भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४
गम्यते । ‘त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसि’ ( प्रश्न० ६।८ ) ‘श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तं मां भगवान्छोकस्य पारं तारयतु’ ( छान्दो० ७।१।३ ) ‘तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारः’ ( छान्दो० ७।२६।२ ) इति चैवमाद्याः श्रुतयो मोक्षप्रतिबन्धनिवृत्तिमात्रमेवात्मज्ञानस्य फलं दर्शयन्ति । तथा चाचार्यप्रणीतं न्यायोपबृंहितं सूत्रम्—‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः’ (न्या०
भामती
द्वयप्रतिबन्धापनयमात्रेण च विद्याया मोक्षसाधनत्वे न स्वतःपूर्वोत्पादेन चेत्यत्रापि श्रुतिमुदाहरति ॐ त्वं हि नः पिता इति ॐ । न केवलमस्मिन्नर्थे श्रुत्यादयोऽपि त्वक्षपादाचार्यसूत्रमपि न्यायमूलमस्तीत्याह ॐ तथा चाचार्यप्रणीत० इति ॐ । आचार्यश्लोकलक्षणः पुराणे ।
‘आचिनोति च शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि ।
स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन सोच्यते ॥ इति ।
तेन हि प्रणीतं सूत्रं "दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तराभावादपवर्ग इति" । पाठापेक्षया कारणमुत्तरं, कार्यं च पूर्वं, कारणापाये कार्यापायः, कफापाय इव कफोद्भवस्य ज्वरस्यापायः । जन्मापाये दुःखापायः प्रवृत्त्यपाये जन्मापायः, दोषापाये प्रवृत्त्यपायः, मिथ्याज्ञानापाये
भामती-व्याख्या
अविद्यारूप प्रतिबन्ध की निवर्तिका होने मात्र से विद्या ( ब्रह्म-वेदन ) को मोक्ष का साधन माना जाता है, वस्तुतः विद्या न तो स्वतः और न अपूर्वोत्पत्ति के द्वारा मोक्ष की जनिका मानी जाती है — इस रहस्य में प्रमाणभूत श्रुतियों का उदाहरण दिया जाता है—"त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं दर्शयति भगवान् सनत्कुमारः" ( छान्दो. ७।२६।२ ) इति चैवमाद्याः श्रुतयो मोक्षप्रतिबन्धनिवृत्तिमात्रमेवात्मज्ञानस्य फलं दर्शयन्ति ।" केवल श्रुतियाँ ही उक्त अर्थ में प्रमाण नहीं, अपि तु महर्षि अक्षपाद के द्वारा प्रणीत सूत्र भी प्रमाण है— "तथा चाचार्यप्रणीतं न्यायोपबृंहितं सूत्रम्—"दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः' ( न्या. सू. १।१।२ ) इति" । शिक्षा-दीक्षा के क्षेत्र में आचार्य का नितान्त उन्नत स्थान है, आचार्य की शरण लिए बिना विद्या फलवती ही नहीं होती— "आचार्याद्धि विद्या विहिता साधिष्ठं प्रापयति" ( छां. ४।९।३ ) । द्विजाति को उपनीत, संस्कृत एवं दीक्षित करने का दायित्व आचार्य पर ही है ( मनु. २।१४० ) निरुक्त (१।४), आपस्तम्ब धर्मसूत्र (१।१।१।४) एवं पुराणों में आचार्य का गौरव वर्णित है । कारण की निवृत्ति से कार्य की निवृत्ति, कारण पूर्ववृत्ति और कार्य उत्तर वृत्ति होना स्वाभाविक है, अतः पूर्वं-पूर्वं की निवृत्ति से उत्तरोत्तर की निवृत्ति का कथन न्याय-संगत है, किन्तु यहाँ सूत्रकार जो उत्तरोत्तर की निवृत्ति से पूर्व-पूर्वं की निवृत्ति का अभिधान करता है, वह अपने सूत्र में पठित पद-क्रम को ध्यान में रख कर कहा है । दुख, जन्म, प्रवृत्ति ( धर्माधर्म ), दोष ( राग-द्वेष ) और मिथ्याज्ञान में पूर्व-पूर्वं कार्य और उत्तरोत्तर कारण का निर्देश किया गया है, अतः 'उत्तरोत्तरापाये' का अर्थ 'कारणानामभावे सति'—ऐसा ही है । 'तत्पूर्वापायः' का अर्थ है—'कार्याणामभावः' । कारण का अभाव होने से वैसे ही कार्य का अभाव होता है, जैसे कफ दोष का अभाव हो जाने से कफज ज्वर का अभाव हो जाता है । अर्थात् जन्म का अभाव होने से दुःख का धर्माधर्मरूप प्रवृत्ति का अभाव होने से जन्म का, दोष ( राग द्वेष ) का अभाव होने से प्रवृत्ति का एवं मिथ्याज्ञान का अभाव हो जाने से दोष का अभाव हो जाता