भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१४६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

कयाचिद्युक्त्या शक्यः कार्यानुप्रवेशः कल्पयितुम् । न च विदिक्रियाकर्मत्वेन कार्यानुप्रवेशो ब्रह्मणः, 'अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि' ( केन० १।३ ) इति विदिक्रिया-

भामती चरितक्रतुसम्बन्धजुहूद्वारेण जुहूत्वं क्रतुं स्मारयद्वाक्येन यथा पर्णतायाः क्रतुशेषभावमापादयति, एवमात्मा-व्यभिचरितक्रतुसम्बन्धो येन तद्दर्शनं क्रत्वङ्गं सदात्मानं क्रत्वर्थं संस्कुर्यात् । तेन यद्ययं विधिस्तथापि सुवर्णं भार्यमितिवद् विनियोगभङ्गेन प्रधानकर्मैवापूर्वविषयत्वाच्च गुणकर्मेति स्थवीयस्तयैतद्दूषणमनभिधाय सर्वपक्षसाधारणं दूषणमुक्तम्, तदतिरोहितार्थतया न व्याख्यातम् । किञ्च ज्ञानक्रियाविषयत्वविधानमस्य बहुश्रुतिविरुद्धमित्याह ॐ न च विदिक्रिया इति ।

भामती-व्याख्या यद्यपि कर्म के प्रकरण में अपठित ( अनारभ्याधीत ) वाक्य के द्वारा विहित पदार्थ भी कर्म का अङ्ग हो सकता है, जैसे "यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति" ( तै. सं. ३।५।७।२ ) इस वाक्य के द्वारा जिस 'जुहू' पात्र के उद्देश्य से पर्णता [ "पलाशे किंशुकः पर्णो वातपोथः"—इस अमरकोष के अनुसार यहाँ पलाश वृक्ष का नाम पर्ण है, अतः जुहू बनाने के लिए पलाश की लकड़ी ] का विधान किया गया है । जुहू के बिना कोई याग सम्पन्न नहीं हो सकता, अतः जुहू का याग से अव्यभिचरित सम्बन्ध होने के कारण जुहू के प्रकृतिभूत पर्ण ( पलाश वृक्ष के काष्ठ ) में यागाङ्गत्व पर्यवसित हो जाता है । तथापि आत्मा का याग के साथ वैसा अव्यभिचरित सम्बन्ध न होने के कारण आत्मदर्शन में यागाङ्गत्व प्राप्त नहीं होता । अतः "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—यह वाक्य यदि विधि-वाक्य है, तब इसके द्वारा विहित दर्शन को वैसे ही गुणकर्म न मानकर प्रधान कर्म माना जायगा, जैसे—सुवर्ण-धारण । ["तस्मात् सुवर्णं हिरण्यं भार्यम्, सुवर्ण एव भवति, दुर्वर्णोऽस्य भ्रातृव्यो भवति" ( तै. ब्रा. २।२।४।५ ) इस अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा विहित शोभन वर्णवाले सुवर्ण का धारण ( कड़ा, मुन्द्रादि का हाथ और कान आदि में पहनना ) गुण कर्म है ? अथवा प्रधान कर्म ? ऐसा सन्देह होने पर पूर्वपक्षी ने कहा है—"अद्रव्यत्वात्तु शेषः स्यात्" ( जै. सू. ३।४।२५ ) । अर्थात् इस कर्म का कोई विशेष द्रव्य ( हवि ) और देवता निर्दिष्ट नहीं, अतः प्रधान कर्म न होकर सुवर्ण-धारण सभी कर्मों का शेष ( अङ्गभूत गुण कर्म ) है । सिद्धान्ती ने उस पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए कहा है—"अप्रकरणे तु तद्धर्मस्ततो विशेषात्" ( जै. सू. ३।४।२६ ) । अर्थात् सुवर्ण-धारण न तो किसी कर्म के प्रकरण में पठित है और न इसका कर्म के साथ अव्यभिचरित सम्बन्ध है, अतः यह गुण कर्म न होकर पुरुष का धर्मभूत प्रधान कर्म है ।] किसी कर्म के साथ सुवर्ण-धारण का विनियोग न होकर पुरुष के साथ विनियोग ( अङ्गाङ्गीभाव ) होता है । उसका फल परमापूर्व के द्वारा भ्रातृव्य ( शत्रु ) की दुर्वर्णता होती है । इसी प्रकार "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—इस वाक्य से विहित आत्मदर्शन गुण कर्म न होकर प्रधान कर्म ही होगा—यह दोष अत्यन्त स्थूल और प्रसिद्ध होने के कारण भाष्यकार के द्वारा उद्भावित न होकर "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों का जो विरोथोद्भावन हुआ है, वह नितान्त स्पष्ट है कि उपासनादि में उपास्य, उपासक और उपासना का भेद अनिवार्य है, किन्तु "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्य सर्वथा भेद का संहार कर रहे हैं, अतः एकत्व-ज्ञान को सम्पदादिरूप न मानकर तत्त्व-साक्षात्कारात्मक ही मानना आवश्यक है ।

'ब्रह्म वेद'—इत्यादि वाक्यों के द्वारा विदि ( वेदन ) क्रिया की कर्मता ब्रह्म में प्रतिपादित है । क्रिया का विधान होता है, ज्ञान का नहीं, अतः विदि क्रिया की विधि के द्वारा ब्रह्म का कार्यानुप्रवेश हो जायगा'—ऐसी शङ्का नहीं की जा सकती, क्योंकि ब्रह्म को