भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसम्प्रद्रूपज्ञानविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४३
स० १।१।२ ) इति । मिथ्याज्ञानापायश्च ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानाद्भवति । न चेदं ब्रह्मात्मैक- त्वविज्ञानं संपद्रूपम्, यथा 'अनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति' (बृह० ३।१।९) इति । न चाध्यासरूपम्, यथा 'मनो ब्रह्मेत्युपासीत' (छान्दो०
भामती
दोषापायः । मिथ्याज्ञानं चाविद्या, रागाद्युपजनितक्रमेण दृष्टेनैव संसारस्य परमं निदानम् । सा च तत्त्वज्ञानेन ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेनावगतिपर्यन्तेन विरोधिना निवर्त्यते । ततोऽविद्यानिवृत्त्या ब्रह्मरूपावि- र्भावो मोक्षः । न तु विद्याकार्यस्तज्जनितापूर्वकार्यो वेति सूत्रार्थः । तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानापाय इत्येता- वन्मात्रेण सूत्रोपन्यासः, न त्वक्षपादसम्मतं तत्त्वज्ञानमिह सम्मतम् । तदनेनाचार्यान्तरसंवादेनायमर्थो दृढ़ीकृतः ।
स्यादेतत्—नैकत्वविज्ञानं स्थितवस्तुविषयं, येन मिथ्याज्ञानं भेदावभासं निवर्त्तयन्न विधि- विषयो भवेत् । अपि तु सम्पदादिरूपम् । तथा च विधेः प्रागप्राप्तं पुरुषेच्छया कर्त्तव्यं सद्विधिविगोचरो भविष्यति । यथा वृत्त्यनन्तत्वेन मनसो विश्वदेवसाम्याद् विश्वान् देवान् मनसि सम्पाद्य मन आल- म्बनमविद्यमानसभं कृत्वा प्राधान्येन सम्पाद्यानां विश्वेषामेव देवानामन्डुचिन्तनं तेन चानन्तलोकप्राप्तिः । एवं चिद्रूपसाम्याज्जीवस्य ब्रह्मरूपतां सम्पाद्य जीवमालम्बनमविद्यमानसभं कृत्वा प्राधान्येन ब्रह्मानुचिन्तनं तेन चामृतत्वफलप्राप्तिः । अध्यासे त्वालम्बनस्यैव प्राधान्येनाारोपिततद्भावस्यानुचिन्तनं, यथा मनो ब्रह्मेत्यु-
भामती-व्याख्या
है । मिथ्या ज्ञान का नाम ही अविद्या है, वह ( अविद्या ) जीव में राग-द्वेषरूप दोष को, दोष प्रवृत्ति को प्रवृत्ति जन्म को और जन्म विविध दुःखों को उत्पन्न करता है । उक्त अविद्या जीवब्रह्माभेद-साक्षात्काररूप तत्त्वज्ञान के द्वारा निवृत्त ( नष्ट ) की जाती है, क्योंकि विद्या अविद्या की सर्वथा विरोधिनी है । अविद्या की निवृत्ति से ब्रह्मभावरूप मोक्ष का आविर्भाव हो जाता है । मोक्ष न तो विद्या का कार्य होता है और न अविद्या-जनित अपूर्व या नियोग का फल । तत्त्व-ज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश होता है— इतना ही दिखाने के लिए भाष्यकार ने यहाँ न्याय-सूत्र उद्धृत किया है, न कि अक्षपाद-सम्मत तत्त्व-ज्ञान और मोक्ष से सम्मति प्रकट करने के लिए, क्योंकि आगे चल कर तर्कपाद में न्याय-मत का भी पूर्णतया निराकरण किया गया है । यहाँ अन्यमतावलम्बी आचार्य का संवाद दिखा कर अपने सिद्धान्त का दृढीकरणमात्र विवक्षित है ।
शङ्का—यह जो कहा गया कि यहाँ 'तत्त्वज्ञान' पद से जीव और ब्रह्म की एकता का ज्ञान विवक्षित है, वह संगत नहीं, क्योंकि वह एकत्व-विज्ञान केवल यथावस्थितवस्तुविषयक नहीं कि वह मिथ्या का निवर्तक होकर विधि का विषय न होता । वस्तु-स्थिति यह है कि यहाँ एकत्व-ज्ञान सम्पदादिरूप है । अन्य वस्तु में अन्यरूपता-का सम्पादन पुरुष की इच्छा पर निर्भर है, अतः विधि के पूर्व कर्त्तव्यत्वेन अप्राप्त होकर सम्परूप ज्ञान विधेय हो जाता है, जैसे कि मन की वृत्तियाँ अनन्त हैं और विश्वदेव भी अनन्त हैं, अतः अनन्तत्व की समानता को लेकर मन में विश्वदेवरूपता का सम्पादन किया जाता है । सम्पादन का अर्थ है—आलम्बनीभूत मन को अविद्यमान-जैसा करके प्रधानतः आरोप्यमान विश्वदेव का अनुचिन्तन । उससे अनन्त- लोक की प्राप्ति होती है । उसी प्रकार जीव और ब्रह्म के चिद्रूपत्वात्मक साम्य को लेकर जीव में ब्रह्मरूपता का सम्पादन अर्थात् आलम्बनीभूत जीव की उपेक्षा कर प्रधानतः ब्रह्मरूपता का अनुचिन्तन किया जाता है, उस अनुचिन्तन से अमृतत्व की प्राप्ति होती है। यद्यपि 'सम्पद्' और 'अध्यास'—दोनों ही आरोप-ज्ञान हैं, तथापि सम्पद में आरोप्य एवं अध्यास में अधिष्ठान वस्तु क? प्राधान्य विवक्षित होता है, जैसे "मनो ब्रह्मेत्युपा?