भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१४४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

३।१८।१) 'आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः' (छान्दो० ३।१९।१) इति च मनआदित्यादिषु ब्रह्मदृष्टयध्यासः। नापि विशिष्टक्रियायोगनिमित्तं 'वायुर्वाव संवर्गः' (छान्दो० ४।३।१) 'प्राणो वाव संवर्गः' (छान्दो० ४।३।३) इतिवत्। नाप्याज्यवेक्षणादिकर्मवत्कर्माङ्ग-संस्काररूपम्। संपदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने 'तत्त्वमसि' (छान्दो० ६।८।७) 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृह० १।४।१०) 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० २।५।१९) इत्येवमादीनां वाक्यानां ब्रह्मात्मैकत्ववस्तुप्रतिपादनपरः पदसमन्वयः पीड्येत। 'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः' (मुण्ड० २।२।८) इति चैवमादीन्यविद्या-

भामती

पासीतादित्यो ब्रह्मेत्यादेश एवं जीवमब्रह्म ब्रह्मेत्युपासीतेति। क्रियाविशेषयोगाद्वा, यथा वायुर्वाव संवर्गः प्राणो वाव संवर्गः। बाह्या खलु वायुदेवता वह्न्यादीन् संवृङ्क्ते। महाप्रलयसमये हि वायुर्वह्नयादीन् संवृज्य संहृत्यात्मनि स्थापयति। यथाह द्रविडाचार्यः—'संहरणाद्वा संवरणाद्वा सात्मीभावाद्वायुः संवर्गः' इति। अध्यात्मं च प्राणः संवर्ग इति। स हि सर्वाणि वागादीनि संवृङ्क्ते, प्रयाणकाले हि स एव सर्वाणी-न्द्रियाणि संगृह्योत्क्रामतीति। सेयं संवर्गदृष्टिर्वायौ प्राणे च दशाशागतं जगद्दर्शयति यथा, एवं जीवात्मनि बृंहणक्रियया ब्रह्मदृष्टिरमृतत्वाय फलाय कल्पत इति। तदेतेषु त्रिष्वपि पक्षेष्वात्मदर्शनोपासनादयः प्रधान-कर्मण्यपूर्वविषयत्वात् स्तुतशस्त्रवत्।

भामती-व्याख्या

(छां. ३।१८।१) यहाँ पर ब्रह्मरूपता का जिसमें आरोप किया है, ऐसे मन का अनुचिन्तन जब किया जाता है—'यह जो हमारा मन है, वही ब्रह्म है'। तब इसे अध्यासानुचिन्तन कहते हैं और जब मन की उपेक्षा कर ब्रह्म का अनुचिन्तन किया जाता है—यह हमारा मन नहीं अपितु ब्रह्म है, ऐसे ब्रह्मप्रधानक अनुचिन्तन को सम्पत् कहा जाता है, जैसे अब्रह्मभूत जीव के लिए कहा गया है—"ब्रह्मेत्युपासीत"।

अथवा क्रिया-विशेष के सम्बन्ध से ब्रह्म-ज्ञान में विधेयता का निर्वाह हो सकता है, जैसे “वायववि संवर्गः, प्राणो वाय संवर्गः” (छां. ४।३।१-३)। अर्थात् बाह्य (अन्तरिक्षस्थ) वायु देवता प्रलय के समय अग्न्यादि पदार्थों को अपने में संवर्जित या उपसंहृत कर लेता है, जैसा द्रविडाचार्य ने कहा है—"संहरणाद्वा संवरणाद्वा सात्मीभावाद् वायुः संवर्गः"। बाह्य वायु के समान ही शरीर के अन्दर की प्राणसंज्ञक वायु भी संवर्ग है, क्योंकि वह वागादि सभी इन्द्रियों का संवर्जन करती है। अर्थात् प्राण मृत्यु के समय सभी इन्द्रियों को अपने में समेट कर शरीर से उत्क्रमण करता है। बाह्य वायु और प्राण में यह संवर्ग दृष्टि दसों दिशाओं में व्याप्त अन्नादत्व का दर्शन प्रस्तुत करती है।

उसी प्रकार जीवात्मा में बृंहण (शरीर को संवर्धित करना) क्रिया को देख कर जीव में ब्रह्म-दृष्टि अमृतत्वरूप फल प्रदान करती है। सम्पद्, अध्यास और क्रिया-विशेष के द्वारा जीव में ब्रह्म-दृष्टि'--ये तीनों उपासनाएँ अपूर्वविषयक होने के कारण वैसे ही प्रधान कर्म मानी जाती हैं, जैसे स्तुत और शस्त्र [मीमांसा-दर्शन के द्वितीय अध्याय में कहा गया है—"स्तुतशस्त्रयोस्तु संस्कारो याज्यावद् देवताभिधानत्वात्" (जै. सू. २।१।१३)। “आज्यैः स्तुवते”, “प्रउगं शंसति”—इत्यादि विधि वाक्यों के द्वारा 'स्तुत' और शास्त्र का विधान किया गया है। साम-गान-युक्त मन्त्रों के द्वारा देवता के गुण-गान को स्तोत्र और अप्रगीत मंत्रों के द्वारा देवता के गुणों का अभिधान शस्त्र कहलाता है। उसके विषय में पूर्व पक्षी ने कहा है कि वे दोनों प्रधान कर्म नहीं, अपितु गुणकर्म हैं, क्योंकि देवताभिधान के द्वारा वैसे हो