भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रधानगुणकर्मविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४५
निवृत्तिफलश्रवणान्यनुपरुध्येरन् । 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' ( मुण्ड० ३।२।९ ) इति चैव- मादीनि तद्भावापत्तिवचनानि संपदादिपक्षे न सामञ्जस्येनोपपद्येरन् । तस्मान्न संपदा- दिरूपं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानम् । अतो न पुरुषव्यापारतन्त्रा ब्रह्मविद्या । किं तर्हि ? प्रत्यक्षादिप्रमाणविषयवस्तुज्ञानवद्वस्तुतन्त्रा । एवंभूतस्य ब्रह्मणस्तज्ज्ञानस्य च न
भामती
आत्मा तु द्रव्यं कर्मणि गुण इति संस्कारो वाऽऽत्मनो दर्शनं विधीयते । यथा दर्शपूर्ण- मासप्रकरणे पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवतीति समाम्नातं प्रकरणिना च गृहीतमुपांशुयागाङ्गभूताज्यद्रव्य- संस्कारतयाऽवेक्षणं गुणकर्म विधीयते, एवं कर्तृत्वेन क्रत्वङ्गभूते आत्मन्यात्मा वा अरे द्रष्टव्य इति दर्शनं गुणकर्म विधीयते । 'यैस्तु द्रव्यं चिकीर्ष्यते गुणस्तत्र प्रतीयेत' इति न्यायात्, अत आह ❀ न चेदं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानम् इति ❀ । कुतः, ❀ सम्पदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञाने इति ❀ । दर्शपूर्णमासप्रकरणे हि समाम्नातमाज्यावेक्षणं तदङ्गभूताज्यसंस्कार इति युज्यते । न चात्मा वा अरे द्रष्टव्य इत्यादि कस्यचित् प्रकरणे समाम्नातम् । न चानारभ्याधीतमपि यस्य पर्णमयी जुहूर्भवतीत्यूव्यभि-
भामती-व्याख्या
देवता में संस्कार उत्पन्न करते हैं, जैसे 'याज्या' मन्त्र, अत एव याज्या मन्त्र (ऋग्विशेष) का उच्चारण गुणकर्म माना गया है। भाष्यकार कहते हैं—"याज्या देवतोपलक्षणार्था" (जै. सू. २।३।१५)। इस पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए सिद्धान्त स्थापित किया गया है- "अपि वा श्रुतिसंयोगात् प्रकरणे स्तौतिशंसती क्रियोत्पत्तिं विदध्यातां" (जै. सू. २।१।२२)। यहाँ 'श्रुति' पद शक्ति वृत्ति का बोधक है, अतः 'स्तौति' और 'शंसति'—इन दोनों धातुओं की शक्ति स्तुतिरूप अर्थ (देवतागत गुणों के प्रकाशन) में है। गुण-प्रकाशन का कोई दृष्ट फल नहीं, अतः क्रियोत्पत्ति (अपूर्व का उत्पादन) ही मुख्य फल है। अपूर्वार्थक कर्म प्रधान कर्म होता है]।
अथवा आत्म-दर्शन को गुण कर्म कहा जा सकता है, क्योंकि दर्शनरूप कर्म (क्रिया) का विषयीभूत आत्मा कर्मों का अङ्ग है, उसी का दर्शनरूप संस्कार 'द्रष्टव्यः' पद के द्वारा विहित है। जैसे दर्शपूर्णमास के प्रकरण में पठित "पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवति"—इस वाक्य के द्वारा जिस आज्य (घृत) द्रव्य का दर्शनरूप संस्कार विहित है, वह आज्य दर्शपूर्णमास- घटक उपांशुयाज नाम के कर्म की हवि है—"सर्वस्मै वा एतद्यज्ञाय गृह्यते यद् ध्रुवाया- माज्यम्" (तै. ब्रा. ३।३।५।५)। 'ध्रुवा' नाम के पात्र में रखा हुआ घृत साधारण द्रव्य होने के कारण उपांशुयाज का द्रव्य माना गया है। यजमान की पत्नी के द्वारा उसका निरीक्षण उस आज्य का संस्कार गुणकर्म है। वैसे ही सभी कर्मों में अपेक्षित कर्त्ता आत्मा द्रव्य है, उसी का "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" (बृह० २।४।५) इस अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा दर्शनरूप संस्कार कर्म विहित है, ऐसे संस्कार कर्मों को गुण कर्म कहा गया है— "यैस्तु द्रव्यं चिकीर्ष्यते गुणस्तत्र प्रतीयेत" (जै. सू. २।१।८)। अर्थात् जिन संस्कार कर्मों के द्वारा कोई द्रव्य संस्कार्यत्वेन आकांक्षित होता है, उन कर्मों को गुण कर्म कहते हैं।
समाधान—इस प्रकार आशङ्कित आत्मदर्शन की सम्पदादिरूपता का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न चेदं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं सम्पद्रूपम्"। जीव-ब्रह्म का एकत्व-दर्शन सम्पदादिरूप नहीं माना जा सकता क्योंकि "सम्पदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्व- विज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने 'तत्त्वमसि' (छां. ६।८।७) इत्यादि पदसन्दर्भः पीड्येत"। आशय यह है कि दर्शपूर्णमास के प्रकरण में पठित आज्यावेक्षण दर्शपूर्णमास कर्म के अङ्गभूत आज्य का संस्कार कर्म है—यह तो युक्ति-संगत है. किन्तु "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—यह वाक्य किसी भी कर्म के प्रकरण में पठित नहीं, अतः कर्माङ्गभूत द्रव्य का संस्कार क्योंकर होगा ?
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