भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१४८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

विजानतां विज्ञातमविजानताम्' ( केन० २।३ ) 'न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः', 'न विज्ञातेर्विज्ञा- तारं विजानीयाः' ( बृह० ३।४।२ ) इति चैवमादि । अतोऽविद्याकल्पितसंसारित्वनि- वर्तनेन नित्यमुक्तात्मस्वरूपसमर्पणान्न मोक्षस्यानित्यत्वदोषः । यस्य तूत्पाद्यो मोक्षस्त- स्य मानसं, वाचिकं कायिकं वा कार्यमपेक्षत इति युक्तम् । तथा विकार्यत्वे च; तयोः पक्षयोर्मोक्षस्य ध्रुवमनित्यत्वम् । न हि दध्यादि विकार्यं उत्पाद्यं वा घटादि नित्यं दृष्टं

भामती

इत्यान्तरश्लोकः । अत्रैवार्थे श्रुतीरुदाहरति ॐ तथा च शास्त्रं, यस्यामतम् इति ॐ । प्रकृतमुपसंहरति ॐ अतोऽविद्याकल्पित इति ॐ । परपक्षे मोक्षस्यानित्यतामापादयति— ॐ यस्य तु इति ॐ । कार्यमपूर्व यागादिव्यापारजन्यं तमपेक्षते मोक्षः स्वोत्पत्ताविति । ॐ तयोः पक्षयोः इति ॐ निर्वर्त्यविकार्ययोः । क्षणिकं ज्ञानमात्मेति बौद्धाः । तथा च विशुद्धविज्ञानोत्पादो मोक्ष इति निर्वर्त्यो मोक्षः । अन्येषां तु संसाररूपा- वस्थापहाया कैवल्यावस्थावाप्तिरात्मनः स मोक्ष इति विकार्यो मोक्षः, यथा पयसः पूर्वावस्थापहानेनाव- स्थान्तरप्राप्तिर्विकारो दधोति । तदेतयोः पक्षयोरनित्यता मोक्षस्य, कार्यत्वाद् , दधिघटादिवत् । अथ

भामती-व्याख्या

विगलितपराग्वृत्त्यर्थत्वं पदस्य तदस्तदा
त्वमिति हि पदेनैकार्थत्वे त्वमित्यपि यत्पदम् ।
तदपि च तदा गत्वैकार्थ्य विशुद्धचिदात्मतां
त्यजति सकलान् कर्तृत्वादीन् पदार्थमलान् निजाम् ॥

[ 'तत् त्वमसि'—यहाँ पर प्रत्यक्पदार्थ की पराक्त्वेन वृत्तिता ( विद्यमानता ) सम्भव नहीं, तब तत्पद की उसमें वृत्ति ( शक्ति ) नहीं हो सकती, क्योंकि त्वम्पदार्थ तत्पदार्थ से अभिन्न या विशुद्ध होकर रह जाता है । तब आत्मा अपने में आरोपित सकल कर्तृत्वादि ( प्रमातृत्वादि ) धर्मों का परित्याग कर डालता है । इसी अर्थ ( ब्रह्मगत फल-व्याप्यताभाव के प्रदर्शन ) में श्रुति प्रमाण प्रस्तुत करते हैं—"यस्यामतं तस्य मतम्, मतं यस्य न वेद सः" (केनो. २।३) । [ जिस व्यक्ति को 'ब्रह्म अमतम्' ( ज्ञानाविषयः ) ऐसा निश्चय है, उस व्यक्ति को ही मतम् ( सम्यक् निश्चय ) है । उसके विपरीत जिस व्यक्ति को 'ब्रह्म मतम्' ( ज्ञानस्य विषयः ) ऐसा निश्चय होता है, वह ब्रह्म का वस्तुस्वरूप नहीं समझ पाया ] । प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—"अतोऽविद्याकल्पितसंसारित्वनिवर्तनेन न मोक्षस्यानित्यत्वदोषः" ।

परकीय पक्ष में मोक्ष की अनित्यतापत्ति का उद्भावन करते हैं—"यस्य तूत्पाद्यो मोक्षः, तस्य कार्यम् अपेक्षते" । यहाँ 'कार्य' पद से यागादि-जन्य अपूर्व विवक्षित है, मोक्ष अपनी उत्पत्ति में उसी अपूर्व को अपेक्षा करता है । 'तयोः पक्षयोः" का अर्थ है—'निर्वर्त्य- विकार्यपक्षयोः । 'मोक्षस्य ध्रुवमनित्यत्वम्, न हि दध्यादि विकार्यमुत्पाद्यं वा घटादि नित्यं दृष्टं लोके" । निर्वर्त्य ( उत्पाद्य ) और विकार्य पक्षों का उदाहरण यह है—( १ ) बौद्धगण क्षणिक विज्ञान को आत्मा मानते हैं, उनके पक्ष में विज्ञान-सन्तति में उत्पद्यमान विशुद्ध विज्ञानक्षणों को मोक्ष माना जाता है, अतः वह मोक्ष निर्वर्त्य है । [ चित्त या विज्ञान में क्लेशावरण और ज्ञेयावरण—ये दो प्रकार के मल माने जाते हैं, उनकी निवृत्ति ही चित्त की विशुद्धता है—"धर्माभावोपलब्धिश्च निःक्लेशविशुद्धता" । ( महायान सू. १३।१६ ) । बौद्ध- निकायों के विविध निर्वाणवाद हैं, उनका दिग्दर्शन भूमिका में देखा जा सकता है ] ।

अन्य आचार्यों के मत में संसाररूप अवस्था छोड़ कर कैवल्यावस्था को आत्मा वैसे ही प्राप्त करता है, जैसे सुवर्ण पिण्डावस्था को छोड़ कर कटकादि में विकृत होता है । यह अवस्थान्तर-प्राप्तिरूप मोक्ष वैसे ही विकार्य है, जैसे दूध का अपनी पूर्वावस्था को छोड़ कर