भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमोक्षस्योत्पाद्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४९
लोके । न चाप्यत्वेनापि कार्यापेक्षा; स्वात्मस्वरूपत्वे सत्यनाप्यत्वात् । स्वरूपव्यति- रिक्तत्वेऽपि ब्रह्मणो नाप्यत्वं, सर्वगतत्वेन नित्याप्तस्वरूपत्वात्सर्वेण ब्रह्मणः, आकाश- स्येव । नापि संस्कार्यो मोक्षः, येन व्यापारमपेक्षेत । संस्कारो हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्याद्दोषापनयनेन वा ? न तावद् गुणाधानेन संभवति; अनाधेयातिशय-
भामती
‘यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते’ इति श्रुतेर्ब्रह्मणो विकृताविकृतदेशभेदावगमादविकृतदेशब्रह्मप्राप्तिरुपा- सनाविधिविधेया भविष्यति । तथा च प्राप्यकर्मता ब्रह्मण इत्यत आह ॐ न चाप्यत्वेनापि इति ॐ । अन्यदन्येन विकृतदेशपरिहाण्याऽविकृतदेशं प्राप्यते । तद्यथोपेवेलं जलधिरतिबहलचपलकल्लोलमालापर- स्परास्फालनसमुल्लसत्फेनपुञ्जस्तवकतया विकृतः, मध्ये तु प्रशान्तसकलकल्लोलोपसर्गः स्वस्थः स्थिर- तयाऽविकृतस्तस्य मध्यमविकृतं पोतिकः पोतेन प्राप्नोति । जीवस्तु ब्रह्मैवेति किं केन प्राप्यतां, भेदाश्रय- त्वात् प्राप्तेरित्यर्थः । अथ जीवो ब्रह्मणो भिन्नस्तथापि न तेन ब्रह्माप्यते, ब्रह्मणो विभुत्वेन नित्यप्राप्तत्वा- दित्याह ॐ स्वरूपव्यतिरिक्तत्वेऽपि इति ॐ । संस्कार्यकर्मतामपाकरोति ॐ नापि संस्कार्यं इति ॐ । द्वयी हि संस्कार्यता, गुणाधानेन वा यथा बीजपूरककुसुमस्य लाक्षारसावसेकस्तेन हि तत् कुसुमं संस्कृतं लाक्षासवर्णं फलं प्रसूते । दोषापनयेन वा यथा मलिनमादर्शतलं निघृष्टमिष्टकाचूर्णेनोद्भासितभास्वरत्वं
भामती-व्याख्या
अवस्थान्तर की प्राप्ति दधिरूप विकार है। इन दोनों पक्षों में घट और दधि के समान मोक्ष में अनित्यत्व सिद्ध होता है ।
शङ्का—मोक्ष यदि उत्पाद्य या विकार्य नहीं, तब प्राप्य तो अवश्य है, क्योंकि "अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु" ( छां. ३।१३।३ ) इत्यादि श्रुतियों के अनुरोध पर आत्मा के दो ( विकृत और अविकृत ) देश प्रतीत होते हैं। उनमें अविकृत देश की प्राप्ति उपासना-विधि की देन है, वही मोक्ष है, अतः मोक्ष में प्राप्य कर्मता स्थिर होती है।
समाधान—भाष्यकार ने उक्त पक्ष का खण्डन करने के लिए कहा है—"न चाप्यत्वेनापि कार्यापेक्षा, स्वात्मस्वरूपत्वे सत्यनाप्यत्वात्" । तात्पर्य यह है कि अन्य वस्तु अन्य साधन के द्वारा विकृत देश को छोड़ कर अविकृत देश को प्राप्त होती है, जैसे जलधि ( महासागर ) अपने तट के समीप अत्यन्त चपल और उत्ताल तरङ्गावलियों के परस्पर आस्फालन ( टकराहट ) से फेनिल अवस्था में विकृत होता है और वही मध्य भाग में जा कर सकल कल्लोल ( उछल-कूद ) को छोड़ कर नितान्त प्रशान्त होता है। नाविक अपने नौका यान के द्वारा उसी प्रशान्त क्षेत्र को प्राप्त करता है, किन्तु जीव तो ब्रह्म रूप ही है, अतः वह किस अन्य पदार्थ को प्राप्त करेगा ? प्राप्ति क्रिया सदैव प्रापक और प्राप्य के भेद की अपेक्षा करती है, प्रकृत में प्रापक ( जीव ) और प्राप्य ( ब्रह्म ) का भेद न होने के कारण प्राप्ति सम्भव नहीं, फलतः मोक्ष में प्राप्य कर्मता क्योंकर बनेगी ? यदि जीव को ब्रह्म से भिन्न भी मान लिया जाय, तब भी वह प्राप्य नहीं हो सकता, क्योंकि लोक में प्राप्य वही माना जाता है, जो कभी अप्राप्त हो, ब्रह्म तो विभु होने के कारण सदैव प्राप्त है—"स्वरूपव्यतिरिक्तत्वेऽपि ब्रह्मणो नाप्यत्वम्, सर्वगतत्वेन नित्याप्तस्वरूपत्वात्" ।
मोक्ष में संस्कार्यकर्मता का अपाकरण किया जाता है—"नापि संस्कार्यो मोक्षः"। संस्कार्य कर्मता दो प्रकार की होती है—( १ ) गुण-विशेष की उत्पत्ति के द्वारा जैसे—
कुसुमे बीजपूरादेः यल्लाक्षाद्युपसिच्यते ।
तद्रूपस्यैव संक्रान्तिः फले तस्येति वासना ॥ ( प्र. वा. भा. पृ. ३५८ )
बीजपूर ( बिजोरा निम्बू ) के फल को लाख के रस ( पानी ) से तर कर देने पर विजोरा