भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१५२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

शुद्धः संस्कृत इति यत्र बुद्धिरुत्पद्यते स संस्क्रियते। स च देहेन संहत एव। तेनैव ह्यहंकर्त्राऽहंप्रत्ययविषयेण प्रत्ययिना सर्वाः क्रिया निर्वर्त्यन्ते। तत्फलं च स एवाश्नाति; ‘तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’ (मुण्ड० ३।१।१) इति मन्त्र-वर्णात्। ‘आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः’ (काठ० १।३।४) इति च। तथा च ‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च’ (श्वेता० ६।११) इति, ‘स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम-स्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्’ (ईशा० ८) इति चैतौ मन्त्रावनाधेयातिशयतां नित्यशुद्धतां च ब्रह्मणो दर्शयतः। ब्रह्मभावश्च मोक्षः। तस्मान्न संस्कार्योऽपि मोक्षः। अतोऽन्यन्मोक्षं प्रति क्रियानुप्रवेशद्वारं न शक्यं केनचिद्दर्शयितुम्। तस्माज्ज्ञानमेकं मुक्त्वा क्रियाया


भामती

संस्कार इति। सनिदर्शनं तु शेषमध्यासभाष्य एव कृतव्याख्यानमिति नेह व्याख्यातम्। ॐ तयोरन्यः पिप्पलं इति ॐ। अन्यो जीवात्मा, पिप्पलं कर्मफलम्। ॐ अनश्नन्नन्य - इति ॐ। परमात्मा। संहतस्यैव भोक्तृत्वमाह मन्त्रवर्णः। ॐ आत्मेन्द्रिय इति ॐ। अनुपहितशुद्धस्वभावब्रह्मप्रदर्शनपरो मन्त्रौ पठति ॐ एको देवः इति ॐ। "शुक्रं" दीप्तिमत् , "अव्रणं" दुःखरहितम्, "अस्नाविरम्" अविगलितम् , अविनाशीति यावत्। उपसंहरति ॐ तस्माद् इति ॐ। ननु मा भून्निर्वर्त्यादिकर्मताचतुष्टयी, पञ्चमी तु काचिद् विधा भविष्यति यया मोक्षस्य कर्मता घटिष्यत इत्यत आह ॐ अतोऽन्यद् इति ॐ। एभ्यः प्रकारेभ्यो न प्रकारान्तरमन्यदस्ति, यतो मोक्षस्य क्रियानुप्रवेशो भविष्यति। एतदुक्तं भवति - चतसृणां विधानां मध्येऽन्यतमतया क्रियाफलत्वं व्याप्तं, सा च मोक्षाद् व्यावर्त्तमाना व्यापकानुपलब्ध्या मोक्षस्य क्रियाफलत्वं व्यावर्त्तयतीति। तत् किं मोक्षे क्रियेव नास्ति, तथा च तदर्थानि शास्त्राणि तदर्थाश्च प्रवृत्तयोऽ-


भामती-व्याख्या

न कोई क्रिया होती है और न तज्जन्य संस्कार। आध्यासिक दृष्टि का विशेष वर्णन "परत्र पूर्वदृष्टावभास"—इस भाष्य की व्याख्या में विविध उदाहरणों के द्वारा पहले किया जा चुका है, अतः यहाँ विशेष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। "तयोरन्यः" इस श्रुति में 'अन्यः' का अर्थ जीव, 'पिप्पलं' का अर्थ कर्म-फल और 'अनश्नन् अन्यः' का अर्थ ब्रह्म या परमात्मा है, क्योंकि शुद्ध चैतन्य में फल-भोक्तृत्व नहीं होता, संहत, उपहित या विशिष्ट आत्मा में ही भोक्तृत्व का वर्णन मन्त्र वर्ण (संहिता-मन्त्र) करता है—"आत्मा इन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः" (कठ० १।३।४)। अनुपहित या शुद्धस्वभाव ब्रह्मपरक दो मन्त्रों का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है—"एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा" (श्वेता. ६।११)। द्वितीय मन्त्र में 'शुक्रम्' का अर्थ—दीप्तिमान् (शुक्ल), 'अव्रणम्' का अर्थ दुःख-रहित, 'अस्नाविरं' का अर्थ—अविगलित (अविनाशी) है। प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—"तस्मान्न संस्कार्योऽपि मोक्षः"। यदि ऐसी शङ्का हो कि निर्वर्त्य, आप्य, विकार्य और संस्कार्यरूप चार प्रकारों से भिन्न पाँचवीं कोई विधा हो सकती है, जिसको लेकर मोक्ष में कर्मता (क्रियाश्रयता) घट जायगी। तो वैसी शङ्का का निरास किया जाता है—"अतोऽन्यन्मोक्षं प्रति क्रियानुप्रवेशद्वारं न शक्यं केनचिद् दर्शयितुम्"। अर्थात् इन चार प्रकारों को छोड़ कर कोई पञ्चम प्रकार ऐसा नहीं दिखाया जा सकता, जिसके द्वारा मोक्ष में क्रिया की अपेक्षा सिद्ध की जा सके। 'यत्र-यत्र क्रियाफलत्वम्, तत्र-तत्र निर्वर्त्यत्वादिचतुष्टयान्यतमत्वम्'—इस प्रकार की व्याप्ति पर्यवसित होती है, अतः प्रकृत (ब्रह्मभावरूप) मोक्ष में निर्वर्त्यत्वाद्यन्यतमता की निवृत्ति से क्रिया-जन्यत्व की निवृत्ति हो जाती है। यह जो शङ्का होती है कि यदि मोक्ष में किसी प्रकार की क्रिया (कृति-साध्यता)