भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१५०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

ब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य । नापि दोषापनयनेन; नित्यशुद्धब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य ।

स्वात्मधर्म एव संस्तिरोभूतो मोक्षः क्रियायात्मनि संस्क्रियमाणेऽभिव्यज्यते, यथाऽऽदर्शे निघर्षणक्रियया संस्क्रियमाणे भास्वरत्वं धर्म इति चेत्,—न; क्रियाश्रयत्वानुपपत्तेरात्मनः । यदाश्रया क्रिया तमविकुर्वती नैवात्मानं लभते । यद्यात्मा क्रियया

भामती

संस्कृतं भवति । तत्र न तावद् ब्रह्मणि गुणाधानं सम्भवति । गुणो हि ब्रह्मणः स्वभावो वा भिन्नो वा ? स्वभावश्चेत् कथमाधेयस्तस्य नित्यत्वात् । भिन्नत्वे तु कार्यत्वेन मोक्षस्यानित्यत्वप्रसङ्गः । न च भेदे धर्मधर्मिभावो गवाश्ववत् । भेदाभेदश्च व्युदस्तो विरोधात् । तदनेनाभिसन्धिनोक्तम् ॐ अनाधेयातिशयब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य ॐ । द्वितीयं पक्षमपक्षिपति ॐ नापि दोषापनयनेन इति ॐ । अशुद्धिः सती दर्पणे निवर्त्तते, न तु ब्रह्मणि असती निवर्त्तनीया, नित्यनिवृत्तत्वादित्यर्थः ।

शङ्कते ॐ स्वात्मधर्म एव इति ॐ । ब्रह्मस्वभाव एव मोक्षोऽनाद्यविद्यामलावृत उपासनादिक्रिययाऽऽत्मनि संस्क्रियमाणेऽभिव्यज्यते, न तु क्रियते । एतदुक्तं भवति—नित्यशुद्धत्वमात्मनोऽसिद्धं, संसारावस्थायामविद्यामलिनत्वादिति । शङ्कां निराकरोति ॐ न ॐ । कुतः ? ॐ क्रियाश्रयत्वानुपपत्तेः ॐ । नाविद्या ब्रह्माaction/ब्रह्माश्रया, किन्तु जीवे, सा त्वनिर्वचनीयेत्युक्तं, तेन नित्यशुद्धमेव ब्रह्म । अभ्युपेत्य त्वशुद्धिं क्रियासंस्कार्यत्वं दूष्यते । क्रिया हि ब्रह्मसमवेता वा ब्रह्म संस्कुर्यात्, यथा घर्षणमिष्टकाचूर्णसंयोग-

भामती-व्याख्या

का फल अन्दर से लाल हो जाता है । यहाँ फूल पर लालिमात्मक गुण का आधान किया जाता है, वह फूल की लालिमा फल के रस में परिणत हो जाती है । (२) दूसरा संस्कार दोषापनयन के द्वारा किया जाता है, जैसे मलिन दर्पण-तल पर ईंट का चूर्ण रगड़ने से दर्पण संस्कृत अर्थात् निर्मल हो जाता है । ब्रह्म पर गुणाधानरूप संस्कार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ब्रह्म पर जो गुण उत्पन्न किया जाता है, वह क्या ब्रह्म का स्वरूप है ? अथवा ब्रह्म से भिन्न ? यदि स्वभाव है, तब वह आधेय नहीं हो सकता, क्योंकि नित्य ब्रह्म का स्वरूप भी नित्य ही है । संस्कार को ब्रह्म से भिन्न और उत्पाद्य मानने पर मोक्ष में अनित्यत्वापत्ति होती है । अत्यन्त भेद मानने पर संस्कार और ब्रह्म का वैसे ही धर्मधर्मिभाव नहीं बन सकता, जैसे गौ और अश्व का । भेदाभेद-पक्ष का निरास पहले ही किया जा चुका है, क्योंकि वह परस्पर-विरुद्ध है—इस आशय को मन में रखकर कहा है—"अनाधेयातिशयब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य" । संस्कार के दोषापनयनरूप द्वितीय कल्प का निरास किया जा रहा है—"नापि दोषापनयनेन, नित्यशुद्धब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य" । आशय यह है कि दृष्टान्त-स्थल पर मल या अशुद्धि वस्तुतः होती है, तब उसकी निवृत्ति हो सकी, किन्तु ब्रह्म पर अशुद्धि की सत्ता तीनों कालों में भी नहीं, तब नित्य असत् या निवृत्त पदार्थ की निवृत्ति क्योंकर होगी ?

शङ्का-सूचक शब्द न होने पर भी यह शङ्का-भाष्य है—'स्वात्मधर्म एव संस्तिरोभूतो मोक्षः' । यद्यपि मोक्ष ब्रह्म-स्वभाव है, तथापि वह अनादि अविद्यारूप मल से आच्छन्न है, उपासनादि क्रिया के द्वारा आत्मा के संस्कृत हो जाने पर वह अभिव्यक्त हो जाता है । शङ्कावादी का अभिप्राय यह है कि आत्मा में नित्यशुद्धत्व सिद्ध नहीं, क्योंकि संसारावस्था में वह अविद्यारूप मल से युक्त होता है । उक्त शङ्का का निराकरण किया जाता है—"न" । किसी भी क्रिया के द्वारा ब्रह्म का संस्कार नहीं किया जा सकता, क्योंकि "क्रियाश्रयत्वानुपपत्तेः" । अविद्या भी ब्रह्म के आश्रित नहीं रहती, किन्तु जीव के आश्रित रहती है । अविद्या अनिर्वचनीय है—यह कहा जा चुका है । फलतः ब्रह्म नित्य शुद्ध ही है । ब्रह्म में अविद्यारूप अशुद्धि को मानकर क्रिया के द्वारा संस्कार्यत्व का निरास किया गया है, क्योंकि क्या क्रिया ब्रह्म के