रतीयमान सुख पुरुषाभिलषित नहीं होता, अतः सदा प्रतीयमानता प्रकट करने के लिए कहा है—"स्वयंज्योतिः"। इस प्रकार अपने अद्वैत वेदान्त के अनुसार श्रुत्यादि के द्वारा मोक्षरूप फल की नित्यता का उपपादन करके पराभिमत कर्मजन्य मोक्ष में अनित्यता का प्रसञ्जन करते हैं—"तद् यदि कर्त्तव्यशेषत्वेनोपदिश्येत, तेन च कर्त्तव्येन साध्यश्चेन्मोक्षोऽभ्युपगम्येत, अनित्य एव स्यात्"। क्रिया-साध्य या अनित्य मोक्षवाद में मोक्षगत नित्यता के प्रतिपादक आगम वाक्यों का विरोध इसलिए प्रसक्त नहीं होता कि मोक्षगत नित्यता के प्रतिपादक आगम वाक्यों का उस (क्रिया-साध्य) मोक्ष में तात्पर्य न होकर नित्यमोक्ष में ही होता है। केवल इतना ही नहीं, ज्ञानजन्य अपूर्व या नियोग के द्वारा साध्य होने के कारण मोक्ष के नैयोगिकत्व-मत की निषेधिका बहुत सी श्रुतियाँ हैं, यह दिखाने के लिए कहा जाता है—"अपि च ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इत्येवमादयः श्रुतयो ब्रह्मविद्यानन्तरं दर्शयन्त्यो मध्ये कार्यान्तरं वारयन्ति"। कथित द्विविध
१४२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
गम्यते । ‘त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसि’ ( प्रश्न० ६।८ ) ‘श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तं मां भगवान्छोकस्य पारं तारयतु’ ( छान्दो० ७।१।३ ) ‘तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारः’ ( छान्दो० ७।२६।२ ) इति चैवमाद्याः श्रुतयो मोक्षप्रतिबन्धनिवृत्तिमात्रमेवात्मज्ञानस्य फलं दर्शयन्ति । तथा चाचार्यप्रणीतं न्यायोपबृंहितं सूत्रम्—‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः’ (न्या०
भामती
द्वयप्रतिबन्धापनयमात्रेण च विद्याया मोक्षसाधनत्वे न स्वतःपूर्वोत्पादेन चेत्यत्रापि श्रुतिमुदाहरति ॐ त्वं हि नः पिता इति ॐ । न केवलमस्मिन्नर्थे श्रुत्यादयोऽपि त्वक्षपादाचार्यसूत्रमपि न्यायमूलमस्तीत्याह ॐ तथा चाचार्यप्रणीत० इति ॐ । आचार्यश्लोकलक्षणः पुराणे ।
‘आचिनोति च शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि ।
स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन सोच्यते ॥ इति ।
तेन हि प्रणीतं सूत्रं "दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तराभावादपवर्ग इति" । पाठापेक्षया कारणमुत्तरं, कार्यं च पूर्वं, कारणापाये कार्यापायः, कफापाय इव कफोद्भवस्य ज्वरस्यापायः । जन्मापाये दुःखापायः प्रवृत्त्यपाये जन्मापायः, दोषापाये प्रवृत्त्यपायः, मिथ्याज्ञानापाये
भामती-व्याख्या
अविद्यारूप प्रतिबन्ध की निवर्तिका होने मात्र से विद्या ( ब्रह्म-वेदन ) को मोक्ष का साधन माना जाता है, वस्तुतः विद्या न तो स्वतः और न अपूर्वोत्पत्ति के द्वारा मोक्ष की जनिका मानी जाती है — इस रहस्य में प्रमाणभूत श्रुतियों का उदाहरण दिया जाता है—"त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं दर्शयति भगवान् सनत्कुमारः" ( छान्दो. ७।२६।२ ) इति चैवमाद्याः श्रुतयो मोक्षप्रतिबन्धनिवृत्तिमात्रमेवात्मज्ञानस्य फलं दर्शयन्ति ।" केवल श्रुतियाँ ही उक्त अर्थ में प्रमाण नहीं, अपि तु महर्षि अक्षपाद के द्वारा प्रणीत सूत्र भी प्रमाण है— "तथा चाचार्यप्रणीतं न्यायोपबृंहितं सूत्रम्—"दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः' ( न्या. सू. १।१।२ ) इति" । शिक्षा-दीक्षा के क्षेत्र में आचार्य का नितान्त उन्नत स्थान है, आचार्य की शरण लिए बिना विद्या फलवती ही नहीं होती— "आचार्याद्धि विद्या विहिता साधिष्ठं प्रापयति" ( छां. ४।९।३ ) । द्विजाति को उपनीत, संस्कृत एवं दीक्षित करने का दायित्व आचार्य पर ही है ( मनु. २।१४० ) निरुक्त (१।४), आपस्तम्ब धर्मसूत्र (१।१।१।४) एवं पुराणों में आचार्य का गौरव वर्णित है । कारण की निवृत्ति से कार्य की निवृत्ति, कारण पूर्ववृत्ति और कार्य उत्तर वृत्ति होना स्वाभाविक है, अतः पूर्वं-पूर्वं की निवृत्ति से उत्तरोत्तर की निवृत्ति का कथन न्याय-संगत है, किन्तु यहाँ सूत्रकार जो उत्तरोत्तर की निवृत्ति से पूर्व-पूर्वं की निवृत्ति का अभिधान करता है, वह अपने सूत्र में पठित पद-क्रम को ध्यान में रख कर कहा है । दुख, जन्म, प्रवृत्ति ( धर्माधर्म ), दोष ( राग-द्वेष ) और मिथ्याज्ञान में पूर्व-पूर्वं कार्य और उत्तरोत्तर कारण का निर्देश किया गया है, अतः 'उत्तरोत्तरापाये' का अर्थ 'कारणानामभावे सति'—ऐसा ही है । 'तत्पूर्वापायः' का अर्थ है—'कार्याणामभावः' । कारण का अभाव होने से वैसे ही कार्य का अभाव होता है, जैसे कफ दोष का अभाव हो जाने से कफज ज्वर का अभाव हो जाता है । अर्थात् जन्म का अभाव होने से दुःख का धर्माधर्मरूप प्रवृत्ति का अभाव होने से जन्म का, दोष ( राग द्वेष ) का अभाव होने से प्रवृत्ति का एवं मिथ्याज्ञान का अभाव हो जाने से दोष का अभाव हो जाता
सम्प्रद्रूपज्ञानविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४३
स० १।१।२ ) इति । मिथ्याज्ञानापायश्च ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानाद्भवति । न चेदं ब्रह्मात्मैक- त्वविज्ञानं संपद्रूपम्, यथा 'अनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति' (बृह० ३।१।९) इति । न चाध्यासरूपम्, यथा 'मनो ब्रह्मेत्युपासीत' (छान्दो०
भामती
दोषापायः । मिथ्याज्ञानं चाविद्या, रागाद्युपजनितक्रमेण दृष्टेनैव संसारस्य परमं निदानम् । सा च तत्त्वज्ञानेन ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेनावगतिपर्यन्तेन विरोधिना निवर्त्यते । ततोऽविद्यानिवृत्त्या ब्रह्मरूपावि- र्भावो मोक्षः । न तु विद्याकार्यस्तज्जनितापूर्वकार्यो वेति सूत्रार्थः । तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानापाय इत्येता- वन्मात्रेण सूत्रोपन्यासः, न त्वक्षपादसम्मतं तत्त्वज्ञानमिह सम्मतम् । तदनेनाचार्यान्तरसंवादेनायमर्थो दृढ़ीकृतः ।
स्यादेतत्—नैकत्वविज्ञानं स्थितवस्तुविषयं, येन मिथ्याज्ञानं भेदावभासं निवर्त्तयन्न विधि- विषयो भवेत् । अपि तु सम्पदादिरूपम् । तथा च विधेः प्रागप्राप्तं पुरुषेच्छया कर्त्तव्यं सद्विधिविगोचरो भविष्यति । यथा वृत्त्यनन्तत्वेन मनसो विश्वदेवसाम्याद् विश्वान् देवान् मनसि सम्पाद्य मन आल- म्बनमविद्यमानसभं कृत्वा प्राधान्येन सम्पाद्यानां विश्वेषामेव देवानामन्डुचिन्तनं तेन चानन्तलोकप्राप्तिः । एवं चिद्रूपसाम्याज्जीवस्य ब्रह्मरूपतां सम्पाद्य जीवमालम्बनमविद्यमानसभं कृत्वा प्राधान्येन ब्रह्मानुचिन्तनं तेन चामृतत्वफलप्राप्तिः । अध्यासे त्वालम्बनस्यैव प्राधान्येनाारोपिततद्भावस्यानुचिन्तनं, यथा मनो ब्रह्मेत्यु-
भामती-व्याख्या
है । मिथ्या ज्ञान का नाम ही अविद्या है, वह ( अविद्या ) जीव में राग-द्वेषरूप दोष को, दोष प्रवृत्ति को प्रवृत्ति जन्म को और जन्म विविध दुःखों को उत्पन्न करता है । उक्त अविद्या जीवब्रह्माभेद-साक्षात्काररूप तत्त्वज्ञान के द्वारा निवृत्त ( नष्ट ) की जाती है, क्योंकि विद्या अविद्या की सर्वथा विरोधिनी है । अविद्या की निवृत्ति से ब्रह्मभावरूप मोक्ष का आविर्भाव हो जाता है । मोक्ष न तो विद्या का कार्य होता है और न अविद्या-जनित अपूर्व या नियोग का फल । तत्त्व-ज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश होता है— इतना ही दिखाने के लिए भाष्यकार ने यहाँ न्याय-सूत्र उद्धृत किया है, न कि अक्षपाद-सम्मत तत्त्व-ज्ञान और मोक्ष से सम्मति प्रकट करने के लिए, क्योंकि आगे चल कर तर्कपाद में न्याय-मत का भी पूर्णतया निराकरण किया गया है । यहाँ अन्यमतावलम्बी आचार्य का संवाद दिखा कर अपने सिद्धान्त का दृढीकरणमात्र विवक्षित है ।
शङ्का—यह जो कहा गया कि यहाँ 'तत्त्वज्ञान' पद से जीव और ब्रह्म की एकता का ज्ञान विवक्षित है, वह संगत नहीं, क्योंकि वह एकत्व-विज्ञान केवल यथावस्थितवस्तुविषयक नहीं कि वह मिथ्या का निवर्तक होकर विधि का विषय न होता । वस्तु-स्थिति यह है कि यहाँ एकत्व-ज्ञान सम्पदादिरूप है । अन्य वस्तु में अन्यरूपता-का सम्पादन पुरुष की इच्छा पर निर्भर है, अतः विधि के पूर्व कर्त्तव्यत्वेन अप्राप्त होकर सम्परूप ज्ञान विधेय हो जाता है, जैसे कि मन की वृत्तियाँ अनन्त हैं और विश्वदेव भी अनन्त हैं, अतः अनन्तत्व की समानता को लेकर मन में विश्वदेवरूपता का सम्पादन किया जाता है । सम्पादन का अर्थ है—आलम्बनीभूत मन को अविद्यमान-जैसा करके प्रधानतः आरोप्यमान विश्वदेव का अनुचिन्तन । उससे अनन्त- लोक की प्राप्ति होती है । उसी प्रकार जीव और ब्रह्म के चिद्रूपत्वात्मक साम्य को लेकर जीव में ब्रह्मरूपता का सम्पादन अर्थात् आलम्बनीभूत जीव की उपेक्षा कर प्रधानतः ब्रह्मरूपता का अनुचिन्तन किया जाता है, उस अनुचिन्तन से अमृतत्व की प्राप्ति होती है। यद्यपि 'सम्पद्' और 'अध्यास'—दोनों ही आरोप-ज्ञान हैं, तथापि सम्पद में आरोप्य एवं अध्यास में अधिष्ठान वस्तु क? प्राधान्य विवक्षित होता है, जैसे "मनो ब्रह्मेत्युपा?
१४४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
३।१८।१) 'आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः' (छान्दो० ३।१९।१) इति च मनआदित्यादिषु ब्रह्मदृष्टयध्यासः। नापि विशिष्टक्रियायोगनिमित्तं 'वायुर्वाव संवर्गः' (छान्दो० ४।३।१) 'प्राणो वाव संवर्गः' (छान्दो० ४।३।३) इतिवत्। नाप्याज्यवेक्षणादिकर्मवत्कर्माङ्ग-संस्काररूपम्। संपदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने 'तत्त्वमसि' (छान्दो० ६।८।७) 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृह० १।४।१०) 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० २।५।१९) इत्येवमादीनां वाक्यानां ब्रह्मात्मैकत्ववस्तुप्रतिपादनपरः पदसमन्वयः पीड्येत। 'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः' (मुण्ड० २।२।८) इति चैवमादीन्यविद्या-
भामती
पासीतादित्यो ब्रह्मेत्यादेश एवं जीवमब्रह्म ब्रह्मेत्युपासीतेति। क्रियाविशेषयोगाद्वा, यथा वायुर्वाव संवर्गः प्राणो वाव संवर्गः। बाह्या खलु वायुदेवता वह्न्यादीन् संवृङ्क्ते। महाप्रलयसमये हि वायुर्वह्नयादीन् संवृज्य संहृत्यात्मनि स्थापयति। यथाह द्रविडाचार्यः—'संहरणाद्वा संवरणाद्वा सात्मीभावाद्वायुः संवर्गः' इति। अध्यात्मं च प्राणः संवर्ग इति। स हि सर्वाणि वागादीनि संवृङ्क्ते, प्रयाणकाले हि स एव सर्वाणी-न्द्रियाणि संगृह्योत्क्रामतीति। सेयं संवर्गदृष्टिर्वायौ प्राणे च दशाशागतं जगद्दर्शयति यथा, एवं जीवात्मनि बृंहणक्रियया ब्रह्मदृष्टिरमृतत्वाय फलाय कल्पत इति। तदेतेषु त्रिष्वपि पक्षेष्वात्मदर्शनोपासनादयः प्रधान-कर्मण्यपूर्वविषयत्वात् स्तुतशस्त्रवत्।
भामती-व्याख्या
(छां. ३।१८।१) यहाँ पर ब्रह्मरूपता का जिसमें आरोप किया है, ऐसे मन का अनुचिन्तन जब किया जाता है—'यह जो हमारा मन है, वही ब्रह्म है'। तब इसे अध्यासानुचिन्तन कहते हैं और जब मन की उपेक्षा कर ब्रह्म का अनुचिन्तन किया जाता है—यह हमारा मन नहीं अपितु ब्रह्म है, ऐसे ब्रह्मप्रधानक अनुचिन्तन को सम्पत् कहा जाता है, जैसे अब्रह्मभूत जीव के लिए कहा गया है—"ब्रह्मेत्युपासीत"।
अथवा क्रिया-विशेष के सम्बन्ध से ब्रह्म-ज्ञान में विधेयता का निर्वाह हो सकता है, जैसे “वायववि संवर्गः, प्राणो वाय संवर्गः” (छां. ४।३।१-३)। अर्थात् बाह्य (अन्तरिक्षस्थ) वायु देवता प्रलय के समय अग्न्यादि पदार्थों को अपने में संवर्जित या उपसंहृत कर लेता है, जैसा द्रविडाचार्य ने कहा है—"संहरणाद्वा संवरणाद्वा सात्मीभावाद् वायुः संवर्गः"। बाह्य वायु के समान ही शरीर के अन्दर की प्राणसंज्ञक वायु भी संवर्ग है, क्योंकि वह वागादि सभी इन्द्रियों का संवर्जन करती है। अर्थात् प्राण मृत्यु के समय सभी इन्द्रियों को अपने में समेट कर शरीर से उत्क्रमण करता है। बाह्य वायु और प्राण में यह संवर्ग दृष्टि दसों दिशाओं में व्याप्त अन्नादत्व का दर्शन प्रस्तुत करती है।
उसी प्रकार जीवात्मा में बृंहण (शरीर को संवर्धित करना) क्रिया को देख कर जीव में ब्रह्म-दृष्टि अमृतत्वरूप फल प्रदान करती है। सम्पद्, अध्यास और क्रिया-विशेष के द्वारा जीव में ब्रह्म-दृष्टि'--ये तीनों उपासनाएँ अपूर्वविषयक होने के कारण वैसे ही प्रधान कर्म मानी जाती हैं, जैसे स्तुत और शस्त्र [मीमांसा-दर्शन के द्वितीय अध्याय में कहा गया है—"स्तुतशस्त्रयोस्तु संस्कारो याज्यावद् देवताभिधानत्वात्" (जै. सू. २।१।१३)। “आज्यैः स्तुवते”, “प्रउगं शंसति”—इत्यादि विधि वाक्यों के द्वारा 'स्तुत' और शास्त्र का विधान किया गया है। साम-गान-युक्त मन्त्रों के द्वारा देवता के गुण-गान को स्तोत्र और अप्रगीत मंत्रों के द्वारा देवता के गुणों का अभिधान शस्त्र कहलाता है। उसके विषय में पूर्व पक्षी ने कहा है कि वे दोनों प्रधान कर्म नहीं, अपितु गुणकर्म हैं, क्योंकि देवताभिधान के द्वारा वैसे हो
प्रधानगुणकर्मविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४५
निवृत्तिफलश्रवणान्यनुपरुध्येरन् । 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' ( मुण्ड० ३।२।९ ) इति चैव- मादीनि तद्भावापत्तिवचनानि संपदादिपक्षे न सामञ्जस्येनोपपद्येरन् । तस्मान्न संपदा- दिरूपं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानम् । अतो न पुरुषव्यापारतन्त्रा ब्रह्मविद्या । किं तर्हि ? प्रत्यक्षादिप्रमाणविषयवस्तुज्ञानवद्वस्तुतन्त्रा । एवंभूतस्य ब्रह्मणस्तज्ज्ञानस्य च न
भामती
आत्मा तु द्रव्यं कर्मणि गुण इति संस्कारो वाऽऽत्मनो दर्शनं विधीयते । यथा दर्शपूर्ण- मासप्रकरणे पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवतीति समाम्नातं प्रकरणिना च गृहीतमुपांशुयागाङ्गभूताज्यद्रव्य- संस्कारतयाऽवेक्षणं गुणकर्म विधीयते, एवं कर्तृत्वेन क्रत्वङ्गभूते आत्मन्यात्मा वा अरे द्रष्टव्य इति दर्शनं गुणकर्म विधीयते । 'यैस्तु द्रव्यं चिकीर्ष्यते गुणस्तत्र प्रतीयेत' इति न्यायात्, अत आह ❀ न चेदं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानम् इति ❀ । कुतः, ❀ सम्पदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञाने इति ❀ । दर्शपूर्णमासप्रकरणे हि समाम्नातमाज्यावेक्षणं तदङ्गभूताज्यसंस्कार इति युज्यते । न चात्मा वा अरे द्रष्टव्य इत्यादि कस्यचित् प्रकरणे समाम्नातम् । न चानारभ्याधीतमपि यस्य पर्णमयी जुहूर्भवतीत्यूव्यभि-
भामती-व्याख्या
देवता में संस्कार उत्पन्न करते हैं, जैसे 'याज्या' मन्त्र, अत एव याज्या मन्त्र (ऋग्विशेष) का उच्चारण गुणकर्म माना गया है। भाष्यकार कहते हैं—"याज्या देवतोपलक्षणार्था" (जै. सू. २।३।१५)। इस पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए सिद्धान्त स्थापित किया गया है- "अपि वा श्रुतिसंयोगात् प्रकरणे स्तौतिशंसती क्रियोत्पत्तिं विदध्यातां" (जै. सू. २।१।२२)। यहाँ 'श्रुति' पद शक्ति वृत्ति का बोधक है, अतः 'स्तौति' और 'शंसति'—इन दोनों धातुओं की शक्ति स्तुतिरूप अर्थ (देवतागत गुणों के प्रकाशन) में है। गुण-प्रकाशन का कोई दृष्ट फल नहीं, अतः क्रियोत्पत्ति (अपूर्व का उत्पादन) ही मुख्य फल है। अपूर्वार्थक कर्म प्रधान कर्म होता है]।
अथवा आत्म-दर्शन को गुण कर्म कहा जा सकता है, क्योंकि दर्शनरूप कर्म (क्रिया) का विषयीभूत आत्मा कर्मों का अङ्ग है, उसी का दर्शनरूप संस्कार 'द्रष्टव्यः' पद के द्वारा विहित है। जैसे दर्शपूर्णमास के प्रकरण में पठित "पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवति"—इस वाक्य के द्वारा जिस आज्य (घृत) द्रव्य का दर्शनरूप संस्कार विहित है, वह आज्य दर्शपूर्णमास- घटक उपांशुयाज नाम के कर्म की हवि है—"सर्वस्मै वा एतद्यज्ञाय गृह्यते यद् ध्रुवाया- माज्यम्" (तै. ब्रा. ३।३।५।५)। 'ध्रुवा' नाम के पात्र में रखा हुआ घृत साधारण द्रव्य होने के कारण उपांशुयाज का द्रव्य माना गया है। यजमान की पत्नी के द्वारा उसका निरीक्षण उस आज्य का संस्कार गुणकर्म है। वैसे ही सभी कर्मों में अपेक्षित कर्त्ता आत्मा द्रव्य है, उसी का "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" (बृह० २।४।५) इस अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा दर्शनरूप संस्कार कर्म विहित है, ऐसे संस्कार कर्मों को गुण कर्म कहा गया है— "यैस्तु द्रव्यं चिकीर्ष्यते गुणस्तत्र प्रतीयेत" (जै. सू. २।१।८)। अर्थात् जिन संस्कार कर्मों के द्वारा कोई द्रव्य संस्कार्यत्वेन आकांक्षित होता है, उन कर्मों को गुण कर्म कहते हैं।
समाधान—इस प्रकार आशङ्कित आत्मदर्शन की सम्पदादिरूपता का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न चेदं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं सम्पद्रूपम्"। जीव-ब्रह्म का एकत्व-दर्शन सम्पदादिरूप नहीं माना जा सकता क्योंकि "सम्पदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्व- विज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने 'तत्त्वमसि' (छां. ६।८।७) इत्यादि पदसन्दर्भः पीड्येत"। आशय यह है कि दर्शपूर्णमास के प्रकरण में पठित आज्यावेक्षण दर्शपूर्णमास कर्म के अङ्गभूत आज्य का संस्कार कर्म है—यह तो युक्ति-संगत है. किन्तु "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—यह वाक्य किसी भी कर्म के प्रकरण में पठित नहीं, अतः कर्माङ्गभूत द्रव्य का संस्कार क्योंकर होगा ?
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१४६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
कयाचिद्युक्त्या शक्यः कार्यानुप्रवेशः कल्पयितुम् । न च विदिक्रियाकर्मत्वेन कार्यानुप्रवेशो ब्रह्मणः, 'अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि' ( केन० १।३ ) इति विदिक्रिया-
भामती चरितक्रतुसम्बन्धजुहूद्वारेण जुहूत्वं क्रतुं स्मारयद्वाक्येन यथा पर्णतायाः क्रतुशेषभावमापादयति, एवमात्मा-व्यभिचरितक्रतुसम्बन्धो येन तद्दर्शनं क्रत्वङ्गं सदात्मानं क्रत्वर्थं संस्कुर्यात् । तेन यद्ययं विधिस्तथापि सुवर्णं भार्यमितिवद् विनियोगभङ्गेन प्रधानकर्मैवापूर्वविषयत्वाच्च गुणकर्मेति स्थवीयस्तयैतद्दूषणमनभिधाय सर्वपक्षसाधारणं दूषणमुक्तम्, तदतिरोहितार्थतया न व्याख्यातम् । किञ्च ज्ञानक्रियाविषयत्वविधानमस्य बहुश्रुतिविरुद्धमित्याह ॐ न च विदिक्रिया इति ।
भामती-व्याख्या यद्यपि कर्म के प्रकरण में अपठित ( अनारभ्याधीत ) वाक्य के द्वारा विहित पदार्थ भी कर्म का अङ्ग हो सकता है, जैसे "यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति" ( तै. सं. ३।५।७।२ ) इस वाक्य के द्वारा जिस 'जुहू' पात्र के उद्देश्य से पर्णता [ "पलाशे किंशुकः पर्णो वातपोथः"—इस अमरकोष के अनुसार यहाँ पलाश वृक्ष का नाम पर्ण है, अतः जुहू बनाने के लिए पलाश की लकड़ी ] का विधान किया गया है । जुहू के बिना कोई याग सम्पन्न नहीं हो सकता, अतः जुहू का याग से अव्यभिचरित सम्बन्ध होने के कारण जुहू के प्रकृतिभूत पर्ण ( पलाश वृक्ष के काष्ठ ) में यागाङ्गत्व पर्यवसित हो जाता है । तथापि आत्मा का याग के साथ वैसा अव्यभिचरित सम्बन्ध न होने के कारण आत्मदर्शन में यागाङ्गत्व प्राप्त नहीं होता । अतः "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—यह वाक्य यदि विधि-वाक्य है, तब इसके द्वारा विहित दर्शन को वैसे ही गुणकर्म न मानकर प्रधान कर्म माना जायगा, जैसे—सुवर्ण-धारण । ["तस्मात् सुवर्णं हिरण्यं भार्यम्, सुवर्ण एव भवति, दुर्वर्णोऽस्य भ्रातृव्यो भवति" ( तै. ब्रा. २।२।४।५ ) इस अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा विहित शोभन वर्णवाले सुवर्ण का धारण ( कड़ा, मुन्द्रादि का हाथ और कान आदि में पहनना ) गुण कर्म है ? अथवा प्रधान कर्म ? ऐसा सन्देह होने पर पूर्वपक्षी ने कहा है—"अद्रव्यत्वात्तु शेषः स्यात्" ( जै. सू. ३।४।२५ ) । अर्थात् इस कर्म का कोई विशेष द्रव्य ( हवि ) और देवता निर्दिष्ट नहीं, अतः प्रधान कर्म न होकर सुवर्ण-धारण सभी कर्मों का शेष ( अङ्गभूत गुण कर्म ) है । सिद्धान्ती ने उस पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए कहा है—"अप्रकरणे तु तद्धर्मस्ततो विशेषात्" ( जै. सू. ३।४।२६ ) । अर्थात् सुवर्ण-धारण न तो किसी कर्म के प्रकरण में पठित है और न इसका कर्म के साथ अव्यभिचरित सम्बन्ध है, अतः यह गुण कर्म न होकर पुरुष का धर्मभूत प्रधान कर्म है ।] किसी कर्म के साथ सुवर्ण-धारण का विनियोग न होकर पुरुष के साथ विनियोग ( अङ्गाङ्गीभाव ) होता है । उसका फल परमापूर्व के द्वारा भ्रातृव्य ( शत्रु ) की दुर्वर्णता होती है । इसी प्रकार "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—इस वाक्य से विहित आत्मदर्शन गुण कर्म न होकर प्रधान कर्म ही होगा—यह दोष अत्यन्त स्थूल और प्रसिद्ध होने के कारण भाष्यकार के द्वारा उद्भावित न होकर "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों का जो विरोथोद्भावन हुआ है, वह नितान्त स्पष्ट है कि उपासनादि में उपास्य, उपासक और उपासना का भेद अनिवार्य है, किन्तु "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्य सर्वथा भेद का संहार कर रहे हैं, अतः एकत्व-ज्ञान को सम्पदादिरूप न मानकर तत्त्व-साक्षात्कारात्मक ही मानना आवश्यक है ।
'ब्रह्म वेद'—इत्यादि वाक्यों के द्वारा विदि ( वेदन ) क्रिया की कर्मता ब्रह्म में प्रतिपादित है । क्रिया का विधान होता है, ज्ञान का नहीं, अतः विदि क्रिया की विधि के द्वारा ब्रह्म का कार्यानुप्रवेश हो जायगा'—ऐसी शङ्का नहीं की जा सकती, क्योंकि ब्रह्म को