भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अविषये शास्त्रयोनित्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४७

कर्मत्वप्रतिषेधाद्, ‘येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात्’ (बृह० २।४।१३) इति च। तथोपास्तिक्रियाकर्मत्वप्रतिषेधोऽपि भवति – ‘यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते’ इत्यविषयत्वं ब्रह्मण उपन्यस्य, ‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’ (केन० १।४) इति। अविषयत्वे ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वानुपपत्तिरिति चेत्, – न; अविद्याकल्पितभेद-निवृत्तिपरत्वाच्छास्त्रस्य। न हि शास्त्रमिदंतया विषयभूतं ब्रह्म प्रतिपिपादयिषति। किं तर्हि? प्रत्यगात्मत्वेनाविषयतया प्रतिपादयदविद्याकल्पितं वेद्यवेदितृवेदनादिभेद-मपनयति। तथा च शास्त्रम् – ‘यस्याऽमतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अविज्ञातं


भामती

शङ्कते ॐ अविषयत्वे इति ॐ। ततश्च शान्तिकर्मणि वेतालोदय इति भावः। निराकरोति ॐ न ॐ। कुतः? ॐ अविद्याकल्पितभेदन्निवृत्तिविषयत्वाद् इति ॐ। सर्वमेव हि वाक्यं नेदन्तया वस्तुभेदं बोधयितुमर्हति, न हीक्षुक्षीरगुडादीनां मधुररसभेदः शक्य आख्यातुम्, एवमन्यत्रापि सर्वत्र द्रष्टव्यम्। तेन प्रमाणान्तरसिद्धे लौकिक एवार्थे यदा गतिरीदृशी शब्दस्य, तदा केव कथा प्रत्यगात्मन्यलौकिके? अदूरविप्रकर्षेण तु कथञ्चित् प्रतिपादनमिहापि समानम्। त्वम्पदार्थो हि प्रमाता प्रमाणाधीनया प्रमित्या प्रमेयं घटादि व्याप्नोतीत्यविद्याविलसितम्। तदस्याविषयीभूतोदासीनतत्पदार्थप्रत्यगात्मसामानाधिकरण्येन प्रमातृत्वाभावाद् तन्निवृत्तौ प्रमाणाद्यस्तिस्रो विधा निवर्त्तन्ते। न हि पक्तुरवस्तुत्वे पाक्यपाकपचनानि वस्तुसन्ति भवितुमर्हन्तीति। तथा हि—

विगलितपराग्वृत्त्यर्थत्वं पदस्य तवस्तदा
त्वमिति हि पदेनैकार्थत्वे त्वमित्यपि यत्पदम्।
तदपि च तदा गत्वैकाग्र्यं विशुद्धचिदात्मतां
त्यजति सकलान् कर्तृत्वादीन् पदार्थमलाश्रयान्॥


भामती-व्याख्या

विदि क्रिया का कर्म मानने पर "अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि" (केन. १।३) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा ब्रह्म में विदि क्रिया की कर्मता का निषेध कर दिया गया है। 'ब्रह्म यदि किसी ज्ञान का विषय नहीं, तब सर्वथा अज्ञेय ब्रह्म में शास्त्रयोनित्व (शास्त्र-प्रतिपादितत्व) क्योंकर सम्भव होगा—यह शङ्का की जा रही है—"अविषयत्वे ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वानुपपत्तिः"। छोटे-से भूत को भगाने के लिए शान्ति कर्म आरम्भ किया था, देखते क्या हैं कि सामने उससे बड़ा खबीस मुँह फाड़े खड़ा है। चिन्ता की बात नहीं, उसे भी भगाने का मन्त्र पढ़ दिया गया है—"न, अविद्याकल्पितभेदनिवृत्तिविषयत्वात्"। जैसे इक्षु (ईख) क्षीर (दूध) और गुड़ादि के माधुर्य का अन्तर किसी भी वाक्य से नहीं कहा जा सकता, वैसे ही लोकोत्तर आनन्द की उत्ताल तरङ्गोंवाले उस महासागर (भूमा तत्त्व) का यथावत् प्रतिपादन किसी भी वाक्य से नहीं किया जा सकता, केवल (अदूरविप्रकर्ष) लक्षणादि के द्वारा ब्रह्म के सूचक शास्त्रों को ब्रह्म में प्रमाण मान कर उसे शास्त्रप्रमाणक कह दिया गया है। यह जो कहा जाता है कि त्वम्पदार्थभूत जीव प्रमाता है, वह प्रमाणाधीन प्रमिति के माध्यम से घटादि प्रमेय वर्ग को व्याप्त करता है। वह कथन पूर्णतया अविद्या-विलसित है, क्योंकि 'अहं घटं जानामि'—यहाँ अस्मत्पदार्थभूत प्रत्यगात्मा और शुद्ध चैतन्य का सामानाधिकरण्य प्रतीत होता है, किन्तु शुद्ध चैतन्य किसी भी प्रमा का विषय नहीं होता, तब उसमें प्रमातृत्व क्योंकर होगा? प्रमाता के बिना प्रमाता, प्रमाण और प्रमा—ये तीनों वैसे ही अनुपपन्न हो जाते हैं, जैसे पक्ता (पाचक पुरुष) के विना पाक्य, पाक और पचन का वास्तविक सद्भाव नहीं रहता। इस तथ्य का प्रकाश इस श्लोक के द्वारा किया जा सकता है—