भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ब्रह्मणोऽविषयत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५१

विक्रियेत, अनित्यत्वमात्मनः प्रसज्येत । ‘अविकार्योऽयमुच्यते’ ( भ. गी. २।२५ ) इति चैवमादीनि वाक्यानि बाध्येरन् । तच्चानिष्टम् । तस्मान्न स्वाश्रया क्रियाऽऽत्मनः संभवति । अन्याश्रयायास्तु क्रियाया अविषयत्वान्न तयाऽऽत्मा संस्क्रियते । ननु देहाश्रयया स्नानाचमनयज्ञोपवीतादिकया क्रियया देही संस्क्रियमाणो दृष्टः, न; देहादिसंहतस्यैवाविद्यागृहीतस्यात्मनः संस्क्रियमाणत्वात् । प्रत्यक्षं हि स्नानाचमनादेर्देहसमबायित्वम् । तया देहाश्रयया तत्संहत एव कश्चिदविद्ययात्मत्वेन परिगृहीतः संस्क्रियत इति युक्तम् । यथा देहाश्रयचिकित्सानिमित्तेन धातुसाम्येन तत्संहतस्य तदभिमानिन आरोग्यफलम् , अहमरोग इति बुद्धिरुत्पद्यते । एवं स्नानाचमनयज्ञोपवीतादिना अहं


भामती

विभागप्रचयो निरन्तर आदर्श तलसमवेतोऽन्यसमवेतो वा । न तावद् ब्रह्मधर्मः क्रिया, तस्याः स्वाश्रयविकारहेतुत्वेन ब्रह्मणो नित्यत्वव्याघातात् । अन्याश्रया तु कथमन्यस्योपकरोति, अतिप्रसङ्गात् । न हि दर्पणे निघृष्यमाणे मणिविशुद्धो दृष्टः । ॐ तच्चानिष्टम् इति ॐ । तदा बाधनं परामृशति । अत्र व्यभिचारं चोदयति ॐ ननु देहाश्रयया इति ॐ । परिहरति ॐ न, देहसंहतस्य इति ॐ । अनाद्यनिर्वचनीयाविद्योपधानमेव ब्रह्मणो जीव इति च क्षेत्रज्ञ इति चाचक्षते । स च स्थूलसूक्ष्मशरीरेन्द्रियादिसंहतस्तत्सङ्घातमध्यपतितस्तदभेदेनाहमितिप्रत्ययविषयीभूतोऽतः शरीरादिसंस्कारः शरीरादिधर्मोऽप्यात्मनो भवति, तदभेदाध्यवसायात् । यथाऽङ्गरागधर्मः सुगन्धिता कामिनीनां व्यपदिश्यते । तेनात्रापि यदाश्रिता क्रिया सांव्यवहारिकप्रमाणविषयोकृता तस्यैव संस्कारी नान्यस्येति न व्यभिचारः । तत्त्वतस्तु न क्रिया न


भामती-व्याख्या

आश्रित होकर वैसे ही ब्रह्म को संस्कृत करती है, जैसे आदर्श-तल पर इष्टिका-चूर्णका निरन्तर संयोग-विभाग-प्रचयरूप घर्षण ? अथवा अन्य वस्तु में रहकर क्रिया ब्रह्म को संस्कृत करती है ? क्रिया ब्रह्म का धर्म नहीं हो सकती, क्योंकि वह नियमतः अपने आश्रय को विकृत करती है, यदि ऐसा मान लिया जाय, तब ब्रह्मगत नित्यत्व-प्रतिपादक श्रुतियों का विरोध होता है । ब्रह्म से अन्य पदार्थ में रहनेवाली क्रिया के द्वारा ब्रह्म संस्कृत नहीं हो सकता, अन्यथा दर्पण पर इष्टिका-चूर्ण रगड़ने पर स्फटिक मणि भी संस्कृत हो जायगी, किन्तु वैसा कभी लोक में देखा नहीं जाता । "तच्चानिष्टम्"-इस भाष्य में 'तत्' पद के द्वारा ब्रह्मगत अनित्यत्व का बाध गृहीत होता है, अर्थात् ब्रह्मगत अनित्यत्व का बाध किसी को भी अभीष्ट नहीं । 'यदाश्रिता क्रिया भवति, तया तदेव संस्क्रियते'-इस नियम के व्यभिचार की शङ्का की जा रही है-"ननु देहाश्रयया स्नानाचमनयज्ञोपवीतादिकया क्रियया देही संस्क्रियमाणो दृष्टः" । उक्त शङ्का का परिहार किया जा रहा है-"न, देहादिसंहतस्यैवात्मनः संस्क्रियमाणत्वात्" । अर्थात् देह-तादात्म्यापन्न आत्मा ही स्नानादि क्रिया का कर्त्ता ( आश्रय ) और वही उसके फल का भोक्ता माना जाता है, अतः उसकी क्रिया से वह ( विशिष्ट ) आत्मा संस्कृत होता है, शुद्ध ब्रह्म नहीं, क्योंकि अनादि और अनिर्वचनीय अविद्यारूप उपाधि से युक्त ब्रह्म को जीव, क्षेत्रज्ञादि पदों के द्वारा अभिहित किया जाता है । वह स्थूल शरीर एवं इन्द्रियादि-घटित सूक्ष्म शरीर से विशिष्ट होता है । देहादि संघात के मध्य में निविष्ट वह देहादि-तादात्म्याध्यास के कारण देहादि को 'अहम्' ही मानता है, इस प्रकार शरीर का संस्कार शरीर-विशिष्ट आत्मा का वैसे ही माना जाता है, जैसे कामिनी के शरीर पर मले हुए चन्दन-चूर्ण की सुगन्धि का व्यवहार कामिनी में होता है, फलतः व्यावहारिक प्रत्यक्षादि प्रमाणों के द्वारा स्नानादि क्रिया जिस आश्रय में देखी जाती है, वह संस्कृत होता है, उक्त नियम में किसी प्रकार का व्यभिचार नहीं होता । तत्त्वतः ( पारमार्थिक दृष्टि से ) पृथक्

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